शुक्रवार, 21 अप्रैल 2017

पहले मे दलितों का हितेसी हूँ बाद मे पार्टी :- ऊदा राम मेघवाल


पश्चिमी राजस्थान के बाड़मेर जिले की शिव तहसील के देदडीयार गाँव में 54 वर्ष पहले एक अत्यंत गरीब मेघवाल परिवार में उदाराम मेघवाल जन्मे .वे अपनी चार बहनों तथा दो भाइयों में सबसे छोटे थे .जब उनकी उम्र महज छह साल थी तभी पिताजी होठीराम गुजर गये. राजकीय प्राथमिक पाठशाला बालेवा में उन्होंने पांचवी तक पढाई की ,लेकिन छठी क्लास में प्रवेश के लिए 14 रूपये की फीस नहीं जुटा पाने की वजह से उन्हें स्कूल छोड़ना पड़ा .घर में कोई कमाई का जरिया भी नहीं था ,इसलिये उन्हें अपना पूरा बचपन गाँव के ही सक्षम लोगों के यहाँ हाली ( बंधुआ श्रमिक ) के रूप में गुजारना पड़ा .

सन 1980 में उन्हें नेहरू युवा केंद्र की ओर से बाड़मेरी चद्दर की प्रिंटिंग सीखने का अवसर मिला . गलीचा बनाने का! हुनर तो उनमें था ही ,इस ट्रेनिंग ने उनके लिए नई संभावनाओं के द्वार खोल दिये .1982 में उन्हें गुजरात के राजकोट जिले के जेतपुर तालुका में साड़ी प्रिंट का काम मिल गया ,जहाँ पर रह कर उन्होंने लगातार कईं साल काम किया और अपने परिवार की आर्थिक हालत सुधारी .पारिवारिक स्थिति ठीक हुई तो उन्हें अपनी अधूरी छूट गई पढाई की याद आई .इन्हीं दिनों में उनकी मुलाकात पटवारी उदाराम और मुकनाराम परिहार से हुई,जिन्होंने उन्हें आगे पढ़ने को प्रेरित किया तथा स्वयंपाठी छात्र के रूप में दाखिला भी करा दिया .अब वे दिन में मजदूरी और रात में पढाई करने लगे .1987 में उन्होंने दसवीं पास कर ली और 1989 में उन्होंने सीनियर सेकेंड्री का एग्जाम पास कर लिया . बाद में राजकीय महाविद्यालय बाड़मेर से रेगुलर छात्र के रूप में उन्होंने स्नातक तक शिक्षा प्राप्त कर अपने पढ़ने के मिशन को कामयाब बना डाला .

कॉलेज स्टूडेंट रहते हुये उदाराम में सामाजिक कार्यों की चेतना आई तथा उन्होंने विभिन्न सरकारी योजनाओं का लाभ पात्र लोगों को दिलाने और हर दिन अस्पताल जा कर लोगों की सेवा करने जैसे कार्यों को करना शुरू किया .तब तक न कोई दिशा थी और ना ही किसी का मार्गदर्शन. विचारधारा की तो कोई समझ थी ही नही .किसी तरह आगे बढ़ना था ,नाम करना था और कुछ कर दिखाना था .उनकी सक्रियता तथा सेवा भाव को देखते हुए बाड़मेर भाजपा के तत्कालीन जिलाध्यक्ष महानंद शर्मा ने उन्हें बीजेपी में शामिल कर लिया और भाजपा अनुसूचित जाति मोर्चे का जिला महासचिव नियुक्त कर दिया .भाजपा में वे शीघ्र ही जोगेश्वर गर्ग ,टीकमचंद कान्त ,किशन सोनगरा तथा कैलाश मेघवाल जैसे भाजपाई दलित नेताओं के करीबी बन गये.सम्पर्क बढ़े तो जिले में भाजपा संगठन में भी कद ऊँचा हुआ ,इस तरह वे भाजपा के जिला उपाध्यक्ष के पद तक पंहुच पाने में कामयाब रहे .

राजस्थान में उन दिनों भाजपा का शासन ही था कि 1998 में बाखासर गाँव के लीला धर मेघवाल की हत्या हो गई ,हुआ यह कि बाखासर के नामी डाकू बलवंत सिंह के परिवार से जुड़े लोगों ने लीलाधर व एक अन्य दलित को चलती हुईगाड़ी से फेंक दिया .लीलाधर की तो मौके पर ही मौत हो गई .लीलाधर की मौत ने बाड़मेर के दलित समुदाय को झकझोर कर रख दिया .पूरा जोधपुर संभाग आक्रोश से सुलग उठा .उस वक़्त आक्रोशित दलित समाज के साथ उदाराम मेघवाल पार्टी की परवाह किये बगैर आ खड़े हुये. दलित समुदाय ने उनमें भरोसा जताया तथा उनको दलित संघर्ष समिति बाड़मेर का संयोजक बनाया .30 दिन लम्बा संघर्ष चला .पूरा पुलिस प्रशासन बदल दिया गया ,मगर दलितों की नाराजगी इस कदर थी कि उन्होंने सामूहिक रूप से भाजपा का बहिष्कार कर दिया .भाजपा के जिला उपाध्यक्ष उदाराम मेघवाल ने अपने नेतृत्व में चल रहे आन्दोलन में अपनी ही पार्टी के बहिष्कार का निर्णय ले कर सबको चौंका दिया .उदाराम मेघवाल उन दिनों को याद करते हुए बताते है कि – “ यह मेरे समाज का निर्णय था , जिसे मुझे मानना ही था ,मेरे लिए तब से अब तक पार्टी से पहले मेरा दलित समाज ही है और आगे भी रहेगा “

भाजपा से खफा उदाराम मेघवाल ने 1998 के चुनावों में भाजपा का विरोध करते हुए खुलकर कांग्रेस का प्रचार किया .प्रदेश में अशोक गहलोत सत्तासीन हुये.उन्होंने अपना वादा निभाया और सरकार बनते ही बाखासर कांड के सभी आरोपियों के खिलाफ चालान करवाया और सभी आरोपी जेल पंहुचे और उन्हें आजीवन कारावास की सजा मिली .इस जीत ने उदाराम मेघवाल को बाड़मेर ही नहीं बल्कि जोधपुर संभाग में भी दलित अत्याचारों के लिए पार्टी हितों से ऊपर उठाकर संघर्ष करने वाले सामाजिक राजनितिक कार्यकर्ता के रूप में स्थापित कर दिया .

कांग्रेस में भी जल्दी ही उनकी लडाई यथास्थिति बरक़रार रखने वाले तत्वों से शुरू हो गई.ग्राम पंचायतों के डीलिमिटेशन को लेकर विधायक आमीन खान से उनकी भिडंत हो गई.दूसरी तरफ नोहडीया के तला के चांदाराम की साजिशन हत्या के विरुद्ध छेड़े गये आन्दोलन की वजह से विधायक अब्दुल हादी भी खिलाफ हो गये.इसके बाद मकाराम मेघवाल तरासर मठ की हत्या और सवाई राम गर्ग हत्याकांड जैसे मामले उठाने की वजह से भी सत्तारूढ़ कांग्रेस से उनके रिश्ते ख़राब हो गये.एक बार फिर उदाराम राजनितिक रूप से चौराहे पर थे .अपने समर्थकों की सलाह पर उन्होंने वापस भाजपा का दामन थाम लिया ,पर ना वो पार्टी को अपना पाये और ना ही पार्टी उनको .2003 वसुंधराराजे मुख्यमंत्री बनी .भाजपा शासन में भी दलित अत्याचारों में कोई कमी नहीं आई. बाड़मेर अत्याचारों की दृष्टि से अव्वल ही बना रहा ,संघर्ष जारी रहा .अंततः उन्होंने भाजपा को अलविदा कह दिया और लोकसभा चुनाव आते आते वे पुनः कांग्रेस में चले गये.हैरत की बात इसलिए भी नहीं थी क्योंकि राजस्थान जैसे प्रदेश में जहाँ भाजपा कांग्रेस जैसी दो ही पार्टियाँ बहुमत प्राप्त करती रहती है तथा किसी मजबूत तीसरे विकल्प के नहीं होने से राजनीती की धुरी बनी हुयी है ऐसे में सदैव ही दलित राजनीतिक कार्यकर्ताओं को भ्रमित रह कर वे दोनों पार्टियों के बीच फुटबाल बने रहते है .इस विकल्पहीनता को ख़त्म करने की दिशा में काम किये जाने की सख्त जरुरत है .

खैर, सन 2005 के पंचायती राज चुनाव में उदाराम मेघवाल शिव पंचायत समिति में कर्नल सोना राम के सहयोग से प्रधान बनने में सफल रहे .सूबे में सरकार भाजपा की थी , इसलिए प्रधानी का सफ़र काफी मुश्किलों भरा रहा .लेकिन प्रधान रहते हुए भी उदाराम दलित अत्याचारों के मामले में संघर्ष करने में सदैव अग्रणी रहे .उन्होंने अपने पद की परवाह किये बगैर दलित अत्याचार निवारण समिति के बैनर तले लगातार 65 दिन तक धरने पर बैठ कर रिकॉर्ड कायम किया तथा शिवकर के दलितों की जिस जमीन पर सामंत कब्ज़ा जमा बैठे थे ,उसे ना केवल मुक्त करवा दिया बल्कि अवैध रूप से जबरन दलितों की भूमि कब्जाने वाले सभी 22 सामंतों को जेल की सलाखों के पार पंहुचा कर ही दम लिया .

फरवरी 2010 से कांग्रेस से जिला परिषद् के सदस्य भी रहे .सत्ता पुनः कांग्रेस की आ ही चुकी थी .उदाराम मेघवाल कांग्रेस से प्रधान रहने के बाद अब जिला परिषद् के सदस्य थे कि सूचना के अधिकार कार्यकर्ता मंगला राम के हाथ पांव कांग्रेस से ही जुड़े एक सरपंच ने तोड़ दिये. उदाराम मंगलाराम को न्याय दिलाने के संघर्ष में आगेवान हो गये.उन्होंने बिना डरे कांग्रेस की सत्ता से लौहा लिया .प्रदेश अध्यक्ष तथा मुख्यमंत्री तक के पुतले फूंके ,नतीजा यह निकला कि उनके खिलाफ उन्हीं की पार्टी की सरकार ने 4 मुकदमे दर्ज करवा दिए.  फंसाने तथा डराने की हर संभव कोशिस की .उदा राम न डरे और न ही फंसे .चारों मुकदमें झूठे साबित हुये.सरकार ने अपनी लाज उन्हें बीस सूत्रीय कार्यक्रम क्रियान्वयन समिति का जिला उपाध्यक्ष बना कर बचाई.

आरटीआई एक्टिविस्ट मंगला राम की न्याय की लडाई के दौरान ही 2011 में मेरी मुलाकात उदाराम जी से हुई,तब से मैं उनको निरंतर मोर्चे पर अग्रणी देखता हूँ .अनथक लड़ते हुये. बेलोस, बेबाक, बेखौफ बोलते हुये. बाड़मेर जिले की प्रतिभाशाली छात्रा डेल्टा मेघवाल के यौन शोषण तथा उसकी रहस्यमय परिस्थितियों में हुए मौत के मामले में हुये आन्दोलन में भी उदाराम मेघवाल काफी सक्रिय रहे है .वर्ष 2016 के अगस्त में उन्होंने बाड़मेर जिले के दलित अत्याचारों के 27 प्रकरणों को लेकर दलित अत्याचार निवारण समिति के ज़रिये 22 दिन लम्बा एक ऐतिहासिक ‘दलित महापड़ाव’ आयोजित किया ,जिसमे हर दिन सैंकड़ों की तादाद में लोगों की उत्साहवर्धक मौजूदगी देखने को मिली .इस महापड़ाव में उठाये गए ज्यादातर प्रकरणों में चालान हो गया है .हालाँकि कुछ मामलों में एफआर भी लगी है . आन्दोलन की वजह से उदाराम मेघवाल तथा उनके साथियों के विरुद्ध एक केस भी दर्ज हुआ है ,पर इस तरह की बातों से वे घबराते नहीं है .लड़ना ही उनकी ज़िन्दगी का मकसद बन चुका है .आजकल वे अपने जिले के एसपी गगन दीप सिंघला से भिड़े हुये है .

दलित अत्याचार निवारण समिति बाड़मेर के जिला संयोजक उदाराम मेघवाल के मुताबिक –“ जिले में दलित अत्याचार के मामले बढ़ते ही जा रहे है .जातिगत अपमान ,मारपीट,जमीने छीनना ,सामूहिक हमला करना , हत्या कर देना तथा दलित महिलाओं के साथ बलात्कार जैसे गंभीर मामले हर रोज दर्ज हो रहे है ,मगर पुलिस संवेदनशील नहीं है .दलित अत्याचार निवारण कानून में संशोधन होने के बाद अब तक 247 मामले दर्ज हुए है ,जिनमे से 74 में चालान पेश हुआ है .87 को झूठा बता दिया गया है .86 में तफ्तीश जारी होना बताया जाता है ,जो कि अनुसन्धान के लिए प्रदत्त 60 दिनों की अवधि से भी ज्यादा समय बीत जाने के बावजूद अनुसन्धान जारी ही है .हद तो यह है कि अजा जजा अत्याचार निवारण अधिनियम 1989 संशोधित हो चुका है , 26 जनवरी 2016 से नया कानून लागू हो गया है.14 अप्रैल 2016 से अजा जजा अत्याचार निवारण संशोधन अधिनियम के नियम भी लागू किये जा चुके है ,मगर इसके बावजूद भी बाड़मेर जिले में लगभग 40 दलित अत्याचार के मामले पुराने कानून की विभिन्न धाराओं में दर्ज किये गए ,उसी में उनका अनुसन्धान किया गया तथा न्यायालय में चालान तक पुराने कानून की धाराओं में ही कर दिया गया है .ऐसी अंधेरगर्दी मचा रखी है पुलिस ने ,जिसके खिलाफ हम संघर्षरत है .एसपी हम लोगों को किसी न किसी मामले में फंसा देना चाहता है ,ताकि दलितों की आवाज दब जाये .मगर हम चुप होने वालों में से नहीं है “ उदाराम मेघवाल इस मामले को हाईकोर्ट ले जा रहे है ताकि ठीक से सुनवाई हो सके .

बार बार राजनीतिक प्रतिबद्धताओं में परिवर्तन होने तथा एक ऐसे राजनीतिक दल के सदस्य होने जिसे अम्बेडकरवादी समूह सही नहीं मानते है ,सम्बन्धी सवालों पर उदाराम मेघवाल का कहना है कि –“ मैं कांग्रेस का सदस्य जरुर हूँ ,पर विचारधारा से बाबा साहब के मिशन के करीब हूँ ,मेरे लिए मेरा दलित बहुजन समाज ही प्रथम है .अगर मेरी पार्टी और मेरे समाज के मध्य हितों का टकराव होता है तो मैं अव्वल और आखिरी समाज के ही साथ खड़ा होऊंगा ,मेरे लिए बाबा साहब की विचारधारा ही प्राथमिकता में है “

निश्चित रूप से उदाराम मेघवाल जैसे राजनीतिक सामाजिक कार्यकर्ता जय भीम की सेना के वे वफादार सिपाही है ,जो अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा तो रखते है ,मगर वे उसे पाने के लिए मुंह सिल कर नहीं बैठते .मुखर हो कर बोलते है .सड़कों पर उतरते है ,मुट्ठियाँ बांधते है और आकाश में नारे भी उछालते है . अपने ही नेताओं के पुतलों को आग के हवाले भी करते है तथा अपने लोगों को न्याय दिलाने के लिए संघर्ष करते है क्योंकि उन्हें पूना पैक्ट की खरपतवार कहलाना पसंद नहीं है . विभिन्न राजनीतिक दलों में गुलाम की भांति हाथ जोड़े ,मुंह सिले ,जबड़े भींचे बैठे पदलोलुप दलित बहुजन लीडरों को उदाराम मेघवाल जैसे राजनीतिक सामाजिक कार्यकर्ता से सीखना चाहिये कि अपने लोगों के लिए लड़ते हुए भी अपनी शर्तों पर राजनीती में कैसे रहा जा सकता है .

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