जैसलमेर। आपने कई बार सुना होगा कि सरकारी नौकरी के पीछे लोग अपनी आधी से ज्यादा जिंदगी कुर्बान कर देते हैं और फिर भी उन्हें नहीं मिल पाती। इसके अलावा कई बार सरकारी नौकरी के लिए सरकार को जरूरत कुछ सौ कर्मचारियों की ही होती है लेकिन उसमें आवेदन लाखों से भी अधिक आते हैं। ऐसे में जब सरकारी नौकरी के लिए लोग एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं, तो एक ऐसा शख्स भी है जो सरकारी नौकरी से इस्तीफा देकर खेती कर रहा है। एलोवेरा की खेती के जरिए से यह शख्स हर साल तकरीबन डेढ़ से दो करोड़ रुपये तक कमा रहा है। इस शख्स का नाम हरीश धनदेव है। किसानों के परिवार से आने वाले हरीश ने कुछ समय पहले ही एक अच्छी खासी सरकारी नौकरी को गुड बाय बोला है और अब वे एक 120 एकड़ से भी अधिक जमीन पर एलोवेरा उगा रहे हैं। हरीश धनदेव ने जैसलमेर से 45 किलोमीटर दूर स्थित धाइसर में एक अपनी कंपनी भी खोली है। ‘नचरेलो एग्रो’ नामक यह कंपनी भारी मात्रा में पतंजली को एलोवेरा भी सप्लाई करती है। इससे पतंजली एलोवेरा जूस बनाती है। एक्सपर्ट्स बताते हैं कि थार रेगिस्तान में उगने वाले ये एलोवेरा बाकी एलोवेरा से काफी बेहतर होते हैं। देश के साथ साथ विदेशी बाजार में भी इन एलोवेरा की काफी मांग है। हरीश ने कहा कि वे जैसलमेर नगर निगम में जूनियर इंजीनियर के पद नौकरी कर रहे थे। तनख्वाह भी अच्छी थी। उन्होंने कहा, ‘कुछ समय तक नौकरी करने के बाद मेरा मन कुछ और करने का हुआ। इसके बाद नौकरी से इस्तीफा दिया और खेती की ओर कदम बढ़ा दिए। हालांकि, मेरे पास जमीन थी लेकिन कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या खेती की जाए।’ हरीश का कहना है कि पिछले साल दिल्ली में हुए ‘एग्रीकल्चर एक्सपो’ से उन्हें एलोवेरा उगाने का आईडिया मिला। शुरुआत में हरीश ने अपने खेत में तकरीबन 80,000 एलोवेरा के पौधे लगाए और अब इसकी संख्या सात लाख तक पहुंच गई है। पिछले चार महीनों में हरीश 125-150 टन तक एलोवेरा पतंजली आयुर्वेद को बेच चुके हैं।
हमारे उद्देश्य: - मेघवाल समुदाय समृद्ध सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, मानसिक और सांस्कृतिक. मृत्यु भोज, शराब दुरुपयोग, बाल विवाह, बहुविवाह, दहेज, विदेशी शोषण, अत्याचार और समाज और सामाजिक कार्यकर्ताओं पर अपराधों को रोकने के लिए और समाज के कमजोर लोगों का समर्थन की तरह प्रगति में बाधा कार्यों से छुटकारा पाने की कोशिश करेंगे :- नवरत्न मन्डुसिया
शुक्रवार, 24 मार्च 2017
विश्व मे नाम रोशन किया मेघवाल समाज की इन छः बेटियों ने
मेघवाल समाज की बेटियों पर गर्व है जो की आज इस मुकाम पर पहुँची है
जिस जैसलमेर जिले में लोग बेटियों के पैदा होते ही उनसे नफरत करने लगते थे आज उस जिले की बेटियां ही अपने जिले का नाम रोशन करती दिख रही हैं. जैसलमेर जिले की एक दलित परिवार की बेटी प्रेम धनदे ने जिले की पहली महिला RPS बनकर पूरे जैसलमेर जिले को गौरवान्वित किया है.
गांव में 150 साल बाद बारात आई थी
जैसलमेर एक पर्यटन नगरी है और पूरे देश दुनिया के सैलानी यहां पर इसकी खूबसूरती को निहारने के लिए हर साल आते हैं. एक और जहां ये पूरी दुनिया में स्वर्ण नगरी के नाम से जानी जाती है वहीँ दूसरी तरफ ये जिला बेटी को पैदा होते ही मारने के रिवाज पर कुख्यात भी रहा है. यहां के एक गांव में तो 150 साल बाद कोई बारात आई थी. और लोग इस जिले को बड़ी हेय द्रष्टि से भी देखते हैं. मगर वक़्त बदला तो इंसान भी बदले. और आज कल यहां की बेटियाँ पूरे देश में अपना और अपने परिवार का नाम रोशन कर रही हैं.
गांव का नाम रोशन कर रही हैं बेटियां
फिलहाल बेटियों के लिए अभिशाप माने जाने वाले इस जिले की शान में चार चांद लगा दिए हैं. यहां के एक दलित परिवार ने. चेलक गांव के इस दलित परिवार को धनदेव परिवार के नाम से लोग जानते हैं. कांग्रेस के लीडर और पीसीसी सचिव रूपा राम धनदेव के परिवार में 6 बेटियां है और सभी अपनी - अपनी फील्ड में अपना नाम रोशन कर रही है. जहां धनदेव की सबसे बड़ी बेटी अंजना मेघवाल जैसलमेर जिले की जिला प्रमुख हैं, वहीँ बाकी तीन बेटियां डॉक्टर हैं. एक बेटी अमेरिका में इंजीनियरिंग की पढाई कर रही है. इन्ही छह बेटियों में एक बेटी प्रेम धनदेव इन दिनों पूरे राजस्थान में अपने नाम का परचम लहरा रही है.
मां- बाप की बदौलत ही पहुंची मुकाम पर
प्रेम जैसलमेर जिले की पहली महिला RPS है और फिलहाल अभी अंडर ट्रेनिंग हैं. दिलचस्प बात है कि हाल ही में जयपुर में हुई पुलिस परेड में उसने छ प्लाटून में से एक प्लाटून का परेड में नेतृत्व कर जिले को गौरवान्वित कर दिया. प्रेम इसके लिए अपने माँ बाप को धन्यवाद देती है और साथ ही यह भी कहती है कि आज वह जो कुछ भी है. अपने मां- बाप की बदौलत ही है.
गांव के लिए प्रेरणा बनीं धनदेव परिवार की बेटियां
प्रेम के पिता रूपा राम धनदेव का कहना है की बेटी होना अब अभिशाप नहीं रहा. लोग मुझे कहते थे की आपके छ बेटियाँ है और अब क्या होगा ?क्योंकि माँ बाप को बेटी होते ही उसके दहेज़ और शादी की चिंता सताती है मगर मैंने इन सबको दरकिनार करके अपनी बेटियों को पढाया लिखाया और समाज की धरा के विपरीत जाकर इनको इस काबिल बनाया है कि लोग आज इनकी मिसाल देते हैं तथा अपनी बेटियों को भी इनकी तरह बनने की प्रेरणा देते हैं.
भाई को भी है अपनी बहन पर नाज
वहीँ छ बहनों के एक मात्र भाई हरीश का कहना है की लोगों का बेटियों के प्रति अब नजरिया बदलना चाहिए क्योंकि अब वो हर क्षत्रे में सबसे आगे निकल रही है और मुझे गर्व है की मेरी बहन जैसलमेर जिले की पहली महिला RPS है.
गुरुवार, 23 मार्च 2017
निर्मला मेघवाल को राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार से किया समानीत
राजकीय जमुना देवी पांडेय बालिका सीसै स्कूल पाटन नीमकाथाना की प्रधानाचार्य निर्मला देवी मेघवाल को शिक्षक दिवस पर दिल्ली में राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार दिया जाएगा। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी निर्मला देवी को राष्ट्रीय शिक्षक सम्मान के रूप में प्रशस्ति पत्र, 50 हजार नकद सिल्वर मैडल देंगे। मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा 3 से 5 सितंबर तक दिल्ली में होने वाले विभिन्न कार्यक्रमों में शामिल होने के लिए निर्मला देवी को आमंत्रित किया गया है। उनको यह पुरस्कार श्रेष्ठ बोर्ड परीक्षा परिणाम, गाइडिंग के क्षेत्र में राज्यस्तरीय, राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विशेष योगदान, पुरस्कारों समाजसेवा के लिए दिया जा रहा है श्रीमती निर्मला जी मेघवाल नीमकाथाना
अनुसुचित जाति राजस्थान की पहली महिला है जिनका चयन
नैशनल टीचर आवार्ड
के लिए हुआ है
जो हमारे समाज और राजस्थान के अनुसुचित जाति/जनजाति वर्ग के लिए बहुत खुशी की बात है
पुरुषोत्तम मेघवाल ने छोड़ी दस से ज्यादा बड़ी सरकारी नौकरियाँ और 150 से ज्यादा युवाओं को बनाया आई.ए.एस & आई.पी.एस
उच्च शिक्षित होने के बावजूद इन युवाअों ने कोई बड़ा सरकारी पद और किसी कंपनी में नौकरी कर बड़ी सैलरी पाने का सपना नहीं संजोया। गोल्ड मेडलिस्ट,एमटेक और प्रशिक्षित आईएएस होने के बाद भी सभी में कुछ अलग करने की चाहत है।
मीनल मुंशी,दिल्ली के आईआईटीएम से एमबीए(गोल्ड मेडलिस्ट)हैं। विजय पाटीदार,एमटेक हैं तो वहीं पुरुषोत्तम मेघवाल प्रशिक्षित आईएएस। ये चंद नाम बानगीभर है...राजधानी में ऐसे हजारों से अधिक युवा हैं,जो अपनी पढ़ाई जारी रखते हुए निर्धन बच्चों व अन्य विद्यार्थियों को पढ़ा रहे हैं। और खास बात तो यह है ॥ की पुरुषोत्तम मेघवाल ने अब तक बड़ी से बड़ी नौकरियों को छोड़कर अबतक 150 युवाओं को आई.ए एस और आई .पी.एस बनाया है और अभी इनका नीमच (मध्यप्रदेश ) मे मेघवाल निःशुल्क के नाम से कोचिंग सेंटर है जिसमे हजारो युवा कोचिंग कर रहे है
इन्होंने बीड़ा उठाया गरीब परिवारों के बच्चों को निशुल्क पढ़ाने का। इनमें से कुछ ऐसे हैं,जिन्होंने सरकारी और गैर सरकारी नौकरी कुछ ही दिन करने के बाद छोड़ दी। अब वे इसे मिशन के रूप में अपनाते हुए बच्चों को शिक्षित व संस्कारवान बनाने के काम में जुटे हैं। और हमे ऐसे युवा पर गर्व करना चाहिये की आज के ज़माने मे निःशुल्क सेवायें दे रहे है और सबसे बड़ी बात यह भी है की यह युवा गरीबो की सेवा भी करते है यदि किसी भी गरीब की फरियाद पुलिस या अन्य दफ्तर नही सुनता है तो उस दुःखद घड़ी मे उस गरीब का साथ पुर्षोतम मेघवाल देते है ॥ दोस्तो आजाद हिन्दुस्तान मे लोग आपसी स्वार्थ निकालते है लेकिन आज के ज़माने मे पुरुषोत्तम जी मेघवाल बिना स्वार्थ युवाओं को निःशुल्क सेवायें दे रहे है ॥
इन सबका कहना है कि वे पढ़-लिख कर कोई अच्छी नौकरी कर सकते थे,पर उनके मन में यह पीड़ा है कि वे तो परिवार के आर्थिक सहयोग से पढ़-लिख गए पर उन बच्चों का क्या,जो गरीब परिवारों के होने के कारण अच्छी शिक्षा प्राप्त नहीं कर पाते। ये सभी,जिसे जहां जगह मिली वहीं कक्षाएं लगाकर उन्हें मुफ्त में पढ़ा रहे हैं। उन्हें उम्मीद है कि उनकी तरह कई अन्य शिक्षित लोग शिक्षा को व्यवसाय का जरिया न बनाकर विद्यादान करेंगे। वे चाहते हैं कि हर सक्षम व्यक्ति एक-एक गरीब बच्चे को गोद लेकर उसकी पढ़ाई का जिम्मा ले। और वो गरीब बच्चा पढ़ लिख कर अपने माता पिता की सेवा करे
शिक्षा से सेवा का मन
पुरुषोत्तम मेघवाल शाजापुर में नायब तहसीलदार,कस्टम एंड सेंट्रल एक्साइज में असिस्टेंट कमिश्नर व नीमच के सरकारी काॅलेज में प्रोफेसर रह चुके हैं। पर उन्होंने ये सभी नौकरियां छोड़ दीं। वजह बताते हैं कि मुझे कुछ अलग करना था। आय के कुछ साधन बना रखे हैं। उनसे काम चल जाता है।
एक साल अधिक समय से एमपी नगर स्थित गायत्री शक्तिपीठ मंदिर के एक बड़े हाल में हर गुरुवार व शुक्रवार शाम साढ़े छह से साढ़े आठ बजे तक कक्षा लगाकर सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी कर रहे करीब हजारों बच्चों को निशुल्क कोचिंग दे रहे है ॥। गायत्री परिवार के साथ जुड़ने पर मुझे यह विचार आया। मंदिर ट्रस्ट ने मुझे यह जगह निशुल्क प्रदान की है।
मीनल मुंशी,दिल्ली के आईआईटीएम से एमबीए(गोल्ड मेडलिस्ट)हैं। विजय पाटीदार,एमटेक हैं तो वहीं पुरुषोत्तम मेघवाल प्रशिक्षित आईएएस। ये चंद नाम बानगीभर है...राजधानी में ऐसे हजारों से अधिक युवा हैं,जो अपनी पढ़ाई जारी रखते हुए निर्धन बच्चों व अन्य विद्यार्थियों को पढ़ा रहे हैं। और खास बात तो यह है ॥ की पुरुषोत्तम मेघवाल ने अब तक बड़ी से बड़ी नौकरियों को छोड़कर अबतक 150 युवाओं को आई.ए एस और आई .पी.एस बनाया है और अभी इनका नीमच (मध्यप्रदेश ) मे मेघवाल निःशुल्क के नाम से कोचिंग सेंटर है जिसमे हजारो युवा कोचिंग कर रहे है
इन्होंने बीड़ा उठाया गरीब परिवारों के बच्चों को निशुल्क पढ़ाने का। इनमें से कुछ ऐसे हैं,जिन्होंने सरकारी और गैर सरकारी नौकरी कुछ ही दिन करने के बाद छोड़ दी। अब वे इसे मिशन के रूप में अपनाते हुए बच्चों को शिक्षित व संस्कारवान बनाने के काम में जुटे हैं। और हमे ऐसे युवा पर गर्व करना चाहिये की आज के ज़माने मे निःशुल्क सेवायें दे रहे है और सबसे बड़ी बात यह भी है की यह युवा गरीबो की सेवा भी करते है यदि किसी भी गरीब की फरियाद पुलिस या अन्य दफ्तर नही सुनता है तो उस दुःखद घड़ी मे उस गरीब का साथ पुर्षोतम मेघवाल देते है ॥ दोस्तो आजाद हिन्दुस्तान मे लोग आपसी स्वार्थ निकालते है लेकिन आज के ज़माने मे पुरुषोत्तम जी मेघवाल बिना स्वार्थ युवाओं को निःशुल्क सेवायें दे रहे है ॥
इन सबका कहना है कि वे पढ़-लिख कर कोई अच्छी नौकरी कर सकते थे,पर उनके मन में यह पीड़ा है कि वे तो परिवार के आर्थिक सहयोग से पढ़-लिख गए पर उन बच्चों का क्या,जो गरीब परिवारों के होने के कारण अच्छी शिक्षा प्राप्त नहीं कर पाते। ये सभी,जिसे जहां जगह मिली वहीं कक्षाएं लगाकर उन्हें मुफ्त में पढ़ा रहे हैं। उन्हें उम्मीद है कि उनकी तरह कई अन्य शिक्षित लोग शिक्षा को व्यवसाय का जरिया न बनाकर विद्यादान करेंगे। वे चाहते हैं कि हर सक्षम व्यक्ति एक-एक गरीब बच्चे को गोद लेकर उसकी पढ़ाई का जिम्मा ले। और वो गरीब बच्चा पढ़ लिख कर अपने माता पिता की सेवा करे
शिक्षा से सेवा का मन
पुरुषोत्तम मेघवाल शाजापुर में नायब तहसीलदार,कस्टम एंड सेंट्रल एक्साइज में असिस्टेंट कमिश्नर व नीमच के सरकारी काॅलेज में प्रोफेसर रह चुके हैं। पर उन्होंने ये सभी नौकरियां छोड़ दीं। वजह बताते हैं कि मुझे कुछ अलग करना था। आय के कुछ साधन बना रखे हैं। उनसे काम चल जाता है।
एक साल अधिक समय से एमपी नगर स्थित गायत्री शक्तिपीठ मंदिर के एक बड़े हाल में हर गुरुवार व शुक्रवार शाम साढ़े छह से साढ़े आठ बजे तक कक्षा लगाकर सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी कर रहे करीब हजारों बच्चों को निशुल्क कोचिंग दे रहे है ॥। गायत्री परिवार के साथ जुड़ने पर मुझे यह विचार आया। मंदिर ट्रस्ट ने मुझे यह जगह निशुल्क प्रदान की है।
मेघवंशी सायर जयपाल के पुत्र बाबा रामदेव जी महाराज थे
सायर जयपाल एक दलित समुदाय के मेघवाल जाति व्यक्ति तथा पोखरन के जागीरदार राजा अजमल सिँह तंवर के घोड़ो को चराते थे| अवतारी बाबा रामदेव पीर का अवतरण उनके घर हुआ था। जिसे अवतार बताया गया जो एक रहस्य है। लेकिन ज्यादा तर लोगो को यह पता नही है ॥ की बाबा रामदेव जयपाल सायर मेघवाल के घर जन्मे थे और इस बात का राजस्थान उच्च न्यायालय ने मेघवाल समाज के पक्ष मे दिया गया की बाबा रामदेव जी महाराज मेघवाल समाज के जयपाल गौत्र मे जन्मे थे
रहस्य:- बाबा रामदेव के जन्म के इतिहास में इस महान रहस्य को छिपाया गया है। जिसमें बाबा रामदेव पीर का अवतार राजा अजमल तथा माता मेणादे बताया गया है। बिना मां की कोख से किसी बच्चे का जन्म हो सकता है। बाबा रामदेव का अवतार नहीँ जन्म हुआ था। वो भी मेघवाल समुदाय मे जो प्रसिद्ध इतिहासकार रामचन्द्र कड़ेला ने 'अवतारवाद के शिकार लोक क्रान्तिकारी महामानव-बाबा रामसापीर' नामक अपनी कृति मे लिखा है। "सायर सुत मंगनी रा जाया, ज्यारी महिमा भारी भेंट कियो सुत अजमलजी ने, सायर ने बलिहारी। मेघरिखा संग तंवर वंश रा, भाग जागिया भारी दुनिया जाणे रामदेवजी ने अजमल घर अवतारी." इस रहस्य से सबसे पहले पर्दा जोधपुर के उत्तम आश्रम के पीठाधीश्वर स्वामी रामप्रकाशाचार्य जी ने अपनी किताब "रामदेव गप्प पुराण" तथा "ढोल में पोल" में किया। जिसमें बाबा रामदेव का जन्म सायर मेघवंशी के घर माता मंगनी की कोख से हुआ बताया गया। प्रसिद्ध दलित लेखिका कुसुम जी मेघवाल ने अपनी पुस्तक 'मेघवाल बाबा रामदेव' वर्ष 2006 में एक शोध ग्रन्थ - 'रामदेव पीर' एक पुनर्विचार में प्रकाशित हुआ जिसमें एक बात समान थी। सायर जयपाल मेघवाल तथा माता मगनी देवी थे। तथा बाड़मेर जिले के उण्डू काश्मीर गांव के रहने वाले थे। उण्डू काश्मीर में बाबा रामदेव का सायर मेघवाल के घर जन्म है। डाली बाई बाबा रामदेव की सगी बहन है।
बाबा रामदेव पीर के जन्म सम्बंधित मामला राजस्थान उच्च न्यायालय में गया जहा से फैसला मेघवाल समुदाय के पक्ष में हुआ। बाबा रामदेव मेघवाल है और वे सायर मेघवाल के पुत्र है।
सन्दर्भ
आजाद हिंदुस्तान मे एक नयी सोच बाड़मेर जिले के गाँव का सकारात्मक नशा मुक्ति क़दम
मे नवरत्न मन्डुसिया एक सकारात्मक जानकारी अपने ब्लॉग के माध्यम से उपलब्ध करवा रहा हूँ अक्सर होली के त्यौहार पर हर आदमी नशा करता है। लेकिन बाड़मेर के सीमावर्ती आसाड़ी गांव में रहने वाले मेघवाल समाज के लोगो ने इस होली के दिन एक साथ जाजम पर बैठ कर एक ऐसा फैसला लिया की इस फ़ेसले से आने वाले दिनो मे युवाओं को सकरात्मक प्रभाव पड़ेगा जिसके कारण यह बाड़मेर का आसाडि गाँव देश विदेश और राजस्थान मे प्रशंसा हो रही है। दरअसल जानकारी के मुताबिक आसाड़ी गांव में मेघवाल समाज ने किसी भी सामाजिक कार्यक्रम में किसी भी नशा नहीं करने का निर्णय लिया है। और इस निर्णय से समाज के लोग बहूत खुश नज़र आ रहे है दोस्तो आजाद हिंदुस्तान मे आपको ऐसे सकारात्मक तथ्य बहूत कम ही मिलेंगे और खासतोर से मेघवाल समाज लेकिन आसाडी गाँव के मेघवाल समाज के लोगो ने यह साबित कर दिया है की अब हम नशा नही करेंगे तो नही...ही करेंगे मेघवाल समाज की ओर से नशा मुक्ति पर आयोजित संगोष्ठी में विद्यार्थियों ने नशा नहीं करने और परिवार को भी नशा नहीं करने देने की शपथ ली
वो भी एक होली के शुभ अवसर पर यह शपथ ली आयोजित कार्यक्रम में कहा कि नशा एक ऐसी बुराई है जो न सिर्फ व्यक्ति बल्कि उसके परिवार को भी तबाह कर देती है। समाज में पनप रहे अधिकांश अपराधों का कारण भी नशा है। कहा कि केवल व्यसन मुक्त व्यक्ति ही अच्छे समाज का निर्माण कर सकता है। और नशा व्यक्ति के भविष्य को बर्बाद कर देता है। व्यक्ति से उसके जीवन के अमूल्य क्षण छीन लेता है। और वो अमूल्य क्षण वापिस नही आता है ॥
उन्होंने शैक्षणिक संस्थानों से नियमानुसार 100 मीटर के अंदर सिगरेट, तंबाकू व अन्य नशीले पदार्थो की बिक्री पर तत्काल रोक लगाने की मांग की। मेघवाल समाज के युवा साथियों ने मेघवाल समाज को इस दिशा में कार्रवाई के निर्देश दिए। संगोष्ठी का संचालन मुख्य रुप से मेघवाल समाज के लोगो ने किया। मौके पर समाज के युवा और बुजुर्ग लोग शामिल थे और इस अवसर पर राजू मेघवाल और नरेश मेघवाल का भी योगदान रहा
इसके साथ ही अगर इस गांव में मेघवाल समाज का कोई भी व्यक्ति नशा करता हुआ पाया जाता है तो उसके खिलाफ जुर्माने का भी प्रावधान रखा है। आसाड़ी गांव निवासी नारणाराम मेघवाल ने जानकारी देते हुए बताया की होली के दिन गांव युवा वर्ग सहित बुजुर्गो ने नशे और बाल विवाह जैसी कई सामाजिक कुरतियां पर प्रतिबंध लगाने के बारे में विस्तार से चर्चा की और सभी ने इस पर सहमति दी उसके बाद ही इस तरह का निर्णय लिया गया है। इस दौरान अर्जुनराम,मखनाराम,मेहराराम,खीमाराम,किसनाराम,जेठाराम,कोजाराम,गोरखाराम,मानाराम,नेमाराम,अलाराम,रमेश,आत्माराम सहित कई लोग उपस्थित थे।
*नवरत्न मन्डुसिया की कलम से*
वो भी एक होली के शुभ अवसर पर यह शपथ ली आयोजित कार्यक्रम में कहा कि नशा एक ऐसी बुराई है जो न सिर्फ व्यक्ति बल्कि उसके परिवार को भी तबाह कर देती है। समाज में पनप रहे अधिकांश अपराधों का कारण भी नशा है। कहा कि केवल व्यसन मुक्त व्यक्ति ही अच्छे समाज का निर्माण कर सकता है। और नशा व्यक्ति के भविष्य को बर्बाद कर देता है। व्यक्ति से उसके जीवन के अमूल्य क्षण छीन लेता है। और वो अमूल्य क्षण वापिस नही आता है ॥
उन्होंने शैक्षणिक संस्थानों से नियमानुसार 100 मीटर के अंदर सिगरेट, तंबाकू व अन्य नशीले पदार्थो की बिक्री पर तत्काल रोक लगाने की मांग की। मेघवाल समाज के युवा साथियों ने मेघवाल समाज को इस दिशा में कार्रवाई के निर्देश दिए। संगोष्ठी का संचालन मुख्य रुप से मेघवाल समाज के लोगो ने किया। मौके पर समाज के युवा और बुजुर्ग लोग शामिल थे और इस अवसर पर राजू मेघवाल और नरेश मेघवाल का भी योगदान रहा
इसके साथ ही अगर इस गांव में मेघवाल समाज का कोई भी व्यक्ति नशा करता हुआ पाया जाता है तो उसके खिलाफ जुर्माने का भी प्रावधान रखा है। आसाड़ी गांव निवासी नारणाराम मेघवाल ने जानकारी देते हुए बताया की होली के दिन गांव युवा वर्ग सहित बुजुर्गो ने नशे और बाल विवाह जैसी कई सामाजिक कुरतियां पर प्रतिबंध लगाने के बारे में विस्तार से चर्चा की और सभी ने इस पर सहमति दी उसके बाद ही इस तरह का निर्णय लिया गया है। इस दौरान अर्जुनराम,मखनाराम,मेहराराम,खीमाराम,किसनाराम,जेठाराम,कोजाराम,गोरखाराम,मानाराम,नेमाराम,अलाराम,रमेश,आत्माराम सहित कई लोग उपस्थित थे।
*नवरत्न मन्डुसिया की कलम से*
शनिवार, 11 फ़रवरी 2017
इतिहास में दर्ज है मेघवाल समाज की शौर्य गाथा, और रहन सहन और आजादी के बाद बसाने पड़े अलग गांव
आजाद हिंदुस्तान में दलित मुद्दा गरमा चुका है। गुजरात में गाय की चमड़ी निकालने के आरोप में दलित युवकों की बेदर्दी से सरेराह पिटाई की गईं। लोग देखते रहे, इस घटना का वीडियो के मार्केट में आने के बाद हंगामा मच गया। उसके बाद देश के अलग-अलग हिस्सों से दलितों के प्रति हो रहे अत्याचार की बातें सामने आने लगीं। यह दासतांन इन्दौर की बताने जा रहा हूँ जब यह ख़बर मेने पत्रिका न्यूज़ पेपर पर पढ़ी तो मेने इस दास्तांन को मेरे ब्लॉग mandusiya.blogspot.com पर पोस्ट करने का विचार किया और इन्दौर मे जाकर मेघवाल समाज के लोगो से जानकारी प्राप्त की जिसे मेने इस ब्लॉग पर पोस्ट की है ॥ दोस्तो आजाद भारत मे सब लोगो का अलग अलग व्यवसाय है ॥ जिसे वो आसानी से कर रहे है
दलितों के दर्द की ये दास्तांन आपको परेशान कर देगी। यह दुखद स्थिति है देवास जिले के कई गावों में रहने वाले बलाई समुदाय के लोगों की। कभी अपनी शौर्यगाथा को इतिहास के पन्नों पर दर्ज करवा चुके बलाई समुदाय को मालवा-निमाड़ सहित प्रदेशभर में बसने के बाद कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा।
उस दौर में जब छूआछूत मानव जीवन पर हावी होने लगी, तब बलाई समुदाय के लोगों को मजबूरन अपने अलग गांव बसाने पड़े। ये गांव आज के दौर में भी पूर्ण रूप से प्रासंगिक है और यहां आज भी सवर्ण समुदाय का व्यक्ति रहना पसंद नहीं करता है।
आजादी के समय बाबा साहेब डॉ. भीमराव अबेडकर मसीहा के रूप में दलितों के अधिकारों की आवाज उठाने आगे आए, जिसके बाद उन्हें संविधान में समानता का अधिकार शामिल किया गया। लेकिन आज भी दलितों को समानता केवल शिक्षित वर्ग में ही मिल पाई। अशिक्षित और ग्रामीण इलाकों में आज भी दलितों को अपनी बस्तियां अलग ही बसानी पड़ रही है। देवास जिले के गांवों में तो स्थिति काफी दुष्कर है।
छूआछूत के कारण समुदाय के ही बसे थे गांव
करीब 40 से 50 के दशक में सामाजिक भेदभाव इतना अधिक था, कि समुदाय के लोगों को अपने गांव अलग बसाकर रहना पड़ता था। ऐसे गांव आज भी हमारे बीच हैं, जहां सिर्फ मेघवाल समुदाय के ही घर है। देवास जिले में फतेहपुर खेड़ा, कमलापुर और लक्ष्मीपुरा इसके उदाहरण है ॥
हमारे बचपन में हमने हर जगह छूआछूत सहन की है। यही कारण है कि समुदाय के लोगों को अपने अलग गांव बसाने पड़े थे, लेकिन आज मेघवाल समाज ने बदलते समय के साथ समृद्धि और सम्मान भी हासिल किया है। लक्ष्मीपुरा के रहने वाले 70 वर्षिय लालसिंह मेघवाल ने बताया कि लेकिन जैसे-जैसे समय बदला हालात सुधरते गए। शिक्षा के प्रसार से छूआछूत भी कम होती गई।
गांवों से शिक्षा और रोजगार की तलाश में शहरी क्षेत्र में पलायन किया तो वहां माहौल और बदल गया। शहरों में समुदाय के लोगों को देखने के लिए लोगों की अलग निगाह नहीं रही। हालांकि कुछ दूषित सोच रखने वाले लोग आज भी भेदभाव करने में पीछे नहीं हटते हैं। ऐसे में कई परिवार तो शहरों में ही अच्छा रोजगार पाकर वहीं बस गए। आज समुदाय के लोगों ने अच्छे-खासे समृद्ध है। जबकि आजादी के बाद वाले दौर में हमारे पास न अच्छे घर थे और न ही आजीविका के लिए अच्छे संसाधन थे।
अब समृद्धि की ओर मेघवाल समाज
शिक्षा के प्रसार के बाद मेघवाल समाज आज समृद्धि की ओर कदम बढ़ा रहा है। उस दौर में जहां समाज को हिराकत की नजर से देखा जाता था, वहीं आज समाज की नई पीढि़ उच्च शिक्षा ले रही है। यही नहीं बेटियां और बहुएं भी पढऩे में पीछे नहीं है। लक्ष्मी पुरा के 66 वर्षिय बाबूलाल मालवीय बताते हैं कि समाज के लोग अब काफी तरक्की कर रहे है। आज भूखमरी जैसी स्थिति नहीं है। समाज के लोगों के पास स्वयं के घर है, आजीविका के लिए खेत है।
टूटती परंपराओं से बिगड़ी सेहत
मेघवाल समुदाय के लोगों ने समाज की मुख्यधारा में शामिल होने की कवायद की है, लेकिन वहीं समुदाय की प्राचीन परंपराओं से दूर जाने से सेहत में भी बदलाव आता गया। जानकार बताते हैं कि समुदाय बेवर पद्धति की खेती से मुड़कर आधुनिक खेती करने लगा, जिसके कारण पोषण आहार में वे सारे पोषक तत्व शामिल नहीं हो पाए जो बेवर खेती पद्धति से उगाए गए 56 प्रकार के अनाजों से पौषण होता था। यह कारण है कि आज बलाई समुदाय के बच्चों में भी कुपोषण देखा जा रहा है।
विपरित हालातों से संघर्ष कर पाया मुकाम
राजस्थान से आने के बाद समाज के लोगों की आर्थिक स्थिति बेहद दयनीय थी, जिसके कारण ही उन्हें सामाजिक भेदभाव का सामना भी करना पड़ा। मेघवाल समाज का इतिहास रखने वाले राजेश बामनिया बताते हैं कि मप्र में आने के दौरान बलाई समाज के लोगों की आर्थिक स्थिति बेहद खराब थी, लेकिन समाज के लोगों ने विपरित परिस्थितियों से संघर्ष किया। आज भी सवर्ण जाति के लोग उन्हें शादी-ब्याह में न्यौते पर नहीं बुलाते। कई स्कूलों में मध्यान्न भोजन के समय मासूम बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया जा रहा है। इन सभी के चलते आने वाली पीढ़ि के सामने कांटों भरा रास्ता है। दलित समुदाय के लोग आज भी समानता की उम्मीद में संविधान की ओर टकटकी लगाए देख रहे हैं। और यहाँ इन्दौर मे बलाई (मेघवाल ) समाज के लोगो ने एक अच्छा योगदान भी दिया है ॥
दलितों के दर्द की ये दास्तांन आपको परेशान कर देगी। यह दुखद स्थिति है देवास जिले के कई गावों में रहने वाले बलाई समुदाय के लोगों की। कभी अपनी शौर्यगाथा को इतिहास के पन्नों पर दर्ज करवा चुके बलाई समुदाय को मालवा-निमाड़ सहित प्रदेशभर में बसने के बाद कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा।
उस दौर में जब छूआछूत मानव जीवन पर हावी होने लगी, तब बलाई समुदाय के लोगों को मजबूरन अपने अलग गांव बसाने पड़े। ये गांव आज के दौर में भी पूर्ण रूप से प्रासंगिक है और यहां आज भी सवर्ण समुदाय का व्यक्ति रहना पसंद नहीं करता है।
आजादी के समय बाबा साहेब डॉ. भीमराव अबेडकर मसीहा के रूप में दलितों के अधिकारों की आवाज उठाने आगे आए, जिसके बाद उन्हें संविधान में समानता का अधिकार शामिल किया गया। लेकिन आज भी दलितों को समानता केवल शिक्षित वर्ग में ही मिल पाई। अशिक्षित और ग्रामीण इलाकों में आज भी दलितों को अपनी बस्तियां अलग ही बसानी पड़ रही है। देवास जिले के गांवों में तो स्थिति काफी दुष्कर है।
छूआछूत के कारण समुदाय के ही बसे थे गांव
करीब 40 से 50 के दशक में सामाजिक भेदभाव इतना अधिक था, कि समुदाय के लोगों को अपने गांव अलग बसाकर रहना पड़ता था। ऐसे गांव आज भी हमारे बीच हैं, जहां सिर्फ मेघवाल समुदाय के ही घर है। देवास जिले में फतेहपुर खेड़ा, कमलापुर और लक्ष्मीपुरा इसके उदाहरण है ॥
हमारे बचपन में हमने हर जगह छूआछूत सहन की है। यही कारण है कि समुदाय के लोगों को अपने अलग गांव बसाने पड़े थे, लेकिन आज मेघवाल समाज ने बदलते समय के साथ समृद्धि और सम्मान भी हासिल किया है। लक्ष्मीपुरा के रहने वाले 70 वर्षिय लालसिंह मेघवाल ने बताया कि लेकिन जैसे-जैसे समय बदला हालात सुधरते गए। शिक्षा के प्रसार से छूआछूत भी कम होती गई।
गांवों से शिक्षा और रोजगार की तलाश में शहरी क्षेत्र में पलायन किया तो वहां माहौल और बदल गया। शहरों में समुदाय के लोगों को देखने के लिए लोगों की अलग निगाह नहीं रही। हालांकि कुछ दूषित सोच रखने वाले लोग आज भी भेदभाव करने में पीछे नहीं हटते हैं। ऐसे में कई परिवार तो शहरों में ही अच्छा रोजगार पाकर वहीं बस गए। आज समुदाय के लोगों ने अच्छे-खासे समृद्ध है। जबकि आजादी के बाद वाले दौर में हमारे पास न अच्छे घर थे और न ही आजीविका के लिए अच्छे संसाधन थे।
अब समृद्धि की ओर मेघवाल समाज
शिक्षा के प्रसार के बाद मेघवाल समाज आज समृद्धि की ओर कदम बढ़ा रहा है। उस दौर में जहां समाज को हिराकत की नजर से देखा जाता था, वहीं आज समाज की नई पीढि़ उच्च शिक्षा ले रही है। यही नहीं बेटियां और बहुएं भी पढऩे में पीछे नहीं है। लक्ष्मी पुरा के 66 वर्षिय बाबूलाल मालवीय बताते हैं कि समाज के लोग अब काफी तरक्की कर रहे है। आज भूखमरी जैसी स्थिति नहीं है। समाज के लोगों के पास स्वयं के घर है, आजीविका के लिए खेत है।
टूटती परंपराओं से बिगड़ी सेहत
मेघवाल समुदाय के लोगों ने समाज की मुख्यधारा में शामिल होने की कवायद की है, लेकिन वहीं समुदाय की प्राचीन परंपराओं से दूर जाने से सेहत में भी बदलाव आता गया। जानकार बताते हैं कि समुदाय बेवर पद्धति की खेती से मुड़कर आधुनिक खेती करने लगा, जिसके कारण पोषण आहार में वे सारे पोषक तत्व शामिल नहीं हो पाए जो बेवर खेती पद्धति से उगाए गए 56 प्रकार के अनाजों से पौषण होता था। यह कारण है कि आज बलाई समुदाय के बच्चों में भी कुपोषण देखा जा रहा है।
विपरित हालातों से संघर्ष कर पाया मुकाम
राजस्थान से आने के बाद समाज के लोगों की आर्थिक स्थिति बेहद दयनीय थी, जिसके कारण ही उन्हें सामाजिक भेदभाव का सामना भी करना पड़ा। मेघवाल समाज का इतिहास रखने वाले राजेश बामनिया बताते हैं कि मप्र में आने के दौरान बलाई समाज के लोगों की आर्थिक स्थिति बेहद खराब थी, लेकिन समाज के लोगों ने विपरित परिस्थितियों से संघर्ष किया। आज भी सवर्ण जाति के लोग उन्हें शादी-ब्याह में न्यौते पर नहीं बुलाते। कई स्कूलों में मध्यान्न भोजन के समय मासूम बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया जा रहा है। इन सभी के चलते आने वाली पीढ़ि के सामने कांटों भरा रास्ता है। दलित समुदाय के लोग आज भी समानता की उम्मीद में संविधान की ओर टकटकी लगाए देख रहे हैं। और यहाँ इन्दौर मे बलाई (मेघवाल ) समाज के लोगो ने एक अच्छा योगदान भी दिया है ॥
सदस्यता लें
संदेश (Atom)
नवरत्न मन्डुसिया
खोरी गांव के मेघवाल समाज की शानदार पहल
सीकर खोरी गांव में मेघवाल समाज की सामूहिक बैठक सीकर - (नवरत्न मंडूसिया) ग्राम खोरी डूंगर में आज मेघवाल परिषद सीकर के जिला अध्यक्ष रामचन्द्...
-
बाबा रामदेव जी महाराज मेघवाल है और इन तथ्यों से साबित होता है ॥ बाबा रामदेव जी महाराज सायर मेघवाल के ही पुत्र थे ॥ और बाबा रामदेव जी मह...
-
मेघवंश जाती के प्रवर शाखा और प्रशाखा प्राचीन क्षत्रियो में चन्द्र वंश और सूर्य वंश ये दो वंश मुख्य मने जाते हैं !फ...
