मंगलवार, 20 जून 2017

मेघवाल समाज के कर्णधार गोकुल दास जी महाराज का जीवन परिचय

नवरत्न मन्डुसिया की कलम से // मेघवंश इतिहास के रचयिता श्री श्री 1008 स्वामी गोकुल दास जी महाराज का जीवन चरित् --

जब जब भी हमारे धर्म, समाज अथवा संस्कृति पर संकट आया, तब भगवान ने मनुष्य रुप में जन्म लेकर ज्ञान, मर्यादा एवं शक्ति द्वारा धर्म की रक्षा कर मानव जीवन का कल्याण कर अपना नाम अमर कर दिया।
हम अपने समाज के इतिहास के पन्ने पलट कर देखें तो
- महात्मा खीवण जी
- जोधपुर नरेश रावल मलिनाथ जी राठौड़ की रानी रूपादें के सिद्ध गुरु मेघधारु जी
- धर्म वीर सिद्ध श्री राम देव जी महाराज कि गुरु बहिन डाली बाई मेघ
- खेड़ापा के रामस्नेही पंथ के आदि गुरु तपस्वी महाराज रामदास जी
- बालेसर शेरगढ के पंडित मद्दा जी
- जोधपुर के उमाराम जी
- महंत किशना राम जी
- नाडोल मारवाड़ की भक्त शिरोमणि अणची बाई
- जोधपुर किले की नींव के शहीद राजा राम
- महाचंद
- मेघडी बाई
- मन्ना मेघ पीछोला(उदयपुर)

इन सभी महापुरुषों ने हमारे मेघवंश समाज में जन्म लेकर कल्याण ही किया।
मेघवंश समाज मेंसमाज सुधारक​ स्वामी गोकुल दास जी महाराज ही हुए जिन्होंने समाज उत्थान हेतु संपूर्ण जीवन संघर्षमय व्यतीत किया।

हमारा समाज आदि काल से ही धार्मिक, आध्यात्मिक, स्वामी भक्त आदि गुणों से ओतप्रोत रहा परन्तु अन्य स्वर्ण समाजों द्वारा निरंतर शोषण का शिकार बनता रहा और दयनीय बनकर अपना मूल अस्तित्व खो बैठा और समाज में कुरीतियां व्याप्त हो गई थी।
ऐसे विकट समय में अजमेर से 14 किलोमीटर दूर दक्षिण दिशा में ग्राम डुमाडा में स्वामी जी महाराज का अवतार हुआ।
फाल्गुन बदी १४ शनिवार संवत १९४८ को स्वामी जी महाराज का जन्म हुआ
पिता श्री नंदराम जी सिंहमार (मेघवंश) जो गांव के जमींदार थे तथा माता का नाम श्रीमती छोटी देवी था। उस समय ग्राम में शिक्षा की कोई संस्था नहीं थी फिर भी पिताजी के प्रयास से सामान्य ज्ञान हेतु 6 किलोमीटर दूर सोमलपुर की पाठशाला में श्री जोधाजी सूबेदार पंडित के पास पढ़ने भेजा जहां स्वामी जी पैदल जाते थे।
आपके पिता ने बचपन में ही आपका विवाह कर दिया था लेकिन किशोरावस्था से ही आपकी जिज्ञासा ग्राम में होने वाले धार्मिक भजन मंडलीयों एवं संत महात्माओं के प्रवचन सुनने में बढ़ती गई।

हजारी दास दरोगा ग्राम
डुमाडा आपके प्रथम शिष्य थे इस पर गांव की अन्य जाति के लोगों ने विरोध किया परन्तु वे आपके साथ वीणा पर भजन-कीर्तन करने में संलग्न रहे। इस प्रकार स्वामी जी महाराज कि आध्यात्मिक रुचि बढ़ती गई और प्रभु की दया से आप श्री स्वामी १०८ सत गुरु रामहंस जी पंवार अजमेर निवासी की शरण में चले गए।
फाल्गुन सुदी २ संवत् १९६०  को आपने वृहद सत्संग का आयोजन किया और गुरुदेव से उपदेश लेकर दीक्षा प्राप्त की।

कुंडलियां

गोकुल ने सतगुरु मिल्या, रामहंस हरदास।
झूठ कर्म जग से मिट्या, भया सांच प्रकाश।।

भया सांच प्रकाश, रेण में उगा चदां।
सभी अंधारा मेट, भजन कर निज मन बंदा।।

तन-मन-धन अर्पण किया, सिमरण श्वसो श्वास।
'गोकुल' ने सतगुरु मिल्या, रामहंस हर दास।।

गुरु दीक्षा लेने के पश्चात आप सांसारिक वासनाओं से आध्यात्मिक क्षेत्र में बढ़ने लगे और आपने
जप,तप,नियम,संयम, व्रत, उपवास, ध्यान,योग विद्या का अभ्यास करना प्रारंभ कर दिया और चैत्र सुदी ५ संवत् १९६३ को सदैव के लिए धर्म पत्नी का त्याग कर वैराग्य जीवन धारण कर लिया। स्वामी गोकुल दास जी महाराज कि जय:- नवरत्न मन्डुसिया की कलम से

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