सोमवार, 6 फ़रवरी 2012





फरवरी 10, 2012 को गुजरात में मेघवार एक त्योहार मनाते हैं जो धणी मातंग देव जी के जन्म दिवस के उपलक्ष्य में मनाया जाता है. ‘मातंग’ शब्द का अर्थ मेघ है. इस अवसर पर वे 28 मेघों की पूजा करते हैं. यह जानकारी मुझे श्री नवीन भोइया से मिली जो अपने संगठन श्री अखिल कच्छ महेश्वरी विकास सेवा संघ के माध्यम से यह त्योहार इस बार बड़े स्तर पर मनाने की योजना बना रहे हैं.

उत्तर भारत में मेघों के पास मेघ ऋषि के जन्म दिवस की कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है. चूँकि धणी मातंग देव एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व हैं जिनके बारे में साहित्य और लोक कथाओं में तारीखें उपलब्ध हैं अतः बहुत संभावना है कि उनके जन्मदिन का मेघ ऋषि के जन्मदिन से कोई परोक्ष संबंध हो. ऐसे में यदि विक्रमी संवत् की पहली तारीख को मेघऋषि का जन्मदिन मना लिया जाए तो असंगत नहीं होगा. मेघवंशी समुदाय इस पर विचार कर सकते हैं.

एक बड़ी खबर नवीन जी ने बताई है कि वे मार्च 2012 में एक संगोष्ठी आयोजित करेंगे जिसमें ऐसे विद्वान आमंत्रित होंगे जिन्होंने मेघवारों के धर्म बारमती पंथ (जिसकी शिक्षा को ‘जिनान’ (Ginan) कहा जाता है) पर शोध किया है. 4 विद्वान पीएचडी (डॉक्टरेट) डिग्री वाले हैं. एक फ्रेंच महिला (Francoise Mallison) शोधकर्ता को भी इस अवसर बुलाया गया है और उसने आने के लिए अपनी सहमति दे दी है. उम्मीद है कि इस आयोजन के दौरान मेघवंशियों के मूल धर्म पर प्रकाश डाला जाएगा जिसे मेघवारों ने सुरक्षित रखा है. क्योंकि मेघवंशी सिंधुघाटी सभ्यता से संबंधित हैं अतः धर्म के मूल में बौधधर्म के सिद्धांत मौजूद रहेंगे ही साथ ही प्रस्तुत किए जाने वाले शोध पत्रों से वे तथ्य सामने आने की संभावना है कि बारमती पंथ तक आते-आते उनमें किस प्रकार का विकासात्मक परिवर्तन हुआ है.

अपनी इंटरनेट यात्रा के दौरान मैंने जाना है कि मेघवार सिंधुघाटी से बिहार की ओर पलायन कर चुके मेघवंशी हैं जो बाद में क्षत्रिय जाति के रूप में गुजरात की ओर लौटे और बहुत बड़े क्षेत्र पर उन्होंने शासन किया. मातंग देव के जन्म दिवस पर वे जिन 28 मेघों की पूजा करते हैं संभव है कि वे मेघ सम्राट रहे हों या धार्मिक प्रमुख रहे हों या उनका राजा के रूप में ऐतिहासिक महत्व रहा हो जिसे आक्रमणकारी आर्य कबीलों ने इतिहास से हटा दिया लेकिन जिन्हें लोक परंपराओं के माध्यम से जनमानस ने याद रखा है.

आज मेरे समुदाय के लोग इस बात पर विश्वास नहीं कर पाते कि मेघ, मेघवाल और मेघवार वास्तव में मेघ ऋषि की ही संतानें हैं जिनका मूल एक है और जिनका गौरवशाली इतिहास रहा है. यद्यपि इतिहास नष्टप्रायः है तथापि उसकी कड़ियाँ जोड़ने का कार्य शोधार्थी कर रहे हैं भारत में भी और अमेरिका में भी. सिंधुघाटी सभ्यता की लिपि को अमेरिका में कंप्यूटर डिकोट करने में लगे हैं जो सिद्ध करेगा कि हम ऐसी सुशिक्षित सभ्यता से निकली जातियाँ हैं जिन्हें आक्रमणकारियों ने जबरन शिक्षा से दूर किया और आधुनिक इतिहास तक आते-आते उन्हें अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जन जातियों और अन्य पिछड़ी जातियों के रूप में एक योजना के तहत बाँट दिया ताकि हम आपस में एकता न कर सकें. परंतु समय आ रहा है कि इस ग़ुलामी की मानसिकता से निकल कर मेघवंशी आपस में राजनीतिक संपर्क बढ़ाएँगे.

नवीन भोइया जी ने आशा जताई है कि इस अवसर पर प्रस्तुत शोधग्रंथों को वे एक स्मारिका/पुस्तक रूप में छापेंगे. इससे मेघवंशियों के इतिहास में और पन्ने जुड़ेंगे.
कच्छ ज़िले के गाँधीधाम और अंजार ताल्लुका के अतििक्त भुज, मुंद्रा और मांडवी ताल्लुका और गाँवों में भी यह उत्सव बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है जिसमें हज़ारों की संख्या में लोग भाग लेते हैं.

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