शुक्रवार, 12 मई 2017

राजा राम मेघवाल (मेहरान गढ़ जोधपुर दुर्ग ) की जीवनी

मेघवाल समाज :- चिड़ियाटूंक पहाड़ी पर स्थित जोधपुर-दुर्ग ‘मेहरानगढ़’ आज अपने वैभव और शिल्पकला के कारण पर्यटन का प्रमुख केंद्र है ।लेकिन इसकी नींव के प्रस्तर नीरव मेघ-निनाद करते हैं क्योंकि वे एक महान् मेघवंशी की शहादत के मूक-दर्शक बने थे ।राजस्थान में राजा रजवाड़ों के जमाने से तालाबों, किलों, मंदिरों व यज्ञों में ज्योतिषियों की सलाहपर शूद्रों को जीवित गाड़कर या जलाकर बलि देने की परम्परा थी । कहा जाता था कि यदि किसी किले की नींव में किसी जीवित पुरूष की बलि दे दी जाए तो वह किला हमेशा राजा के अधिकार में रहेगा, हमेशा विजयी होगा और राजा का खजाना हमेशा भरा रहेगा ! इस किले हेतु भी सिंध प्रान्त के ज्योतिषी गणपत ने किले की अजेयता और समृद्धता के लिए नरबलि देना अनिवार्य बताया । राव जोधा उसके प्रस्ताव को मानकर नरबलि हेतु अग्रसर हुआ और आम-जनता से में इसके लिए घोषणा करवा दी । उस दौर में राजा की ओर से उनके हरकारे गांव-गांव जाकर ढोल-नगाड़ों को बजा राजा का फरमान सुनाया करते थे। उन्होंने गांव-गांव जाकर घोषणा की कि राव जोधा मारवाड़ की नई राजधानी का निर्माण करने जा रहे है। इसके लिए किसी ऐसे स्वामी भक्त वीर पुरुष की आवश्यकता है जो दुर्ग की नींव में स्वयं को जीवित गाड़े जाने के लिए अपनी मर्जी से पेश कर सके। इतने क्षत्रिय-ब्राह्मण-वैश्य-सामंत-सेठ-साहूकारों में से कोई एक भी लोक-कल्याण हेतु अपनी बलि देने को तैयार नहीं हुआ । सभी बड़े-बड़े कार्य इनकी उपस्थिति में होते थे । राजा द्वारा इनको विशेष रूप से आमंत्रित किया जाता था । उनकी चाटुकारिता का भी कोई जवाब नहीं । शब्द-कौशल के धनी लंबी-चौड़ी प्रशंसाएं करते दिखाई देते थे । दरबार में हमेशा स्तुतियाँ हुआ करती थी पर अपनी जान कौन दे? इसके लिए कोई सपने में भी तैयार नहीं हो सका । आख़िरकार स्वामिभक्ति के लिए एकमात्र राजिया भाम्बी (राजाराम मेघवाल गौत्र कड़ेला) अपने आत्मबलिदान हेतु प्रस्तुत हुआ । एक ऐसे समुदाय का व्यक्ति जिससे बात करना तो दूर उसका स्पर्श भी अग्राह्य था । लोग उसकी छाया पड़ने को भी अशुभ मानते थे । हाँ, वह एक अछूत था ! फिर भी उसे किले की दीवार में चुनना और उसके पार्श्व में ख़जाने हेतु भवन बनाना पूरी तरह शुभ था । दोगलेपन का इससे बड़ा क्या सबूत हो सकता है !
इसी गगनचुम्बी भव्य किले की नींव में ज्योतिषी गणपतदत्त की सलाह पर 15 मई 1459 [12 मई 1459 ई. तदनुसार ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी (11) वार शनिवार को] दलित राजाराम मेघवाल उसकी माता केसर व पिता मोहणसी को नींव में चुना गया। 
कुछ स्रोत उद्घाटित करते हैं कि राजिया (राजाराम) और कालिया नामक दो मेघवंशी किले की दीवार में जीवित चुने गए थे । साथ थी कुछ स्रोतों से ज्ञात होता है कि गोरा भी सती हुई थी ।
राजिया के सहर्ष किये हुए आत्म त्याग एवम स्वामी भक्ति की एवज में राव जोधाजी राठोड ने उनके वंशजो को जोधपुर किले पास सूरसागर में कुछ भूमि भी दी ( पट्टा सहित ) व दस हजार रुपए नगद प्रदान किए गए । राव जोधा के आदेश पर जमीन का पट्टा उसकी पत्नी व पुत्र के नाम कर दिया गया। राज बाग के नाम से प्रसिद्ध हैं !और होली के त्यौहार पर मेघवालो की गेर को किले में गाजे बजे साथ जाने का अधिकार हैं जो अन्य किसी जाति को नही हैं !
जहां राजाराम की बलि दी गई थी उस स्थान के ऊपर विशाल किले का खजाना व नक्कारखाने वाला भाग स्थित है। किले में रोजाना हजारों देशी-विदेशी पर्यटक आते हैं लेकिन उन्हें उस लोमहर्षक घटना के बारे में कुछ भी नहीं बताया जाता है। एक दीवार पर एक छोटा-सा पत्थर जरूर चिपकाया गया है जो किसी पर्यटक को नजर ही नहीं आता है उस पत्थर पर धुंधले अक्षरों में राजाराम की शहादत की तारीख खुदी हुई है।

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