गुरुवार, 4 मई 2017

सामाजिक जीवन मे रिश्ते के महत्व के दो पहलू :- नवरत्न मन्डुसिया

सामाजिक जीवन में सामान्यतः रिश्तों को दो भागों में विभाजित किया जाता है। एक रिश्ता वह जो खून से बंधा होता है, दूसरा रिश्ता जो हम स्वयं गढ़ते हैं। भारतीय परिवेश में खून के रिश्तों को सबसे ज्यादा अहमियत दी जाती है और माना जाता है कि खून का रिश्ता ही सही मायने में जीवन का जुड़ाव होता है, और इससे बढ़कर रिश्ता होता है वैवाहिक संबंधों का।
इससे इतर जो रिश्ते होते हैं वे न तो खून से बंधे होते हैं और न उनमें सामाजिक दायित्वों का ही कोई बंधन होता है। दरअसल सही रिश्ते वे ही होते हैं, जो सारे बंधनों से मुक्त होकर सिर्फ दिल से बंधे होते हैं। इस बात से कई लोगों को एतराज भी हो सकता है, पर सच यही है कि खून के रिश्ते तो इत्तफाक से बनते हैं।
एक परिवार के सदस्यों का आपस में रिश्ता सिर्फ इसलिए होता है कि उन्हें इत्तफाक ने मिलाया होता है। कुछ हद तक यही बात सामाजिक परिवेश में तय होने वाले वैवाहिक संबंधों पर भी लागू होती है। सिर्फ एक नजर में एक-दूसरे को देखकर वैवाहिक संबंधों की स्वीकृति दे देना और फिर जीवनभर उस रिश्ते को निभाना वास्तव में रिश्तों में बंधना नहीं बल्कि समझौता है।
असल रिश्ता तो वह है, जो हम अपनी पूरी समझ-बूझ और परख के साथ तथा अपनी पसंद से बनाते हैं। फिर चाहे वह रिश्ता दो दोस्तों के बीच का हो या फिर प्रेमियों का या फिर पड़ोसियों के बीच का पारिवारिक-सा रिश्ता ही क्यों न हो। सभी में यह बात 'कॉमन' है। कोई भी रिश्ता इत्तफाक या सामाजिक दबाव में नहीं बना।
अपने पूरे जीवन में हम कई लोगों से मिलते हैं। कुछ हमें अच्छे लगते हैं तो कुछ को हम पहली नजर में खारिज कर देते हैं। संपर्क में आने वाले कुछ लोगों से बार-बार मिलने और बात करने की इच्छा होती है और यही आकर्षण दोस्ती या प्रेम की मजबूत गाँठ बन जाता है। ठीक यही बात समीप रहने वाले दो परिवारों के बीच भी होती है। बहुत सारे लोगों के बीच रहकर भी ऐसे लोग उंगलियों पर गिनने लायक ही होते हैं, जिन्हें हम अपने बहुत नजदीक मानते हैं।
उन्हें अपने दिल की बात बताने का भी मन करता है और उनके दिल की बात सुनने की भी इच्छा होती है। अक्सर देखा जाता है कि स्कूल, कॉलेज या दफ्तरों में कई जोड़ी दोस्त होते हैं। सभी एक साथ रोज मिलते तो जरूर हैं पर सभी को जब भी बातचीत का अवसर मिलता है, वे गुटों में बंट जाते हैं। इसका सीधा-सा अर्थ यही है कि जो जिसके साथ निकटता महसूस करता है, वह उसी के साथ समय भी गुजारना चाहता है।
रिश्तों को जीवन की सफलता और असफलता के मामले में भी एक बड़ा मानक माना गया है। कब, कौन-सा रिश्ता या कौन-सी दोस्ती व्यक्ति को सफलता की ऊंचाइयों पर पहुंचा दे, कहा नहीं जा सकता लेकिन यदि परिस्थितियां अनुकूल न हों तो इसका उलट भी हो सकता है। ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं है, जब किसी साथी की मदद से व्यक्ति शिखर पर पहुंच गया, पर सारा दारोमदार इस बात पर निर्भर है कि आप अपने रिश्ते के प्रति कितने गंभीर हैं।
नवरत्न मन्डुसिया की कलम से

शनिवार, 29 अप्रैल 2017

मेघवाल समाज की बेटी अनु मेघवाल समाज का एक युवा चेहरा

दोस्तो आप सब जानते है की एक तरफ़ भूर्ण हत्यायें हो रही है लोग बेटियाँ को कलंक मानते है और जन्म से पहले ही बेटियों  मौत के घाट उतार दिये जाते है और दूसरी तरफ़ जयपुर की सवाई मान सिंह मेडिकल कॉलेज की छात्रा अनु मेघवाल इस समय बहूत जोर शोर से समाज.सेवा के साथ साथ  राजनीति मे अपना अच्छा योगदान दे रही है अनु मेघवाल का कहना है की बेटी एक देवी का रुप होती है हमे बेटियों की पूजा करनी चाहिये और मुख्य रुप से यह भी इनका कहना है की.यदि समाज मे नारियों की इज्जत होगी तो समाज का उथ्थान होगा और समाज मे नारियों का मनोबल बढेगा क्यों आजाद हिंदुस्तान मे समानता का अधिकार है इस कारण हम बेटियों को डरना नही चाहिये बल्कि विपरीत परिस्मेथियों का सामना होगा ये सौच है एक दलित बेटी अनु मेघवाल की मे  नवरत्न मन्डुसिया बहिन अनु जी मेघवाल को तहदील से आभार प्रकट करता हूँ धन्यवाद देता हूँ की आप मेघवाल समाज मे जन्म लेकर यह साबित कर दिया है की समाज मे बेटी भी किसी से कम नही है और सबको यह बता दिया है की कोई भी दलित बेटी किसी से कम नही है यदि वह कूछ ठान ले तो वह बेटी अपनी मंजिल तक आसानी से पहुंच सकती है अनु मेघवाल वर्तमान मे जयपुर के सबसे बड़े महाविद्यालय सवाई मान सिंह मेडिकल कॉलेज की अध्यक्ष पद पर आसीन है और अभी नयी दिल्ली मे सरकारी चिकित्सक पद पर चयन हुवा है और यह भी सबसे बड़ी बात है की दिल्ली जेसे प्रदेश मे एक मेघवाल समाज की बेटी सेवायें देगी अनु मेघवाल अपने परिवार और मित्रों को आदर्श मानती है तथा राजनीति मे जाने के लिये तथा शिक्षा के बहूत प्रेरित करती है और गरीबो की सेवा करना मुख्य आधार मानती है अनु मेघवाल बीस साल की मेघवाल समाज की युवा चेहरा है और इन्होने सरकारी कॉलेज से एम.बी.बी.एस किया है अनु मेघवाल अपने टिव्टर फेसबुक इन्स्टोग्राम यू ट्य्युब आदि सोशियल अकाउंट पर सक्रिय रहती है
नवरत्न मन्डुसिया की कलम से
सामाजिक जनसेवक
अनु मेघवाल और साथ मे मानवीय भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र जी मोदी और अमित शाह जी 

शुक्रवार, 28 अप्रैल 2017

भीम प्रवाह' समाचार-पत्र का उद्देश्य बहुजन मीडिया को मजबूती प्रदान करना हैं - बरवड़

आज मीडिया की ताकत को हर व्यक्ति जानता है। जिसने मीडिया की ताकत को पहचान लिया और उपयोग कर लिया तो समझो उसने अपना मिशन जीत लिया। हमारे लोग मनुवादी मीडिया, मनुवादी मीडिया चिल्लाते रहते हैं। लेकिन ये तो सोचिए आप अपने मीडिया ( बहुजन सामाजिक मीडिया) के लिए कुछ कर रहे हैं या बस मनुवादी मीडिया पर ही अपनी भड़ास निकाल रहे हैं। मनुवादी मीडिया अपना काम कर रहा है और बहुजन समाज का तबीयत से बैंड बजा रहा है।
समझ में यह नहीं आ रहा है कि हम हमारे अपने बहुजन सामाजिक मीडिया ( प्रिंट,  इलेक्ट्रॉनिक मीडिया) को सपोर्ट क्यों नहीं कर रहे हैं ? क्या कारण है कि हम अपना मीडिया तंत्र विकसित करने में आपना योगदान नहीं दे रहे हैं ? मनुवादी मीडिया को गाली देने से कुछ नहीं होगा। आप अपना मीडिया विकसित करें। कौन रोकता है ?
हमारे इतने झुझारू समाज बंधु सामाजिक समाचार पत्रों, पत्रिकाओं,चैनलों का प्रकाशन, प्रसारण कर रहे हैं लेकिन हम उन्हें अपना सपोर्ट नहीं दे रहे हैं। हम केवल हमारे अपने संपादक, प्रेस रिपोर्टर की बुराई करने में आगे रहते हैं लेकिन मनुवादी मीडिया के सामने हमारी घिग्घी बंध जाती है।
बहुजन मीडिया की कड़ी के रूप में राजस्थान के सीकर जिला मुख्यालय से प्रकाशित सामाजिक न्याय को समर्पित
 'भीम प्रवाह' पाक्षिक समाचार - पत्र शोषण अन्याय व अत्याचार के विरूध्द गरीब कमजोर वर्ग की आवाज बुलंद करने का मुख्य वाहक माना जाता है। भीम प्रवाह पाक्षिक समाचार-पत्र की स्थापना 1 सितंबर 2015 को हुई। समाचार- पत्र आर्थिक,सामाजिक व राजनैतिक सहित विभिन्न झंझावतों को झेलते हुए वर्ष 2017 सितंबर माह में अपने सफलतम तीन वर्ष का मुकाम तय करेगा।
इसके सम्पादक मेघवाल समाज में जन्मे बीरबल सिंह बरवड़ जो कि राजस्थान प्रांत के सीकर जिले की श्रीमाधोपुर तहसील के ग्राम लापुवां के निवासी है। आपकी किसी से कोई व्यक्तिगत लड़ाई नही है, लड़ाई है तो अत्याचार व जुल्म से है क्यों की यह गरीबो पर जुल्म अत्याचार होते हुए नही देख सकते। पीड़ित को न्याय दिलाने में मीडिया की मुख्य भूमिका रहती है। अत: इस सोच को मूर्तरूप देने के लिए उन्होंने एक समाचार - पत्र के प्रकाशन का मानस बनाया। जो कि आज हम भीम प्रवाह के रूप में देख रहे हैं। लेखन के क्षैत्र में सदा से ही आपकी रूचि रही है। विभिन्न सामाजिक पत्र - पत्रिकाओ के आपकी रचनाएं पिछले 15 वर्षों से लगातार प्रकाशित होती रहती हैं।
संपादक बरवड़ बताते है कि 'भीम प्रवाह' समाचार-पत्र का मुख्य उध्देश्य गरीबो को न्याय दिलाना कमजोर वर्गों को साथ देना और संविधान निर्माता बाबा साहेब डॉ.भीमराव अम्बेडकर के आदर्शों व उनकी विचारधारा को आमजन तक पहुंचाना और लागू करवाने में अपनी भूमिका अदा करना है ।

'भीम प्रवाह' समाचार-पत्र का माध्यम

समाचार-पत्र सूचनाओं व मानवीय संवेदनाओं के आदान-प्रदान का प्रमुख स्तंभ है । इसका इतिहास अपेक्षाकृत प्राचीन है । प्राचीन काल में यह क्षेत्र विशेष तक ही सीमित था परंतु छपाई की कला में नित नए अन्वेषणों व इसकी उपयोगिता को देखते हुए समाचार-पत्रों में समय के साथ व्यापकता आई हैं। आज के जमाने मे समाचार-पत्रों की व्यापकता इतनी अधिक हो गई है कि ये जन-मानस का प्रमुख अंग बन चुके हैं । तथा दिन-प्रतिदिन इनसे जुड़ाव बढ़ता ही जा रहा है । विश्वभर में अनेकों भाषाओं में समाचार-पत्र प्रकाशित होते हैं । हमारे देश में भी अधिकांश पत्र हिंदी भाषा में प्रकाशित होते हैं। आगे हमे अंग्रेजी भाषा में राष्ट्रीय स्तर पर सामाजिक समाचार-पत्रों के प्रकाशन की आवश्यकता हैं । इसके अतिरिक्त देश के विभिन्न भागों में क्षेत्रीय भाषाओं में भी समाचार-पत्र प्रकाशित करने की जरूरत है। इस क्षैत्र में 'भीम प्रवाह' का प्रयास सराहनीय हैं। आज हमारी भी जिम्मेदारी बनती है कि गाँव गाँव, ढाणी - ढाणी मे 'भीम प्रवाह' को पहुंचाने हेतु सफल और सकारात्मक पहल कर  बाबा साहब अंबेडकर व बहुजन महापुरूषों की विचारधारा को घर घर पहुंचाने में अपना अपेक्षित सहयोग प्रदान करें।
'भीम प्रवाह' समाचार-पत्र प्रजातांत्रिक शासन प्रणाली के प्रमुख स्तंभों में से एक हैं । इसके माध्यम से व्यक्ति अपने भावों,अनुभवों व संवेदनाओं को समाज व राष्ट्र के सम्मुख निष्पक्ष और निर्भय होकर व्यक्त कर सकता है। समाचार-पत्र के माध्यम से किसी विशेष विषय से संबंधित लोगों का मत या उनकी राय भी जानी जा सकती है। इस पत्र के माध्यम से देश-विदेश की राजनीतिक उथल-पुथल व नेताओं के वक्तव्य आदि की जानकारी हम घर बैठे ही प्राप्त कर लेते हैं । इसके अतिरिक्त किसी राजनीतिक पहलू पर लिए गए किसी विशेष निर्णय के संदर्भ में प्रबुध्दजनो व राजनीतिक विश्लेषकों द्वारा प्रस्तुत समीक्षा का भी हम अवलोकन कर सकते हैं । साथ ही साथ उस विशेष निर्णय अथवा घटना के संदर्भ में वांछित अपनी राय व अपना मत हम देश के सम्मुख रख सकते हैं ।
'भीम प्रवाह' ने कम समय में ही पाठकों के दिलों में सम्मानजनक जगह बनाई हैं। समाचार पत्र डाक सेवा से राजस्थान के हर जिले में 15 दिन से दस्तक देता है। इसके साथ ही यूपी. ,हरियाणा, महाराष्ट्र, कर्नाटक, पंजाब , हरियाणा आदि प्रदेशों में भी समाचार पत्र के बहुतायत रूप में पाठक हैं। भीम प्रवाह सोसल मीडिया में  बहुजन समाज के समाचार पत्रों में सर्वाधिक प्रचारित अखबार हैं।



विशेष आग्रह :-
मेरा आग्रह है अपना मीडिया तैयार करें। हमारे समाज बंधु जो सामाजिक समाचारों का प्रकाशन कर रहे हैं उनका तन मन धन से सपोर्ट करें। यह कार्य जरूर करें -
1 प्रत्येक परिवार में एक ना एक सामाजिक समाचार पत्र अवश्य आये।
2. फ्री में सामाजिक समाचार पत्र मंगाने, पढने की गंदी आदत छोड़ दें। जो व्यक्ति सामाजिक समाचार पत्रों को मंगाते हैं लेकिन मासिक/वार्षिक शुल्क नहीं देते हैं ऐसे लोगों के लिए कौनसा शब्द काम में लिया जाये यह मैं शब्दकोश में ढूंढ रहा हूँ।
3. सामाजिक समाचार पत्रों/पत्रिकाओं को प्रकाशित करने वाले हमारे संपादक बहुत मेहनत से काम करते हैं। इनका उत्साहवर्धन करें। समाचार पत्र प्रकाशित करना बहुत ही मेहनत का काम है।
4. हमें इनका तन मन धन से सहयोग करना चाहिए। यदि नहीं कर सकते तो मनुवादी मीडिया से अपनी बेइज्जती कराते रहें।
5. मैं बहुजन समाज के उन लोगों से निवेदन करना चाहूँगा जो उच्च शिक्षित हैं, उच्च पदों पर बैठे हैं, सामाजिक समाचार पत्रों को सपोर्ट करें। आर्थिक सहयोग दें। इनकी ताकत बनें। यदि कोई मुफ्त में सामाजिक समाचार पत्रों को पढने की आदत रखता है तो किसी मनोचिकित्सक से उसका उपचार करायें। क्यों कि ऐसे लोग मनुवादी अखबारों को मुफ्त में पढने की हिम्मत नहीं रखते हैं।
जागो!  जागो!!  जागो!!!
अपनी आवाज जन-जन तक पहुंचाने के लिए अपना मीडिया तैयार करो। ऐसा कोई अपना घर ना हो जहाँ हमारा अपना सामाजिक समाचार पत्र नहीं आता हो।
एक बात पूंछू :-
क्या आपके घर अपना सामाजिक अखबार आता है ? यदि नहीं तो अब क्या सोच रहे हो ? मंगवाना शुरू कर दो जी।
'भीम प्रवाह' समाचार पत्र की सदस्यता ( सहयोग राशि वार्षिक शुल्क 200/- त्रैवार्षिक 600/- आजीवन शुल्क 2100/-) हेतु संपादक के मो. व व्हाट्स अप नं. 07891189451 पर संपर्क किया जा सकता हैं। हम अकसर शिकायत करते हैं कि बहुजन समाज का मीडिया नहीं है। कई मौकों पर वंचित वर्ग के मीडिया की बहुत जरूरत महसूस की जाती हैं। इस हेतु भीम प्रवाह एक स्थायी व कारगर व्यवस्था साबित हो सकती हैं। 'भीम प्रवाह' का चौथे वर्ष में प्रवेश एक नई उम्मीद जगाती हैं। अत: आप सभी नौकरी पेशा कर्मचारी वर्ग, उध्द्मियो व समाज के भामाशाहों से अपील की जाती है कि आप समाचार पत्र के सफल संचालन हेतु यथा सहयोग करें।

"अपना मीडिया, अपनी आवाज।
कदम बढा ले, ऐ जांबाज।।"

*नवरत्न मन्डुसिया की कलम से*

गुरुवार, 27 अप्रैल 2017

नवरत्न मन्डुसिया का मेघवाल समाज का ब्लॉग देश विदेशो मे चमका*

(मन्डुसिया लेखन )मेघवाल समाज का एक ब्लॉग है जो की देश विदेश मे बहूत ज्यादा देखा जा रहा है इस ब्लॉग का नाम मन्डुसिया डॉट ब्लॉग्सपोट डॉट कॉम के नाम से संचालन किया जा रहा है इस मेघवाल समाज के ब्लॉग को राजस्थान प्रांत के सीकर जिले के सुरेरा नामक गाँव के नवरत्न* *मन्डुसिया नामक 23 वर्षीय युवा चला रहा है इस ब्लॉग का मुख्य उद्देश्य: - मेघवाल समुदाय समृद्ध सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, मानसिक और सांस्कृतिक. मृत्यु भोज, शराब दुरुपयोग, बाल विवाह, बहुविवाह, दहेज, विदेशी शोषण, अत्याचार और समाज और सामाजिक कार्यकर्ताओं पर अपराधों को रोकने के लिए और समाज के कमजोर लोगों का समर्थन की तरह प्रगति में बाधा कार्यों से छुटकारा पाने की कोशिश करने का है तथा इस ब्लॉग मे बाबा रामदेव जी महाराज डाली बाई मेघवाल झरकारी बाई राजा राम मेघवाल*
*करनी माता के ग्वाले दशरथ मेघवाल*
*अखिल भारतीय सांगलिया धुनी के संत श्री लादू दास जी महाराज गरीबो के मसीहा संत श्री खीवा दास जी* *महाराज तथा शिक्षा रत्न संत श्री बंशी दास जी महाराज संत श्री भगत दास जी महाराज मेघवाल समाज के रत्न गरीब दास जी महाराज तथा मेघवाल समाज के भारत के लोकसभा* *विधानसभा उच्च पदों पर विराजमान अधिकारियों के नाम पद उनकी जीवनियां आदि के बारे मे जानकारियां दे रखी है तथा यह ब्लॉग बहूत तेजी से कर रखा है इस ब्लॉग का संचालन मेघवाल समाज  लाडला नवरत्न मन्डुसिया ने सन 2011 मे किया गया था बी.ए. और बी.एड़ और एम.ए इतिहास की पढ़ाई में मन लगा और तीनो डिग्रीया पूरी हुई। और इसके साथ साथ नवरत्न मन्डुसिया ने आई.टी.आई ईलेट्रीसीयन* *(विधुतकार )से करने के बाद मे मेघवाल समाज के बारे अनेक तथ्य लिखे तथा अनेक पुस्तकें लिखी तथा इस ब्लॉग का उदेश्य मेघवाल समाज की सेवा करना ही* *उदेश्य हैं आप मेघवाल समाज के इस ब्लॉग से जानकारी देख सकते हैं  तथा आप इस मेघवाल समाज के ब्लॉग मे मेघवाल समाज की रहन सहन वेश भूसा धार्मिक कार्य और आप इस ब्लॉग मे मेघवाल समाज के गोत्र मेघवाल समाज की.उत्पति आदि के बारे मे जानकारी देख सकते है*
*और इस ब्लॉग को भारत के अलावा*
*यू एस ए "फ्रांस " चीन " नेपाल " यू ए इ " लंदन सिंगापुर रूस अफ्रीका के देशों मे तथा बांग्लादेश* मॉरीशस इटली नाइजीरिया केर्नौफौर्निया 
*पाकिस्तान आदि देशों मे बहूत तेजी से देख रहे है तथा इस ब्लॉग को जो भी देखता है तो नवरत्न मन्डुसिया को बधाई देने से नही रोक पाता है नवरत्न मन्डुसिया को एक दिन मे हजारो कॉलों का सामना करना पड़ता है*तथा अब तक लाखो लोग नवरत्न मन्डुसिया के ब्लॉग्स को देख चुके है तथा नवरत्न मन्डुसिया के विदेशो मे रह रहे मित्र यह बताते है की आपका ब्लोग बहूत ही अच्छा है और और इस मेघवाल समाज के ब्लोग की खास बात यह है की दुनिया की कोई सी भी भाषा हो आप उस भाषा मे देख सकते हो और नवरत्न मन्डुसिया को समाज हित मे काम करने के कारण विदेशो मे लाखो रुपयो के ऑफर आ रहे है की आप हमारी कम्पनियों का हिस्सा बनकर आप हमारे से जुड़े और हमारे साथ काम करे 

रविवार, 23 अप्रैल 2017

इंसान की पहचान पहनावे से नहीं, कर्म से होती है :- नवरत्न मन्डुसिया

जिस तरह दीपक की पहचान उसकी लौ से होती है, न कि उसके रंग-रूप या बनावट से। उसी प्रकार इंसान अपने स्वभाव से जाना जाता है। उसकी पहचान उसके कर्म से होती है। न कि उसकी शक्ल, सूरत व पहनावे से।’ सुरेरा के मेघवाल समाज के मोहल्ले  में आयोजित मेघवाल समाज की साधारण सभा मे सामाजिक कार्यकर्ता नवरत्न मन्डुसिया (सुरेरा) ने   यह विचार रखे। उन्होंने कहा कि सूरत से तो बगुला-हंस, भूंड-भंवरा एक से लगते हैं, पर कर्म से पहचाने जाते हैं कि कौन क्या है। ऐसे ही इंसान की भी स्थिति है। कोई पाताल में बैठकर नेकी कर रहा है वो भी प्रकट होगी। कोई यदि किसी कोने में छिपकर बदी कर रहा है, वो भी सामने आएगी। अपने आपसे न कोई बचा है, न बच सकता है। हर इंसान अपने स्वभाव के अधीन होता है। चाहे कोई लाख यत्न कर ले, पर अपनी सोच, कर्म, फितरत को नहीं छिपा सकता। उन्होंने कहा कि अपने अंदर के विपरीत भाव का रुपांतरण किया जा सकता है। जब बड़े-बड़े पापी-कपटी, कामी-क्रोधी, लोभी बदल सकते हैं, तो हम क्यों नहीं बदल सकते। बस वैसा कर्म करना पड़ेगा। पहले भी पारस छूने से लोहा सोना बन जाता था, आज भी वैसा ही है। इंसान भी सही मार्ग दर्शन से अच्छाई का मार्ग अपना सकता है। इसके लिए पूर्ण सतगुरु की शरण में जाना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि यह मानव तन हम सभी को बहुत सौभाग्य से मिला है। इसलिए हमें अपने जीवन में कोई भी पाप व बुरे कर्म नहीं करने चाहिए।
और सबसे बड़ा धर्म माता पिता की सेवा करना है समाज को आगे बढाना है तो नारियों का समान करना और महिलाओं को इज्जत देना ही सबसे बड़ा धर्म है आजाद हिंदुस्तान मे दिन प्रतिदिन महिलाओं की लज्जा भंग उनके साथ बलात्कार यॆ हमारे समाज के लिये बहूत ही शर्म की बात है इसलिए सारी कुरुतीयो को त्याग कर हमे समाज की इज्जत करनी चाहिये और भाईचारे की भाँति रहना चाहिये और अन्य धर्मों की हिफाजत भी करनी चाहिये और सभी धर्मों को समान रुप से मानना चाहिये और हमे अन्य धर्मों की मर्यादाओं को भंग नही करना चाहिये हमे हिन्दू मुस्लिम एकता पर बल देना चाहिये
                                  नवरत्न मन्डुसिया की कलम से 

हिम्मत करने वालों की हार नहीं होती

लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती
हिम्मत करने वालों की कभी हार नहीं होती

नन्हीं चींटीं जब दाना ले कर चढ़ती है
चढ़ती दीवारों पर सौ बार फिसलती है
मन का विश्वास रगॊं मे साहस भरता है
चढ़ कर गिरना, गिर कर चढ़ना न अखरता है
मेहनत उसकी बेकार नहीं हर बार होती
हिम्मत करने वालों की कभी हार नहीं होती

डुबकियाँ सिंधु में गोताखोर लगाता है
जा-जा कर खाली हाथ लौट कर आता है
मिलते न सहज ही मोती गेहरे पानी में
बढ़ता दूना विश्वास इसी हैरानी में
मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती
हिम्मत करने वालों की कभी हार नहीं होती

असफलता एक चुनौती है, स्वीकार करो
क्या कमी रह गयी देखो और सुधार करो
जब तक न सफल हो नींद-चैन को त्यागो तुम
संघर्षों का मैदान छोड़ मत भागो तुम
कुछ किए बिना ही जयजयकार नहीं होती
हिम्मत करने वालों की कभी हार नहीं होती

                                 …….हरिवंशराय बच्चन

शुक्रवार, 21 अप्रैल 2017

पहले मे दलितों का हितेसी हूँ बाद मे पार्टी :- ऊदा राम मेघवाल


पश्चिमी राजस्थान के बाड़मेर जिले की शिव तहसील के देदडीयार गाँव में 54 वर्ष पहले एक अत्यंत गरीब मेघवाल परिवार में उदाराम मेघवाल जन्मे .वे अपनी चार बहनों तथा दो भाइयों में सबसे छोटे थे .जब उनकी उम्र महज छह साल थी तभी पिताजी होठीराम गुजर गये. राजकीय प्राथमिक पाठशाला बालेवा में उन्होंने पांचवी तक पढाई की ,लेकिन छठी क्लास में प्रवेश के लिए 14 रूपये की फीस नहीं जुटा पाने की वजह से उन्हें स्कूल छोड़ना पड़ा .घर में कोई कमाई का जरिया भी नहीं था ,इसलिये उन्हें अपना पूरा बचपन गाँव के ही सक्षम लोगों के यहाँ हाली ( बंधुआ श्रमिक ) के रूप में गुजारना पड़ा .

सन 1980 में उन्हें नेहरू युवा केंद्र की ओर से बाड़मेरी चद्दर की प्रिंटिंग सीखने का अवसर मिला . गलीचा बनाने का! हुनर तो उनमें था ही ,इस ट्रेनिंग ने उनके लिए नई संभावनाओं के द्वार खोल दिये .1982 में उन्हें गुजरात के राजकोट जिले के जेतपुर तालुका में साड़ी प्रिंट का काम मिल गया ,जहाँ पर रह कर उन्होंने लगातार कईं साल काम किया और अपने परिवार की आर्थिक हालत सुधारी .पारिवारिक स्थिति ठीक हुई तो उन्हें अपनी अधूरी छूट गई पढाई की याद आई .इन्हीं दिनों में उनकी मुलाकात पटवारी उदाराम और मुकनाराम परिहार से हुई,जिन्होंने उन्हें आगे पढ़ने को प्रेरित किया तथा स्वयंपाठी छात्र के रूप में दाखिला भी करा दिया .अब वे दिन में मजदूरी और रात में पढाई करने लगे .1987 में उन्होंने दसवीं पास कर ली और 1989 में उन्होंने सीनियर सेकेंड्री का एग्जाम पास कर लिया . बाद में राजकीय महाविद्यालय बाड़मेर से रेगुलर छात्र के रूप में उन्होंने स्नातक तक शिक्षा प्राप्त कर अपने पढ़ने के मिशन को कामयाब बना डाला .

कॉलेज स्टूडेंट रहते हुये उदाराम में सामाजिक कार्यों की चेतना आई तथा उन्होंने विभिन्न सरकारी योजनाओं का लाभ पात्र लोगों को दिलाने और हर दिन अस्पताल जा कर लोगों की सेवा करने जैसे कार्यों को करना शुरू किया .तब तक न कोई दिशा थी और ना ही किसी का मार्गदर्शन. विचारधारा की तो कोई समझ थी ही नही .किसी तरह आगे बढ़ना था ,नाम करना था और कुछ कर दिखाना था .उनकी सक्रियता तथा सेवा भाव को देखते हुए बाड़मेर भाजपा के तत्कालीन जिलाध्यक्ष महानंद शर्मा ने उन्हें बीजेपी में शामिल कर लिया और भाजपा अनुसूचित जाति मोर्चे का जिला महासचिव नियुक्त कर दिया .भाजपा में वे शीघ्र ही जोगेश्वर गर्ग ,टीकमचंद कान्त ,किशन सोनगरा तथा कैलाश मेघवाल जैसे भाजपाई दलित नेताओं के करीबी बन गये.सम्पर्क बढ़े तो जिले में भाजपा संगठन में भी कद ऊँचा हुआ ,इस तरह वे भाजपा के जिला उपाध्यक्ष के पद तक पंहुच पाने में कामयाब रहे .

राजस्थान में उन दिनों भाजपा का शासन ही था कि 1998 में बाखासर गाँव के लीला धर मेघवाल की हत्या हो गई ,हुआ यह कि बाखासर के नामी डाकू बलवंत सिंह के परिवार से जुड़े लोगों ने लीलाधर व एक अन्य दलित को चलती हुईगाड़ी से फेंक दिया .लीलाधर की तो मौके पर ही मौत हो गई .लीलाधर की मौत ने बाड़मेर के दलित समुदाय को झकझोर कर रख दिया .पूरा जोधपुर संभाग आक्रोश से सुलग उठा .उस वक़्त आक्रोशित दलित समाज के साथ उदाराम मेघवाल पार्टी की परवाह किये बगैर आ खड़े हुये. दलित समुदाय ने उनमें भरोसा जताया तथा उनको दलित संघर्ष समिति बाड़मेर का संयोजक बनाया .30 दिन लम्बा संघर्ष चला .पूरा पुलिस प्रशासन बदल दिया गया ,मगर दलितों की नाराजगी इस कदर थी कि उन्होंने सामूहिक रूप से भाजपा का बहिष्कार कर दिया .भाजपा के जिला उपाध्यक्ष उदाराम मेघवाल ने अपने नेतृत्व में चल रहे आन्दोलन में अपनी ही पार्टी के बहिष्कार का निर्णय ले कर सबको चौंका दिया .उदाराम मेघवाल उन दिनों को याद करते हुए बताते है कि – “ यह मेरे समाज का निर्णय था , जिसे मुझे मानना ही था ,मेरे लिए तब से अब तक पार्टी से पहले मेरा दलित समाज ही है और आगे भी रहेगा “

भाजपा से खफा उदाराम मेघवाल ने 1998 के चुनावों में भाजपा का विरोध करते हुए खुलकर कांग्रेस का प्रचार किया .प्रदेश में अशोक गहलोत सत्तासीन हुये.उन्होंने अपना वादा निभाया और सरकार बनते ही बाखासर कांड के सभी आरोपियों के खिलाफ चालान करवाया और सभी आरोपी जेल पंहुचे और उन्हें आजीवन कारावास की सजा मिली .इस जीत ने उदाराम मेघवाल को बाड़मेर ही नहीं बल्कि जोधपुर संभाग में भी दलित अत्याचारों के लिए पार्टी हितों से ऊपर उठाकर संघर्ष करने वाले सामाजिक राजनितिक कार्यकर्ता के रूप में स्थापित कर दिया .

कांग्रेस में भी जल्दी ही उनकी लडाई यथास्थिति बरक़रार रखने वाले तत्वों से शुरू हो गई.ग्राम पंचायतों के डीलिमिटेशन को लेकर विधायक आमीन खान से उनकी भिडंत हो गई.दूसरी तरफ नोहडीया के तला के चांदाराम की साजिशन हत्या के विरुद्ध छेड़े गये आन्दोलन की वजह से विधायक अब्दुल हादी भी खिलाफ हो गये.इसके बाद मकाराम मेघवाल तरासर मठ की हत्या और सवाई राम गर्ग हत्याकांड जैसे मामले उठाने की वजह से भी सत्तारूढ़ कांग्रेस से उनके रिश्ते ख़राब हो गये.एक बार फिर उदाराम राजनितिक रूप से चौराहे पर थे .अपने समर्थकों की सलाह पर उन्होंने वापस भाजपा का दामन थाम लिया ,पर ना वो पार्टी को अपना पाये और ना ही पार्टी उनको .2003 वसुंधराराजे मुख्यमंत्री बनी .भाजपा शासन में भी दलित अत्याचारों में कोई कमी नहीं आई. बाड़मेर अत्याचारों की दृष्टि से अव्वल ही बना रहा ,संघर्ष जारी रहा .अंततः उन्होंने भाजपा को अलविदा कह दिया और लोकसभा चुनाव आते आते वे पुनः कांग्रेस में चले गये.हैरत की बात इसलिए भी नहीं थी क्योंकि राजस्थान जैसे प्रदेश में जहाँ भाजपा कांग्रेस जैसी दो ही पार्टियाँ बहुमत प्राप्त करती रहती है तथा किसी मजबूत तीसरे विकल्प के नहीं होने से राजनीती की धुरी बनी हुयी है ऐसे में सदैव ही दलित राजनीतिक कार्यकर्ताओं को भ्रमित रह कर वे दोनों पार्टियों के बीच फुटबाल बने रहते है .इस विकल्पहीनता को ख़त्म करने की दिशा में काम किये जाने की सख्त जरुरत है .

खैर, सन 2005 के पंचायती राज चुनाव में उदाराम मेघवाल शिव पंचायत समिति में कर्नल सोना राम के सहयोग से प्रधान बनने में सफल रहे .सूबे में सरकार भाजपा की थी , इसलिए प्रधानी का सफ़र काफी मुश्किलों भरा रहा .लेकिन प्रधान रहते हुए भी उदाराम दलित अत्याचारों के मामले में संघर्ष करने में सदैव अग्रणी रहे .उन्होंने अपने पद की परवाह किये बगैर दलित अत्याचार निवारण समिति के बैनर तले लगातार 65 दिन तक धरने पर बैठ कर रिकॉर्ड कायम किया तथा शिवकर के दलितों की जिस जमीन पर सामंत कब्ज़ा जमा बैठे थे ,उसे ना केवल मुक्त करवा दिया बल्कि अवैध रूप से जबरन दलितों की भूमि कब्जाने वाले सभी 22 सामंतों को जेल की सलाखों के पार पंहुचा कर ही दम लिया .

फरवरी 2010 से कांग्रेस से जिला परिषद् के सदस्य भी रहे .सत्ता पुनः कांग्रेस की आ ही चुकी थी .उदाराम मेघवाल कांग्रेस से प्रधान रहने के बाद अब जिला परिषद् के सदस्य थे कि सूचना के अधिकार कार्यकर्ता मंगला राम के हाथ पांव कांग्रेस से ही जुड़े एक सरपंच ने तोड़ दिये. उदाराम मंगलाराम को न्याय दिलाने के संघर्ष में आगेवान हो गये.उन्होंने बिना डरे कांग्रेस की सत्ता से लौहा लिया .प्रदेश अध्यक्ष तथा मुख्यमंत्री तक के पुतले फूंके ,नतीजा यह निकला कि उनके खिलाफ उन्हीं की पार्टी की सरकार ने 4 मुकदमे दर्ज करवा दिए.  फंसाने तथा डराने की हर संभव कोशिस की .उदा राम न डरे और न ही फंसे .चारों मुकदमें झूठे साबित हुये.सरकार ने अपनी लाज उन्हें बीस सूत्रीय कार्यक्रम क्रियान्वयन समिति का जिला उपाध्यक्ष बना कर बचाई.

आरटीआई एक्टिविस्ट मंगला राम की न्याय की लडाई के दौरान ही 2011 में मेरी मुलाकात उदाराम जी से हुई,तब से मैं उनको निरंतर मोर्चे पर अग्रणी देखता हूँ .अनथक लड़ते हुये. बेलोस, बेबाक, बेखौफ बोलते हुये. बाड़मेर जिले की प्रतिभाशाली छात्रा डेल्टा मेघवाल के यौन शोषण तथा उसकी रहस्यमय परिस्थितियों में हुए मौत के मामले में हुये आन्दोलन में भी उदाराम मेघवाल काफी सक्रिय रहे है .वर्ष 2016 के अगस्त में उन्होंने बाड़मेर जिले के दलित अत्याचारों के 27 प्रकरणों को लेकर दलित अत्याचार निवारण समिति के ज़रिये 22 दिन लम्बा एक ऐतिहासिक ‘दलित महापड़ाव’ आयोजित किया ,जिसमे हर दिन सैंकड़ों की तादाद में लोगों की उत्साहवर्धक मौजूदगी देखने को मिली .इस महापड़ाव में उठाये गए ज्यादातर प्रकरणों में चालान हो गया है .हालाँकि कुछ मामलों में एफआर भी लगी है . आन्दोलन की वजह से उदाराम मेघवाल तथा उनके साथियों के विरुद्ध एक केस भी दर्ज हुआ है ,पर इस तरह की बातों से वे घबराते नहीं है .लड़ना ही उनकी ज़िन्दगी का मकसद बन चुका है .आजकल वे अपने जिले के एसपी गगन दीप सिंघला से भिड़े हुये है .

दलित अत्याचार निवारण समिति बाड़मेर के जिला संयोजक उदाराम मेघवाल के मुताबिक –“ जिले में दलित अत्याचार के मामले बढ़ते ही जा रहे है .जातिगत अपमान ,मारपीट,जमीने छीनना ,सामूहिक हमला करना , हत्या कर देना तथा दलित महिलाओं के साथ बलात्कार जैसे गंभीर मामले हर रोज दर्ज हो रहे है ,मगर पुलिस संवेदनशील नहीं है .दलित अत्याचार निवारण कानून में संशोधन होने के बाद अब तक 247 मामले दर्ज हुए है ,जिनमे से 74 में चालान पेश हुआ है .87 को झूठा बता दिया गया है .86 में तफ्तीश जारी होना बताया जाता है ,जो कि अनुसन्धान के लिए प्रदत्त 60 दिनों की अवधि से भी ज्यादा समय बीत जाने के बावजूद अनुसन्धान जारी ही है .हद तो यह है कि अजा जजा अत्याचार निवारण अधिनियम 1989 संशोधित हो चुका है , 26 जनवरी 2016 से नया कानून लागू हो गया है.14 अप्रैल 2016 से अजा जजा अत्याचार निवारण संशोधन अधिनियम के नियम भी लागू किये जा चुके है ,मगर इसके बावजूद भी बाड़मेर जिले में लगभग 40 दलित अत्याचार के मामले पुराने कानून की विभिन्न धाराओं में दर्ज किये गए ,उसी में उनका अनुसन्धान किया गया तथा न्यायालय में चालान तक पुराने कानून की धाराओं में ही कर दिया गया है .ऐसी अंधेरगर्दी मचा रखी है पुलिस ने ,जिसके खिलाफ हम संघर्षरत है .एसपी हम लोगों को किसी न किसी मामले में फंसा देना चाहता है ,ताकि दलितों की आवाज दब जाये .मगर हम चुप होने वालों में से नहीं है “ उदाराम मेघवाल इस मामले को हाईकोर्ट ले जा रहे है ताकि ठीक से सुनवाई हो सके .

बार बार राजनीतिक प्रतिबद्धताओं में परिवर्तन होने तथा एक ऐसे राजनीतिक दल के सदस्य होने जिसे अम्बेडकरवादी समूह सही नहीं मानते है ,सम्बन्धी सवालों पर उदाराम मेघवाल का कहना है कि –“ मैं कांग्रेस का सदस्य जरुर हूँ ,पर विचारधारा से बाबा साहब के मिशन के करीब हूँ ,मेरे लिए मेरा दलित बहुजन समाज ही प्रथम है .अगर मेरी पार्टी और मेरे समाज के मध्य हितों का टकराव होता है तो मैं अव्वल और आखिरी समाज के ही साथ खड़ा होऊंगा ,मेरे लिए बाबा साहब की विचारधारा ही प्राथमिकता में है “

निश्चित रूप से उदाराम मेघवाल जैसे राजनीतिक सामाजिक कार्यकर्ता जय भीम की सेना के वे वफादार सिपाही है ,जो अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा तो रखते है ,मगर वे उसे पाने के लिए मुंह सिल कर नहीं बैठते .मुखर हो कर बोलते है .सड़कों पर उतरते है ,मुट्ठियाँ बांधते है और आकाश में नारे भी उछालते है . अपने ही नेताओं के पुतलों को आग के हवाले भी करते है तथा अपने लोगों को न्याय दिलाने के लिए संघर्ष करते है क्योंकि उन्हें पूना पैक्ट की खरपतवार कहलाना पसंद नहीं है . विभिन्न राजनीतिक दलों में गुलाम की भांति हाथ जोड़े ,मुंह सिले ,जबड़े भींचे बैठे पदलोलुप दलित बहुजन लीडरों को उदाराम मेघवाल जैसे राजनीतिक सामाजिक कार्यकर्ता से सीखना चाहिये कि अपने लोगों के लिए लड़ते हुए भी अपनी शर्तों पर राजनीती में कैसे रहा जा सकता है .

नवरत्न मन्डुसिया

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