शनिवार, 11 फ़रवरी 2017

इतिहास में दर्ज है मेघवाल समाज की शौर्य गाथा, और रहन सहन और आजादी के बाद बसाने पड़े अलग गांव

आजाद हिंदुस्तान  में दलित मुद्दा गरमा चुका है। गुजरात में गाय की चमड़ी निकालने के आरोप में दलित युवकों की बेदर्दी से सरेराह पिटाई की गईं। लोग देखते रहे, इस घटना का वीडियो के मार्केट में आने के बाद हंगामा मच गया। उसके बाद देश के अलग-अलग हिस्सों से दलितों के प्रति हो रहे अत्याचार की बातें सामने आने लगीं। यह दासतांन इन्दौर की बताने जा रहा हूँ  जब यह ख़बर मेने पत्रिका न्यूज़ पेपर पर पढ़ी तो मेने इस दास्तांन को मेरे ब्लॉग mandusiya.blogspot.com पर पोस्ट करने का विचार किया और इन्दौर मे जाकर मेघवाल समाज के लोगो से जानकारी प्राप्त की जिसे मेने इस ब्लॉग पर पोस्ट की है ॥ दोस्तो आजाद भारत मे सब लोगो का अलग अलग व्यवसाय है ॥ जिसे वो आसानी से कर रहे है

दलितों के दर्द की ये दास्तांन आपको परेशान कर देगी। यह दुखद स्थिति है देवास जिले के कई गावों में रहने वाले बलाई समुदाय के लोगों की। कभी अपनी शौर्यगाथा को इतिहास के पन्नों पर दर्ज करवा चुके बलाई समुदाय को मालवा-निमाड़ सहित प्रदेशभर में बसने के बाद कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा।
उस दौर में जब छूआछूत मानव जीवन पर हावी होने लगी, तब बलाई समुदाय के लोगों को मजबूरन अपने अलग गांव बसाने पड़े। ये गांव आज के दौर में भी पूर्ण रूप से प्रासंगिक है और यहां आज भी सवर्ण समुदाय का व्यक्ति रहना पसंद नहीं करता है।
आजादी के समय बाबा साहेब डॉ. भीमराव अबेडकर मसीहा के रूप में दलितों के अधिकारों की आवाज उठाने आगे आए, जिसके बाद उन्हें संविधान में समानता का अधिकार शामिल किया गया। लेकिन आज भी दलितों को समानता केवल शिक्षित वर्ग में ही मिल पाई। अशिक्षित और ग्रामीण इलाकों में आज भी दलितों को अपनी बस्तियां अलग ही बसानी पड़ रही है। देवास जिले के गांवों में तो स्थिति काफी दुष्कर है।

छूआछूत के कारण समुदाय के ही बसे थे गांव

करीब 40 से 50 के दशक में सामाजिक भेदभाव इतना अधिक था, कि समुदाय के लोगों को अपने गांव अलग बसाकर रहना पड़ता था। ऐसे गांव आज भी हमारे बीच हैं, जहां सिर्फ मेघवाल समुदाय के ही घर है। देवास जिले में फतेहपुर खेड़ा, कमलापुर और लक्ष्मीपुरा इसके उदाहरण है ॥
हमारे बचपन में हमने हर जगह छूआछूत सहन की है। यही कारण है कि समुदाय के लोगों को अपने अलग गांव बसाने पड़े थे, लेकिन आज मेघवाल समाज ने बदलते समय के साथ समृद्धि और सम्मान भी हासिल किया है। लक्ष्मीपुरा के रहने वाले 70 वर्षिय लालसिंह मेघवाल ने बताया कि लेकिन जैसे-जैसे समय बदला हालात सुधरते गए। शिक्षा के प्रसार से छूआछूत भी कम होती गई।
गांवों से शिक्षा और रोजगार की तलाश में शहरी क्षेत्र में पलायन किया तो वहां माहौल और बदल गया। शहरों में समुदाय के लोगों को देखने के लिए लोगों की अलग निगाह नहीं रही। हालांकि कुछ दूषित सोच रखने वाले लोग आज भी भेदभाव करने में पीछे नहीं हटते हैं। ऐसे में कई परिवार तो शहरों में ही अच्छा रोजगार पाकर वहीं बस गए। आज समुदाय के लोगों ने अच्छे-खासे समृद्ध है। जबकि आजादी के बाद वाले दौर में हमारे पास न अच्छे घर थे और न ही आजीविका के लिए अच्छे संसाधन थे।
अब समृद्धि की ओर मेघवाल समाज
शिक्षा के प्रसार के बाद मेघवाल समाज आज समृद्धि की ओर कदम बढ़ा रहा है। उस दौर में जहां समाज को हिराकत की नजर से देखा जाता था, वहीं आज समाज की नई पीढि़ उच्च शिक्षा ले रही है। यही नहीं बेटियां और बहुएं भी पढऩे में पीछे नहीं है। लक्ष्मी पुरा के 66 वर्षिय बाबूलाल मालवीय बताते हैं कि समाज के लोग अब काफी तरक्की कर रहे है। आज भूखमरी जैसी स्थिति नहीं है। समाज के लोगों के पास स्वयं के घर है, आजीविका के लिए खेत है।


टूटती परंपराओं से बिगड़ी सेहत
मेघवाल  समुदाय के लोगों ने समाज की मुख्यधारा में शामिल होने की कवायद की है, लेकिन वहीं समुदाय की प्राचीन परंपराओं से दूर जाने से सेहत में भी बदलाव आता गया। जानकार बताते हैं कि समुदाय बेवर पद्धति की खेती से मुड़कर आधुनिक खेती करने लगा, जिसके कारण पोषण आहार में वे सारे पोषक तत्व शामिल नहीं हो पाए जो बेवर खेती पद्धति से उगाए गए 56 प्रकार के अनाजों से पौषण होता था। यह कारण है कि आज बलाई समुदाय के बच्चों में भी कुपोषण देखा जा रहा है।

विपरित हालातों से संघर्ष कर पाया मुकाम
राजस्थान से आने के बाद समाज के लोगों की आर्थिक स्थिति बेहद दयनीय थी, जिसके कारण ही उन्हें सामाजिक भेदभाव का सामना भी करना पड़ा। मेघवाल  समाज का इतिहास रखने वाले राजेश बामनिया बताते हैं कि मप्र में आने के दौरान बलाई समाज के लोगों की आर्थिक स्थिति बेहद खराब थी, लेकिन समाज के लोगों ने विपरित परिस्थितियों से संघर्ष किया। आज भी सवर्ण जाति के लोग उन्हें शादी-ब्याह में न्यौते पर नहीं बुलाते। कई स्कूलों में मध्यान्न भोजन के समय मासूम बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया जा रहा है। इन सभी के चलते आने वाली पीढ़ि के सामने कांटों भरा रास्ता है। दलित समुदाय के लोग आज भी समानता की उम्मीद में संविधान की ओर टकटकी लगाए देख रहे हैं। और यहाँ इन्दौर मे बलाई (मेघवाल ) समाज के लोगो ने एक अच्छा योगदान भी दिया है ॥

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