मंगलवार, 11 अप्रैल 2017

यहाँ देखिये मेघवाल समाज का ऐसा इतिहास जो की आपको सोचने पर मजबूर कर देगा

इतिहास तो बाद की बात हैपहले कुछ ऐतिहासिक सवाल हैं -
मेघों का इतिहास है तो उन्होंने युद्ध भी लड़ा होगाइसके पर्याप्त सबूत हैं कि मेघवंशी या मेघ-भगत योद्धा रहे हैं हालाँकि उनकेअधिकतर इतिहास का लोप कर दिया गया हैनवल वियोगी जैसे इतिहासकारों ने 


 तथ्यों के साथ इतिहास को फिर से लिखाहै और बताया है कि इस देश के प्राचीन शासक नागवंशी थेआपने मेघ ऋषि के बारे में सुना होगा उसे वेदों में 'अहि' यानि'नाग' कहा गया है.

''मेघवंश'


 एक मानव समूह है जो उस कोलारियन ग्रुप से संबंधित है जो मध्य एशिया से ईरान के रास्ते इस क्षेत्र में आया था.इसका रंग गेहुँआ (wheetish) है.

मेघवंशी सत्ता में रहे हैं जिसे 'अंधकार युग' (dark period या dark agesकहा जाता थालेकिन के.पीजायसवालनवल वियोगीएस.एनरॉय-शास्त्री (जिन्होंने मेघ राजाओं के सिक्कों और शिलालेखों का अध्ययन कियाऔर आर.बीलाथम ऐसे इतिहासकार हैं जिनकी खोज ने उस समय का इतिहास खोजाआज इतिहास में कोई 'अंधकार काल' नहीं है.

मेघवंशी रेस ने मेडिटेरेनियन साम्राज्य की स्थापना की थी जो सतलुज और झेलम तक फैला थापर्शियन राज्य की स्थापना के बाद यह समाप्त हो गया और मेदियन साम्राज्य के लोग बिखर गए होंगे इसका अनुमान सहज लगाया जा सकता है.

आर्यों के आने से पहले सप्तसिंधु क्षेत्र में बसे लोग 'मेघ ऋषि' जिसे 'वृत्र' भी कहा जाता है के अनुगामी थे या उसकी प्रजा थे.उसका उल्लेख वेदों में आता हैकाबुल से लेकर दक्षिण में नर्बदा नदी तक उसका आधिपत्य (Suzerainty) थासप्तसिंधु का अर्थ है सात दरिया यानि सिंधसतलुजब्यासराविचिनाबझेलम और यमुनाआर्यों का आगमन ईसा से लगभग 1500 वर्ष पूर्व माना जाता है और मेदियन साम्राज्य ईसा से 600 वर्ष पूर्व अस्तित्व में थाइस दौरान आर्यों के बड़ी संख्या में आने की शुरूआत हुई और इस क्षेत्र में मेघवंशियों के साथ लगभग 500 वर्ष तक चले संघर्ष के बाद आर्य जीत गएयह लड़ाई मुख्यतः दरियाओं के पानी और उपजाऊ जमीन के लिए लड़ी गई.

आर.एलगोत्रा जी ने लिखा है कि 'वैदिक साहित्य के अनुसार मेघ या वृत्र से जुड़े लगभग लाख मेघों की हत्या की गई थी'.धीरे-धीरे आर्यों का वर्चस्व स्थापित होता चला गया जो बुद्ध के बाद पुष्यमित्र शुंग के द्वारा असंख्य बौधों की हत्या तक चला जिसमें बौधधर्म के मेघवंशी प्रचारक भी बड़ी संख्या में शामिल थेकालांतर में ब्राह्मणीकल व्यवस्था स्थापित हुईमनुस्मृति जैसा धार्मिक-राजनीतिक संविधान पुष्यमित्र ने स्मृति भार्गव से लिखवायाजात-पात निर्धारित हुई और मेघवंशियों का बुरा समय शुरू हुआ.

मेघों का प्राचीन इतिहास भारत में कम और पुराने पड़ोसी देशों के इतिहास में अधिक हैयह उनके लिए दिशा संकेत है जो खोजी हैं.

ख़ैरबहुत आगे चल कर आर्य ब्राह्मणों की बनाई हुई जातिप्रथा में शामिल होने से मेघवंश से कई जातियाँ निकलींपंजाब और जम्मू-कश्मीर के मेघ-भगत एक जाति है तथापि मेघवंश से राजस्थान के मेघवाल भी निकले हैं और गुजरात के मेघवार भीकई अन्य जातियाँ भी मेघवंश से निकली हैं जिन्हें आज हम पहचाने से इंकार कर देते हैं लेकिन पहचानने की कोशिशें तेज़ हो रही है.

आपके गोत्र में आपका थोडा-सा इतिहास रहता है और आपका सामाजिक स्तर भी. गोत्र से उन सारी बातों का प्रचार हो जाता हैजो याद दिलाती रहती हैं कि कौन सा वर्ण सबसे ऊँचा है या सबसे ऊँचे से कितना नीचे है.

लोगों को आपने जन्म-मरणविवाह के संस्कारों के समय अपना गोत्र छिपाते हुए देखा होगावे केवल ऋषि गोत्र से काम चलाना चाहते हैंवे जानते हैं कि गोत्र बता कर वे अपनी जाति और अपने सामाजिक स्तर की घोषणा खुद करते हैं जो उन्हें अच्छा नहीं लगतागोत्र की परंपरा का बोलबाला देख कर मेघों ने भी ख़ुद को ब्राह्मणवादी व्यवस्था में मिलाते हुए इस गोत्र व्यवस्था कोअपनायागोत्र-परंपरा ब्राह्मणी परंपरा से ली गई प्रथा है.

आमतौर पर ब्राह्मण परंपरा में गोत्र को रक्त-परंपरा (अपना ख़ूनऔर वंश के अर्थ में लिया जाता हैइसलिए ब्राह्मण हमेशाब्राह्मण ही रहेगामेघवंशी मेघवंशी ही रहेगावह आर्य या ब्राह्मण नहीं बन सकताएक अन्य परंपरा के अनुसार मेघों की पहचान वशिष्टी के नाम से ही की जाती थीइसलिए सारे भारत में मेघ वाशिष्ठीवशिष्टा या वासिका नाम से जाने गएफिरकई भू-भागों में यह वशिष्टा नाम धीरे-धीरे लुप्तप्राय हो गया.

आदिकाल से ही मेघ लोग अपने मूलपुरुष के रूप में मेघ नामधारी महापुरुष को मानते आए हैंयह मूल पुरुष ही उनका गोत्रकर्ता(वंशकर्ताहैइसे सभी मेघवंशी मानते हैं.

मेघों का धर्म
क्या मेघों का अपना कोई पुराना धर्म हैइतिहास खुली नज़र से इसका भी रिकार्ड देखता है. मेघ समुदाय में मेघों के धर्म के विषय पर कुछ कहना टेढ़ी खीर हैजम्मू के एक उत्साही युवा सतीश एक विद्रोही ने इस विषय पर एक चर्चा आयोजित की थी जिसमें बहुत-सी बातें उभर कर आई थींवैसे आज धर्म नितांत व्यक्तिगत चीज़ है.

राजस्थान के बहुत से मेघवंशी अपने एक पूर्वज बाबा रामदेव में आस्था रखते हैंगुजरात के मेघवारों ने अपने पूर्वज मातंग ऋषिऔर ममई देव के बारमतिपंथ को धर्म के रूप में सहेज कर रखा है और उनके अपने मंदिर हैंपाकिस्तान में भी हैंप्रसंगवश मातंग शब्द का अर्थ मेघ ही हैमेघवार अपने सांस्कृतिक त्योहारों में सात मेघों की पूजा करते हैंसंभव है वे सात मेघवंशी राजा रहे होंममैदेव महेश्वरी मेघवारों के पूज्य हैं जो मातंग देव या मातंग ऋषि के वंशज हैंममैदेव का मक़बरा जिस कब्रगाह में है उसे यूनेस्को ने विश्वधरोहर (World Heritage) के रूप में मान्यता दी हैइस प्रकार एक मेघवंशी का निर्वाण स्थल विश्वधरोहर में है.

मेघ कई अन्य धर्मों/पंथों में गए जैसे राधास्वामीनिरंकारीब्राह्मणीकल सनातन धर्मसिखिज़्मआर्यसमाजईसाईयतविभिन्न गुरुओं की गद्दियाँडेरे आदिसच्चाई यह है कि जिसने भी उन्हें 'मानवता और समानताका बोर्ड दिखाया वे उसकी ओर गए.लेकिन उनका सामाजिक स्तर वही रहाधार्मिक दृष्टि से उनकी अलग पहचान और एकता नहीं हो पाईमेघों ने सामूहिक निर्णय कम ही लिए हैं.

लेकिन इस बात का उल्लेख ज़रूरी है कि आर्यसमाज द्वारा मेघों के शुद्धीकरण के बाद मेघों का आत्मविश्वास जागाउनकी राजनीतिक महत्वाकाँक्षा बढ़ी और स्थानीय राजनीति में सक्रियता की उनकी इच्छा को बल मिलावे म्युनिसपैलिटी जैसी संस्थाओं में अपनी नुमाइंदगी की माँग करने लगेइससे आर्यसमाजी परेशान हुए.

मेघों की नई पीढ़ी कबीर की ओर झुकने लगी है ऐसा दिखता है और बुद्धिज़्म को एक विकल्प के रूप में जानने लगी हैयह भी आगे चल कर मेघों के धार्मिक इतिहास में एक प्रवृत्ति (tendencyके तौर पर पहचाना जाएगामेघों में संशयवादी(scepticism) विचारधारा के लोग भी हैं जो ईश्वर-भगवानमंदिरधर्मग्रंथोंधार्मिक प्रतीकों आदि पर सवाल उठाते हैं और उनकी आवश्यकता महसूस नहीं करतेमेघों की देरियाँ भी उनके पूजास्थल हैं जो अधिकतर जम्मू में और दो-तीन पंजाब में हैं.

इधर ''मेघऋषि'' का मिथ धर्म और पूजा पद्धति में प्रवेश पाने के लिए आतुर हैमेघऋषि की कोई स्पष्ट तस्वीर तो नहीं है लेकिन कल्पना की जाती है कि एक जटाधारी भगवा कपड़े पहने ऋषि रहा होगा जो पालथी लगा कर जंगल में तपस्या करता थाइसी पौराणिक इमेज के आधार पर गढ़ाजालंधर में एक मेघ सज्जन सुदागर मल कोमल ने अपने देवी के मंदिर में मेघऋषि की मूर्ति स्थापित की हैराजस्थान में गोपाल डेनवाल ने मेघ भगवान और मेघ ऋषि के मंदिर बनाने का कार्य शुरू किया हैइसके लिए उन्होंने मोहंजो दाड़ो सभ्यता में मिली सिन्धी अज्रुक पहने हुए पुरोहित-नरेश (King Preist) की 2500 .पू.की एक प्रतिमा जो पाकिस्तान के नेशनल म्यूज़ियमकराचीमें रखी है उसकी इमेज या छवि का भी प्रयोग किया है. मेघ भगवान की आरतियाँचालीसास्तुतियाँ तैयार करके CDs बनाई और बाँटी गई हैं.

कमज़ोर आर्थिक-सामाजिक स्थिति की वजह से राजनीति के क्षेत्र में मेघों की सुनवाई लगभग नहीं के बराबर है और सत्ता में भागीदारी बहुत दूर की बात हैएक सकारात्मक बात यह है कि पढ़े-लिखे मेघों ने बड़ी तेज़ी से अपना पुश्तैनी कार्य छोड़ कर अपनी कुशलता कई अन्य कार्यों में दिखाई और उसमें सफल हुएव्यापार के क्षेत्र में इनकी पहचान बने इसकी प्रतीक्षा है.

मेघों के इतिहास के ये कुछ पृष्ठ ख़ाली पड़े हैं.

1. अलैक्ज़ेंडर कन्निंघम ने अपनी खोज में मेघों की स्थिति को सिकंदर के रास्ते में बताया हैहालाँकि राजा पोरस पर कई जातियाँ अपना अधिकार जताती हैंतथापि यह देखने की बात है कि उस समय पोरस की सेना में शामिल योद्धा जातियाँ कौन-कौन थींभूलना नहीं चाहिए कि उस क्षेत्र में मेघ बहुत अधिक संख्या में थे जो योद्धा थेकुछ इतिहासकारों ने बताया है कि पोरस ने ही सिकंदर को हराया था.

2. केरन वाले भगता साध की अगुआई में कई हज़ार मेघों ने मांसाहार छोड़ायह एक तरह का एकतरफा करार थाइस करार की शर्तों और पृष्ठभूमि को देखने की ज़रूरत है.

3. कुछ मेघों ने विश्वयुद्धों मेंपाकिस्तान और चीन के साथ हुए युद्धों में हिस्सा लिया हैवे दुश्मन की सामाओं में घुस कर लड़े हैंउनके बारे में जानकारी नहीं मिलती.

4. दीनानगर की अनीता भगत ने बताया था कि एक मेघ भगत मास्टर नरपत सिंहगाँव बफड़ींतहसील और ज़िला हमीरपुर(हिमाचल प्रदेश), (जीवन काल सन् 1914 से 1992 तक) स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा पा चुके हैं. अनीता ने उनके बारे में जानकारी और फोटोग्राफ इकट्ठे करके भेजे हैंउस वीर को 1972 में प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी ने स्वतंत्रता संग्राम में योगदान के लिए ताम्रपत्र भेंट किया थागाँव की पंचायत ने उनके सम्मान में स्मृति द्वार बनवाया हैएक ऐसा स्वतंत्रता सेनानी जिसके शरीर पर गोलियों के छह निशान थेऐसे लोग शायद और भी मिलेंदेखिएढूँढिए.

5. मेघवंश के लेखकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का रिकार्ड तैयार करने की भी ज़रूरत हैएडवोकेट हंसराज भगतभगत दौलत राम जी के बारे में कुछ जानकारी मिली हैयह सूची अधूरी है.

6. ऐसे ही मेघों के राजनेताओं की जानकारी का संकलन अभी तक नहीं हो पाया है.

जो अब तक कहा गया है उसे अंत में आप मेघों के इतिहास की हेडलाइन्स समझ कर संतोष करें.

मेघ इतने दमन के बावजूद बेदम नहीं हुए बल्कि आज वे पहले से अधिक प्रकाशित हैंअन्य जातियों के साथ मिला कर वे देश की प्रगति में अपना योगदान दे रहे हैंआने वाले समय में इनकी भूमिका बहुत एक्टिव होगी और स्पेस भी अधिक होगापनेपिछले इतिहास को थोड़ा-सा जान लिया हैअब अपने आज को सँवारिए और भविष्य बनाइए जो आपका है.

जय मेघजय भारत.

भारत भूषण भगत
 चंडीगढ़.

सोमवार, 10 अप्रैल 2017

क्या आप जानते हैं कि श्मशान से आने के बाद नहाते क्यों हैं, जानें इसके वैज्ञानिक और धार्मिक कारण को!


शवयात्रा में भाग लेने वाले सभी लोग करते हैं स्नान:
आपने एक और चीज देखी होगी कि जो लोग भी इस शवयात्रा में शामिल होते हैं, सभी स्नान करते हैं। बहुत सारे तो उनमें से ऐसे होते हैं, जिन्हें इसके कारणों के बारे में भी पता नहीं होता है। क्या आप भी उन्ही में से हैं, जिन्हें श्मशान के बाद नहाने की वजह नहीं पता है तो जानिए अंतिम संस्कार के बाद स्नान करने के धार्मिक और वैज्ञानिक कारण क्या हैं।अंतिम संस्कार के बाद स्नान के धार्मिक कारण:श्मशान से आने के बाद नहाने का धार्मिक कारण यह है कि श्मशान एक ऐसी जगह होती है जहाँ पर नकारात्मक शक्तियों का वास होता है। यह कमजोर दिल वाले व्यक्ति पर बहुत जल्द अपना कब्ज़ा कर लेती हैं। आपको बता दें पुरुषों की अपेक्षा महिलायें ज्यादा भावुक और मानसिक रूप से कमजोर होती हैं, इसलिए उन्हें श्मशान जाने की इजाजत नहीं होती है। ऐसा माना जाता है कि अंतिम किया हो जाने के बाद भी मृतआत्मा का सूक्ष्म शरीर कुछ समय तक वहाँ मौजूद रहता है। जो किसी पर भी बुरे प्रभाव डालने की शक्ति रखती है।
 अंतिम संस्कार के बाद स्नान के वैज्ञानिक कारण:अंतिम संस्कार के बाद स्नान करने के पीछे वैज्ञानिक कारण भी है। अंतिम संस्कार से पहले ही शव काफी देर तक बाहर रहता है, इस वजह से वह वातारण के सूक्ष्म और संक्रामक कीटाणुओं से संक्रमित हो जाता है। इसके अलावा मृत व्यक्ति का शव भी संक्रामक रोगों से ग्रसित हो जाता है। जो लोग वहाँ उपस्थित होते हैं, उन्हें भी संक्रमित होने का खतरा होता है। लेकिन जब भी व्यक्ति नहाता है तो, उसके संक्रमण के कीटाणु साफ़ हो जाते हैं। इसलिए अंतिम संस्कार के बाद स्नान करते है ॥ 
यह सब स्नान करने की क्रिया मेघवाल समुदाय के अलावा अन्य समुदायों मे भी है ॥

शनिवार, 8 अप्रैल 2017

सामाजिक जीवन बिताने वाले समाज सेवी भँवर मेघवंशी जी की कलम से


“लग ही नहीं रहा था कि इसी गांव में 14 मई 2016 को छह लोगों की हत्या की गई थी। दुःख और डर की छाया कहीं दिखी तो सिर्फ मेघवाल और गोस्वामी परिवारों के घर। ”:- भँवर मेघवंशी 


खुदमुख्तारी की सजा हिंसा
डांगावास हिंसा के शिकार एक और दलित की मौत
राजस्थान के गांव में दलितों की हत्या, बलात्कार से तनाव
दो महीने पहले 14 मई 2015 को राजस्थान के नागौर जिले के डांगावास गांव में  निर्मम तरीके से पांच दलितों की हत्या की गई थी। जमीन के एक टुकड़े को लेकर दो पक्षों में जंग हुई। सुबह 11बजे गांव की एक अवैध खाप पंचायत ने अमानवीय तरीके से दलित परिवार पर हमला कर दिया था। इस हमले में पांच दलित मारे गए और 11 लोग घायल हो गए थे। यह दलित संहार मानवता की सारी हदों को पार करने वाला था। दलित स्त्रियों के साथ यौन उत्पीड़न किया गया। दलित पुरुषों पर ट्रैक्टर चढ़ा कर उन्हें कुचल दिया गया। इस घटना में गंभीर रूप से घायल दलितों की आंखें तक फोड़ दी गईं
पांचाराम नाम के एक दलित व्यक्ति को गोली मारी गई थी। इसी दिन डांगावास के निवासी रामपाल गोस्वामी की भी सीने पर गोली मारकर हत्या की गई थी। रामपाल की हत्या का दोष दलितों पर मढ़ दिया गया। जिसके बाद दलित समुदाय के लोगों पर हमले किए गए। यही नहीं हमले में गंभीर रूप से घायल लोगों को मेड़तासिटी के अस्पताल ले जाया गया तो वहां पर भी पुलिस की मौजूदगी में उन पर हमला किया गया, लोगों को बुरी तरह पीटा गया। घायलों को ले जा रही एंबुलेंस पर भी हमला और पथराव किया। जिससे वहां भय और आतंक का वातावरण बन गया।

थाने से महज पांच किलोमीटर दूर इस घटना को अंजाम दिया गया। पुलिस को घटनास्थल तक पहुंचती‚ इससे पहले आततायी क्रूरता के खेल को अंजाम देकर लौट चुके थे। इस निर्मम नरसंहार के विरोध की आवाज पूरे राजस्थान में उठी। लोग सड़कों पर उतर आए। मजबूरन राज्य सरकार को इसकी जांच सीबीआई को सौंपनी पड़ी। तब से मेड़तासिटी में दो पुलिस अधीक्षकों सहित तकरीबन 26 लोगों की एक विशेष सीबीआई टीम ने डेरा डाल रखा है।

11 जुलाई 2016 की सुबह मैं फिर से डांगावास पंहुचा‚ यह देखने के लिए कि अब वहां के क्या हालात हैं। शुरुआत में तो गांव का कोई भी आदमी कुछ बोलने को तैयार नहीं था। मेघवाल समुदाय के वे परिवार जिन पर हमला किया गया था, दहशत में थे। लेकिन अन्य समुदायों के लोग सामान्य जीवन यापन करते नजर आए। गांव के चौराहे पर कुछ लोग ताश खेल रहे थे। दुकानें खुली हुई थीं। लग ही नहीं रहा था कि इसी गांव मे छह लोगों की हत्या की गई थी। दुःख और डर की छाया कहीं दिखी तो सिर्फ मेघवाल और गोस्वामी परिवारों के घर। मेघवाल परिवार के लोगों की सुरक्षा के लिए गांव के रामदेव मंदिर के पास एक अस्थाई पुलिस चौकी लगाई गई है, जहां आरएसी के 20 जवान और राजस्थान पुलिस के 15 जवान तैनात किए गए थे। जिन लोगों को दलितों की सुरक्षा में तैनात किया गया है वे सभी गैर जाट हैं। कोशिश की गई कि दलितों की सुरक्षा में दलित पुलिसकर्मी ही तैनात किए जाएं। पुलिस फोर्स का यह जातीय विभाजन एक अलग तरह के खतरे की ओर भी संकेत करता है।

सबसे पहले दलित बस्ती में छात्र नरेंद्र मेघवाल से मुलाकात हुई। सत्रह वर्षीय नरेंद्र गंभीर रूप से घायल हुए खेमाराम मेघवाल का बेटा है। उसके बड़े भाई गणेश राम की इस जनसंहार में मौत हो गई थी। नरेंद्र मेड़तासिटी में था जब उसे फोन पर इस नरसंहार की सूचना मिली थी। अपने दोस्त के साथ मोटर साईकिल पर सवार हो कर घटना स्थल की तरफ भागा। उसने गांव के सैंकड़ों लोगों को हथियारों के साथ जश्न मनाते हुए देखा, उनमें से कई को वह पहचानता भी है। नरेंद्र कहता है कि पुलिस अगर लंबे घुमावदार रास्ते से न आकर सही रास्ते से घटनास्थल तक पहुंचती तो उसे सारे आरोपी सामने मिल जाते लेकिन पुलिस ने जानबूझ कर देरी की और दूसरा रास्ता लिया। घटना को याद करते हुए वह फफककर रोने लगा: चारों तरफ शव बिखरे हुए थे। मेरे बड़े पिताजी रतनाराम की मौत हो चुकी थी। मेरे पापा खेमाराम लहुलुहान पड़े थे, वह होश में थे, मैं जोर-जोर से रोने लगा तो बोले- रो मत,हिम्मत रख। तब तक पुलिसवाले आ गए। नरेंद्र बताता है कि  पुलिस के साथ मिलकर उसने सबको अस्पताल पंहुचाया। इकहरे बदन का यह बच्चा उस दिन सबसे हिम्मतवाला साबित हुआ। नरेंद्र ने बताया कि वह जल्द ही कॉलेज जाना शुरू करेगा। हमले में बुरी तरह घायल हुए खेमाराम से भी मेरी मुलाकात हुई। मैंने जब उनसे कहा कि कहीं आप लोग घबरा कर समझौता तो नहीं कर लेंगे, तमतमाते हुए खेमाराम ने कहा – भले ही मेरी दोनों टांगे कट जाएं या जान ही क्यों ना चली जाए, समझौता करने का सवाल ही नहीं उठता है। खेमाराम अब भी खाट पर ही हैं। उनके एक पांव में स्टील की रॉड लगी हुई है।

उस हमले में घायल सोनकी देवी, बिदामी देवी, जसौदा देवी, भंवरकी देवी और श्रवणराम से भी मुलाकात हुई। वे सभी खुद कुछ भी नहीं कर सकते। सभी को गंभीर चोटें आई हैं। यहां अर्जुन राम भी मिला। जिसके बयान को आधार बना कर पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज की थी। अर्जुनराम का कहना है, मुझे होश ही नहीं था कि वे क्या पूछ रहे थे और मैं क्या जवाब दे रहा था, पुलिस ने अपनी मनमर्जी से कुछ भी लिख लिया और मुझसे दस्तखत करवा लिए।

हालांकि इस घटना के बाद लगभग पूरा थाना निलंबित किया जा चुका है। मामले की जांच पहले सीबीसीआईडी और बाद में सीबीआई को सौंप दी गई।

कथित दलितों की गोली के शिकार हुए रामपाल गोस्वामी की हत्या अब भी यहां एक पहेली है। मृतक रामपाल की विधवा मां कहती है, हमारी तो मेघवालों से कोई लड़ाई ही नहीं है, वे मेरे बेटे को क्यों मारेंगे? दलितों पर दर्ज प्राथमिकी में बतौर गवाह सज्जनपुरी का कहना है कि वह तो उस दिन डांगावास में था ही नहीं। इस मामले में जिन लोगों पर आरोप है उनमें गोविंदराम, बाबूदेवी, सत्तूराम, दिनेश, सुगनाराम, कैलाश, रामकंवरी और नरेंद्र सहित 8 लोग तो घटनास्थल पर मौजूद थे ही नहीं। ये लोग सीधे अस्पताल पहुंचे थे फिर भी हत्या के मुकदमे में आरोपी बना लिए गए।

रामपाल गोस्वामी की हत्या में मुख्य आरोपी बनाये गए गोविंदराम मेघवाल ने बताया कि सीबीआई ने उससे और किशनाराम से नार्को टेस्ट कराने के लिए सहमति पत्र पर हस्ताक्षर करवाए हैं। सीबीआई ने पीड़ित दलितों से भी अलग अलग बयान लिए हैं।

मेघवाल समुदाय के लोग अपने बच्चों की सुरक्षा को लेकर बेहद चिंतित हैं। घटना  में अपने भाई को खोनेवाली पप्पुड़ी देवी ने बेटे को पढ़ने के लिए अजमेर भेज दिया है।

गांव के लोगों से पता चला कि जिस जमीन को लेकर जंग हुई थी, उस जमीन को कुर्क कर दिया गया है। जबकि दोनों पक्षों में समझौते की शर्त में यह भी शामिल था कि दलितों को उनकी जमीन पर अधिकार दिया जाएगा। राज्य सरकार ने दलितों के आक्रोश को शांत करने के लिए जो वादे किए वे पूरे नहीं हुए। मृतकों के आश्रितों को नौकरी देने की कोई प्रक्रिया शुरू नहीं की गई। कुछ घायल ऐसे भी मिले जिन्हें मुआवजा नहीं दिया गया। पीड़ित दलित परिवारों को सिर्फ एक बार रसद विभाग की ओर से खाने पीने के सामान की मदद दी गई। जबकि पीड़ित लोग जब तक चलने फिरने में सक्षम नहीं हो जाते तब तक उन्हें राशन दिया जाना चाहिए। अवैध खाप पंचायत करनेवालों के विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं की गई। सबसे बड़ी चिंता तो डांगावास के पीड़ित दलित परिवारों की सुरक्षा को ले कर है। अभी तो सीबीआई का डेरा वहां है और अस्थाई चौकी भी लगी हुई है लेकिन सुरक्षा के स्थाई बंदोबस्त के लिए यहां एक स्थाई पुलिस चौकी बनायी जानी चाहिए। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक सीबीआई ने अबतक जेल में बंद आरोपियों से ही पूछताछ की है। डांगावास पंचायत क्षेत्र के भूमि संबंधी दस्तावेज भी खंगाले हैं।

कुल मिलाकर सीबीआई जांच जारी है। डांगावास के मेघवाल समुदाय के दलित लोगों के चेहरे पर अब भी भय की छाया देखी जा सकती है। बाकी गांव अपनी दिनचर्या में मगन है।

नवरत्न मन्डुसिया

खोरी गांव के मेघवाल समाज की शानदार पहल

  सीकर खोरी गांव में मेघवाल समाज की सामूहिक बैठक सीकर - (नवरत्न मंडूसिया) ग्राम खोरी डूंगर में आज मेघवाल परिषद सीकर के जिला अध्यक्ष रामचन्द्...