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Wednesday, June 1, 2011

Carrying in manor get sloppy work meghwal cast जागीर में मिलता है मैला ढोने का काम



जागीर में मिलता है मैला ढोने का काम


बरोठा गांमित्रा बाई जब शादी होची थी तब उनकी सास ने उन्हें अपनी जागीर सौंप दी थी और उन्हें जागीर में मिला था 25 घरों का मैला ढोने का काम। असभ्य समाज में भी इस तरह की प्रथा का प्रचलन नहीं था पर विकसित होते समाज में बदस्तूर ऐसी प्रथा का पालन किया जा रहा है जिसमें इंसान का इंसान से ही मल साफ करवाया जा रहा है।

इसी व्यवहार के सम्बन्ध में अब तक किये गये प्रयासों से यह मान्यता स्थापित होती गई है कि यदि एक समुदाय मानव मल ढोने का काम कर रहा है तो इसका सबसे बड़ा कारण आर्थिक अभाव नहीं बल्कि सामाजिक असंवेदनशीलता और प्रतिबध्दता की कमी है। सुमित्रा बाई ने खुद को इस पेशे के चक्रव्यूह में से बाहर निकालने की जध्दोजहद की। अब से दो साल पहले उन्होंने मैला ढोने का काम बंद कर दिया था। उन्हें अन्त्यावसायी योजना के अन्तर्गत राष्ट्रीयकृत बैंक से वैकल्पिक रोजगार के लिये 20 हजार रूपये का ऋण भी मिला। वह खुश थीं कि अब उनके बच्चों को समाज में सम्मान मिलेगा और वह बेहतर जीवन जी पायेंगी। सुमित्रा बाई ने ऋण राशि से गांव में कपड़े की दुकान खोली परन्तु मुक्ति का वह रास्ता किसी अंधेरी गुफा में जा पहुंचा। तीन माह तक हर रोज सुमित्रा बाई बड़ी उम्मीद के साथ दुकान खोलती पर इस दौरान गांव से कपड़े का एक टुकडा भी किसी व्यक्ति ने उनके यहां से नहीं खरीदा। बात प्रचलित हो गई कि सुमित्रा बाई मसान के कपड़े बेच रही है। आखिरकार उन्हें अपनी दुकान बंद कर देना पड़ी और एक सुखद सपने का शुरूआत से पहले ही अंत हो गया। डेढ़ साल तक फिर भी वह अन्य विकल्पों की तलाश करती रही पर उन्हें निराशा ही हाथ लगी और सुमित्रा बाई को एक बार फिर कच्चे शौचालयों की सफाई के काम की ओर कदम बढ़ाने पड़े। पहले एक प्रशासनिक अधिकारी और अब सामाजिक कार्यकर्ता की हैसियत से इस मुद्दे पर काम कर रहे हर्शमन्दर कहते हैं कि यह सम्मान और गरिमा का सवाल है; कोई आर्थिक मदद या सरकारी योजना इसका जवाब नहीं खोज सकती है। अभी तक हम योजना आधारित पुनर्वास की कोशिशें करते रहे हैं जबकि जरूरत सामाजिक बदलाव की है। इसमें दो तरफा पहल की जरूरत है, एक तो मैला ढोने के काम में लगे लोग इस काम को छोडें और दूसरे स्तर पर समाज उन्हें समानता का दर्जा देते हुए बिना किसी भेदभाव के स्वीकार करें। विगत एक दशक में सरकार 144 करोड़ रूपये खर्च करके भी इन परिवारों को अमानवीय पीड़ा से मुक्ति नहीं दिला पाई है। उनके दावों का अब भी कोई आधार नहीं है, न ही वे अपने काम को जवाबदेय ही मानते हैं।

मध्यप्रदेश में दलित समानता के लिए की गई पहल को दुनिया भर में ख्याति मिली है और राज्य सरकार के उसी दलित एजेण्डे में यह स्पष्ट रूप से दावा किया गया था कि अप्रैल 2003 तक प्रदेश के सभी शौचालयों को जलवाहित शौचालयों में बदलने का काम पूर्ण कर लिया जायेगा परन्तु आज की स्थिति में भी मध्यप्रदेश में 78 हजार से ज्यादा शुष्क शौचालय हैं जिनमें मैला साफ करने में अठारह हजार लोग लगे हुए हैं। राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग के अनुसार भी मध्यप्रदेश के 16 जिलों में अभी व्यापक रूप से यह प्रथा प्रचलन में है। सबसे अहम् बात यह है कि सरकार के स्तर पर किये गये प्रयासों में अभी भी सामाजिक सोच में बदलाव की कोशिशों का पूर्णत: अभाव है और तो और उन्हें व्यवस्था की मदद भी नहीं मिल पा रही हैं। शासन की कल्याणकारी योजना के अनुसार अस्वच्छ पेशों में संलग्न परिवारों के बच्चों को शिक्षा के लिए हर वर्ष साढ़े सात सौ रूपये की छात्रवृत्ति प्रदान की जाती है परन्तु धरातल पर यह योजना विसंगति पूर्ण परिणाम दे रही हैं पन्ना जिले के बिसानी गांव की तीन महिलाओं ने जब यह पेशा छोड़ा तो उन्हें प्रोत्साहन मिलना तो दूर तत्काल उनके बच्चों को मिलने वाली छात्रवृत्तिा बंद कर दी गई। उनमें से एक अनिता वाल्मिकी कहती हैं कि उस छात्रवृत्तिा से कम से कम बच्चों की किताबें और कपड़े तो आ ही जाते थे परन्तु अब तो वह मदद भी बंद हो गई। सरकार मानती है कि मैला ढोने का काम बंद करते ही उन्हें दूसरे अच्छे काम मिल जाते हैं जबकि वास्तविकता यह है कि ऐसा करने से उनके दूसरे विकल्प भी छिन जाते हैं। देवास जिले की बागली तहसील की शांतिबाई कहती हैं कि हमें इस काम के एवज में हर घर से एक बासी रोटी और त्यौंहारों पर पुराने कपड़े मिलते थे। हम तो उनके गुलाम जैसे थे इसलिये काम करवाने वाले हमारी कुछ मदद भी कर देते थे परन्तु जबसे यह काम छोड़ा है तब से हमारा तो जैसे सामाजिक बहिष्कार हो गया है। अब जरूरत पड़ने पर भी जब हम सवर्णों से रोटी या अन्य मदद मांगने जाते हैं तो एक भी परिवार हमारी मदद नहीं करता है। इतना ही नहीं शांति बाई को यह कहकर मजदूरी पर नहीं लगाया गया कि तुम तो मैला ढोने वाले हो तुमसे मजदूरी कैसे होगी देवास के गंधर्वपुरी गांव की मुन्नी बाई से कहा गया कि जिन्होंने तुमसे मैला ढोने का काम छुड़वाया है अब उन्हें से जाकर मदद मांगो। शिक्षा अब एक मौलिक अधिकार है और सरकार 14 वर्ष तक के बच्चों की नि:शुल्क शिक्षा के लिए प्रतिबध्द है। परन्तु हर जिले में सरकारी स्कूल में बच्चों से 30 रूपये प्रतिमाह शुल्क लिया जा रहा है। दलित परिवारों के सामने यह दुविधा की स्थिति है।

सामाजिक संरचना पर वर्गभेद इस कदर हावी है कि व्यापक समाज यह स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है कि वाल्मिकी समाज इस अस्वच्छ पेशे से मुक्त हो। वहीं दूसरी ओर समाज (वाल्मिकी) के भीतर भी भेदभाव चरम स्तर पर है।

मैला ढोने की प्रथा के उन्मूलन में लगे गरिमा अभियान के एक अध्ययन से पता चला है कि जिन 531 परिवारों का उन्होंने सर्वेक्षण मध्यप्रदेश में किया उनमें से 506 परिवारों में यह काम केवल महिलायें ही करती हैं। परम्परा यह है कि महिला विवाह के बाद जब अपने ससुराल पहुंचती है तो तत्काल उसे जागीरदारी में 20-25 घरों के मैला ढोने का काम मिलता है। अध्ययन का यह निष्कर्ष चौंकाने वाला है कि अस्पृश्यता औषण की पीड़ग रहे दलित समुचर्मकार, बरगुण्डा और बैरवा जाति के अस्सी फीसदी लोग यह मानते है कि वाल्मिकी समुदाय को यह करते रहना चाहिए क्योंकि यह उनकी जिम्मेदारी है।

वास्तव में इस व्यवसाय का आर्थिक पहलू का विष्लेषण भी अपने आप में बहुत रोचक है। अब तक यह माना जाता है कि चूंकि वाल्मिकी समाज के परिवारों को इस पेशे से आय होती है और इसी से वे जीवनयापन करते हैं इसलिये ये यह काम नहीं छोड़ना चाहते हैं। परन्तु आकलन से पता चलता है कि एक परिवार से मैला उठाने के एवज में उन्हें 5 से 20 रूपये प्रतिमाह मिलते है। और अधिकतम 25 घरों की सफाई का काम इनके पास रहता है। इस तरह इस गरिमाहीन पेशे से उन्हें प्रतिमाह 125 से 500 रूपये की ही आय होती है और त्यौंहारों या समारोहों के मौके पर उन्हे पुराने कपड़े और मिठाई भी मिल जाती है। टोंक की रेखा बाई कहती हैं कि मैं चार सौ रूपये कमाने के लिए बहुत बड़ी कीमत चुकाती हूं। वाल्मिकी समाज अकल्पनीय छुआछूत को भोगता है। आज भी गांव या कस्बे की चाय की दुकानों पर उनके लिये अलग टूटे बरतन रखे जाते हैं। देवास, पन्ना, होशंगाबाद, शाजापुर, हरदा और मन्दसौर के साढ़े तीन सौ गांवों में वाल्मिकी बलाई एवं चर्मकार समाज के लोगों के बाल नाई नहीं काटते है। आमलाताज बनवाने और बाल कटवाने के ते हैं क्योंलिये एक बार में 65 से 70 रूपये खर्च करने पड़कि इसके लिये हमें 20 रूपये खर्च करके सोनकच्छ जाना पड़ता है, 15 रूपये दाढ़ी-कटिंग के देने होते है। और समय इतना लगता है कि 35 रूपये की मजदूरी चली जाती है।

सरकारी स्तर पर अपरिपक्व नजरिये के कारण कई प्रयास सफल नहीं हो पा रहे हैं। राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी कर्मचारी आयोग के सदस्य गिरिजा शंकर प्रसाद कहते हैं कि केन्द्र सरकार पिछले आठ सालों से लगातार राज्य सरकार को निर्देश दे रही है परन्तु यहां के प्रशासनिक अधिकारी संवेदनशीलता के साथ योजनाओं का क्रियान्वयन नहीं कर रहे हैं और अब तो यह निर्देश भी जारी कर दिये गये है कि किसी जिले में एक भी व्यक्ति इस पेशे में संलग्न पाया जाता है और यदि वहां कानून के अनुसार कार्रवाई नहीं होती है तो जिलाधिकारी को इस कोताही के लिए जिम्मेदार माना जायेगा। परन्तु यह बात भी स्पष्ट है कि केन्द्र सरकार ने अब तक जारी 13 गंभीर आदेशों-दिशा निर्देशों और तीन सम्बन्धित कानूल्यांयास नहीं किये है_ था के उन्मूनों की निगरानी-मूकन के लिए अब तक कार्इे प्र। स्वाभाविक है कि इस प्रलन के प्रयास में क्रियान्वयन की जिम्मेदारी जिला प्रशासन की है परन्तु इस संवेदनशील प्रथा के परिप्रेक्ष्य में बहुत ही असंवेदनशील तरीके से प्रयास हुये हैं। सरकार की अन्त्यावसायी योजना के अन्तर्गत अस्वच्छ कामों में लगी महिलाओं को किसी कला या अन्य कार्य के कौशल विकास के लिये छह माह का प्रशिक्षण दिये जाने का प्रावधान है। इसी के आधार पर होशंगाबाद की सोहागपुर तहसील में 30 महिलाओं को मूर्तिकला का प्रशिक्षण दिया गया। अब तक मैला उठाने वाले हाथ इतनी जल्दी र उन्हानें मांशिक्षण की अवधि और बढ़ा दी जाये परन्तु प्रशासन ने तत्काल यह कला सीख नहीं पाये औग की कि उनके प्रयह कहते हुये इस जरूरत को नजरअंदाज कर दिया कि शासन की योजनाओं मे यह प्रावधान नहीं है। परिणामस्वरूप उन महिलाओं को प्रशिक्षण मिलने के बाद भी उस सरकारी योजना का लाभ नहीं मिल सका। मध्यप्रदेश के पन्ना, देवास सहित 36 जिले दावा कर चुके हैं कि वहां मैला ढोने का काम बंद हो चुका है। जबकि वहां आज भी सत्तार हजार से ज्यादा कच्चे शौचालय मौजूद हैं। देवास के कमलापुर थाने में ही अब भी कच्चा शौंचालय हैं और मध्यप्रदेश के सभी नगरीय निकायों में साफ-सफाई के काम में इसी समुदाय के लोगों को नियुक्त किया जा रहा है। वास्तव में व्यापक समाज के स्तर पर यह मानसिकता स्थापित हो चुकी है कि अस्वच्छता से सम्बन्धित किसी भी काम में इसी समुदाय को जिम्मेदारी दी जानी चाहिये।

गरिमा अभियान ने छह जिलों में अपने सघन प्रयासों से छह सौ महिलाओं को इस पेशे से मुक्त करवाया है परन्तु अब उसके सामने भी यह अनुभव उभरकर सामने आने लगा है कि मैला साफ करने का काम छोड़ने वाली महिला पर यह काम फिर से शुरू करने का दबाव बहुत बढ़ रहा है। उसके अपने आंकड़े भी हैं कि तीस महिलाओं ने फिर से यह काम अपना लिया है। कारण साफ है कि यह पेशे को अपनाने या छोडने का मामला नहीं है बल्कि सामाजिक व्यवस्था के भेदवादी चरित्र को चुनौती देने का मामला हैं।

सचिन कुमार जैन



Vestibule Gaanmitra left the marriage was Hochi was from his mother handed him his estate and the estate was found in 25 houses carry sloppy work. Uncivilized society this kind of practice was not growing trend in society Bdastoor follow such practice is being made clear that human feces from the human being.

This would deal yet made efforts began to establish the belief that if a community is working to carry human feces because of the its biggest economic deprivation rather than social insensitivity and lack of commitment. Sumitra Bai himself out of the profession Ackrwjoah of the Jdhdojahr. Longer than two years ago, he was sloppy transport stopped working. Antyaoasayie them alternative employment under the scheme for the nationalized banks also received a loan of 20 thousand. She was happy now that their children will get respect in society and live a better life Pieangee. Sumitra Bai opened clothing store in the village of the loan amount but the way of salvation reaching a dark cave. Sumitra Bai high expectations three months with the store opens every day on a piece of cloth from the village during which a person also did not buy them here. Become prevalent thing that Sumitra Bai Msana selling clothes. After all they had to close his shop before the beginning of a pleasant dream ended. Half years, yet he continued to seek other options but they drew a blank and Sumitra Bai raw toilets once again have to step to the cleaning work. Before an administrative officer and now as a social worker working on the issue Hershmander say it's a question of respect and dignity; no financial support or government plans may not find the answer. So far we have been planning based rehabilitation efforts is the need for social change. It needs two-way initiative, one of the dirty work involved in transporting people skip the work and the society at another level, giving them the status of equality without discrimination accept. Government spending 144 crore in the last decade the inhuman suffering of these families did not save the bears. Still there is no basis for their claims, nor do they consider their work as Jabdey.

Dalits in Madhya Pradesh for equality initiatives have received worldwide acclaim and state government in the same Dalit agenda that was clearly claimed to April 2003 of the state to convert all toilets toilets Jlwahit work completed But that will be in a position in Madhya Pradesh in which 78 thousand dry toilets to clean muddy Eighteen thousand people are engaged. Sweeper according to the National Commission of the 16 districts in Madhya Pradesh, this practice still widely in vogue. The ego thing is that efforts at the government level were still efforts to change social perception of the completely lacking and so are not getting the help they provided. According to the plan of government welfare families engaged in unclean professions education for children seven and a half rupees every year, the scholarship is provided on the ground but the plan is to give full results discrepancy Bisani village of Panna district when three women encourage them to see it left the profession to their children getting off the Chhatarvrttio immediately discontinued. One of them says Anita Walmiqui Chhatarvrttio that at least children's books and the clothes were coming off but now it also has helped. The Government believes that close working sloppy transport them to find another good job remained the reality is that doing so would threaten their other options are. Tehsil of Dewas district Baglly Shantibai says work against us in every home Tyoanharoan on a stale bread and old clothes were found. We were like their slaves because the work done was give us some help, but also since left the job, such as social exclusion, then so is ours. Now when required even when we are seeking help Swarnoan bread or the other does not help a single family. Not just to the left peace imposed on wages, saying that you're carrying so sloppy you how wages will Dewas Gandharvpure Munni Bai village were asked to carry dirty work, who you have retrieved them now go and ask for help. Education is a fundamental right and the government 14 years now the children free education is committed to. But in every district public school children are being charged 30 rupees per month. Dalit families in front of the dilemma.

Waragahed social structure that dominates the extent of the wider society is not ready to accept the Walmiqui society free from the unclean profession. On the other hand society (Walmiqui) discrimination within the extreme level.

Engaged in the elimination of the practice of carrying muddy dignity campaign is a study of the 531 families of those he surveyed 506 families in Madhya Pradesh in this work as only women do. Tradition that the woman reaches her in-laws after marriage when the immediate task of carrying her Zageeradhari 20-25 homes get sloppy. It is shocking that the study findings are Pergh of untouchability Dalit औhaon Samuchermkar, Bergunda and eight per cent believe that race Bairwa Walmiqui community should do this because it is their responsibility.

In fact the economic aspect of this business Avishaleshon in itself is very interesting. So far it is believed that the income from this profession Walmiqui society are families and that they are living so they do not want to leave this job. But the assessment shows that in return for raising a family sloppy See 5 to 20 rupees per month. And a maximum of 25 work cleaning houses to their lives. The way the profession Gharimahen them Rs 500 to 125 per month as income and Tyoanharoan or events to coincide with them gets old clothes and sweets. Tonk says that I left the line to earn four hundred rupees Chukati am a big price. Walmiqui society indulges the unthinkable untouchability. Today the village or town of tea shops broken dishes are put aside for them. Dewas, emerald, Hoshangabad, Shajapur, Harda and three hundred villages in half of Mandasur Walmiqui Balai and tanners society people do not like the hair is cut. Amalatj construct and haircut are te Kayoanlie Perki spending Rs 65 to 70 at a time for it to go Sonkachch us by spending 20 rupees, 15 rupees beard - have to pay for the cutting. And time so that the wages of 35 rupees goes.

Government level efforts are not successful immature point of view because many are finding. Girija Shankar Prasad sweeper staff member of the National Commission says that the Central Government to direct the state government the past eight consecutive years is the administrative officer here but not with sensitivity to the implementation of plans are now directed to release it Given that a single person in a district is found to engage in this profession and if there is action by law the DM will be responsible for the deficiency. But it is also clear that the Central Government has so far issued 13 serious orders - three related guidelines and monitoring Uanmunoan Kaneulyaanyass was _ not to be - far to Mukane Caree UP Naturally, the responsibility for implementation of the district administration in an effort to Parlne but very insensitive in the context of the sensitive practice to find ways to try. Scheme of the Government Antyaoasayie unclean women engaged in an art work or other work skills development training for the six months given to the provision. Based on this Soahagpur tehsil of Hoshangabad in the 30 women were trained in sculpture. Now hurry up muddy hands bearing period and increased Let R Uanhanean Ommanshikshaon but authorities could not immediately learn the art of AUGE find their Preyah says the government ignored the need for this provision is not in the plans. As a result of getting the training that women could not get the benefit of the government plan. Panna, Madhya Pradesh, Dewas district, including the 36 have claimed that there has been sloppy transport stops working. While there still exist Sattar thousand raw toilet. Kamalapur station Dewas in Madhya Pradesh are still raw Ashoanchaaly clear all urban bodies - the work of cleaning the same community, people are being appointed. In fact the level of the wider society has been established that this mindset Aaswchcht any job-related responsibilities should be allocated in the same community.

Dignity campaign in six districts of intensive efforts to free six hundred women from the profession has done it before, but now that experience is beginning to emerge that the women leave the work to clean up sloppy work on the pressure to resume very moving. Its own statistics that the three women have accepted the job again. Clearly, due to adopt the profession or leaving is not the case but a case challenging the social order are Hedadi character.

Sachin Kumar Jain

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