शनिवार, 16 अप्रैल 2016

भारत की आत्मा है हिन्दू-मुस्लिम सांस्कृतिक एकता :- नवरत्न मन्डुसिया

हिन्दू मुस्लिम एकता पर एक तथ्य है ! क्यों की हमे हिन्दू मुस्लिम एकता को आगे बढ़ना और बढ़ाना है ! मे नवरत्न मन्डुसिया आपको एक एकता का पाठ आपको दिखा रहा हूँ

‘साझा संस्कृति’ का एक प्रमुख तत्व है- ‘हिंदू-
मुस्लिम सद्भाव’ तथा संस्कृति में हिंदू-मुस्लिम
संस्कृतियों का एक-दूसरे में घुल-मिल जाना
और इसी आत्मसातीकरण की दुहरी प्रक्रिया
में भारतीय संस्कृति की आत्मा का निर्माण
हुआ है। ‘साझा संस्कृति’ की अवधारणा का
यह केंद्रीय बिंदु है। ‘साझा संस्कृति’ का
मतलब ‘हिंदू-मुस्लिम एकता’ भर नहीं है बल्कि
इसे बृहत्तर अर्थों में ग्रहण किया जाना
चाहिए। भारतीय ज्ञान-विज्ञान, रहन-सहन,
खान-पान, ललितकलाएं आदि सभी में
‘साझा संस्कृति’ की परंपरा घुली-मिली है।
सांप्रदायिक विचारधारा साझा संस्कृति
का मुखर विरोध करती है, इसके पीछे मूल
मकसद है भारतीय संस्कृति की आत्मा की ही
हत्या कर देना।
भारतीय संस्कृति में से मुस्लिम अवदान या
इस्लाम के अवदान को निकाल देने का मतलब
है देश को सांस्कृतिक रूप से खत्म कर देना।
आधुनिक दौर में फासिज्म ही एक मात्र ऐसी
वियारधारा है जो संस्कृति को खत्म करती
है, बर्बरता को स्थापित करती है। यूरोप में
फासिस्ट विचारधारा को जैसा आधार एवं
अवसर संस्कृति पर प्रत्यक्ष हमला करने का
मिला था, अगर वैसा अवसर हमारे यहां
सांप्रदायिकता को मिल जाए तो वह उसी
भूमिका को अदा करेगी।
बाबरी मस्जिद प्रकरण के दौरान मुस्लिम
विरोधी उन्माद को सबने देखा है।
लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सांप्रदायिक
शक्तियों का चुनाव जीतकर सत्तारूढ़ हो
जाना कोई बड़ी बात नहीं है। हिटलर भी
लोकतंत्र के वोटों से ही आया था। मूल बात
है सांप्रदायिक विचारधारा, यह
विचारधारा फासिज्म का भारतीय प्रतिरूप
है। इसे सांप्रदायिक दंगों, सांप्रदायिक दलों
मात्र में सीमित करके नहीं देखना चाहिए
बल्कि बृहत्तर विचारधारात्मक परिप्रेक्ष्य में
रखकर देखा जाना चाहिए।
सांप्रदायिक विचारधारा ने पिछले कुछ
वर्षों में अपना जनता से सीधे संवाद बनाया
है। जबकि, धर्मनिरपेक्ष विचारधारा अभी
जनता में पूरी तरह पहुंची नहीं है। साझा
संस्कृति के खंडित हो जाने की जो लोग बात
करते हैं, वे संस्कृति को बहुत सीमित अर्थों में
ग्रहण करते हैं, जबकि साझा संस्कृति हमारी
सांस्कृतिक आत्मा में समा चुकी है। उसे
आसानी से नष्ट करना बेहद मुश्किल है। साझा
संस्कृति पर हमले की बृहत्तर योजना के तहत
ही मुसलमानों को देश से बाहर चले जाने की
बात उठाई गई है। इस्लाम धर्म एवं मुसलमानों
के अवदान को नकारा जा रहा है। अभी इस
अवदान को नकारा जा रहा है। कालांतर में
सांप्रदायिक विचारधारा देश में सत्तारूढ़
होने में सफल हो जाए तो वह उन सभी बहुमूल्य
तत्वों को चुन-चुनकर नष्ट भी करेगी, जिनका
किसी भी रूप में इस्लाम या मुसलमान से कोई
नाता रहा हो। क्या हम साझा संस्कृति में से
उन तत्वों को निकाल सकते हैं जिनके
निर्माण में मुसलमानों एवं इस्लाम धर्म की
निर्णायक एवं आविष्कारक की भूमिका रही
है। उन आविष्कारों को देश की विरासत से
निकालने का मतलब होगा, बर्बरता के युग में
लौटना दूसरी बात यह कि क्या साझा
संस्कृति के तत्व पूरी तरह खंडित हो गए हैं, या
नकारा हो गए हैं?
साझा संस्कृति के अनेक महत्वपूर्ण तत्व आज
भी जिंदा हैं और जब तक सभ्यता रहेगी तब
तक जिंदा रहेंगे। ये तत्व साझा संस्कृति की
धुरी हैं। वे तत्व क्या हैं-
1. सूफी संत परंपरा एवं सूफी साहित्य हमारी
साहित्यिक परंपरा का अभिन्न अंग हैं।
ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती से लेकर मलिक
मुहम्मद जायसी तक सभी सूफी संतों एवं
कवियों की भारतीय संस्कृति में जुडे हैं और वे
घुल-मिल गए हैं। सूफी संतों-कवियों का
प्रेममार्गी साहित्य हमारी साझा संस्कृति
का स्फटिक है।
2. हिंदी साहित्य का पहला कवि अमीर
खुसरो हमारा साहित्यिक पूर्वज है और
साझा संस्कृति का जनक भी। अमीर खुसरो
को बहिष्कृत कर देंगे तो हम साहित्यिक
अनाथ हो जाएंगे ? हिंदी साहित्य के लिए
अमीर खुसरो वैसे ही आवश्यक है जैसे कि मनुष्य
के लिए वायु।
3. साझा संस्कृति में शामिल इस्लाम एवं
मुस्लिम अवदान को खारिज कर देंगे तो हमारे
पास बचेगा क्या? यह सच है कि भारत में
कागज एवं बारूद के आविष्कारक मुसलमान थे,
आज ये दोनों ही वस्तुएं देश की सुरक्षा एवं
ज्ञान के लिए आवश्यक हैं। क्या साझा
संस्कृति की सर्जना से कागज एवं बारूद को
बहिष्कृत किया जा सकता है? क्या आधुनिक
जीवन में यह संभव है?
4. मुसलमानों ने ही मीनाकारी एवं बीदरी
का काम शुरू किया। धातुओं पर कलई करके
चमक लाने के आविष्कारक वही थे। यह कला
ईरान से भारत आई। मुगल राजकुमारों ने ही
कपड़े पर कढ़ाई एवं जरी की असंख्य डिजाइनों
का आविष्कार किया। इत्रों की खोज की।
आज हम सबके जीवन में ये चीजें घुल-मिल गई हैं।
5. साझा संस्कृति के जनक अमीर खुसरो ने ही
कव्वाली, तराना का श्रीगणेश किया था।
जिलुफ, सरपदा, साजगीरी जैसे रागों को
जन्म दिया। अमीर खुसरो ने नायक गोपाल के
साथ मिलकर ही सितार एवं तबला का
आविष्कार किया। क्या सितार और तबला
को बहिष्कृत कर सकते हैं?
6. साझा संस्कृति हिंदू-मुसलमान का
शारीरिक सहमेल एवं एकता का मोर्चा मात्र
नहीं है बल्कि इससे बढ़कर है। वह एक
विचारधारात्मक शक्ति है। हिंदू-मुस्लिम
संस्कृति के सहमिलन के कारण ही अनेक अरबी
एवं फारसी राग भारतीय संस्कृति में घुल-मिल
गए हैं। वे साझा संस्कृति के ही अंग हैं। इनमें कुछ
हैं-जिलुक, नौरोज, जांगुला, इराक, यमन,
हुसैनी, जिला दरबारी, होज, खमाज ये सभी
जनता एवं राजा दोनों में ही लोकप्रिय रहे
हैं। भारतीय संगीत की ध्रुपद परंपरा
मरणोन्मुखथी पर मुगल दरबारों के संरक्षण के
कारण ही बच पाई जिसे कालांतर में तानसेन
ने चरमोत्कर्ष पर पहुंचाया।
7. जौनपुर के सुल्तान हुसैन ने प्रसिद्ध राग
हुसैनी, कान्हडा और तोड़ी का आविष्कार
किया था। उसके दरबार में हिंदू और मुसलमान
दोनों समुदाय के विद्वान थे जिनमें-नायक
बख्श, बैजू (बावरा), पांडवी, लोहुंग, जुजूं, ढेंढी
और डालू के नाम प्रमुख हैं। अकबर के नवरत्नों में
तानसेन सर्वोपरि था।
8. जहांगीर के दरबार में चतरखा, पार्विजाद,
जहांगीर दाद, खुर्रम दाद, मक्कू, हमजान और
विलास खां (तानसेन का बेटा) प्रमुख थे,
जिनका संगीत की साझा परंपरा बनाने में
बड़ा योगदान है।
9. मोहम्मद शाह रंगीला ने नादिरशाह के
आक्रमण के बावजूद अदारंग, सदारंगा और
शोरी आदि के जरिए संगीत की परंपरा को
सुरक्षित रखा जिसमें सदारंगा ने ख्याल का
आविष्कार किया। हालांकि इसके साथ हुसैन
शाह सरकी को भी जोड़ा जाता है। शोरी
ने पंजाबी टप्पा को दरबारी राग में रूपांतरित
किया। इन सबके अलावा रेख्ता, कौल,
तराना, तख्त गजल, कलबना, मर्सिया और
सोज के भी गायक थे। वजीर खां ख्याली,
फिदा हुसैन सरोदिया, मुहम्मद अली खां
रूबाइया को क्या हम साझा संस्कृति से काट
सकते हैं? इससे भी बड़ी बात यह कि क्या
संस्कृति में संगीत आता है या नहीं? यदि हां
तो फिर संगीत परंपरा की उपेक्षा क्यों?
क्या यह हमारे संकीर्ण नजरिए का द्योतक
नहीं हैं?
10. मुस्लिम संगीतकारों ने कुछ प्रमुख वाद्य
यंत्रों का भी आविष्कार किया था। जिनमें
कुछ हैं-सारंगी, दिलरूबा, तौस, सितार, रूबाब,
सुरबीन, सुर सिंगार, तबला और अलगोजा।
मुसलमानों की मदद से ही शहनाई, उन्स (रोशन
चौकी) और नौबत (नगाड़ा) का आविष्कार
हुआ था। तारों को झंकृत करने वाली
मिजराब, मुस्लिम खोज का ही परिणाम है।
क्या संगीत की इतनी लंबी परंपरा एवं अवदान
को भारतीय संस्कृति और साझा संस्कृति से
निकालकर हम अपने समाज को बर्बरता के युग
में नहीं ले जाएंगे? संगीत हमारी साझा
संस्कृति का बहुमूल्य रत्न है, वह हमारे दिलों
को जोड़ता है हमें और ज्यादा मानवीय
बनाता है। संगीत की परंपरा में हिंदू मुसलमान
का और मुसलमान हिंदू का शिष्य बनता रहा
है और दोनों अपने गुरू को देवता की तरह
मान्यता देते रहे हैं।
11. ‘साझा संस्कृति’ का यह दायरा संगीत
तक ही नहीं है बल्कि चित्रकला एवं स्थापत्य
इसके प्रमुख रूप हैं। सांप्रदायिक विचारधारा
ने बाबरी मस्जिद प्रकरण के संदर्भ में साझा
संस्कृति की धरोहर ऐतिहासिक पुरातात्विक
निधि को ही अपना निशाना बनाया है और
इसी तरह की 3,000 मस्जिदें हैं जिनको
गिराकर वे मंदिर बनाना चाहते हैं। यूरोप में
फासिज्म ने सत्ता पर काबिज होने के बाद
संस्कृति को नष्ट किया था। सांप्रदायिक
शक्तियां जनता के नाम पर नीचे से दबाव
डालकर ऐसा कर रही हैं। यह अचानक नहीं है
कि वे मुगलकालीन स्थापत्य को नष्ट करना
चाहती हैं बल्कि यह सोची-समझी योजना
का हिस्सा है। इस बार स्थापत्य है, अगली
बार समूची संस्कृति होगी। अत: इस रणनीति
को विफल करना साझा संस्कृति के पक्षधरों
की सबसे बड़ी जरूरत है।
12. साझा संस्कृति के एक अन्य तत्व
चित्रकला को हम लोग अभी भी भूले नहीं है।
चित्रकला में मुगलशैली का अवदान बेमिसाल
है और गर्व की वस्तु है। मुगलदरबारों में यह
अमूमन होता था कि अगर मुस्लिम चित्रकार
ने खाका बनाया है तो हिंदू चित्रकार ने रंग
भरे हैं। अकबरनामा में आदम खां के प्राणदंड
वाले चित्र का खाका मिस्कीं ने खींचा, पर
रंग शंकर ने भरे थे। एक दूसरे चित्र का खाका
मिस्कीं ने खींचा रंग सरवन ने भरे, चेहरानामी
तीसरे चित्रकार ने किया और सूरतें माधो ने
बनाईं।
मुगल शैली का भारतीय चित्रकला पर प्रभुत्व
ढाई सौ साल रहा। इस बीच हजारों चित्र
बने। दरबारों में सैकड़ों चित्रकारों को
संरक्षण मिलता था। स्वयं अबुल फजल ने सौ
चित्रकारों का उल्लेख किया है जिनमें सत्रह
प्रधान चित्रकार थे, जिनके चित्रों पर
हस्ताक्षर मिलते हैं। 1600 ई. में तैयार की गई
हस्तलिपि वाकियाते बाबरी में 22
चित्रकारों के हस्ताक्षर हैं। महत्वपूर्ण बात
यह है कि इनमें हिंदू चित्रकार अधिक हैं। अबुल
फजल ने जिन 17 कलाकार-चित्रकारों का
जिक्र किया है, उनमें मात्र चार मुसलमान हैं
और तेरह हिंदू हैं। इसी तरह रज्मनामा के
हस्ताक्षरों में 21 नाम हिंदुओं के हैं, सात
मुसलमानों के हैं। मुगलशैली का राजपूत शैली
एवं दकनी शैली पर भी गहरा प्रभाव पड़ा।
क्या आज हम मुगल शैली के प्रभाव को साझा
संस्कृति से बहिष्कृत कर सकते हैं? क्या
चित्रकला की परंपरा इस अवदान को भूल
सकती है? चित्रकला को मुगल शैली की बहुत
बड़ी संपदा ब्रिटिश साम्राज्यवादी लूटकर ले
गए, पर कला इतिहास की पुस्तकों में इस
परंपरा का विस्तृत वर्णन मिलता है। बेहतर
होता कि भारत के शासक वह कलाकृतियां
किसी भी रूप में वापस लाने का प्रयास करते।
13. मुगलों के अवदान के कारण ही भारतीय
पहनावे में भारी परिवर्तन आया। यहां तक कि
शिवाजी और महाराणा प्रताप तक भव्य
मुगल पोशाकें पहनते थे। भारतीय पोशाक
अचकन और पजामा मुगलों की देन है। तुर्क,
पठान और मुगलों द्वारा प्रचलित जुराब और
मोजा, जोरा और जाया, कुर्त्ता और
कमीज,ऐचा, चोगा और मिर्जई भारतीय
वस्त्र परंपरा का अभिन्न अंग है।
14. भारतीय जीवन शैली में हिंदू वधू को
मुसलमानों का सबसे महत्वपूर्ण उपहार है नथ।
आज नथ हिंदू औरत की सुंदरता का प्रतीक है।
इसके आविष्कारक मुसलमान ही थे। मुगलों ने
ही हिंदू दूल्हें के सिर पर सेहरा और मौर
बांधा। सबसे अद्भूत बात है ‘रोटी’ का
भारतीय शब्द-भंडार में समा जाना,
‘रोटी’ (फुलका या चपाती) शब्द तुर्की शब्द
‘रोती’ का सहजिया है। जिस पर रोटी सेंकते
हैं वह होता है ‘तवा’ यह भी मुगलों की ही देन
है। क्या ये सब ‘साझा संस्कृति’ में आज भी
बरकरार नहीं हैं? तब ‘कंपोजिट कल्चर’ के खत्म
हो जाने की बात बेबुनियाद है। वह कंपोजिट
कल्चर खत्म हुई है जिसे बुर्जुआजी नेताओं एवं
नेहरू ने विशेष रूप से उछाला था और यह
बुर्जुआजी की तात्कालिक रणनीति से
उपजी इकहरी धारणा थी।
15. उर्दू साहित्य की परंपरा एवं अवदान को
सभी जानते हैं जिसे मैं दोहराना नहीं
चाहता। सांप्रदायिक विचारधारा का
साझा संस्कृति पर किया गया वैचारिक
हमला वस्तुत: हमें संस्कृतिहीन एवं अमानवीय
दिशा में ले जाने की एक कोशिश भर है। इस
बार हमला स्थापत्य पर है, सन् 1977-78 के
वर्षों में इतिहास की पुस्तकों पर था।
विशेषकर उन पुस्तकों पर जो सांप्रदायिक
इतिहास लेखन के बजाय वैज्ञानिक
इतिहास लेखन पर बल देती थीं। साझा
संस्कृति को अगर कोई खतरा है तो
सांप्रदायिक विचारधारा और राज्य की
निष्क्रिय-कमजोर धर्मनिरपेक्षता से जिसका
सांप्रदायिक संगठन लाभ उठा रहे हैं।
बुर्जुआ विचारकों एवं दलों ने साझा संस्कृति
पर होने वाले हमलों को कानून एवं व्यवस्था
का मसला बना दिया है, वह इस हमले की
विचारधारा से टकराना नहीं चाहते और न
ही साझा संस्कृति का संवर्धन करना चाहते हैं
क्योंकि बुर्जुआ मूलरूप से संस्कृति का शत्रु
होता है और मासकल्चर का संवर्द्धक होता
है। क्लासिक रचनाओं और उस युग के अवदान
को वह नापसंद करता है। उनसे घृणा करता है,
इसलिए वह कभी भी साझा संस्कृति का
रक्षक भी नहीं हो सकता। विभिन्न
कलारूपों एवं उर्दू भाषा के प्रति उसका
विद्वेषभाव जग जाहिर है। अत: नेहरू की तर्ज
पर साझा संस्कृति न तो समझी जा सकती है,
न उसका संवर्धन संभव है। साझा संस्कृति की
शक्ति, सीमा एवं संभावनाएं मार्क्सीय
दृष्टि से ही समझी जा सकती हैं।

शुक्रवार, 4 मार्च 2016

समाजसेवी पूरण मल मेघवाल

नवरत्न मन्डुसिया की कलम से // पूरण मल मेघवाल ए सोशियल वर्कर ऑफ सर्व समाज
कम्यूनिटी हिस्टरी :---
दोस्तो पूरण मल मेघवाल एक 25 साल का मेघवाल समाज का युवा
चेहरा है ! इसका जन्म डेड्या के बास नागौर मे हुवा है इन्होने
ग्रेजुएशन और आई.टी.आई करने के बाद इन्होने
अपना जीवन समाज मे सम्पर्प्रीत कर
दिया है ! और समाज एकता पर अपना खूब योगदान दिया है इस युवा
ने आजतक कभी हार नही
मानी है और हमेशा अन्याय का सामना किया है यह
युवा वर्तमान मे नागौर जिले मे जिला परिषद सदस्य है ! और नावा
तहसील मे दलित संघठन का अध्यक्ष
भी है ! और इस युवा ने डान्गावास दलित हत्याकांड मे
एम.एल.ए से लेकर राष्ट्पति तक को ज्ञापन दिया था दोस्तो पूरण
मल मेघवाल एक शांत व्यवहार वाला युवा है ऐसे युवा यदि इस
धरती पर रहेंगे तो समाज का कोई भी कुछ
नही बिगाड़ सकेगापूरण मल मेघवाल का जीवन परिचय     नागौर के जिला परिषद चुनाव में दो प्रमुखउम्मीदवार हैं- कॉंग्रेस पार्टी के पूरण मल मेघवाल और भाजपा पार्टी के उम्मीदवारआइए विस्तार से जानते हैं दोनों उम्मीदवारों केबारे मेंपूरण मल मेघवाल का जिला परिषद के रूप में अपना पहलाकार्यकाल हैं. वे 2014 में चुनावजीतकर नागौर ही नही बल्कि पूरे राजस्थान मे भी दलितों के मशीहा बने है वे राजस्थान मे अनेक संघठनों के रुप मेंजुड़े हैं.उनका मुक़ाबला आजाद हिंदुस्तान मे जो लोग अन्याय करते ह उसके विरुद्ध है और पूरण मल मेघवाल का मुक़ाबलाकड़ा है.लेकिन एक बात पूरण मल मेघवाल के पक्ष में जाती है और वोहै लोगो का उनसे लगाव. नागौर और राजस्थान के लोग उन्हेंव्यक्तिगत रुप से पसंद करते हैं भले ही वोअर्थव्यवस्था संभालने के उनके तौर तरीक़ों को लेकर उन्हें कम अंक देते हैं.क्यों की यह सत्य पर कायम रहते है इस कारण इन्हे अंको का सामना करना पड़ता है
पूरण मल मेघवाल मीडिया से रूबरू होते हुवे 

यदि वो अपने समर्थकों को एक बारफिर अपने साथ जुटा पाते हैं, और उन -लोगो कोअपनी ओर खींच पाते हैं क्यों की पूरण मल मेघवाल जब एक बार किसी से मिल जाते ह तॊ वो बन्दा पूरण मल मेघवाल का हो जाता है दोस्तो जब तक आजाद हिंदुस्तान मे पूरण मल मेघवाल जेसे पूत इसधरती पर रहेंगे तॊ किसी की अन्याय करने की हिम्मत नही होगीदोस्तो जब मे पूरण मल मेघवाल से मिला तॊ मुझे लगा की पूरण मल मेघवाल समाज की खातिर ही नही बल्कीपूरे देश की खातिर समाज हेतु संघर्ष कर रहे है पूरण मल मेघवाल कॉलेज करने के बाद आई टी आई की औरजब राजनीति के बारे मे सोचा तॊ वो राजनीति मे प्रवेश कर लिया दोस्तो इस युवा का राजनीति के साथ साथ समाजिक संघटनों से भी ह दोस्तो पूरण मल मेघवाल का जब इंटरव्यू जब याहू कम्पनी मे प्रशारीत हुवा तॊ उसका भी बड़ा योगदान समाज मे मिला क्यों की इसी कारण पूरण मल मेघवाल समाज को लेकर आगे बढ़ता है दोस्तो मेने मेघवाल समाज के www.mandusiya.blogspot.com पर पूरण मल मेघवाल के बारे मे पूरण मल मेघवाल की जीवनी समाजिक कार्यों के बारे मे तथ्यों को शेयर किया ह

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2016

डॉक्टर भीम राव अम्बेडकर का जीवन परिचय

भारत को संविधान देने वाले महान नेता डा. भीम राव अंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 को मध्य प्रदेश के एक छोटे से गांव में हुआ था। डा. भीमराव अंबेडकर के पिता का नाम रामजी मालोजी सकपाल और माता का भीमाबाई था। अपने माता-पिता की चौदहवीं संतान के रूप में जन्में डॉ. भीमराव अम्बेडकर जन्मजात प्रतिभा संपन्न थे।भीमराव अंबेडकर का जन्म महार जाति में हुआ था जिसे लोग अछूत और बेहद निचला वर्ग मानते थे। बचपन में भीमराव अंबेडकर (Dr.B R Ambedkar) के परिवार के साथ सामाजिक और आर्थिक रूप से गहरा भेदभाव किया जाता था। भीमराव अंबेडकर के बचपन का नाम रामजी सकपाल था. अंबेडकर के पूर्वज लंबे समय तक ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में कार्य करते थे और उनके पिता ब्रिटिश भारतीय सेना की मऊ छावनी में सेवा में थे. भीमराव के पिता हमेशा ही अपनेबच्चों की शिक्षा पर जोर देते थे।1894 में भीमराव अंबेडकर जी के पिता सेवानिवृत्त हो गए और इसके दो साल बाद, अंबेडकर की मां की मृत्यु हो गई. बच्चों की देखभाल उनकी चाची ने कठिन परिस्थितियों में रहते हुये की। रामजी सकपाल के केवल तीन बेटे, बलराम, आनंदराव और भीमराव और दो बेटियाँ मंजुला और तुलासा ही इन कठिन हालातों मे जीवित बच पाए। अपने भाइयों और बहनों मे केवल अंबेडकर ही स्कूल की परीक्षा में सफल हुए और इसके बाद बड़े स्कूल में जाने में सफल हुये। अपने एक देशस्त ब्राह्मण शिक्षक महादेव अंबेडकर जो उनसे विशेष स्नेह रखते थे के कहने पर अंबेडकर नेअपने नाम से सकपाल हटाकर अंबेडकर जोड़ लिया जो उनके गांव के नाम "अंबावडे" पर आधारित था।8 अगस्त, 1930 को एक शोषित वर्ग के सम्मेलन के दौरान अंबेडकर ने अपनी राजनीतिक दृष्टि को दुनिया के सामने रखा, जिसके अनुसार शोषित वर्ग की सुरक्षा उसकी सरकार और कांग्रेस दोनों से स्वतंत्र होने में है।अपने विवादास्पद विचारों, और गांधी और कांग्रेस की कटु आलोचना के बावजूद अंबेडकर की प्रतिष्ठा एक अद्वितीय विद्वान और विधिवेत्ता की थी जिसके कारण जब, 15 अगस्त, 1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद, कांग्रेस के नेतृत्व वाली नई सरकार अस्तित्व में आई तो उसने अंबेडकर को देश का पहले कानून मंत्री के रूप में सेवा करने के लिए आमंत्रित किया, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। 29 अगस्त 1947 को अंबेडकर को स्वतंत्र भारत के नए संविधान की रचना के लिए बनी संविधान मसौदा समिति के अध्यक्ष पद पर नियुक्त किया गया। 26 नवंबर, 1949 को संविधान सभा ने संविधान को अपना लिया।14 अक्टूबर, 1956 को नागपुर में अंबेडकर ने खुद और उनके समर्थकों के लिए एक औपचारिकसार्वजनिक समारोह का आयोजन किया। अंबेडकर ने एक बौद्ध भिक्षु से पारंपरिक तरीके से तीन रत्न ग्रहण और पंचशील को अपनाते हुये बौद्ध धर्म ग्रहण किया। 1948 से अंबेडकर मधुमेह से पीड़ित थे. जून से अक्टूबर 1954 तक वो बहुत बीमार रहे इस दौरान वो नैदानिक अवसाद और कमजोर होती दृष्टि से ग्रस्त थे। 6 दिसंबर 1956 को अंबेडकर जी की मृत्यु हो गई !

मेघवंशी थे बाबा रामदेवजी महाराज

अवतारवाद के शिकारक्रान्तिकारी बाबा रामदेव मेघवाल...अवतार साबित करने के पिछे सबसे बङा हाथहरजी भाटी का है। देखा जाएतो हरजी भाटी का जन्म बाबा रामदेव जी केसमाधी लेने के ठिक 303 साल बाद हुआ था।हरजी भाटी ने बाबा रामदेव जी पर एकआरती लिखी जो आज बाबा रामदेव जी के मन्दिरमे गायी जाती है। आरती के शब्द इस प्रकार है।"पिछ्म धरा छु म्हारा पिर जी पधारेया घरअजमल अवतार लियो लाछा सुगना करेहरी री आरती हरजी भाटी चँवर ढोले।अब इसमेसवाल उठता है।कि रामदेव जी के समाधी के 303साल बाद हरजी भाटी का जन्म हुआ तो वेलाछा सुगना के साथ चँवर केसे ढोला...औरपुरी आरती मे ङाली बाई का नाम तकनही।क्या यह हमारे साथ भेदभाव नही है।303 साल बाद जन्मे हरजी भाटी को तो बाबा के साथ बड चढ के गाया जाता है।ओर बाबा कि बहन का कँई नाम नही ।अब आप ही बताए यह केसे सम्भव हुआ बाबा रामदेव जी के समाधी लेने के बाद 250 साल तक उच्च जाती के लोग बाबा के अनुयायी क्यु नही बने।और ही हरजी के समयकांल से पहले कौईभजन वाणी मे बाबा के अवतार चुननेको नही मिलता क्युकि सबको पता था की बाबा रामदेव जी ने अवतार नही मेघवाल समाज मे जन्मलिया है।ईसलिए तो सुगना के ससुराल वालेबाबा से नफरत करते थे।इसलिए मेघवालो को बाबा रा रिखया कहा जाता है। फिर हरजी भाटी ने बाबा को अवतार बताने मे कोई कसर नही छोङी ओर बाबा के अवतार का झुठा प्रचार किया इसकी वजह से बाबा रामदेवपर अवतारका नकाब चङा दिया...और आज सब अवतार की राग अलाप ते है। झुठ पे झुठ एक ओर गीत आज बहुत चुननेको मिलता है। बाबा रामदेव परणावे तुमपरणो हरजी भाटी...मे पुछता हु क्या यही गीत सत्य हो सकता है।324 बाद बाबा रामदेव जी को हरजी भाटी के साथ।॥अवतार साबित नही होता क्युकि 1950 से पहले पिछङी जातिया sc/st को शिक्षा पर प्रतिबंध था।इसलिए शिक्षित न होने कि वजह से अवतार का विरोध नही कर सके।लेकिन हमारे मेघ मोखिक गायक और मेघ भजन वाणी मे बाबा के जन्म के सत्यको पीढी दर पीढी सँजोय रखा ॥इसी प्रमाणो पर इस सत्य को उजागर किया सतगुरु रामप्रकाश जी ने।ओर बाबा रामदेव जी पर सत्य ग्रँथ लिखा ।सिर्फ ग्रँथ ही नही जोधपुरकोर्ट से मुकदमा भी जीत लिया।ओर सत्य को साबित किया कि बाबा रामदेव जी मेघवाल थे।बाबा रामदेव जीके पिता जी सायर जी जयपाल और माता मँगनी देवी था।ङाली बाई बाबा की बहन थी।आज भी इतिहासकार इससत्य को उजागर कर रहै है।

सोमवार, 2 नवंबर 2015

घेवर राम मेघवाल ने दिखाया अकाल की जोखिम को कम करने का रास्ता

घेवर राम ने दिखाया अकाल की जोखिम को कम करने का रास्ता चरखा फिचर्स, अप्रैल 2013 पश्चिमी रेगिस्तान के रहने वाले घेवर राम मेघवाल द्वारा किये गये नवाचार को तरजीह मिले तो रेगिस्तान भी (Zizyphus mauritiana) उत्पादन के नाम पर अपनी पहचान बना सकता है। जोधपुर जिले की फलौदी तहसील के एक छोटे से गांव दयाकौर के रहने वाले सीमांत किसान घेवर राम ने अपनी मेहनत और लगन से 10 क्विंटल बेर का उत्पादन किया है। घेवर राम ने वर्ष 2008 में अपनी ज़मीन के 160 वर्ग फुट के टुकड़े में 36 बेर तथा 28 गूंदा, (जिसे लसौड़ा के नाम से भी जाना जाता है) के पौधे लगाये थे। चालीस हजार लीटर के अंडरग्राउंड टैंक में बरसात का पानी एकत्रित कर पौधों को सींचा और देखभाल की। चार साल की अथक मेहनत से उन्होंने यह साबित कर दिया कि शुष्क और अकाल प्रभावित क्षेत्र के नाम से प्रसिद्ध रेगिस्तान की बंजर और कम उत्पादन वाली धरती पर बेर की फसल भी लहलहा सकती है। अपने गांव में ही नहीं, पूरी फलौदी तहसील में घेवर राम के इस कार्य की चर्चा हो रही है। इस सीजन में दिसंबर 2012 से फरवरी 2013 तक इस किसान की ज़मीन के इस छोटे से टुकड़े में लगे 36 बेर के पौधों से 10 क्विंटल बेर का उत्पादन हुआ है। जिसे उन्होंने 20 हजार रुपए में बेचा है। घेवर राम के गांव में 14 अन्य किसानों ने उन्नति विकास शिक्षण संगठन जोधपुर तथा उरमूल मरूस्थली बुनकर विकास समिति फलौदी के आर्थिक व तकनीकी सहयोग से आपदा जोखिम घटाव कार्यक्रम के तहत व्यक्तिगत कृषि योग्य ज़मीन के 160 वर्ग फुट के टुकड़े पर बेर व गूंदा के पौधे लगाये थे। राजस्थान में आपदा जोखिम घटाव पर काम करने वाली संस्था उन्नति विकास शिक्षण संगठन ने अंतरराष्ट्रीय संगठन (cordaid) के सहयोग से वर्ष 2008 में अकाल की जोखिम को कम करने की कवायद के तहत जोधपुर जिले के फालौदी एवं शेरगढ़ ब्लाक तथा बाड़मेर के बालोतरा में आइडिया संस्थान व सिणधरी ब्लाक में प्रयास संस्थान के सहयोग से कार्य किया। जिसके तहत शुष्क एवं अकाल प्रभावित क्षेत्र में मॉडल के तौर पर 125 किसानों की प्रति किसान 0.5 हेक्टेयर व्यक्तिगत ज़मीन पर हॉर्टिपाश्चर के ऐसे प्लॉट विकसित किये हैं जिसका असर अब दिखने लगा है। 125 किसानों की व्यक्तिगत ज़मीन पर प्रति किसान 64 पौधों की दर 8000 बेर व गूंदा के पौधे लगाये गये थे। चार साल के अथक प्रयासों से आज 90 प्रतिशत पौधे इस मरूभूमि को हरियाली से आच्छादित कर रहे हैं। घेवर राम के अलावा फलौदी तहसील के दयाकैर गांव के जेठाराम, हरूराम, सुगनी देवी, माडू देवी, बंशीलाल, बालोतरा ब्लाक के मंडली व रामदेवपुरा के अनोपाराम, भैराराम, शिवाराम, तगाराम व मगाराम, सुरजबेरा के सत्ताराम, मिश्राराम, झमूदेवी, सिणधरी ब्लाक के डाबड़ भाटियान गांव की मोहरों देवी, चूनाराम, करडालीनाडी के सिरदाराम, अन्नाराम के हॉर्टिपाश्चर प्लॉट में इस साल बेर का उत्पादन हुआ है। बेर के बंपर उत्पादन में गत वर्ष जेठाराम तो, इस वर्ष घेवरराम अव्वल रहा है। तेल व गैस उत्पादन तथा रिफ़ाइनरी स्थापित करने के नाम पर इन दिनों सुर्खियों में रहने वाले मारवाड़ के इन गरीब किसानों ने यह दिखा दिया है कि थोड़ी मेहनत से मारवाड़ न केवल तेल उत्पादन बल्कि रसीले बेर उत्पादन में भी जगप्रसिद्धि हासिल कर सकता है। पश्चिमी रेगिस्तान के चार जिले बाड़मेर, जैसलमेर, जोधपुर व बीकानेर अकाल के नाम से जाने जाते हैं। यहां हर तीसरे वर्ष अकाल पड़ता है। किसी न किसी क्षेत्र में प्रतिवर्ष अकाल मौजूद रहता है। अकाल में मुख्यतः पशुओं के लिये चारा तथा पानी का संकट अधिक होता है। घेवरराम बताते हैं कि क्षेत्र के गरीब व दलित समुदाय अकाल को ध्यान में रखते हुए बकरी पालन अधिक करते हैं। लेकिन अकाल में बकरियों के चारे का संकट हो जाता है। ऐसे समय में चारे की जोखिम को करने का आइडिया उन्नति विकास शिक्षण संगठन ने अपने अनुभवों के आधार पर हमारे सामने रखा। प्रारंभ में हमें विश्वास नहीं हो रहा था कि इस सूखे क्षेत्र रेगिस्तान में बेर जैसे फल लग सकते हैं। उन्नति द्वारा आर्थिक व तकनीकी सहयोग देने का आश्वासन मिलने पर वर्ष 2008 में गांव से हम सात किसान इस प्रयोग को अंजाम तक पहुंचाने के लिये तैयार हुए। संस्थान द्वारा पौधे, खाद, दवा, फैन्सिंग, अंडर ग्राउंड टैंक निर्माण तथा समय-समय पर पौधों की देखभाल के लिये प्रशिक्षण का सहयोग मिला। इस नवाचार को अंजाम तक पहुंचाने में कुछ किसान सुस्ता गये। लेकिन मैंने हिम्मत नहीं हारी। प्रशिक्षण व विजिट के दौरान कृषि वैज्ञानिक जो भी सलाह मुझे देते, उसे लागू करता रहा। कंपोस्ट खाद बनाकर हर साल पौधों को देता रहा। समय पर पानी, निराई- गुड़ाई करना तथा पौधों का बच्चों की तरह पालन-पोषण करने से मुझे इस मेहनत का फल मिलने लगा है। आज जब मैं घर के बाहर 160 वर्गफिट के इस प्लॉट को देखता हूं तो, दिल खुश हो जाता है। इस साल मैंने अपने ही गांव में बीस हजार रुपए के बेर के फल बेचे हैं। जोधुपर जिले में स्थापित सेंटर फॉर एरिडजॉन रिसर्च इंस्टीट्यूट (काजरी), कृषि विज्ञान केंद्र जोधपुर तथा कृषि प्रसार विभाग के वैज्ञानिकों द्वारा समय-समय पर इन किसानों को प्रशिक्षण देने एवं क्षेत्र का विजिट कर किसानों को सलाह देने में सहयोग मिलता रहा। काजरी के वैज्ञानिक पी. आर. मेघवाल का कहना है कि पश्चिमी रेगिस्तान के इस शुष्क मरूस्थल में अच्छी गुणवत्ता वाले बेर का उत्पादन हो सकता है। इस नवाचार को सरकार के मनरेगा व बागवानी मिशन जैसे कार्यों से जोड़ा जाये तो गरीब किसानों की आय का अच्छा जरिया बन सकता है। मनरेगा में अपना खेत अपना काम के तहत भूमि सुधार के इस कार्य को नियोजित ढंग से इस नवाचार के साथ जोड़ा जाये तो पश्चिमी राजस्थान की सूरत बदल सकती है। सबसे बड़ी बात यह है कि इससे अकाल जैसी आफ़त के प्रभाव या उससे उपजी जोखिम को कम किया जा सकता है।

मेघवाल समाज का इतिहास भारतवर्ष के सभ्यता इतिहास में पुरातन सभ्यताऐं सिन्धु घाटी, मोहनजोदडो जैसी सम्पन्न सभ्यताओं के पुरातन प्राप्त अवशेषों एवं भारत के कई प्राचीन ऋषि ग्रंथों में मेघवाल समाज की उत्पत्ति एवं उन्नति की जानकारीयां मिली हैं

मेघवाल समाज का इतिहास भारतवर्ष के सभ्यता इतिहास में पुरातन सभ्यताऐं सिन्धु घाटी, मोहनजोदडो जैसी सम्पन्न सभ्यताओं के पुरातन प्राप्त अवशेषों एवं भारत के कई प्राचीन ऋषि ग्रंथों में मेघवाल समाज की उत्पत्ति एवं उन्नति की जानकारीयां मिली हैं. साथ ही समाज के प्रात: स्मरणीय स्वामी गोकुलदास जी द्वारा सदग्रंथों से प्राप्त जानकारी के आधार पर भी समाज के सृजनहार ऋषि मेघ का विवरण ज्ञात हुआ है. मेघवाल इतिहास गौरवशाली ऋषि परम्पराओं वाला तथा शासकीय स्वरूप वाला रहा है. मेघऋषि का इतिहास भारत के उत्तर-पश्चिमी भूभाग की सरसब्ज सिन्धुघाटी सभ्यता के शासक एवं धर्म संस्थापक के रूप में रहा है जो प्राचीनकाल में वस्त्र उद्दोग, कांस्यकला तथा स्थापत्यकला का विकसित केन्द्र रहा था. संसार में सभ्यता के सूत्रधार स्वरूप वस्त्र निर्माण की शुरू आत भगवान मेघ की प्रेरणा से स्वयं भगवान शिव द्वारा ऋषि मेघ के जरिये कपास का बिजारोपण करवाकर कपास की खेती विकसित करवाई गयी थी. जो समस्त विश्व की सभ्यताओं के विकास का आधार बना. समस्त उत्तर-पश्चिमी भूभाग पर मेघऋषि के अनुयायियों एवं वंशजों का साम्राज्य था. जिसमें लोगों का प्रजातांत्रिक तरीके से विकास हुआ था जहां पर मानवमात्र एकसमान था. लेकिन भारत में कई विदेशी कबीले आये जिनमें आर्य भी एक थे, उन्होंने अपनी चतुराई एवं बाहुबल से इन बसे हुये लोगों को खंडित कर दिया तथा उन लोगों को | सम्पूर्ण भारत में बिखर जाने लिये विवस कर दिया. चूंकि आर्य समुदाय शासक के रूप में एवं सभी संसाधनों के स्वामी के रूप में यहां स्थापित हो चुके थे उन्होंने अपने वर्णाश्रम एवं ब्राह्मणी संस्कृति को यहां थोप दिया था. ऐसी हालत में उनसे हारे हुये मेघऋषि के वंशजों को आर्यों द्वारा नीचा दर्जा दिया गया. जिसमें आज के वर्तमान के सभी आदिवासी, दलित एवं पिछडे लोग शामिल थेभारत में स्थापित आर्य सभ्यता वालों ने यहां पर अपने अनुकुल धर्म, परमपरायें एवं नियम, रिवाज आदि कायम कर दिये थे जिनमें श्रम सम्बन्धि कठिन काम पूर्व में बसे हुये लोगों पर थोपकर उनसे निम्नता का व्यवहार किया जाना शुरू कर दिया था तथा उन्हें पुराने काल के राक्षस, नाग, असुर, अनार्य, दैत्य आदि कहकर उनकी छवि को खराब किया गया. इन समूहों के राजाओं के धर्म को अधर्म कहा गया था. इस प्रकार इतिहास के अंशों को देखकर मेघऋषि के वंशजों को अपना गौरवशाली अतीत पर गौरवान्वित होना चाहिये तथा वर्तमान व्यवस्था में ब्राह्मणवादी संस्कृति के थोपी हुई मान्यताओं को नकारते हुये कलियुग में भगवान रामदेव एवं बाबा साहेब भीमराव आम्बेडकर के बताये आदर्शों पर अमल करते हुये अपने अधिकार प्राप्त करने चाहिये. समाज में मेघवंश को सबल बनाने के लिये स्वामी गोकुलदासजी महाराज, गरीबदास जी महाराज जैसे संत हुये हैं जिन्होंने मेघवाल समाज के गौरव को भारत के प्राचीन ग्रंथों से समाज की उत्पत्ति एवं विकास का स्वरूप उजागर कर हमें हमारा गौरवशाली अतीत बताया है. तथा हमें निम्नता एवं कुरीतियों का त्याग कर सत कर्मों की ओर बड़ने का मार्ग दिखाया है. मेघवंश इतिहास मेघजाति की उत्पत्ति एवं निकास की खोज स्वामी गोकुलदासजी महाराज डूमाडा (अजमेर) ने अपनी खोज एवं लेखन के जरिये मेघवाल समाज की सेवा में प्रस्तुत की है जो इस प्रकार है; सृष्टि के आदि में श्रीनारायण के नाभिकमल से ब्रह्मा, ब्रह्मा ने सृष्टि रचाने की इच्छा से सनक, सनन्दन, सनातन, सन्तकुमार इन चार ऋषियों को उत्पन्न किया लेकिन ये चारों नैष्टिक ब्रह्मचारी रहे फिर ब्रह्मा ने दस मानसी पुत्रों को उत्पन्न किया. मरीचि, अत्रि अंगिरा, पुलस्त्व, पुलह, क्रतु, भृगु, वशिष्ट, दक्ष, और नारद. ब्रह्मा ने अपने शरीर के दो खण्ड करके दाहिने भाग से स्वायम्भुव मनु (पुरूष) और बाम भाग से स्तरूपा (स्त्री) को उत्पन्न करके मैथुनी सृष्टि आरम्भ की. स्वायम्भु मनु स्तरुपा से 2 पुत्र - उत्तानपाद और प्रियव्रत तथा 3 कन्याऐं आकुति, प्रसूति, देवहूति उत्पन्न हुई. स्वायम्भु मनु की पुत्री आकुति का विवाह रूचिनाम ऋषि से, प्रसूति का दक्ष प्रजापति से और देवहुति का कर्दम ऋषि से कर दिया. कर्दम ऋषि के कपिल मुनि पैदा हुये जिन्होंने सांख्य शास्त्र बनाया. कर्दम ऋषि के 9 कन्याऐं हुई जिनका विवाह: कला का मरीचि से, अनुसूया का अत्रि से, श्रद्धा का अंगिरा ऋषि से, हवि का पुलस्त्य ऋषि से, गति का पुलह से, योग का क्रतु से, ख्याति का भृगु से, अरुन्धति का वशिष्ट से और शांति का अर्थवन से कर दिया. ब्रह्माजी के पुत्र वशिष्ट ऋषि की अरुन्धति नामक स्त्री से मेघ, शक्ति आदि 100 पुत्र उत्पन्न हुये. इस प्रकार ब्रह्माजी के पौत्र मेघ ऋषि से मेघवंश चला. वशिष्ट ऋषि का वंश सूर्यवंश माना जाता है. ब्रह्माजी के जिन दस मानसी पुत्रों का वर्णन पीछे किया गया है उन ऋषियों से उन्हीं के नामानुसार गौत्र चालू हुये जो अब तक चले आ रहे हैं. ब्रह्माजी के ये पुत्र, पौत्र और प्रपौत्र ही गुण कर्मानुसार चारों वर्णों में विभाजित हुये| श्रीमदभागवत में एक कथा आती है कि मान्धाता के वंश में त्रिशंकु नामक एक राजा हुये, वह सदेह स्वर्ग जाने के लिये यज्ञ की इच्छा करके महर्षि वशिष्ट के पास गये और इस प्रकार यज्ञ करने के लिये कहा. वशिष्टजी ने यह कहकर इन्कार कर दिया कि मुझे ऐसा यज्ञ कराना नहीं आता. यह सुनकर वह वशिष्टजी के 100 पुत्रों के पास जाकर उनसे यज्ञ करने को कहा. तब उन्होंने उस राजा त्रिशंकु को श्राप दिया कि तू हमारे गुरू का वचन झूंठा समझकर हमारे पास आया है इसलिये तू चांडाल हो जायेगा, वह चांडाल हो गया. फिर वह ऋषि विश्वामित्र के पास गया, विश्वामित्र ने उसकी चांडाल हालत देखकर कहा कि हे राजा तेरी यह दशा कैसे हुई. त्रिशंक ने अपना सारा वृतान्त कह सुनाया. विश्वामित्र उसका यह वृतान्त सुनकर अत्यन्त क्रोधित हुये और उसका वह यज्ञ कराने की स्वीकृति दे दी विश्वामित्र ने राजा त्रिशंकु के यज्ञ में समस्त ब्राह्मणों को आमंत्रण किया मगर वशिष्ट ऋषि और उनके 100 पुत्र यज्ञ में सम्मिलित नहीं हुये. इस पर विश्वामित्र ने उनको श्राप दिया कि तुम शूद्रत्व को प्राप्त हो जावो. उनके श्राप से वशिष्ट ऋषि की सन्तान मेघ आदि 100 पुत्र शूद्रत्व को प्राप्त हो गये|

जातिवाद दुनिया का सबसे बड़ा आतंकवाद :- नवरत्न मन्डुसिया

जातिवाद हमारे देश मे बहूत जोरों शोरो से चल रहा । हमारे देश मे यदि जातिवाद हट जाये तो हमारे भारत देश को वापिस सोने की चिड़िया कह सकते है क्यों की देश का सबसे बड़ा आतंकवाद जातिवाद ही है। सुरेरा राजस्थान के युवा लेखक समाज सेवी नवरत्न मन्डुसिया ने बताया की डॉक्टर भीव राव अम्बेडकर ने समानता का कानून बनाया था लेकिन बाबा साहेब की कलम की अवहेलना की जा रही हैं और आज भी जातिवाद की बाढ़ आ रही हैं और कब रुकेगी ये जातिवाद की पाठशाला जब तक तक जातिवाद बढ़ता रहेगा तो भारत देश मे कोई भी समुदाय एक साथ नज़र नही आयेगा । सभी समुदायो के साथ कही ना कही भी भेदभाव किया जाता हैं ये लोग ऐसी नकारात्मक सोच क्यों रखते हैं जातिवाद एक भयंकर समस्या हैं क्यों की यह प्रथा हमारे समाज के लिये एक दिन बहूत समस्या बन जायेगी इस कारण समाज पिछड़ता जायेगा और हम आगे बढ़ नही पायेंगे इस कारण हम सभी लोगों कॊ एकता की भावना रखकर हम सभी कॊ आगे आना चाहिये और इस जातिवाद की पाठशाला कॊ विलुप्त करना चाहिये । और हम पूरे विश्व मे ये मुहिम की क्रांति चलानी जिसमे जातिवाद कॊ मिटाया जा सके । भारतीये संविधान ने सभी नागरिकों कॊ समानता का अधिकार दिया गया हैं और राजनेतिक और कानूनी तौर पर भी सभी समान हैं फ़िर भी समाज के साथ अत्याचार होता हैं और सरकार कोई गम्भीर कदम नही उठाती है । इसलिए हमारे समुदायो कॊ आगे बढ़ना हैं हमारे समाज मे आज भी ऐसी चुनौतियां हैं जिनके आधार पर विभिन्न समूहों / समुदायों व व्यक्तियों के साथ भेदभाव किया जाता हैं ऐसी घटनाये हमारे समाज को पिछडापन बना देती हैं इस कारण हमे समाज की खातिर आगे आना चहिये और समाज एकता मे अपना योगदान देना चहिये ॥

नवरत्न मन्डुसिया

खोरी गांव के मेघवाल समाज की शानदार पहल

  सीकर खोरी गांव में मेघवाल समाज की सामूहिक बैठक सीकर - (नवरत्न मंडूसिया) ग्राम खोरी डूंगर में आज मेघवाल परिषद सीकर के जिला अध्यक्ष रामचन्द्...