रविवार, 19 नवंबर 2017

फोन या सार्वजनिक स्थान पर SC/ST के खिलाफ जातिसूचक शब्द कहना अपराध : सुप्रीम कोर्ट


RAJKUMAR PAL
Publish: Nov, 19 2017 02:54:40 (IST)
MISCELLENOUS INDIA
सार्वजनिक स्थानों या फोन पर अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) श्रेणी के खिलाफ जातिसूचक टिप्पणी करना अपराध

नई दिल्ली: एससी और एसटी संबंधित एक मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला दिया है। सार्वजनिक स्थानों या फोन पर अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) श्रेणी के खिलाफ जातिसूचक टिप्पणी करना अपराध माना जाएगा। इसके लिए अधिकतम पांच जेल की सजा हो सकती है।
दरअसल जस्टिस जे चेलामेश्वर और एस अब्दुल नजीर की बेंच ने इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा 17 अगस्त के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। क्योंकि हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के रहने वाले व्यक्ति की याचिका खारिज कर दी थी। जिसने अपने खिलाफ एक महिला द्वारा दर्ज करायी गई प्राथमिकी को रद्द करने की मांग की थी। व्यक्ति पर आरोप है कि उसने फोन पर अजा/अजजा श्रेणी की एक महिला के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी की थी।
वकील ने कोर्ट में दिया ये दलील
वहीं दो जजों के बेंच ने कहते हुए उसकी याचिका खारिज कर दी कि आरोपी व्यक्ति को सुनवाई के दौरान यह साबित करना होगा कि उसने महिला से सार्वजनिक स्थल से बात नहीं की थी। वहीं इस मामले में आरोपी पक्ष के वकील विवेश विश्नोई ने कहा कि पहली बात की यह एक प्राइवेट बातचीत थी। महिला और उनके मुवक्किल ने जब बात की तब दोनों अलग-अलग शहरों में थे। साथ ही उन्होंने कहा कि इस कारण यह नहीं कहा जा सकता है कि आरोपी तब सार्वजनिक स्थान पर खड़ा या मौजूद था।
2008 में सार्वजनिक स्थल पर आ चुका है फैसला
वकील विवेश विश्नोई ने आगे कहा कि इस केस में जब दोनों व्यक्ति अलग-अलग शहरों में थे और सारी बातचीत जब फोन पर हो रही है। साथ ही किसी ने नहीं देखा कि मेरे मुवक्किल सार्वजनिक स्थल पर खड़े हैं। उसके साथ ही एक निजी बातचीत थी। उन्होंने कहा कि वैसे भी 2008 के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने पहले से ही तय कर रखा है कि 'सार्वजनिक स्थल या दृष्टिकोण' का मतलब क्या है।https://m.patrika.com/miscellenous-india/supreme-court-rules-out-abusing-scst-over-phone-in-public-place-2013856/


शुक्रवार, 17 नवंबर 2017

सहारनपुर बवाल: जानिए क्या है भीम आर्मी और कौन हैं इसके संस्थापक


   

सहारनपुर। शब्बीरपुर में हुए जातीय संघर्ष के बाद गांव रामनगर में हुए दलित बनाम पुलिस बवाल को लेकर एक खास नाम सामने आया है। जिसका नाम है भीम आर्मी। भीम आर्मी का पूरा नाम भारत एकता मिशन भीम आर्मी है। छह साल पहले दलितों के दमन की वारदातों को ध्यान में रखते हुए भीम आर्मी के गठन का निर्णय लिया गया था। आज यह संगठन दलित युवकों का पसंदीदा संगठन बन गया है। फेसबुक पर इस संगठन को पसंद करने वालों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है। खास बात यह है कि इस संगठन में दलित युवकों के साथ साथ पंजाब और हरियाणा के सिख युवा भी जुड़े हैं। एक दो गुर्जर युवक भी इस संगठन के सदस्य हैं।

सहारनपुर में यह संगठन अपनी खास पहचान बनाए हुए है। इस संगठन के संस्थापक और राष्ट्रीय अध्यक्ष, अधिवक्ता चंद्रशेखर आजाद हैं। करीब छह साल पहले जब चंद्रशेखर के पिता अस्पताल में भर्ती थे तो चंद्रशेखर ने अपने अस्पताल में लोगों से दलित समाज के दमन की बातों को सुना। उस वक्त वह अमेरिका जाकर उच्च शिक्षा प्राप्त करना चाहते थे, लेकिन दलितों के दमन की बात सुनकर चंद्रशेखर ने अमेरिका जाने का विचार त्याग दिया और 2011 में गांव के कुछ युवाओं के साथ मिलकर भारत एकता मिशन भीम आर्मी का गठन किया।

तीस वर्षीय चंद्रशेखर पेशे से अधिवक्ता हैं, संगठन के साथ-साथ वह वकालत भी करते हैं। जिस वक्त भीम आर्मी का गठन किया गया था, उस समय इसका उद्देश्य दलित समाज की सेवा करना और इस समाज की गरीब कन्याओं के लिए धन जुटाकर विवाह संपन्न कराना था। लेकिन तीन दिन पूर्व गांव रामनगर में हुए बवाल ने इस संगठन के नाम पर कालिख पोत दी। बकौल चंद्रशेखर, जिस दिन यह बवाल हुआ उस दिन वह अपने परिवार के सदस्यों के साथ अपने गांव छुटमलपुर स्थित घर पर थे।

चंद्रशेखर ने बताया कि ने कहा, राजनीतिक दलों को सभी समुदायों के वोटों की ज़रूरत होती है लेकिन कोई भी वास्तव में दलितों की परवाह नहीं करता है। हमारे लोगों पर हर दिन अत्याचार किया जाता है और उनके पास आवाज नहीं है वे पुलिस में नहीं जा सकते क्योंकि वे हमारी बात नहीं सुनते हैं। उन्होंने उदाहरण दिया कि उना (पिछले साल गुजरात में दलितों के हमलों पर गठबंधन पर हमला) या (हैदराबाद छात्र) रोहिथ वेमुला की आत्महत्या आदि ऐसे मामले हैं, जहां पर दलितों की कोई सुनवाई नहीं हुई। चंद्रशेखर के अनुसार, भीम सेना एक मंच है जहां हम अपने युवा दलित समाज हित में कार्य करने के निर्देश देते हैं और उन्हें जागरूक करते हैं।

चंद्रशेखर ने बताया कि दस मई को मल्हीपुर रोड पर हुई वारदात में सभी लोग भीम आर्मी के सदस्य नहीं थे। उन्होंने कहा कि मल्हीपुर रोड पर बवाल होने के बाद अधिकारियों ने उसे विरोधियों को शांत करने के लिए बुलाया था। वह भगवान बुद्ध की शिक्षाओं के साथ साथ डा. अंबेडकर के अहिंसावादी रास्तों का पालन करते हैं। उन्होंने कहा कि मैं सभी को बताता हूं कि इन दिनों सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि दमन से लड़ने के लिए दलित शिक्षित हो। जब हम उनकी (ऊपरी जाति) नौकरियां प्राप्त करें, तभी कुछ समानता हो जाएगी। हमारे पास एक ही खून है, इसलिए अंतर क्यों? दो साल पहले चंद्रशेखर के पिता का देहांत हो गया था। अब परिवार में दो बहनें हैं, जिनमें से एक की शादी हो चुकी है और दो भाई है, जिनमें एक चंद्रशेखर की भी शादी नहीं हुई है। दूसरा भाई पढ़ाई के साथ साथ एक मेडिकल स्टोर पर नौकरी करता है। एक चचेरा भाई है, जो इंजीनियर है। वही परिवार को समय समय पर आर्थिक सहायता प्रदान करता है।

आपको बता दें फेसबुक पर भीम आर्मी का एक पेज बना है, जिसके फालोअर्स की संख्या में दिन प्रतिदिन बढ़ोत्तरी हो रही है। इस पेज से ज्यादातर दलित जुड़े हैं, लेकिन पंजाबी और सिख युवा भी इसके सदस्य हैं। स्थानीय स्तर पर यह संगठन इतना मजबूत है कि हर गांव में इस संगठन से जुड़े दलित युवक हैं। सहारनपुर के अलावा शामली और मुजफ्फरनगर जनपदों में भी कार्य कर रहा है। हरियाणा के अंबाला और यमुनानगर के अलावा राजस्थान  उत्तराखंड के मैदानी जनपद देहरादून व हरिद्वार में भी इस संगठन के कार्यकर्ता हैं।

जातीय सेनाओं ने हरेक जाति को एक राष्ट्र बना दिया :- भँवर मेघवंशी


युवा लेखक शून्यकाल के सम्पादक की खास रिपोर्ट 
जातीय सेनाओं पर प्रतिबंध के लिए राजस्थान के सामाजिक कार्यकर्ता भंवर मेघवंशी ने राष्ट्रपति से की अपील, प्रतिबंध की गिनवाई विस्तार में वजहें
1- भारतीय संविधान के अनुसार वैधानिक रूप से तीन सेनाओं - थलसेना, वायुसेना और जलसेना का अस्तित्व है, जिन्हें शस्त्र धारण कर देश की अखंडता, एकता और संप्रभुता का संरक्षण करने का दायित्व सौपा गया है , ये तीनों सेनाएं भारत के राष्ट्रपति के अधीन है और संविधान के दायरे में पूर्णतः कानूनी रूप से काम करने हेतु बाध्य है।
2- भारत का संविधान देश के नागरिकों को शांतिपूर्ण एवम अहिंसक रूप से संगठित होने, संघ बनाने का मौलिक अधिकार देता है, जिसके तहत कई संस्था, संगठन, अभियान और जन आंदोलन, ट्रेड यूनियन एवम राजनीतिक दल गठित हो कर संविधान के दायरे में काम करते है ।
3- जिन तत्वों की लोकतंत्र में आस्था नहीं है, ऐसे सामंती और जातिवादी तत्व संविधान के दायरे से ऊपर उठकर निजी गिरोह बना लेते है, जिन्हें किसी प्रसिद्ध इतिहास पुरूष अथवा धार्मिक व्यक्ति के नाम या धर्म, सम्प्रदाय अथवा जाति का नाम देकर सेना बना लेते है जो कि पूर्णतः असंवैधानिक होती है और गैरकानूनी गतिविधियों में लिप्त रहती है।
4-आजकल ऐसी जातीय, धार्मिक और साम्प्रदायिक निजी सेनाएं देश भर में सक्रिय हो चुकी है जो भारत राष्ट्र की कानून और व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती के रूप में उभर रही है, ये निजी सेनाएं असामाजिक तत्वों के गिरोह है, जो अपनी जाति या सम्प्रदाय को ही राष्ट्र समझते है ।
5-जाति सेनाओं के अत्यधिक उभार से यह बात साबित होती है कि जातीयां अब इस देश मे सम्पूर्ण प्रभुता सम्पन्न स्वतन्त्र गणराज्यों का स्वरूप ले रही है ,जिनकी अपनी सेनाएं है और अपनी खांप नामक न्याय पंचायतें जो कि अदालतों के समानांतर वैधानिक कार्यवाहियों को अंजाम देती है ,कई बार तो लोगों की चरित्र परीक्षा और जान तक लेने के आदेश दिए जाते है ,जो कि एक राष्ट्र के रूप में भारत के लिए अत्यंत शर्मनाक बात है ।
6-आजकल हर जाति की सेना मौजूद है, इन्हें बाकायदा आर्मी, सेना या रेजिमेंट कहा जाता है ,इनकी ड्रेस होती है, झंडे होते है, इनके पास हथियार होते है और वे अक्सर सशस्त्र बलों की भांति हथियारों के साथ सड़कों पर मार्चपास्ट करते है, आम जन में दशहत का माहौल बनाते है और अपनी जाति के लिए मांगे मनवाने के लिए सड़कें जाम कर देते है, रेल की पटरियां उखाड़ लेते है, थाने जला देते है और पुलिस एवम अर्धसैनिक बलों पर गोलीबारी करते है ,ये अपनी जाति समुदाय के लिए राष्ट्र की हज़ारों करोड़ की संपत्ति को नुकसान पँहुचाने से भी गुरेज नही करते है, इनके लिए राष्ट्र से पहले अपनी जाति,धर्म,समुदाय है ।
7- इन जातीय सेनाओं ने हरेक जाति को एक राष्ट्र बना दिया है, इनकी अपनी न्याय व्यवस्था है ,इनकी अपनी सेनाएं है, इनका अपना निज़ाम, इनके डंडे, इनके झंडे है ,इनको देश और देश के अन्य नागरिकों से कोई मतलब नही है, इन जातीय सेनाओं ने भारत का लोकतंत्रीकरण करने के बजाय कबीलाईकरण कर दिया है, हम 21 वीं सदी के बजाय 12 वी सदी में पँहुच गये है, निजी जातीय सेनाओं का अस्तित्व में आना और जीवित बने रहना हमारे राष्ट्र राज्य की विफलता है ।
8-जाति सेनाएं अब संविधान से ऊपर हो गयी हैं, वे संविधान प्रदत्त अभिव्यक्ति की आज़ादी को छीन रही हैं ,वे नागरिकों पर संविधानेतर सेंसरशिप लाद रही हैं, अब तो ये सेना नामधारी जातिवादी गिरोह तय कर रहे हैं कि इस देश का इतिहास क्या होगा ? चित्र क्या बनेंगे ? गीत कविताएं क्या गाई जाएगी? साहित्य क्या लिखा जाएगा ? किताबें कौनसी छपेगी ? फिल्में क्या बनेगी ? उनमें क्या फिल्माया और दिखाया जाएगा...

महोदय ,इस देश मे अब हर चीज़ सड़क छाप गुंडे तय करेंगे ? संविधान द्वारा दिये गए नागरिक अधिकारों का इन जाति सेनाओं ने अपहरण कर लिया है और उनके विरुद्ध किसी प्रकार की कार्यवाही नही की जाती है ,यह कैसी बेबसी है महामहिम ?
अगर हमें अपनी महान लोकशाही को बचाना है, तो संवैधानिक सेनाओं के अलावा की सभी सेनाओं ,आर्मियों और रेजिमेंटों पर तुरन्त प्रभाव से रोक लगानी होगी और जाति, सम्प्रदाय ,धर्म ,मजहब आधारित तमाम सेनाओं को असंवैधानिक घोषित कर उनपर पूर्णतया प्रतिबंध लगाना होगा ,अन्यथा ये राष्ट्रद्रोही जातिवादी गिरोह भारत नामक राष्ट्र राज्य का अस्तित्व ही मिटा देंगे और हम फिर से अलग अलग कबीलों में बंट कर धूल धूसरित हो कर मिट जाएंगे ।
अतः भारत राष्ट्र के राष्ट्रपति होने के नाते और तीनों संवैधानिक सेनाओं के मुखिया होने के नाते आपसे यह पुरजोर अनुरोध है कि अविलम्ब जाति ,धर्म ,मजहब आधारित समस्त सेनाओं पर रोक के आदेश जारी करें ,इस तरह के गैरकानूनी गिरोहों के गठन तथा परिचालन को अवैध करार दे कर कानूनी अपराध घोषित किया जाए और बरसों से इस प्रकार के सैन्य गिरोह संचालित कर देश विरोधी गतिविधियों में संलिप्त जाति सेनाओं के मुखियाओं की संपत्तियों एवं गतिविधियों की सघन जांच की जाएं ।
उम्मीद है कि आप राष्ट्र के लिए खतरा बन चुकी इन जातीय सेनाओं के खिलाफ तुरन्त कार्यवाही के दिशा निर्देश प्रदान करेंगे और इन असंवैधानिक सैनिक गिरोहों को पूर्णतः तुरन्त प्रतिबंधित करने के आदेश भारत सरकार को देंगे ।

मेघवाल समाज का तीसरा सामूहिक विवाह सम्मेलन 19 नवंबर 2017 को, सगाई की रस्म आयोजित*

जयपुर के रामपुरा डाबड़ी में होगा आयोजन

भीम प्रवाह न्यूज/जयपुर। बलाई समाज सामूहिक विवाह समिती और मेघवंश जाग्रति संस्थान, नीमकाथाना (सीकर) के संयुक्त तत्वावधान में बलाई समाज का तृतीय सामूहिक विवाह सम्मेलन रविवार 19 नवंबर 2017 को कांदेला कृषि फार्म हाऊस, रामपुरा डाबड़ी, एन एच. 11(52), सीकर रोड़, तह. आमेर , जि. जयपुर पर आयोजित होगा। 

सगाई की रस्म आयोजित

 तृतीय सामूहिक विवाह सम्मेलन का सगाई समारोह 12 नवंबर को आयोजित किया गया । जिसके मुख्य अतिथि प्रदेशाध्यक्ष डॉ. रणजीत महरानियां थे। अध्यक्षता विवाह समिति अध्यक्ष चांदमल काला ने की। सभी जोड़ो को डॉ. रणजीत मेहरानियां की तरफ से बरी का बेस व सूट का कपड़ा भेंट किया गया ।

यह जानकारी देते हुए विवाह सम्मेलन के संयोजक सोदागर कांदेला ने बताया कि समाज के सभी लोगो के सहयोग व आशीर्वाद से बलाई समाज को खर्चीली शादियों व दहेज से मुक्ति दिलाने हेतु प्रथम प्रयास में 5 दिसंबर 2015 को 13 जोड़ो का व व्दितीय प्रयास में  दि. 20 नवंबर 2016 को 21 जोड़ो का भव्य सामूहिक विवाह सम्मेलन का आयोजन कर समाज सुधार व उत्थान का एक नया आयाम स्थापित करने का प्रयास विवाह समिती व्दारा किया गया। इसी प्रकार समाजोत्थान हेतु हमारी दोनो संस्थाओ व्दारा तृतीय प्रयास के रूप में *(रविवार 19 नवंबर 2017)* को पुन: 51 जोड़ो के सामूहिक विवाह सम्मेलन का लक्ष्य रखा गया हैं। विवाह हेतु योग्य जोड़ो से 11,000/-  रुपए आर्थिक सहयोग व 500/- रूपये रजिस्ट्रेशन शुल्क के तय किया गया है। 

शनिवार, 11 नवंबर 2017

मेघवंश समाज के पर्यायवाची नामों की राज्यवार तालिका

आंध्रप्रदेश – घासी, मादिगा, ऋषि, रिखिया, महार
अरुणाचल प्रदेश – ऋषि, मुची, महार
असम – मुचि, ऋषि, महार, बरुवा, पान
बिहार – घासी, घसीया, तांती, तन्तुवा, दुसाध, मुची
चंडीगढ़ – रामदासी, कबीरपंथी, जुलाहा, कोरी, कोली, मेघ
दादर नगर हवेली – मैघ्यावंशी, महार
दिल्ली – बलाई, रामदासिया, कबीरपंथी, कोली, मेघवाल
गुजरात – मेघवाल, मेघवार, मैह्यवंशी, भांबी, बंभी, रोहिदास, रोहित, बणकर, मारू
गोवा दमन दीव – मेघ्यावंशी, महार
हरियाणा – मेघ, मेघवाल, कोरी, कोली, महाशय, कबीरपंथी, जुलाहा, रामदासिया, बलाही, जाटव, जाटवा, भांबी
हिमाचल – मेघ, कोरी, कोली, महाशय, कबीरपंथी, जुलाहा, बलाही, जाटव, जाटवा, भांबी
जम्मू-कश्मीर – मेघ, कोरी, कबीरपंथी, जुलाहा, रामदासिया
कर्नाटक – मादिगा, सूर्यवंशी, पदमशाली, भांबी, भांभी, मदार, रोहिदास
केरल – वेल्लुवन, मुची
मध्यप्रदेश – मेघवाल, मेहरा, मेहर, महार, बलाई, भांबी, रामनामी, सतनामी, घासी, धानिया, कोरी, कोली
महाराष्ट्र – मेघ, मेघवाल, मेघवार, बलाई, भांबी, बंभी, सतनामी, सूर्यवंशी, घासी, घसिया, कोरी, मेहरा, मुची, मादिगा, मदार, महार, मेगु, मैह्यवंशी, कोरी
मणीपुर – मेघायल, ऋषि, मपची, रविदास
मिज़ोरम – ऋषि, मुची, कबीरपंथी, जुलाहा, महार
मेघालय – मुची, ऋषि, महार
ओड़िशा – सतनामी, मारू, घरसी, घसिया, कोरी, भापिग, मुची, मादिगा, महार, मेहरा
पांडिचेरी – मादिग, वेल्लुवन
पंजाब – मेघ, कोरी, कबीरपंथी, जुलाहा, रामदासी
राजस्थान – मेघ, मेघवाल, मेघवार, मेघवंश, मेघवंशी, मैह्यवंशी, बलाई, राजबलाई, भांबी, लाटवा, मारू, बणकर, बुनकर, कोरी, साल्वी, सूत्रकार, ऋषि, रिखिया, छड़ीदार, चोबदार, बैरवा, जाटव
तमिलनाडु – कोलियान, मादिगा, वेल्लुवन, मुची
त्रिपुरा – बागड़ी, घासी, घसिया, कोल, कोरी, कोरा, कोट, मुची
उत्तर प्रदेश – बलाई, बलाही, घसिया, कोल, कोरी, कोरवा, कोट, शिल्पकार, तंतुवाय, धूसिया, जूसिया, जाटव
पश्चिम बंगाल – मुची, ऋषि, घासी, म्हार

गुरुवार, 19 अक्टूबर 2017

जानिये चेक बाउंस (अनादर) मामले मे सजा क्या होती है


चेक एक परक्राम्य लिखत या दस्तावेज (negotiable instrument) है, जिसके तहत बिना किसी शर्त के एक निश्चित धनराशि का भुगतान करने का वादा किया जाता है या आदेश दिया जाता हैl  रेखांकित चेक (crossed cheque) और खाता से भुगतान होने वाले चेक (account payee cheque) द्वारा केवल उसी व्यक्ति को धनराशि का भुगतान किया जाता है, जिसका नाम प्राप्तकर्ता के रूप में चेक पर लिखा रहता हैl ऐसे चेक को प्राप्तकर्ता के बैंक खाते में जमा करना पड़ता हैl
(एक व्यक्ति चेक जारी करता हुए)
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कानूनी रूप से चेक के मालिक को “चेक काटने वाला” या “चेकदाता” या “चेक जारीकर्ता” (Drawer) कहा जाता है, जिसके पक्ष में चेक तैयार किया जाता है उसे “प्राप्तकर्ता” (Payee) कहा जाता है और जिस बैंक को धनराशि का भुगतान करने के लिए निर्देशित किया जाता है, उसे “भुगतानकर्ता” (Drawee) कहा जाता हैl
हाल के दिनों में चेक बाउंस की घटनाएँ आम हो गई है। कभी-कभी बड़ी धनराशि वाले चेक का भुगतान नहीं हो पाता है और उन बैंकों को चेक वापस कर दिया जाता है, जिन्होंने इसे तैयार किया होता हैl
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नीचे दिए गए लेख में इस बात की जानकारी प्रदान की गई है कि यदि आपका चेक अस्वीकृत हो गया है तो आप क्या कर सकते हैं? इसके साथ ही चेक के अस्वीकृत होने पर आपको किन-किन कानूनी प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ेगा, उसके बारे में चरणबद्ध विवरण दिया गया हैl
चेक अस्वीकृत होने पर उठाए जाने वाले कदम
जब एक चेक अस्वीकृत हो जाता है तो भुगतानकर्ता बैंक (Drawee Bank) तुरंत ही “प्राप्तकर्ता” (Payee) के बैंक को “चेक रिटर्न मेमो” जारी करता है और भुगतान न करने का कारण बताता हैl इसके बाद “प्राप्तकर्ता” (Payee) का बैंक “प्राप्तकर्ता” (Payee) को अस्वीकृत चेक और “चेक रिटर्न मेमो” सौंप देता हैl यदि धारक या प्राप्तकर्ता को यह लगता है कि दूसरी बार चेक को जमा करने पर उसे स्वीकार कर लिया जाएगा तो वह उस तारीख के तीन महीनों के भीतर पुनः चेक को जमा कर सकता हैl लेकिन यदि चेक जारीकर्ता दूसरी बार भी भुगतान करने में विफल रहता है तो धारक या प्राप्तकर्ता को चेक जारीकर्ता के विरूद्ध कानूनी तौर पर मुकदमा दर्ज कराने का अधिकार प्रदान किया गया है।
प्राप्तकर्ता (Payee) चेक अस्वीकृत होने पर डिफॉल्टर/चेक जारीकर्ता के विरूद्ध कानूनी रूप से तभी मुकदमा कर सकता है यदि चेक में उल्लिखित राशि ऋण या किसी अन्य देनदारी के भुगतान के लिए डिफॉल्टर/चेक जारीकर्ता द्वारा प्राप्तकर्ता के लिए जारी किया गया हैl
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यदि चेक उपहार के रूप में जारी किया गया हो, ऋण देने के लिए जारी किया हो या गैरकानूनी उद्देश्यों की पूर्ति के लिए जारी किया गया हो तो ऐसे मामलों में डिफॉल्टर/चेक जारीकर्ता के विरूद्ध मुकदमा नहीं चलाया जा सकता हैl
कानूनी कार्रवाई
चेक अस्वीकृत होने से संबंधित मामलों की जांच परक्राम्य लिखत अधिनियम (The Negotiable Instruments Act), 1881 के अंतर्गत की जाती हैl 1881 के बाद से इस अधिनियम को कई बार संशोधित किया गया हैl
इस अधिनियम की धारा 138 के अनुसार चेक का अस्वीकृत होना एक दंडनीय अपराध है और इसके लिए दो साल का कारावास या जुर्माना या दोनों हो सकते हैंl
यदि चेक प्राप्तकर्ता कानूनी कार्यवाही करने का निर्णय लेता है तो पहले चेक जारीकर्ता को तुरंत चेक की राशि चुकाने का मौका देना चाहिए। इस तरह का एक मौका केवल लिखित रूप से नोटिस के रूप में देना चाहिए।
प्राप्तकर्ता (Payee), बैंक से "चेक रिटर्न मेमो" प्राप्त करने की तारीख से 30 दिन के अंदर चेक जारीकर्ता को नोटिस भेज सकता हैl इस नोटिस में यह बात का उल्लेख अवश्य करना चाहिए कि चेक जारीकर्ता को नोटिस प्राप्ति की तारीख से 15 दिनों के अंदर प्राप्तकर्ता को चेक की राशि का भुगतान करना होगा। यदि चेक जारीकर्ता नोटिस प्राप्त करने के 30 दिनों के भीतर भुगतान करने में विफल रहता है, तो प्राप्तकर्ता (Payee) परक्राम्य लिखत अधिनियम (The Negotiable Instruments Act) की धारा 138 के तहत उसके खिलाफ आपराधिक शिकायत दर्ज करा सकता हैl
 court-proceeding

इस बात का ध्यान अवश्य रखना चाहिए कि नोटिस अवधि की समाप्ति से एक महीने के भीतर किसी मजिस्ट्रेट के कोर्ट में शिकायत दर्ज हो जानी चाहिए। इस तरह के मुकदमे में आगे बढ़ने के लिए एक ऐसे वकील से परामर्श करना आवश्यक होता है जो इस क्षेत्र से अच्छी तरह वाकिफ हो और उसे ऐसे मुकदमों पर काम करने का अच्छा खासा अनुभव हो।
अभियोजन पक्ष (prosecution) के लिए शर्तें
कानूनी रूप से धारा 138 के प्रावधानों का उपयोग करने के लिए अभियोजन पक्ष को निम्नलिखित शर्तों को पूरा करना आवश्यक है:
1. “चेक जारीकर्ता” (Drawer) ने अपने नाम से चल रहे खाते से चेक जारी किया हो l
2.“चेक जारीकर्ता” (Drawer) के खाते में अपर्याप्त धनराशि के कारण चेक को लौटाया या अस्वीकार किया गया हो l
3. चेक को किसी ऋण या कानूनी दायित्व को पूरा करने के लिए जारी किया गया है।
नोटिस प्राप्त करने के बाद अगर चेक जारीकर्ता नोटिस प्राप्त करने के दिन से 15 दिनों के भीतर भुगतान नहीं करता है, तो वह परक्राम्य लिखत अधिनियम (The Negotiable Instruments Act) की धारा 138 के तहत दंडनीय अपराध करता है।
सजा और जुर्माना
इस मामले से संबंधित हलफनामा और जरूरी कागजातों के साथ शिकायत प्राप्त करने पर अदालत सम्मन (summon) जारी करेगी और मामले की सुनवाई करेगीl यदि दोष सिद्ध हो जाता हैतो डिफॉल्टर को जुर्माने की राशि के रूप में चेक में अंकित राशि से दुगुना वसूला जा सकता है या दो साल की कैद हो सकती है या जुर्माना और कैद दोनों हो सकती हैl इसके साथ ही किसी व्यक्ति द्वारा जारी किया चेक बार-बार बाउंस हो जाता है बैंक उस व्यक्ति को चेक बुक की सुविधा से वंचित कर सकती है और उसके खाते को भी बंद कर सकती है।
अगर चेक जारीकर्ता नोटिस प्राप्त होने की तारीख से 15 दिनों के भीतर चेक राशि का भुगतान करता हैतो वह किसी अपराध की श्रेणी में नहीं आता है। अन्यथा, आवेदक नोटिस में निर्धारित 15 दिनों की समाप्ति की तारीख से एक महीने के भीतर उस क्षेत्र के मजिस्ट्रेट के कोर्ट में शिकायत दर्ज कर सकता हैl
सारांश के रूप में यह कहा जा सकता है कि सरकार ने चेक बाउंस के बढ़ते मामलों को रोकने और लोगों को उनकी वित्तीय जिम्मेदारियों को ठीक से अदा करने के लिए, चेक बाउंस को परक्राम्य लिखत अधिनियम (The Negotiable Instruments Act) की धारा 138 के तहत दंडनीय अपराध घोषित किया अधिक जानकारी के लिये करे सम्पर्क नवरत्न मन्डुसिया 

सोमवार, 16 अक्टूबर 2017

भँवर मेघवंशी ने किया अपना देहदान

एक जरुरी फैसला - देहदान का !


मैं जो भी हूँ ,आप सबके प्यार ,स्नेह और मार्गदर्शन की वजह से हूँ। इसलिए आप सबका खूब खूब धन्यवाद ,साधुवाद,आभार ।

आज(25 फरवरी 2017) को  42 साल पूरे हुए ,43 वा  प्रारम्भ हुआ। हालाँकि यह दिन भी और दिनों जैसा ही है। अलग कुछ भी नहीं । लेकिन कई वर्षों की एक इच्छा को आज पूरा होते देख रहा हूँ । एक जरुरी फैसला जो कि कुछ वर्षों से लंबित था ,वह ले पाने का सुकून महसूस रहा हूँ ।

कई बरसों से देह दान की इच्छा रही ,वह अब जा कर साथी कमल टाँक एवं ललित दार्शनिक के सहयोग से पूरी हुई। मैं हृदय से आभारी हूँ कमल जी और ललित जी का कि उनकी मदद से यह महत्वपूर्ण कार्य हो सका। आभारी हूँ अपने परिजनों का भी कि उन्होंने सहमति दी।

कई सालों से मेरा यह सोच रहा है कि आखिरी सांस तक जमकर देश और समाज के लिए काम किया जाये और जब मौत आ जाये तो उसके बाद इस देह का उपयोग मेडिकल छात्रों के शोध व अध्ययन के लिए हो ।

मैं इस मौके पर कहना चाहता हूँ कि मेरी स्वाभाविक मौत हो या अस्वाभाविक ,घर पर हो या सड़क पर अथवा आंदोलन या अभियान में । मौत के तुरंत बाद बिना कोई रीति रिवाज किये शांतिपूर्ण ढंग से देह को एस एम एस मेडिकल कॉलेज ,जयपुर को दे दिया जाये।

अपनी देह को जलाने या दफनाने के काम के  बजाय मैं यही पसंद करूँगा कि वह मेडिकल विज्ञान के लिए काम आये ।अगर कुछ अंग जरूरतमंदों के लिए उपयोगी हो तो उन्हें भी काम में ले लिया जाये।

मैं किसी प्रकार का अंतिम संस्कार नहीं चाहता । कोई तीसरा या उठावना नहीं चाहता और ना ही 12 दिन तक बैठ कर शोक मनाने के निठल्ले काम से मेरी सहमति है। किसी तरह की शोक सभा नहीं की जानी चाहिए :, मृत्युभोज और गंगा जल ,पिंडदान तथा तर्पण और नदी नाले में ले जा कर अस्थियों के विसर्जन जैसी अवैज्ञानिक चीजे तो कतई नहीं की जाये,क्योकि इनमें मेरा कोई यकीन  नहीं है।

आत्मा की शांति ,परमात्मा की प्राप्ति ,स्वर्ग- नरक तथा पुनर्जन्म जैसे खोखले शब्दों से मैं स्वयं को दूर करता हूँ।मैं नहीं चाहता कि मेरे विदा होने के बाद किसी तरह की स्मृति बाकी रहे ,किसी समाधि ,किसी मूर्ति या किसी चित्र की कोई आवश्यकता नहीं है।

अगर आप मुझसे प्यार करते है तो मेरे मरने के बाद नहीं ,मेरे जीते जी साथ जुड़े ,सहयोग करें और वंचितों ,पीड़ितों ,दलितों ,दमितों के लिए न्याय और समानता पर आधारित समाज रचना के अभियान में साथ चलें ।

सब कुछ इस लोक में कीजिये ,परलोक में मेरा विश्वास नहीं है ।सब कुछ जीते जी ,अभी और यहीं ,बाद मरने के कुछ भी मान्य नहीं होगा।


                       भँवर मेघवंशी जी लब्ज  

नवरत्न मन्डुसिया

खोरी गांव के मेघवाल समाज की शानदार पहल

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