गुरुवार, 15 जून 2017

भारत मे दलितों की स्थिति के बारे मे जानकार रह जायेंगे दंग पढ़िये पूरी रिपोर्ट

नवरत्न मन्डुसिया की कलम से //दलितों को लेकर देश की राजनीति गर्म है। ऐसा हमेशा से होता आया है। लेकिन देश में दलितों की स्थिति में आजादी के बाद से ही कोई खास सुधार नहीं हुआ है। देश में अनुसूचित जाति की आबादी 20 करोड़ है, जिन्हें दलित कहा जाता है। इनकी जनसंख्या करीब 20% की दर से बढ़ी है लेकिन आज भी बड़ी सरकारी पोस्ट्स पर इनकी मौजूदगी न के बराबर है। हालांकि दलित एंटरप्रेनोयर बढ़ रहे हैं। दलितों की स्थिति पर रिपोर्ट...
अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय के लिए 2014 में प्रोफेसर अमिताभ कुंडु ने एक रिपोर्ट तैयार की थी। 

- इसमें बताया गया था कि आज देश में एक तिहाई दलितों के पास जीवन की सबसे कम जरूरतों को पूरा करने वाली सुविधाएं नहीं हैं।
-  गांवों में 45 फीसदी दलित परिवारों के पास जमीन नहीं हैं और वह छोटी-मोटी मजदूरी कर गुजारा करते हैं।
- हालांकि सरकार ने साल 2016-17 में दलितों के ऊपर उठाने के लिए 38,832 करोड़ रुपए का आवंटन किया है, यह आंकड़ा पिछले बजट में 30 हजार करोड़ था।
पत्रकार रामा लक्ष्मी अपनी रिपोर्ट में कहती हैं कि दलित युवा अपनी आवाज को बुलंद करने के लिए टि्वटर का खूब इस्तेमाल कर रहे हैं। 
- कोलकाता में कुछ महीने पहले जब ब्रिज गिरा और दर्जनों लोग मारे गए तब कंस्ट्रक्शन कंपनी पर सवाल उठने लगे।

- इसी दौरान एक अमीर व्यवसायी मोतीलाल ओसवाल ने ट्वीट किया कि यह देश के उन इंजीनियर्स के कारण हुआ है, जो टैलेंट के दम पर नहीं बल्कि जाति का लाभ लेकर इंजीनियर बनते हैं। 
- उनके इस ट्वीट के बाद सैकड़ों दलितों ने उनके विरोध में ट्वीट किया। मामला इस कदर बढ़ा कि घंटे भर के अंदर उन्होंने न केवल अपना ट्वीट डिलीट किया बल्कि माफी भी मांगी।उन्होंने ओसवाल के ट्वीट का स्क्रीनशॉट भी खूब शेयर किया। 
- ऐसा ही एक कैंपेन ट्वीटर पर दलितों ने देश की उस कंपनी के खिलाफ चलाया जिसने अपने एक ऐड में आरक्षण का फायदा लेने से इंकार करने वाले लोवर कास्ट स्टूडेंट को दिखाया था। 
- दलित राइटर चंद्रभान प्रसाद कहते हैं कि अपर कास्ट लोगों के लिए ट्विटर बना होगा लेकिन दलितों के लिए क्रांति का जरिया है। 
- इन्होंने ही हाल ही में दलित फूड्स के नाम से ऑनलाइन स्टार्टअप शुरू किया है। इसकी खासियत यह है कि ये वेबसाइट्स पर बिकने वाले सभी प्रोडक्ट्स दलितों द्वारा बनाए हुए लेते हैं। 

80 फीसदी दलित ग्रुप-डी और सी नौकरियों में

भारत सरकार के पूर्व ज्वाइंट सेक्रेटरी ओपी शुक्ला कहते हैं कि सरकारी नौकरियों में 80 फीसदी दलित ग्रुप-डी और सी की नौकरियों में थे, जिसे 6ठवें वेतनमान के बाद सरकार ने मिलाकर ग्रेड 3 कर दिया है। 
- चपरासी, सफाई कर्मचारी, ऑफिस ब्वाय, क्लर्क और डाटा ऑपरेटर आदि पदों पर 80 फीसदी कर्मचारी ठेके पर रखे जा रहे हैं, इसलिए सरकार ने जहां से सबसे ज्यादा दलित नौकरियों में आते थे, उसे एक तरह से बंद कर दिया है।
- नेशनल कमिशन फॉर शेड्यूल कास्ट के चेयरमैन पीएल पुनिया के अनुसार देश में 1064 जातियां अनुसूचित जाति या दलित वर्ग के तहत आती हैं। इनकी आबादी कुल जनसंख्या की 16.6 फीसदी हैं। 
- वहीं उत्तरप्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में करीब 50 पिछड़ी जातियां ऐसी हैं जो खुद को एसी वर्ग में शामिल करने की मांग कर रही हैं। 

 कोटा 15% का ; नौकरियों में हैं 17% क्योंकि 40% सिर्फ सफाई कर्मचारी 

 कुल सरकारी नौकरियों में 17 फीसदी दलित हैं, जबकि कोटा 15 फीसदी है। बढ़ोतरी का यह आंकडा इसलिए है क्योंकि 40 फीसदी सफाई कर्मचारी दलित जाति से हैं। 
- इसी के चलते क्लास फोर्थ यानी ग्रुप डी की नौकरियों में दलित 19.3 फीसदी हैं, जबकि ग्रुप सी में 16 फीसदी हैं।
- हालांकि हर साल 30% बढ़ रहे हैं दलित एंटरप्रेन्योर। 2001 में देश में दलित एंटरप्रेन्योर 10.5 लाख थे। जो 2006-07 में बढ़कर 28 लाख हो गए। 
- एक अनुमान के मुताबिक अब इनकी संख्या 87 लाख से अधिक है। वर्तमान में हर साल 30% एंटरप्रेन्योर उद्यमी बढ़ रहे हैं।
सोर्स- नेशनल सैंपल सर्वे आॅर्गेनाइजेशन-इकाॅनाॅमिक डाटा, सेंसस 2011, लोकसभा में पेश रिपोर्ट, एनसीआरबी रिपोर्ट, दलित इंडियन चैंबर आॅफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री

दलित शब्द कहा से आया जानिये दलित शब्द के बारे मे

नवरत्न मन्डुसिया की कलम से //आज तक मे सोचता था की ये दलित शब्द क्या है लेकिन दलित शब्द के बारे मे पूरी तरह पढ़ने के बाद पता चला की दलित शब्द का तो सर्वप्रथम 1831 मे पाया गया था 

जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर विवेक कुमार बताते हैं कि दलित शब्द का जिक्र सबसे पहले 1831 की मोल्सवर्थ डिक्शनरी में पाया जाता है. फिर बाबा भीमराव अंबेडकर ने भी इस शब्द को अपने भाषणों में प्रयोग किया.
क्या आपको पता है कि ‘दलित’ शब्द कहां से आया है? किसने इस शब्द को सबसे पहले इस्तेमाल किया? किसने इस शब्द को समाज के पिछड़े तबके से जोड़ा?

इस स्टोरी में हम इन्हीं सवालों के जवाब ढूंढने की कोशिश करेंगे. आपको बता दें कि ये रिपोर्ट दलित चिंतकों, रिसर्चर, प्रोफेसर्स, वरिष्ठ पत्रकारों और समाजिक कार्यकर्ताओं से की गई बातचीत पर आधारित है.
अक्सर आप अखबार के पहले या फिर बीच के पन्नों में दलितों पर हो रही हिंसा की खबरें देखते होंगे. क्विंट हिंदी भी दलितों के खिलाफ हिंसा के मुद्दे को पुरजोर तरीके से उठाता रहा है. लेकिन इस बीच हमने एक कोशिश की है ‘दलित’ शब्द के इतिहास को टटोलने की.

दलित शब्द का जिक्र

जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर विवेक कुमार बताते हैं कि दलित शब्द का जिक्र सबसे पहले 1831 की मोल्सवर्थ डिक्शनरी में पाया जाता है. फिर बाबा भीमराव अंबेडकर ने भी इस शब्द को अपने भाषणों में प्रयोग किया.

कुछ जानकार बताते हैं कि 1921 से 1926 के बीच ‘दलित’ शब्द का इस्तेमाल ‘स्वामी श्रद्धानंद’ ने भी किया था. दिल्ली में दलितोद्धार सभा बनाकर उन्होंने दलितों को सामाजिक स्वीकृति की वकालत की थी.

दलित शब्द का संविधान में कोई जिक्र नहीं

2008 में नेशनल एससी कमीशन ने सारे राज्यों को निर्देश दिया था कि राज्य अपने आधिकारिक दस्तावेजों में दलित शब्द का इस्तेमाल न करें. 

दलित पैंथर्स ने दिया पिछड़ों को नया नाम

साल 1972 में महाराष्ट्र में दलित पैंथर्स मुंबई नाम का एक सामाजिक-राजनीतिक संगठन बनाया गया. आगे चलकर इसी संगठन ने एक आंदोलन का रूप ले लिया.

नामदेव ढसाल, राजा ढाले और अरुण कांबले इसके शुरुआती प्रमुख नेताओं में शामिल हैं. इसका गठन अफ्रीकी-अमेरिकी ब्‍लैक पैंथर आंदोलन से प्रभावित होकर किया गया था.

यहीं से ‘दलित’ शब्द को महाराष्ट्र में सामाजिक स्वीकृति मिल गई. लेकिन अभी तक दलित शब्द उत्तर भारत में प्रचलित नहीं हुआ था.

नॉर्थ इंडिया में दलित शब्द को प्रचलित कांशीराम ने किया. DS4 जिसका मतलब है दलित शोषित समाज संघर्ष समिति. इसका गठन कांशीराम ने किया था और महाराष्ट्र के बाद नॉर्थ इंडिया में अब पिछड़ों और अति-पिछड़ों को दलित कहा जाने लगा था.


चंद्रभान प्रसाद, दलित चिंतक

ठाकुर, ब्राह्मण, बनिया छोड़ बाकी सब DS4 - कांशीराम का नारा


लंबे समय से ये शब्द इस्तेमाल में रहा है, लेकिन इसका पॉपुलर इस्तेमाल दलित पैंथर्स ने ही किया. अंबेडकर ज्यादातर डिप्रेस्ड क्लास शब्द का ही इस्तेमाल करते थे, अंग्रेज भी इसी शब्द का इस्तेमाल करते थे और फिर यहीं से ‘दलित’ शब्द बना.


विवेक कुमार, प्रोफेसर, सोशल सिस्टम और सोशल साइंस सेंटर, जेएनयू

1929 में लिखी एक कविता में राष्ट्रकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने भी ‘दलित’ शब्द का इस्तेमाल किया था, जो इस बात की पुष्टि करता है कि ये शब्द प्रचलन में तो था, लेकिन बड़े पैमाने पर इस्तेमाल नहीं किया जाता था. 1943 में ‘अणिमा’ नाम के काव्य संग्रह में उनकी ये कविता छपी.

दलित जन पर करो करुणा।
दीनता पर उतर आये प्रभु,
तुम्हारी शक्ति वरुणा।

राजनीतिक विश्लेषक और रिसर्चर मनीषा प्रियम कहती हैं कि ‘दलित’ शब्द दरअसल लोकभाषा के शब्द दरिद्र से आया है. किसी जाति विशेष से ये शब्द नहीं जुड़ा है इसलिए इसे स्वीकृति भी बड़े पैमाने पर मिली:- नवरत्न मन्डुसिया की कलम से 

सूपर स्टार सिंगर चुन्नी लाल बिकूनिया की सुरीली आवाज़ बन रही रही युवाओं की धड़कन

नवरत्न मन्डुसिया की कलम से  //सी.एल.बी म्यूज़िक ग्रूप के अध्यक्ष चुनी लाल जी बिकूनिया के बारे मे अवगत करा रहा हूँ चुनी लाल जी बिकूनिया राजस्थान प्रांत के नागौर जिले के परबतसर गाँव के एक प्राथमिक स्कूल से शिक्षा ली और उसके बाद एक निजी विधालय से 12वी पास करने के बाद अपने गायन क्षेत्र को एक महत्वपूर्ण जिंदगी की महत्वपूर्ण दिशा समझे और उसके बाद गायन क्षेत्र मे चुनी लाल जी बिकूनिया का बहूत जोरों शोरो से गायन के क्षेत्र मे नाम चलने लग गया मेघवाल समाज मे जन्मे बिकूनिया के गाने आज राजस्थान के अलवा अन्य राज्यों मे भी बहूत महत्वपूर्ण रुप से माँग आ रही है चुन्नी लाल बिकूनिया के जब जय भीम जय भीम गीत बाजार मे आया तो इस भजन से पूरो राज्यों मे धूम सी मचने लग गयी उसके बाद चुन्नी लाल बिकूनिया ने उसके बाद मेघवाल समाज के लोगो को उनकी राजनीति उनकी आर्थिक सामाजिक धार्मिक संस्कॄति सांस्कृतिक विचार धारायें आदि को अपने गीतों के माध्यम से उकेरा गया दोस्तो आज के ज़माने के यह 20 या 22 साल का यह युवा आगे जाकर पूरे देश मे नाम रोशन करेंगे चुन्नी लाल बिकूनिया राजस्थान के मारवाड़ राजस्थानी गानों के   गायक कलाकार है  जो कि मुख्यतः हिन्दी और राजस्थानी फिल्मों में गाने भजन गाये जाते हैं। बिकूनिया  राजस्थानी भाषा मे कई गाने भजन गीत गाये है और अब वर्तमान समय मे  मणिपुरी, गढ़वाली, ओडि़या, तमिल, असामीज, पंजाबी, बंगाली, मलयालम, मराठी, तेलगु और नेपाली आदि भाषाओं की तेयारी कर रहे है बहूत जल्द ही इन भाषाओं मे गायकी के सुर बढ़ायेंगे और जल्द ही इन भाषाओं मे  शामिल होंगे  उनके राजस्थानी पाॅप एल्बम भी रिलीज होने वाले है और पोप एलबम और रीलिज करेंगे और उन्हें कुछ राजस्थानी  फिल्मों में अभिनेता के तौर पर भी काम करने के लिये अपने क़दम बढ़ायेंगे है। वे पुरूषों में कई बड़े बड़े गायक कलाकारों  के बाद ऐसे गायक रहे हैं जिन्होंने सबसे लंबे वक्त तक राजस्थानी फिल्म इंडस्ट्री में राज किया है। उनकी आवाज का जादू कुछ ऐसा हैं कि इसने पूरे देश में उनकी गायकी का लोहा माना और वे हर वर्ग के लोगों की पसंद बन गए चुन्नी लाल बिकूनिया की सुरीली आवाज़ एक नये युग की पहचान बन गयी है चुनी लाल बिकूनिया को नवरत्न मन्डुसिया की तरफ़ से तहदिल से आभार प्रकट करते है और उनके उज्ज्वल जीवन की शुभकामनाएँ देता हूँ मेघवाल समाज मे वेसे बहूत गायक कलाकार है जिसमे चुन्नी लाल बिकूनिया का नाम भी अग्रणी चलता है चुन्नी लाल बिकूनिया अपने आप को भीम पुत्र होने पर बहूत गर्व महसूस करते है  चुन्नी लाल बिकूनिया ने बाबा रामदेव जी महाराज तेजा जी महाराज पाबू जी महाराज देव नारायण चतुर दास जी महाराज मेघवाल समाज के भजन भीम सेना के भजन बालाजी महाराज माता जी के भजन खाटुश्याम जी महाराज के भजन सालासर बालाजी के भजन गणेश जी महाराज के भजन केसरिया कंवर जी महाराज के भजनआदि भजनों मे अपना महत्वपूर्ण योगदान देकर भजनों की प्रस्तुति दी है चुन्नी लाल बिकूनिया गायकी क्षेत्र के साथ साथ समाज मे भी अपना महत्वपूर्ण योगदान देते है बड़े बुजर्गों युवाओ आदि से अपना व्यक्तिगत आधार रखते है और बहूत मिलनासार वाले युवा गायक कलाकार है :- नवरत्न मन्डुसिया की कलम से

सोमवार, 12 जून 2017

मेघवाल समाज के नौरत राम लोरोली ने 16 साल की उम्र से शुरू की समाज सेवा आज विश्व लेवल की पहचान बन गयी :- नवरत्न मन्डुसिया

नवरत्न मन्डुसिया की कलम से //मेघवाल समाज के भीम पुत्र ने विपरीत पारिस्थितियो से गुजर कर किया संगठन का उदय आइये जानते है भीम पुत्र नौरत राम लोरोरी  के बारे मे दोस्तो नौरत राम लोरोली का समाज मे शुरू से ही रुचि दायक था नौरत राम लोरोली ने समाज सेवा पर केवल 16 साल की छोटी सी उम्र मे किया था जब नौरत राम लोरोली 16 साल के थे तो उनको यह समझ मे नही आया की मे आज के युग मे आगे बढ़ पाऊँगा या नही लेकिन फ़िर भी नौरत राम लोरोली ने 16 साल की उम्र मे आगे बढ़ना शुरू कर दिया और वो उम्र देखे तो आज के ज़माने मे किसी भी जाति से कम नही है  नौरत राम लोरोली ने एक विश्व लेवर का संगठन बनाया और वो संघठन आज पूरे राजस्थान मे बहूत जोरों शोरो से चल रहा है दोस्तो जब मेरी नौरत राम लोरोली की बात फोन पर हुई तो उनके बोल इतने अच्छॆ थे की मेने मन ही बना लिया की नौरत राम लोरोली की पूरी बाते मेघवाल समाज के ब्लोग पर पोस्ट कर दूँ  दोस्तो आजकल के युग मे बहूत से कम लोग है जो बिना स्वार्थ लोग समाज की सेवा करते है आजकल के ज़माने मे देखे तो बहूत ही कम लोग मिलते है जो लोग समाज सेवा करते है दोस्तो ये संगठन- डॉ. अम्बेडकर स्टुडेंट फ्रंट ऑफ इण्डिया (डीएएसएफआई) ही होगा जो आज तक इनके अलावा किसी भी संघठन ने चुनाव नही लड़ा लेकिन इस भीम संघठन ने लगभग राजस्थान मे चुनाव भी लड़ा और कई जगह चुनाव भी जीते है  दोस्तो इस संगठन को कोई भी उदेश्य नकारात्मक नही है और ना ही किसी जाति विशेष से है इसका उद्देश्य है तो बहुजन समाज को आगे बढाना और दलितों पर हो रहे अत्याचारों को रोकना दलित वर्ग को शिक्षा दिलाना ही महत्वपूर्ण उद्देश्य है इस संघठन के द्वारा लोगो के बीच चर्चित नाम- *अम्बेडकरवादी छात्रों की आवाज को बनाना और इनकी उपलब्धियां जातिवाद से पूरी तरह भरी पडी राजस्थान की कॉलेज राजनीति में एक जाट छात्र नेता ने चैलेंज करते हुए कहा था कि आपकी हैसियत नही है हमारे सामने खड़े होने की तो टिकट लेकर क्या करोगे। नोरतराम लोरोली मानते है कि यह बात हमारे हर छात्र नेता को सुनने को मिलती है जब टिकट मांग ने की बात आती है। उस वक्त नोरतराम लोरोली ने जाट नेता को चैलेंज करते हुए कहा था कि जिस दिन तेरे संगठन से ज्यादा वोट लेकर आऊंगा उसी दिन कालेज में आउंगा।नोरतराम लोरोली ने बाबा साहब अम्बेडकर का अध्ययन किया है ओर राजस्थान की छात्र राजनीति में एक नया अध्याय जोडते हुए एक गैर राजनैतिक छात्र संगठन की स्थापना कॉलेज में कर दी। आपको बता दे कि अभी तक समाज में बहुत बडे बडे संगठन बने है मगर बाबा साहब के नाम पर यह एक मात्र संगठन बना था। जिसका मकसद कॉलेज राजनीति के साथ साथ सामाजिक भेदभाव को मिटाना था। 2014 के छात्रसंघ चुनाव में  संगठन को उतारा। मगर सफलता नही मिली क्यूं कि अम्बेडकर नाम से होने पर छात्रों को डर लगता था। मगर 2015 में संगठन ने राजस्थान के आधे जिलों की जिलामुख्यालय की कॉलेज में नोरतराम लोरोली जी के नेतृत्व उतारे तो एक इतिहास बनकर सामने आया।   ओर  बाबासाहेब के नाम बने इस संगठन के 6 छात्र संघ अध्यक्ष बनकर कर आये जो एक बदलाव की खबर थी 2016 में एक बडा बदलाव आया जो यह था कि डीएएसएफआई राजस्थान का सबसे बडा अम्बेडकरवादी छात्र संगठन बना. ओर नोरतराम लोरोली राजस्थान के चर्चित अम्बेडकरवादी छात्रनेता । क्यूं कि राजस्थान विश्वविधालय  जो राजस्थान की राजनीति का गढ है मैं डीएएसएफआई की समर्थक उम्मीदवार अकिंत जीतकर आया।। कई बार विरोधी छात्र संगठनों ने हर प्रकार का दबाव बनाया- नोरतराम लोरोली ने कॉलेज कैंपस में अपने छात्रों को मनुवाद से बाहर निकालने  व अम्बेडकरवाद के लिए *संघर्ष व स्वाभिमान* का नारा दिया।- सोसल मीडिया पर राजस्थान के सबसे ज्यादा चर्चित छात्रनेता है और अम्बेडकर जी नाम पर सबसे पहले राजस्थान में एक शाम बाबा साहब के नाम कार्यक्रम किया जिसमे हजारो की तादात मे भीम सेनिक भीम पुत्र और कई लोग शामिल हुवे थे - अम्बेडकर जयंती पर सबसे बडा रक्तदान शिविर सहित कई सामाजिक आंदोलन बाबासाहेब के जीवन पर पुस्तक व कलैंडर का प्रकाशन करवा चुके हर अत्याचार पर आंदोलन में अग्रणी रहते है - मकसद राजस्थान की प्रत्येक महाविधालय में अम्बेडकरवाद का प्रसार प्रचार करना है - राजस्थान की अम्बेडकरवादी छात्र राजनीति का सबसे बडा. नाम है और - छात्र राजनीति में अकेले  ने  अम्बेडकरवाद को फैलाया किसी भी छात्र संगठन से नही डरे अब तक बहुजन छात्रों के साथ बै़ठकर जबर बहुत काम किये- बाबा साहब का ज्ञान, कांशीराम जी की शिक्षा लेते है। शेर जैसी तेज तर्रार आवाज है ।- हर कॉलेज में बाबा साहेब को नाम फैला कर छात्रों का साथ जीता।- कॉलेज कैंपस में जातिवाद को मिटाया। अम्बेडकरवाद  के साथ छात्रों को एकजुट किया।  बहुजन छात्रों की आवाज बनकर  साथ रहना। उनके हर आंदोलन को छात्रहितों के साथ आवाज देना।
कॉलेज में स्वाभिमान की राजनीति लेकर हर इंसान इस बात को जानता है। महाविधालय में अम्बेडकरवाद की जोत जगा दी।
- नोरतराम नाम है लोरोली गांव है। मेघवंशी जैसा रहन सहन ओर ठाठ है। पर विश्वास रखते है (नवरत्न मन्डुसिया की कलम से)

अनु मेघवाल राजस्थान की सबसे सक्रिय समाज सेविका :- नवरत्न मन्डुसिया

अनु मेघवाल मीडिया से रूबरू होती हुई 

नवरत्न मन्डुसिया की कलम से //अनु मेघवाल की दास्तान हिसाब से फिल्मी नजारों से कम नही है दोस्तो मे बहिन अनु मेघवाल को अक्सर देखता हूँ तो अनु मेघवाल हमेशा व्यस्त ही ही रहती है वो भी समाज सेवा मे अनु मेघवाल राजस्थान की महिलाओ मे सबसे सक्रिय समाज सेविका है क्यों की यह सबसे कठिन काम को सरल बनाने मे एक्सपर्ट है इस कारण आगे बढ़ने की जिद हमेशा रखते है
अनु मेघवाल का वेसे सरकारी विभाग मे चिकित्सक के पद पर चयन हो रखा है और अनु मेघवाल मेरे हिसाब से मेघवाल समाज का नाम भी रोशन करेगी क्यों की इतनी कम उम्र मे उनके बोलने का टेलेंट भी डॉक्टर ए.पी.जे अब्दुल कलाम मदर टेरेसा दलित सम्राट कांशीराम जी और बाबा साहेब से कम नही है मेरी और से अनु बहिन को ढेर सारी शुभकामनाएँ आपके साथ है की आप हमेशा आगे बढ़ते रहे और समाज सेवायें करते रहे मुझे  तो आपको एक ही बात कहनी है की आप हमेशा दलितों की हितेषि रहना दोस्तो वेसे मे अनु मेघवाल को व्यक्तिगत और मिलकर आपको पूरी जानकारी प्रेषित करूँगा  वेसे अनु मेघवाल मेरी सोशियल फेसबुक दोस्त है और मे अनु मेघवाल से जल्द ही मिलूंगा और उनके बारे मे आपको पूरी जीवनी से अवगत कराऊंगा दोस्तो अनु बहिन का पूरा सहयोग करे मे नवरत्न मन्डुसिया अनु मेघवाल को पूरा सहयोग ककरता हूँ  अनु मेघवाल साधारण कपड़ो और  सूती साड़ी और हवाई चप्पल में वह साधारण स्त्री ही नजर आती हैं। जब फर्राटेदार अंग्रेजी बोलना शुरू करती हैं तो समझ आता है कि वह घाट की रहने वाली नहीं हैं। जब भाषण देती है तो वहां जमा होने वाली भीड़ को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि उनकी बातों का कितना असर हमारे देश पर है। अनु मेघवाल ने सामाजिक अध्ययन के क्षेत्र में बहूत योगदान  किया है। और समझा है की हमे किस तरह से आगे बढ़ना है
 अनु मेघवाल के तर्क  :-- अनु मेघवाल
जीवन-स्तर को उन्नत बनाने का प्रयत्न करती है। मेघवाल कहती है की जब हम सामाजिक विचारो को उकेरे तो आप इस हिसाब से उकेरे की समाज मे सकारात्मक क्रांति फेले सामाजिक कार्य को सकारात्मक, और सक्रिय हस्तक्षेप के माध्यम से लोगों और उनके सामाजिक माहौल के बीच अन्तःक्रिया प्रोत्साहित करके व्यक्तियों की क्षमताओं को बेहतर करना ताकि वे अपनी ज़िंदगी की ज़रूरतें पूरी करते हुए अपनी तकलीफ़ों को कम कर सकें। इस प्रक्रिया में समाज-कार्य लोगों की आकांक्षाओं की पूर्ति करने और उन्हें अपने ही मूल्यों की कसौटी पर खरे उतरने में सहायक होता है।

समाजसेवा वैयक्तिक आधार पर, समूह अथवा समुदाय में व्यक्तियों की सहायता करने की एक प्रक्रिया है, जिससे व्यक्ति अपनी सहायता स्वयं कर सके। इसके माध्यम से सेवार्थी वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों में उत्पन्न अपनी समस्याओं को स्वयं सुलझाने में सक्षम होता है। समाजसेवा अन्य सभी व्यवसायों से सर्वथा भिन्न होती है, क्योंकि समाज सेवा उन सभी सामाजिक, आर्थिक एवं मनोवैज्ञानिक कारकों का निरूपण कर उसके परिप्रेक्ष्य में क्रियान्वित होती है, जो व्यक्ति एवं उसके पर्यावरण-परिवार, समुदाय तथा समाज को प्रभावित करते हैं। सामाजिक कार्यकर्ता पर्यावरण की सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक शक्तियों के बाद व्यक्तिगत जैविकीय, भावात्मक तथा मनोवैज्ञानिक तत्वों को गतिशील अंत:क्रिया को दृष्टिगत कर ही सेवार्थी की सेवा प्रदान करता है। वह सेवार्थी के जीवन के प्रत्येक पहलू तथा उसके पर्यावरण में क्रियाशील, प्रत्येक सामाजिक स्थिति से अवगत रहता है क्योंकि सेवा प्रदान करने की योजना बताते समय वह इनकी उपेक्षा नहीं कर सकता। दोस्तो अनु मेघवाल को राजस्थान से हर हिस्से से आगे बढ़ने के लिये प्रेरित करे और आगे बढ़ाने मे सहयोग करे (नवरत्न मन्डुसिया की कलम से )
अनु मेघवाल मीडिया से रूबरू होती हुई 

शनिवार, 10 जून 2017

रिश्ते के साथ साथ समान जानिये एक दूसरे की विचार धारायें


नवरत्न मन्डुसिया की कलम से // क्या  है रिश्तों में सम्मान का अर्थ मे आपको मेरे व्यक्तिगत विचार से आपको रिश्ते के साथ साथ हमे एक दूसरे के सामने किस तरह पेश आना चाहिये ये बाते मे आपको बताने जा रहा हूँ 

किसी भी रिश्ते के गहरे होने की पहली शर्त होती है सम्मान। सिर्फ पति-पत्नी ही नहीं, तमाम रिश्तों से लेकर यारी-दोस्ती तक में एक-दूसरे के प्रति सम्मान बेहद अहम् है। हंसी-मजाक के दौरान भी यदि हम हद से आगे बढ जाते हैं, तो सामनेवाले को ठेस पहुंचती है। ऎसे में यह बात समझना जरूरी है कि हर चीज की हद होती है। अपने दायरों को लांघते ही जैसे ही हम हदों को पार

किसी की भी राय को महत्व ना देकर मनमानी करना। कर जाते हैं, तो वहां सम्मान खत्म हो जाता है और रिश्तों पर नकारात्मक प्रभाव पडता है। हम रिश्तों को सम्मान दे रहे हैं या नहीं, इसे इन कसौटी पर परखें- अगर हम किसी बात पर असहमत हैं, पर हम अपनी ही बात और राय को महत्व देकर सामनेवाले को सुनना ही ना चाहे और उससे भी यह उम्मीद रखें कि वो हमारी ही सुने, तो यह उसके सम्मान को आहत करेगा।हर समय सिर्फ अपनी जरूरतों के बारे में ही सोचना। दोस्तो यह भी हद होती है की हमे किस तरह की मजाक करनी चाहिये मे नवरत्न मन्डुसिया आपको यह कहना चाहता हूँ की हम लोगो को एक सच्चे प्यार की भावनाएँ समझनी चाहिये और हमे एक दूसरे का समान करना चाहिये दोस्तो आपका अपना दोस्त आपका भाई नवरत्न मन्डुसिया हमेशा आपके साथ एक सच्चे अम्बेडकर वादी विचार धारा रखने वाला है मेरा तो यह ही सोचना है कहना है की हमे रिश्ते की गहराई को देखकर हमे अच्छा रिश्ता निभाना चाहिये हमे महिलाओ की इज्जत करनी चाहिये बड़े लोगो का और छोटे लोगो का सभी लोगो का समान करना चाहिये ताकि हमे समाज मे एक सकरात्मक पहल देखने को मिले और हमे मजाक करना आदि परिस्थियों को देखकर करना चाहिये 

सबसे मजाक करना, लेकिन जब कोई आपसे मजाक करे, तो बुरा मान जाना। सामनेवाले की स्थिति को समझे बगैर या समझने की कोशिश किए बिना ही बात-बात पर नाराज हो जाना।
विचार अलग होने पर दूसरों के विचारों को गलत व महत्वहीन समझना। सामनेवाले की भावनाओं के प्रति असंवेदनशील होकर उन्हें महत्व ना देना। अपने रिश्तेदारों या पार्टनर को सामाजिक समारोहों में या अन्य लोगों के सामने डांटते हैं या उनका मजाक उडाते हैं।
सबसे यह उम्मीद रखना कि वो सिर्फ आपका ही ख्याल रखे और आपकी हर बात पर हां में हां मिलाए।
अपनी सुविधानुसार नियम बदलना और दूसरों से भी अपनी सुविधानुसार ही व्यहार करने की उम्मीद करना।
किसी की भी राय को महत्व ना देकर मनमानी करना।ये सभी चीजे हमे व्यवहार और हमारे महत्वपूर्ण  समान को दर्शाती है  इसलिए हमे किसी से जो भी रिश्ता निभाये वो सच्चे दिल और प्रेम से निभाना चाहिये 

नवरत्न मन्डुसिया की कलम से 

सामाजिक जनसेवक

शुक्रवार, 2 जून 2017

परिवार की उत्पति महत्व और परिचय


(मन्डुसिया लेखन )//परिवार (family) साधारणतया पति, पत्नी और बच्चों के समूह को कहते हैं, किंतु दुनिया के अधिकांश भागों में वह सम्मिलित वासवाले रक्त संबंधियों का समूह है जिसमें विवाहऔर दत्तक प्रथा द्वारा स्वीकृत व्यक्ति भी सम्मिलित हैं।

परिचय एवं महत्व

सभी समाजों में बच्चों का जन्म और पालन पोषण परिवार में होता है। बच्चों का संस्कार करने और समाज के आचार व्यवहार में उन्हें दीक्षित करने का काम मुख्य रूप से परिवार में होता है। इसके द्वारा समाज की सांस्कृतिक विरासत एक से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित होती है। व्यक्ति की सामाजिक मर्यादा बहुत कुछ परिवार से ही निर्धारित होती है। नर-नारी के यौन संबंध मुख्यत: परिवार के दायरे में निबद्ध होते हैं। औद्योगिक सभ्यता से उत्पन्न जनसंकुल समाजों और नगरों को यदि छोड़ दिया जाए तो व्यक्ति का परिचय मुख्यत: उसके परिवार और कुल के आधार पर होता है। संसार के विभिन्न प्रदेशों और विभिन्न कालों में यद्यपि रचना, आकार, संबंध और कार्य की दृष्टि से परिवार के अनेक भेद हैं किंतु उसके यह उपर्युक्त कार्य सार्वदेशिक और सार्वकालिक हैं। उसमें देश, काल, परिस्थिति और प्रथा आदि के भेद स एक या अनेक पीढ़ियों का और एक या अनेक दंपतियों अथवा पति-पत्नियों के समूहों का होना संभव है, उसके सदस्य एक पारिवारिक अनुशासन व्यवस्था के अतिरिक्त पति और पत्नी, भाई और बहन, पितामह और पौत्र, चाचा और भतीजे, सास और पुत्रवधू जैसे संबंधों तथा कर्तव्यों एवं अधिकारों से परस्पर आबद्ध, अन्य सामाजिक समूहों के संदर्भ में एक घनिष्टतम अंतरंग समूह के रूप में रहते हैं। परिवार के दायरे में स्त्री और पुरुष के बीच कार्यविभाजन भी सार्वत्रिक और सार्वकालिक है। स्त्रियों का अधिकांश समय घर में व्यतीत होता है। भोजन बनाना, बच्चों की देख रेख और घर की सफाई करना और कपड़ों की सिलाई आदि ऐसे काम हैं जो स्त्री के हिस्से में आते हैं। पुरुष बाहरी तथा अधिक श्रम के कार्य करता है, जैसे खेती, व्यापार, उद्योग, पशुचारण, शिकार और लड़ाई आदि। तब भी यह कार्यविभाजन सब समाजों में एक सा नहीं है, कोई बड़ी सामान्य सूची भी बनाना कठिन है क्योंकि कई समाजों में स्त्रियाँ भी खेती और शिकार जैसे कामों में हिस्सा लेती हैं।

उत्पत्ति

विवाह के रूपों से परिवार के रूपों का घनिष्ट संबंध है। लेविस मार्गन आदि विकासवादियों का मत है कि मानव समाज की प्रारंभिक अवस्था में विवाह प्रथा नहीं थी और पूर्ण कामाचार प्रचलित था। इसके बाद सामाजिक विकासक्रम में यूथ विवाह (कई पुरुषों और कई स्त्रियों का सामूहिक रूप से पति पत्नी होना), बहुपतित्व, बहुपत्नीत्व और एकपत्नीत्व या एकपतित्व की अवस्था आई। वस्तुत: बहुविवाह और एकपत्नीत्व की प्रथा असभ्य और सभ्य सभी समाजों में पाई जाती है। अत: यह मत साक्ष्यसंमत नहीं प्रतीत होता। मानव शिशु के पालन पोषण के लिए लंबी अवधि अपेक्षित है और पहले बच्चें की बाल्यावस्था में ही अन्य छोटे बच्चे उत्पन्न होते रहते हैं। गर्भावस्था और प्रसूतिकाल में माता की देख-रेख आवश्यक है। फिर, पशुओं की भाँति मनुष्य में रति की कोई विशेष ऋतु नहीं है। अत: संभवत: मानव समाज के प्रारंभ में या तो पूरा समुदाय या फिर पति पत्नी तथा बच्चों का समूह ही परिवार था।

मानव वैज्ञानिकों को कोई ऐसा समाज नहीं मिला जहाँ विवाह संबंध परिवार के अंदर ही होते हों, अत: पितृस्थानीय परिवार में पत्नी को और मातृस्थानीय परिवार में पति को अतिरिक्त सदस्यता प्रदान की जाती है। युगल परिवार में पति और पत्नी मिलकर अपनी पृथक् गृहस्थी स्थापित करते हैं। किंतु अधिकांश समाजों में यह परिवार बृहत्तर कौटुंबिक समूह का अंग माना जाता है और जीवन के अनेक प्रसंगों में परिवार पर बृहत्तर कौटुबिक समूह का, घनिष्ट संबध के अतिरिक्त, नियंत्रण होता है। अमरीका जैसे उद्योगप्रधान देशों में कुटुंबियों के सम्मिलित परिवार के स्थान पर युगल परिवार की बहुलता हो गई है। यद्यपि वहाँ का समाज पितृवंशीय है, फिर भी युगल परिवार वहाँ किसी एक बृहत्तर कुटुंब का अंग नहीं माना जाता। युगल परिवार में पति पत्नी और, पैदा होने पर, उनके अविवाहित बच्चे होते हैं। सम्मिलित परिवारों में इनके अतिरिक्त विवाहित बच्चे और उनकी संतान, विवाहित भाई अथवा बहन और उनके बच्चे साथ रह सकते हैं। सम्मिलित परिवार में रक्त संबंधियों की परिधि भिन्न भिन्न समाजों में भिन्न भिन्न है। भारत जैसे देश में एक सम्मिलित परिवार में साधारणत: 10-12 सदस्य होते हैं, किंतु कुछ परिवारों में सदस्यों की संख्या 50-60 या 100 तक होती है।

विवाह, वंशावली, स्वामित्व और शासनाधिकार के विभिन्न रूपों के आधार पर परिवारों के विभिन्न रूप और प्रकार हो जाते हैं। मातृस्थानीय परिवार में पति अपनी पत्नी के घर का स्थायी या अस्थायी सदस्य बनता है, जबकि पितृस्थानीय परिवार में पत्नी पति के घर जाकर रहती है। मातृस्थानीय परिवार साधारणत: मातृवंशीय और पितृस्थानीय परिवार पितृवंशीय होते हैं। बहुधा परिवार की संपत्ति का स्वामित्व पितृस्थानीय परिवार में पुरुष को और मातृस्थानीय परिवार में नारी को प्राप्त है। प्राय: संपत्ति का उत्तराधिकारी ज्येष्ठ संतान होती है। किंतु यह आवश्यक नहीं है। भारत की गारो जैसी जनजाति में सबसे छाटी लड़की ही पारिवारिक संपत्ति की स्वामिनी होती है। अनेक समाजों में परिवार के सभी स्त्री या पुरुष सदस्यों में स्वमित्व निहित होता है और कुछ में पुरुष तथा स्त्री दोनों को संपत्ति का उत्तराधिकार प्राप्त है। परिवार का शासन अधिकांश समाजों में पुरुषों के हाथ होता है। अंतर इतना है कि पितृवंशीय परिवारों में साधारणत: पिता अथवा घर का सबसे बड़ा पुरुष और मातृवंशीय परिवारों में मामा या माता का अन्य सबसे बड़ा रक्तसंबंधी (पुरुष) घर का मुखिया होता है। अत: संसार के अधिकांश भागों में और समाजों में पुरुष की प्रधानता पाई जाती है।

संसार में दांपत्य जीवन में प्राय: एकपत्नीत्व ही सबसे अधिक प्रचलित है, यद्यपि अनेक समाजों में पुरुषों को एक से अधिक पत्नियाँ रखने की भी छूट है। इसके विपरीत टोडा और खस जनजातियों में और तिब्बत के कुछ प्रदेशों में बहुपति प्रथा तथा एक प्रकार के यूथ विवाह की प्रथा है। इसी प्रकार भारत में खासी, गारो और अमरीका में होपी, हैडिया जैसी जनजातियाँ भी हैं जो मातृस्थानीय और मातृवंशीय हैं। विवाह के इन रूपों में परिवार की रचना और स्वरूप में अंतर पड़ जाता है।

आधुनिक औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप परिवार की रचना और कार्यों में गंभीर परिवर्तन परिलक्षित हुए हैं। पहले सभी समाजों में परिवार समाज की सबसे महत्वपूर्ण और मौलिक संस्था थी। जीवन का अधिकांश व्यापार परिवार के माध्यम से संपन्न होता था। इन औद्योगिक समाजों में परिवार अब उत्पादन की इकाई नहीं है। बच्चों के शिक्षण का कार्य शिक्षण संस्थाओं ने लिया है। रसोई का कार्य व्यावसायिक भोजनालयों तथा जलपानगृहों में चला गया है। मनोरंजन के लिए पृथक् संगठन स्थापित हो गए हैं। सामाजिक सुरक्षा का उत्तरदायित्व राज्य के पास चला गया और धर्म के घटते हुए प्रभाव के कारण धार्मिक कृत्यों का स्थान गौण को गया है। पति और पत्नी का अधिकांश समय घर के बाहर व्यतीत होता है। फिर भी परिवार बना हुआ है और उसके द्वारा कुछ महत्वपूर्ण कार्य संपन्न होते हैं, जिन्हें परिवार का स्थायी या अवशिष्ट कार्य कहा जाता है। नवरत्न मन्डुसिया की कलम से

https://hi.m.wikipedia.org/wiki/परिवार
1980 के दशक का एक मराठा परिवार 


नवरत्न मन्डुसिया

खोरी गांव के मेघवाल समाज की शानदार पहल

  सीकर खोरी गांव में मेघवाल समाज की सामूहिक बैठक सीकर - (नवरत्न मंडूसिया) ग्राम खोरी डूंगर में आज मेघवाल परिषद सीकर के जिला अध्यक्ष रामचन्द्...