वन्दना
पिपरालिया एम. कोम. की छात्रा बनी राजलिया (नागोर) की
कम उम्र की सरपंच | वन्दना पिपरालिया ने राजलिया (नागोर) में पहुंचकर लोगों को चुनाव जीत जाने की सूचना दी तो लोग खुशी से नाचने लगे। उन्होंने गांव में लड्डू बांटे। इस अवसर पर कार्यकर्ताओं ने मिठाइयां बांटकर खुशी जाहिर वन्दना पिपरालिया
के सरपंच निर्वाचित होते ही राजलिया (नागोर) मे
खुशी की लहर दौड़ी
हमारे उद्देश्य: - मेघवाल समुदाय समृद्ध सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, मानसिक और सांस्कृतिक. मृत्यु भोज, शराब दुरुपयोग, बाल विवाह, बहुविवाह, दहेज, विदेशी शोषण, अत्याचार और समाज और सामाजिक कार्यकर्ताओं पर अपराधों को रोकने के लिए और समाज के कमजोर लोगों का समर्थन की तरह प्रगति में बाधा कार्यों से छुटकारा पाने की कोशिश करेंगे :- नवरत्न मन्डुसिया
शनिवार, 27 जून 2015
शनिवार, 20 जून 2015
समाज , परिवार , (samaj)
व्यावहारिक रुप से समाज शब्द का प्रयोग मानव समूह के लिए किया जाता है । किन्तु वास्तविक रुप से समाज मानव समूह के अन्तर्गत व्यक्तियों के सम्बंधों की व्यवस्था का नाम है । समाज स्वयं एक संघ है संगठन है, औपचारिक सम्बंधों का योग है ।
समाज के प्रमुख स्तम्भ स्त्री और पुरुष हैं । स्त्री और पुरुष का प्रथम सम्बंध पति और पत्नी का है, इनके आपसी संसर्ग से सन्तानोत्पत्ति होती है और परिवार बनता है । परिवार में सदस्यों की वृद्धि होती जाती है और आपसी सम्बंधों का एक लम्बा सिलसिला जारी होता है । मानव बुद्धिजीवी है इसलिए इसे सामाजिक प्राणी कहा गया है । मानवेतर प्राइज़ में इन सम्बंधों के मर्यादा के निर्वाह की वैसी बुद्धि नहीं है जैसी मानव में होती है । परिवार सामाजिक जीवन की सबसे छोटी और महत्वपूर्ण इकाई है ।
प्राचीन ऐतिहासिक अध्ययन से यह ज्ञात होता है कि प्रारंभिक युग का जीवन संयुक्त पारिवारिक प्रणाली पर आधारित था । गॉंव या शहर में कई पैतृक कुटुम्ब बसे रहते थे और उन पैतृक कुटुम्बों के स्वामी ही गॉंव के बड़े एवं मुखिया होते थे । कुटुम्ब का संगठन अनुशासन एवं मर्यादायुक्त होता था । परिवार का मुखिया उसका वयोवृद्ध व्यक्ति हुआ करता था । वही धार्मिक, आर्थिक, सामाजिक मामलों में परिवार का नेतृत्व करता था । मध्य काल तक लगभग परिवार की यही व्यवस्था चलती रही । किन्तु योरोपीय सभ्यता ने जब हमारी संस्कृति पर प्रभाव डाला तो संयुक्त परिवार प्रणाली में बिखराव आने लगा । जहॉं परिवार में कई कई पीढि़यों तक संयुक्त रहने का एक नियम सा बन गया था, वहॉं पाश्चात्य सभ्यता के प्रभाव से परिवार पति-पत्नी तथा अविवाहित बच्चों तक ही सीमित रह गया । वर्तमान युग आते-आते संयुक्त परिवारों की संख्या कम होती गई तथा अब यह प्रणाली समाप्त प्राय ही दृष्टिगत होती है । इस विघटन का मुख्य कारण व्यक्तिवादी विचारधारा का बाहुल्य है । आज का पारिवारिक जीवन भौतिक जीवन की सुख-समृद्धि जुटाने तक ही सीमित रह गया है । जिन आघ्यात्मिक मूल्यों पर यह व्यवस्था आधारित थी उन मूल्यों को हम भूलते जा रहे हैं ।
आदिकाल से ही हमारा समाज पितृ-प्रधान रहा है । यही कारण है कि पैतृक सम्पत्ति के संरक्षण, वंश विस्तार तथा पिता के मरणोपरान्त उसे ऋण से उऋण होने हेतु पुत्र का होना आवश्यक समझा जाने लगा तथा सन्तान का होना भी अत्यावश्यक समझा जाने लगा । यह सामाजिक व्यवस्था एवं मनोवृत्ति आज भी भारतीय जनमानस में विद्यमान है । हॉं वर्तमान में यह अवश्य हुआ है कि बढ़ती हुई जनसंख्या के नियंत्रण हेतु सरकारी कानूनों एवं प्रोजेक्ट के परिणास्वरुप नियोजित परिवार की धारणा बनी है, किन्तु पुत्रहीन होना आज भी किसी को पसंद नहीं है ।
भारतीय संस्कृति में नारी का परम्परागत आदर्श है “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता”। भारतीय संस्कृति इसके जननी, भगिनी, पत्नी तथा पुत्री के पवित्र रुपों को अंगीकार करती है । जिसमें ममता, करुणा, क्षमा, दया, कुलमर्यादा का आचरण तथा परिवार एवं स्वजनों के निमित्त बलिदान की भावना हो, वह भारतीय नारी का आदर्श रुप है । नारी का मातृरुप महत्वपूर्ण आदर्श है- जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरियसी । किन्तु भारतीय संस्कृति की विचारधारा में नारी पतिव्रत-धर्म मातृ रुप से भी अधिक महत्वपूर्ण माना गया है । प्रकृति ने नर और नारी में भिन्नता प्रदान की है और यही कारण है कि उनके कर्म भी अलग-अलग हैं । किन्तु ये दोनों एक दूसरे के पूरक हैं । मनुष्य कठोर परिश्रम करके जीवन-संग्राम में प्रकृति पर यथाशक्ति अधिकारी करके एक शासन चाहता है, जो उसके जीवन का परम लक्ष्य है और कठोर परिश्रम के पश्चात् विश्राम की आवश्यकता होती है तो शीतल विश्राम है स्नेह, सेवा और करुणा की मूर्ति रुपी नारी । नारी के अनेक रुपों में पर का पत्नी रुप से अति निकट का सम्बन्ध है । नर-नारी सम्बन्धों का सुन्दर रुप दाम्पत्य जीवन है । क्योंकि पति-पत्नी एक दूसरे के प्रति आकर्षित होने पर ही प्रजा का सृजन कर सकते हैं और परिवार को सुचारु रुप से चला सकते हैं । आधुनिक युग में भी शिक्षित, जागरुक, चरित्रवान आदर्श सुपत्नी ही आदर्श भारतीय नारी है ।
ऊपर यह स्पष्ट किया गया है कि स्त्री और पुरुष एक दूसरे के पूरक हैं किन्तु आज भी हमारा समाज पितृ-प्रधान ही है । देश के विभिन्न समुदायों तथा वर्गों में स्त्री की सामाजिक स्थिति पुरुष की अपेक्षा निम्न मानी जाती है । यहॉं अभी भी ऐसे रीति-रिवाज, अंधविश्वास और धर्म विधियॉं या कर्म-काण्ड हैं जो स्त्री को नीचा दिखाते हैं और पुरुष को स्त्री से उच्च व बहुत अधिक वांछित साबित करते हैं – जैसे पिता के मरणोपरान्त अंतिम धार्मिक कृत्य बेटा ही करेगा और बेटे के ही करने से पिता स्वर्ग का भागी होगा । हमारे समाज ऐसे रीति-रिवाज तथा प्रवृत्तियॉं प्रचलित हैं, जिसके कारण आज भी स्त्रियों को वह स्थान प्राप्त नहीं है जो वास्तव में होना चाहिए । जैसे- दहेज-प्रथा या लड़की का पराया धन समझना और शादी के बाद माता-पिता का कोई हक न समझना तथा शादी-शुदा स्त्री को जब तक पुत्र न पैदा हो तब तक उसे परिवार में महत्वपूर्ण स्थान न देना आदि । इन्हीं सामाजिक प्रवृत्तियों और दहेज जैसे रिवाजों के परिणामस्वरुप बेटियॉं चेतन व अचेतन रुप में एक बोझ सी मानी जाती हैं, जबकि बेटे एक पूंजी के समान समझे जाते हैं । यद्यपि आजादी के बाद हुए आर्थिक सामाजिक परिवर्तनों तथा अर्न्राष्ट्रीय महिला वर्ष के अन्तर्गत महिलाओं की िस्थति को सुधारने के लिए बनी योजनाओं के माध्यम से महिलाओं की सामाजिक स्थिति में काफी परिवर्तन आया है ।
यद्यपि वर्तमान में पाश्चात्य सभ्यता के प्रभाव, परिवार नियोजन की धारणा तथा व्यक्तिवादी सोच के कारण नारी स्वभाव में कुछ विकृति आई है । पूर्वकाल में जहॉं नारियॉं अपने दूध से दूसरों के बच्चों का पालन-पोषण करना अपना कर्तव्य समझती थीं वहॉं कभी यह सोचा भी नहीं जा सकता था कि ममता, करुणा, स्नेह और दया की देवी कही जाने वाली नारी अपने ही बच्चे को अपना दूध नहीं पिलाएगी । किन्तु वर्तमान में यह स्पष्ट रुप से दृष्टिगत हो रहा है । स्त्रियों द्वारा बच्चों को अपना दूध न पिलाना एक समस्या बन गयी है और इसी प्रकार यह कहना कि नारी सर्पिणी बन जायेगी अपने ही बच्चे की हत्यारिन होगी असंभव था, किन्तु आज बढ़ती हुई भ्रूण हत्या इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है । यद्यपि इसके लिए पुरुष व चिकित्सक भी कम जिम्मेदार नहीं है । भारत सरकार ने कानून बनाकर भ्रूण-हत्या को कानूनी अपराध करार दिया है ।
व्यक्तिवादी सोच एवं फिल्म संसार ने तो वर्तमान में सामाजिक मूल्यों को ताक पर रख दिया है । स्मरणीय है कि कुछ वर्ष पूर्व किसी फिल्म निर्माता पर मुकद्मा चलाया गया । किन्तु आज फिल्मों में ही नहीं बल्कि चौराहों पर लगे पोस्टर में भारतीय नारियों को अर्द्धनग्न ही नहीं बल्कि अति नग्न तस्वीरें देखी जा सकती है । यदि समाज के इस परिवर्तन पर ध्यान न दिया गया इसे नियंत्रित करने का प्रयास न किया गया तो भविष्य में भारतीय नारी का आदर्श क्या होगा, कहना कठिन है ।
दाम्पत्य जीवन का फल संतान उत्पत्ति है । पहले भी लिखा जा चुका है कि नियोजित परिवार की धारणा के बावजूद भी कोई व्यक्ति पुत्रहीन होना पसंद नहीं करता । आज के बच्चे ही कल के स्त्री और पुरुष है । बाल्यावस्था में जो संस्कार बनते हैं वही बड़े होने पर प्रकट होते हैं । मॉं की गोद को बच्चे की पहली पाठशाला कहा गया है । प्राचीन ऐतिहासिक अध्ययनों से पता चलता है कि मॉं अपने बच्चे को लोरियों और कहानियों के माध्यम से वीर गाथायें और सत्पुरुषों की कहानियां सुनाती थी, जिससे उनके अन्दर वीरता एवं सच्चाई के भाव पैदा होते थे और बड़े होकर वीर और सच्चे बालक के रुप में धरा को सुशोभित करते थे । कक्षा-3 की पुस्तक में सच्चा बालक नामक शीर्षक में यह पढ़ा था कि हजरत अब्दुल कादिर जीलानी रहमतुल्लाह अलैहे को उनकी मॉं ने सच्चाई का पाठ पढ़ाया था और यात्रा पर जाते समय यह समझाया था कि बेटा कभी झूठ मत बोलना । मॉं की इस नसीहत का बच्चे अब्दुल कादिर पर इतना गहरा असर था कि रास्ते में डाकुओं द्वारा काफिले का सारा माल लूटे जाने के पश्चात् जब उनसे उनके माल के बारे में पूछा गया तो उन्होंने सदरी में मॉं द्वारा छिपाकर रखी गई चालीस अशर्फियों को निकाल कर दिखा दिया, जबकि डाकू उन अशर्फियों को ढूंढने में असमर्थ थे । यह देखकर डाकुओं के सरदार ने आश्चर्य से पूछा ऐ लड़के । तुमने अपने छिपे हुए माल का पता हमें क्यों बता दिया, जबकि तुमको यह पता है कि हम डाकू हैं । बच्चे ने जवाब दिया कि चलते समय मेरी मॉं ने मुझसे कहा था, बेटा कभी झूठ मत बोलना तो मैं झूठ कैसे बोल सकता हूँ बच्चे की इस सच्चाई का डाकुओं पर ऐसा प्रभाव पड़ा कि उन्होने काफिले का लूटा हुआ सारा माल वापस कर दिया तथा हमेशा के लिए डकैती का परित्याग कर दिया
भारतीय मनीषियों ने मानव जीवन के सम्यक संचालन के लिए मनोवैज्ञानिक आधार पर चार सूत्रीय व्यवस्था की योजना की थी । जिसके अनुसार मानव को 100 वर्ष का मानकर चार स्वाभाविक अवस्थाओं में विभक्त किया गया था, जिसके प्रथम 25 वर्ष (ब्रह्मचर्य आश्रम) विद्या अध्ययन हेतु रखा गया था । बालक परिवार की पाठशाला छोड़ कर गुरु की पाठशाला में प्रवेश करता था । गुरु गाँव अथवा शहर के वातावरण से पृथक जगंल के शुद्ध प्राकृतिक वातावरण में छात्र को विद्या अध्ययन कराते थे और अध्ययनोपरांत छात्र चरित्रवान, सुशील, सहनशील, धैर्यवान एवं आज्ञापालक बनकर अपने घर वापस लौटते थे यधपि शिक्षा का यह रूप बहुत सीमित था । समाज का हर व्यक्ति शिक्षा नहीं ग्रहण कर सकता था आगे चलकर यह व्यवस्था समाप्त हो गयी और वर्तमान में समाज के हर व्यक्ति को समान रूप से शिक्षा ग्रहण करने का अधिकार प्राप्त है।
वर्तमान में परिवार के बाद दूसरी महत्वपूर्ण संस्था विद्यालय है । अधिकांश देशों में प्राथमिक स्तर तक नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा की व्यवस्था की गयी है । चूँकि शिक्षा देश के विकास की प्रक्रिया का एक अभिन्न अंग है । इसलिए इसे उच्च प्राथमिकता दी गयी है । चूंकि शिक्षा देश के विकास की प्रक्रिया का एक अभिन्न अंग है । इसलिए इसे उच्च प्राथमिकता दी गयी है । विद्यालय बालक को देश-विदेश के इतिहास, भाषा, विज्ञान, गणित, कला तथा भूगोल की जानकारी प्रदान करते है । कालेज, विश्वविद्यालय और अन्य संस्थान व्यक्ति को किन्हीं खास विषयों का विशिष्ट ज्ञान प्रदान करते हैं । वे व्यक्ति को इस योग्य बनाते है कि वे अपनी जीविका उपार्जित कर सकें और समाज का एक उपयोगी अंग बन सके । वर्तमान में शिक्षा संस्थाओं की बहुतायत है और इस संस्था में शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्र, छात्राओं की भीड़ है । बालक, बालिकाएं समान रुप से तकनीकी एवं गैर-तकनीकी हर क्षेत्र में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं । किन्तु आज की सह-शिक्षा ने पाश्चात्य देशों की तरह हमारे देश में निरंकुश समाज को जन्म दिया है । जिसके परिणामस्वरुप युवक और युवतियों के आचार-विचार में काफी परिवर्तन आया है । आचरणहीनता, अशिष्टता तथा मर्यादा का निर्वाह न करना आम बात बन गयी है । शिक्षा संस्थाओं और शिक्षकों की बहुतायत होने के बावजूद भी समाज नैतिक पतन की और जा रहा है । इसके पीछे जो कारण प्रतीत होता है वह यह है कि शिक्षा का उद्देश्य लिखने-पढ़ने के योग्य बन जाना और शिक्षा के माध्यम से जीविकोपार्जन का साधन प्राप्त कर लेना है । हमारी आज की शिक्षा में कहीं भी इस बात पर बल नहीं दिया गया है कि शिक्षा के माध्यम से चरित्र का निर्माण हो और मर्यादा का पालन किया जायेगा । आज का एक डाक्टर समाज का शिक्षित और संभ्रांत व्यक्ति है । क्या यह डाक्टर अपने भौतिक सुख के लिए अथवा भौतिक सुख को प्राइज़ करने के लिए अपनी कई पत्नियों, एक के बाद दूसरी को जहर का इंजेक्शन लगाकर मौत के घाट उतार सकता है क्या उच्च शिक्षा प्राप्त उच्च अधिकारी पति-पत्नियों की आपसी आचरणहीनता एक दूसरे को आत्महत्या के लिए मजबूर कर सकती है इस प्रकार की अनेकों खबरें समाचार पत्रों के माध्यम से आज के शिक्षित समाज की प्राप्त होती रहती है । जो आज के शिक्षित समाज के लिए एक अभिशाप है ।
परिवार और शिक्षण संस्थाओं के बाद व्यक्ति के लिए उसका पड़ोस और आस-पास का इलाका सबसे अधिक महत्व रखता है । पड़ोसी अलग-अलग जातीय समुदाय से संबंधित हो सकते है । उनके व्यवसाय धार्मिक विश्वास और रहन-सहन का ढंग भी अलग-अलग हो सकता है, किन्तु पड़ोसी होने के कारण कुछ सम्मिलित जिम्मेदारियां होती है । जैसे पड़ोस में रहने वाले सभी लोगों का कल्याण इस बात में है कि गली-मुहल्ला साफ-सुथरा रहे, सभी लोग यह चाहेगें कि पड़ोस में शान्ति पूर्ण वातावरण रहे, सभी यह चाहेगें कि उनके बच्चे बुरी आदतों का शिकार न बनें और पड़ोस में आमोद-प्रमोद का स्वस्थ्य वातावरण बना रहे । अच्छे पड़ोसी के लिये यह आवश्यक है कि वह पास-पड़ोस को साफ-सुथरा रखें, पड़ोसियों के दु:ख दर्द में शामिल हो, उनकी सुख-सुविधाओं का ध्यान रखें, चोरों और अजनबी लोगों पर नजर रखें, बच्चों को कुसंग से बचायें आदि ।
जैसे-जैसे पारिवारिक पड़ोस में वृद्धि होती जाती है समाजिक क्षेत्र का विस्तार होता चला जाता है । कई परिवारों से गॉंव, कस्बे शहर बनते हैं, तत्पश्चात् देश और सम्पूर्ण विश्व । पड़ोस से तात्पर्य सिर्फ घर से घर ही नहीं बल्कि गॉंव का पड़ोसी गॉंव, शहर का पड़ोसी शहर, देश का पड़ोसी देश इस प्रकार सम्पूर्ण विश्व बनता है । हमारी संस्कृति तो वसुधैव कुटुम्बकम् के भाव से परिपूर्ण है । सम्पूर्ण विश्व को एक परिवार माना गया है और सबके ही सुख और कल्याण की कामना की गयी है ।
सर्वे भवन्तु सुखिन:, सर्वे सन्तु निरामया: ।
सर्वे पश्यन्तु भद्राणि, मा कश्चिद् दु:ख भाग भवेत् ।।
समाज के प्रमुख स्तम्भ स्त्री और पुरुष हैं । स्त्री और पुरुष का प्रथम सम्बंध पति और पत्नी का है, इनके आपसी संसर्ग से सन्तानोत्पत्ति होती है और परिवार बनता है । परिवार में सदस्यों की वृद्धि होती जाती है और आपसी सम्बंधों का एक लम्बा सिलसिला जारी होता है । मानव बुद्धिजीवी है इसलिए इसे सामाजिक प्राणी कहा गया है । मानवेतर प्राइज़ में इन सम्बंधों के मर्यादा के निर्वाह की वैसी बुद्धि नहीं है जैसी मानव में होती है । परिवार सामाजिक जीवन की सबसे छोटी और महत्वपूर्ण इकाई है ।
प्राचीन ऐतिहासिक अध्ययन से यह ज्ञात होता है कि प्रारंभिक युग का जीवन संयुक्त पारिवारिक प्रणाली पर आधारित था । गॉंव या शहर में कई पैतृक कुटुम्ब बसे रहते थे और उन पैतृक कुटुम्बों के स्वामी ही गॉंव के बड़े एवं मुखिया होते थे । कुटुम्ब का संगठन अनुशासन एवं मर्यादायुक्त होता था । परिवार का मुखिया उसका वयोवृद्ध व्यक्ति हुआ करता था । वही धार्मिक, आर्थिक, सामाजिक मामलों में परिवार का नेतृत्व करता था । मध्य काल तक लगभग परिवार की यही व्यवस्था चलती रही । किन्तु योरोपीय सभ्यता ने जब हमारी संस्कृति पर प्रभाव डाला तो संयुक्त परिवार प्रणाली में बिखराव आने लगा । जहॉं परिवार में कई कई पीढि़यों तक संयुक्त रहने का एक नियम सा बन गया था, वहॉं पाश्चात्य सभ्यता के प्रभाव से परिवार पति-पत्नी तथा अविवाहित बच्चों तक ही सीमित रह गया । वर्तमान युग आते-आते संयुक्त परिवारों की संख्या कम होती गई तथा अब यह प्रणाली समाप्त प्राय ही दृष्टिगत होती है । इस विघटन का मुख्य कारण व्यक्तिवादी विचारधारा का बाहुल्य है । आज का पारिवारिक जीवन भौतिक जीवन की सुख-समृद्धि जुटाने तक ही सीमित रह गया है । जिन आघ्यात्मिक मूल्यों पर यह व्यवस्था आधारित थी उन मूल्यों को हम भूलते जा रहे हैं ।
आदिकाल से ही हमारा समाज पितृ-प्रधान रहा है । यही कारण है कि पैतृक सम्पत्ति के संरक्षण, वंश विस्तार तथा पिता के मरणोपरान्त उसे ऋण से उऋण होने हेतु पुत्र का होना आवश्यक समझा जाने लगा तथा सन्तान का होना भी अत्यावश्यक समझा जाने लगा । यह सामाजिक व्यवस्था एवं मनोवृत्ति आज भी भारतीय जनमानस में विद्यमान है । हॉं वर्तमान में यह अवश्य हुआ है कि बढ़ती हुई जनसंख्या के नियंत्रण हेतु सरकारी कानूनों एवं प्रोजेक्ट के परिणास्वरुप नियोजित परिवार की धारणा बनी है, किन्तु पुत्रहीन होना आज भी किसी को पसंद नहीं है ।
भारतीय संस्कृति में नारी का परम्परागत आदर्श है “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता”। भारतीय संस्कृति इसके जननी, भगिनी, पत्नी तथा पुत्री के पवित्र रुपों को अंगीकार करती है । जिसमें ममता, करुणा, क्षमा, दया, कुलमर्यादा का आचरण तथा परिवार एवं स्वजनों के निमित्त बलिदान की भावना हो, वह भारतीय नारी का आदर्श रुप है । नारी का मातृरुप महत्वपूर्ण आदर्श है- जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरियसी । किन्तु भारतीय संस्कृति की विचारधारा में नारी पतिव्रत-धर्म मातृ रुप से भी अधिक महत्वपूर्ण माना गया है । प्रकृति ने नर और नारी में भिन्नता प्रदान की है और यही कारण है कि उनके कर्म भी अलग-अलग हैं । किन्तु ये दोनों एक दूसरे के पूरक हैं । मनुष्य कठोर परिश्रम करके जीवन-संग्राम में प्रकृति पर यथाशक्ति अधिकारी करके एक शासन चाहता है, जो उसके जीवन का परम लक्ष्य है और कठोर परिश्रम के पश्चात् विश्राम की आवश्यकता होती है तो शीतल विश्राम है स्नेह, सेवा और करुणा की मूर्ति रुपी नारी । नारी के अनेक रुपों में पर का पत्नी रुप से अति निकट का सम्बन्ध है । नर-नारी सम्बन्धों का सुन्दर रुप दाम्पत्य जीवन है । क्योंकि पति-पत्नी एक दूसरे के प्रति आकर्षित होने पर ही प्रजा का सृजन कर सकते हैं और परिवार को सुचारु रुप से चला सकते हैं । आधुनिक युग में भी शिक्षित, जागरुक, चरित्रवान आदर्श सुपत्नी ही आदर्श भारतीय नारी है ।
ऊपर यह स्पष्ट किया गया है कि स्त्री और पुरुष एक दूसरे के पूरक हैं किन्तु आज भी हमारा समाज पितृ-प्रधान ही है । देश के विभिन्न समुदायों तथा वर्गों में स्त्री की सामाजिक स्थिति पुरुष की अपेक्षा निम्न मानी जाती है । यहॉं अभी भी ऐसे रीति-रिवाज, अंधविश्वास और धर्म विधियॉं या कर्म-काण्ड हैं जो स्त्री को नीचा दिखाते हैं और पुरुष को स्त्री से उच्च व बहुत अधिक वांछित साबित करते हैं – जैसे पिता के मरणोपरान्त अंतिम धार्मिक कृत्य बेटा ही करेगा और बेटे के ही करने से पिता स्वर्ग का भागी होगा । हमारे समाज ऐसे रीति-रिवाज तथा प्रवृत्तियॉं प्रचलित हैं, जिसके कारण आज भी स्त्रियों को वह स्थान प्राप्त नहीं है जो वास्तव में होना चाहिए । जैसे- दहेज-प्रथा या लड़की का पराया धन समझना और शादी के बाद माता-पिता का कोई हक न समझना तथा शादी-शुदा स्त्री को जब तक पुत्र न पैदा हो तब तक उसे परिवार में महत्वपूर्ण स्थान न देना आदि । इन्हीं सामाजिक प्रवृत्तियों और दहेज जैसे रिवाजों के परिणामस्वरुप बेटियॉं चेतन व अचेतन रुप में एक बोझ सी मानी जाती हैं, जबकि बेटे एक पूंजी के समान समझे जाते हैं । यद्यपि आजादी के बाद हुए आर्थिक सामाजिक परिवर्तनों तथा अर्न्राष्ट्रीय महिला वर्ष के अन्तर्गत महिलाओं की िस्थति को सुधारने के लिए बनी योजनाओं के माध्यम से महिलाओं की सामाजिक स्थिति में काफी परिवर्तन आया है ।
यद्यपि वर्तमान में पाश्चात्य सभ्यता के प्रभाव, परिवार नियोजन की धारणा तथा व्यक्तिवादी सोच के कारण नारी स्वभाव में कुछ विकृति आई है । पूर्वकाल में जहॉं नारियॉं अपने दूध से दूसरों के बच्चों का पालन-पोषण करना अपना कर्तव्य समझती थीं वहॉं कभी यह सोचा भी नहीं जा सकता था कि ममता, करुणा, स्नेह और दया की देवी कही जाने वाली नारी अपने ही बच्चे को अपना दूध नहीं पिलाएगी । किन्तु वर्तमान में यह स्पष्ट रुप से दृष्टिगत हो रहा है । स्त्रियों द्वारा बच्चों को अपना दूध न पिलाना एक समस्या बन गयी है और इसी प्रकार यह कहना कि नारी सर्पिणी बन जायेगी अपने ही बच्चे की हत्यारिन होगी असंभव था, किन्तु आज बढ़ती हुई भ्रूण हत्या इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है । यद्यपि इसके लिए पुरुष व चिकित्सक भी कम जिम्मेदार नहीं है । भारत सरकार ने कानून बनाकर भ्रूण-हत्या को कानूनी अपराध करार दिया है ।
व्यक्तिवादी सोच एवं फिल्म संसार ने तो वर्तमान में सामाजिक मूल्यों को ताक पर रख दिया है । स्मरणीय है कि कुछ वर्ष पूर्व किसी फिल्म निर्माता पर मुकद्मा चलाया गया । किन्तु आज फिल्मों में ही नहीं बल्कि चौराहों पर लगे पोस्टर में भारतीय नारियों को अर्द्धनग्न ही नहीं बल्कि अति नग्न तस्वीरें देखी जा सकती है । यदि समाज के इस परिवर्तन पर ध्यान न दिया गया इसे नियंत्रित करने का प्रयास न किया गया तो भविष्य में भारतीय नारी का आदर्श क्या होगा, कहना कठिन है ।
दाम्पत्य जीवन का फल संतान उत्पत्ति है । पहले भी लिखा जा चुका है कि नियोजित परिवार की धारणा के बावजूद भी कोई व्यक्ति पुत्रहीन होना पसंद नहीं करता । आज के बच्चे ही कल के स्त्री और पुरुष है । बाल्यावस्था में जो संस्कार बनते हैं वही बड़े होने पर प्रकट होते हैं । मॉं की गोद को बच्चे की पहली पाठशाला कहा गया है । प्राचीन ऐतिहासिक अध्ययनों से पता चलता है कि मॉं अपने बच्चे को लोरियों और कहानियों के माध्यम से वीर गाथायें और सत्पुरुषों की कहानियां सुनाती थी, जिससे उनके अन्दर वीरता एवं सच्चाई के भाव पैदा होते थे और बड़े होकर वीर और सच्चे बालक के रुप में धरा को सुशोभित करते थे । कक्षा-3 की पुस्तक में सच्चा बालक नामक शीर्षक में यह पढ़ा था कि हजरत अब्दुल कादिर जीलानी रहमतुल्लाह अलैहे को उनकी मॉं ने सच्चाई का पाठ पढ़ाया था और यात्रा पर जाते समय यह समझाया था कि बेटा कभी झूठ मत बोलना । मॉं की इस नसीहत का बच्चे अब्दुल कादिर पर इतना गहरा असर था कि रास्ते में डाकुओं द्वारा काफिले का सारा माल लूटे जाने के पश्चात् जब उनसे उनके माल के बारे में पूछा गया तो उन्होंने सदरी में मॉं द्वारा छिपाकर रखी गई चालीस अशर्फियों को निकाल कर दिखा दिया, जबकि डाकू उन अशर्फियों को ढूंढने में असमर्थ थे । यह देखकर डाकुओं के सरदार ने आश्चर्य से पूछा ऐ लड़के । तुमने अपने छिपे हुए माल का पता हमें क्यों बता दिया, जबकि तुमको यह पता है कि हम डाकू हैं । बच्चे ने जवाब दिया कि चलते समय मेरी मॉं ने मुझसे कहा था, बेटा कभी झूठ मत बोलना तो मैं झूठ कैसे बोल सकता हूँ बच्चे की इस सच्चाई का डाकुओं पर ऐसा प्रभाव पड़ा कि उन्होने काफिले का लूटा हुआ सारा माल वापस कर दिया तथा हमेशा के लिए डकैती का परित्याग कर दिया
भारतीय मनीषियों ने मानव जीवन के सम्यक संचालन के लिए मनोवैज्ञानिक आधार पर चार सूत्रीय व्यवस्था की योजना की थी । जिसके अनुसार मानव को 100 वर्ष का मानकर चार स्वाभाविक अवस्थाओं में विभक्त किया गया था, जिसके प्रथम 25 वर्ष (ब्रह्मचर्य आश्रम) विद्या अध्ययन हेतु रखा गया था । बालक परिवार की पाठशाला छोड़ कर गुरु की पाठशाला में प्रवेश करता था । गुरु गाँव अथवा शहर के वातावरण से पृथक जगंल के शुद्ध प्राकृतिक वातावरण में छात्र को विद्या अध्ययन कराते थे और अध्ययनोपरांत छात्र चरित्रवान, सुशील, सहनशील, धैर्यवान एवं आज्ञापालक बनकर अपने घर वापस लौटते थे यधपि शिक्षा का यह रूप बहुत सीमित था । समाज का हर व्यक्ति शिक्षा नहीं ग्रहण कर सकता था आगे चलकर यह व्यवस्था समाप्त हो गयी और वर्तमान में समाज के हर व्यक्ति को समान रूप से शिक्षा ग्रहण करने का अधिकार प्राप्त है।
वर्तमान में परिवार के बाद दूसरी महत्वपूर्ण संस्था विद्यालय है । अधिकांश देशों में प्राथमिक स्तर तक नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा की व्यवस्था की गयी है । चूँकि शिक्षा देश के विकास की प्रक्रिया का एक अभिन्न अंग है । इसलिए इसे उच्च प्राथमिकता दी गयी है । चूंकि शिक्षा देश के विकास की प्रक्रिया का एक अभिन्न अंग है । इसलिए इसे उच्च प्राथमिकता दी गयी है । विद्यालय बालक को देश-विदेश के इतिहास, भाषा, विज्ञान, गणित, कला तथा भूगोल की जानकारी प्रदान करते है । कालेज, विश्वविद्यालय और अन्य संस्थान व्यक्ति को किन्हीं खास विषयों का विशिष्ट ज्ञान प्रदान करते हैं । वे व्यक्ति को इस योग्य बनाते है कि वे अपनी जीविका उपार्जित कर सकें और समाज का एक उपयोगी अंग बन सके । वर्तमान में शिक्षा संस्थाओं की बहुतायत है और इस संस्था में शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्र, छात्राओं की भीड़ है । बालक, बालिकाएं समान रुप से तकनीकी एवं गैर-तकनीकी हर क्षेत्र में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं । किन्तु आज की सह-शिक्षा ने पाश्चात्य देशों की तरह हमारे देश में निरंकुश समाज को जन्म दिया है । जिसके परिणामस्वरुप युवक और युवतियों के आचार-विचार में काफी परिवर्तन आया है । आचरणहीनता, अशिष्टता तथा मर्यादा का निर्वाह न करना आम बात बन गयी है । शिक्षा संस्थाओं और शिक्षकों की बहुतायत होने के बावजूद भी समाज नैतिक पतन की और जा रहा है । इसके पीछे जो कारण प्रतीत होता है वह यह है कि शिक्षा का उद्देश्य लिखने-पढ़ने के योग्य बन जाना और शिक्षा के माध्यम से जीविकोपार्जन का साधन प्राप्त कर लेना है । हमारी आज की शिक्षा में कहीं भी इस बात पर बल नहीं दिया गया है कि शिक्षा के माध्यम से चरित्र का निर्माण हो और मर्यादा का पालन किया जायेगा । आज का एक डाक्टर समाज का शिक्षित और संभ्रांत व्यक्ति है । क्या यह डाक्टर अपने भौतिक सुख के लिए अथवा भौतिक सुख को प्राइज़ करने के लिए अपनी कई पत्नियों, एक के बाद दूसरी को जहर का इंजेक्शन लगाकर मौत के घाट उतार सकता है क्या उच्च शिक्षा प्राप्त उच्च अधिकारी पति-पत्नियों की आपसी आचरणहीनता एक दूसरे को आत्महत्या के लिए मजबूर कर सकती है इस प्रकार की अनेकों खबरें समाचार पत्रों के माध्यम से आज के शिक्षित समाज की प्राप्त होती रहती है । जो आज के शिक्षित समाज के लिए एक अभिशाप है ।
परिवार और शिक्षण संस्थाओं के बाद व्यक्ति के लिए उसका पड़ोस और आस-पास का इलाका सबसे अधिक महत्व रखता है । पड़ोसी अलग-अलग जातीय समुदाय से संबंधित हो सकते है । उनके व्यवसाय धार्मिक विश्वास और रहन-सहन का ढंग भी अलग-अलग हो सकता है, किन्तु पड़ोसी होने के कारण कुछ सम्मिलित जिम्मेदारियां होती है । जैसे पड़ोस में रहने वाले सभी लोगों का कल्याण इस बात में है कि गली-मुहल्ला साफ-सुथरा रहे, सभी लोग यह चाहेगें कि पड़ोस में शान्ति पूर्ण वातावरण रहे, सभी यह चाहेगें कि उनके बच्चे बुरी आदतों का शिकार न बनें और पड़ोस में आमोद-प्रमोद का स्वस्थ्य वातावरण बना रहे । अच्छे पड़ोसी के लिये यह आवश्यक है कि वह पास-पड़ोस को साफ-सुथरा रखें, पड़ोसियों के दु:ख दर्द में शामिल हो, उनकी सुख-सुविधाओं का ध्यान रखें, चोरों और अजनबी लोगों पर नजर रखें, बच्चों को कुसंग से बचायें आदि ।
जैसे-जैसे पारिवारिक पड़ोस में वृद्धि होती जाती है समाजिक क्षेत्र का विस्तार होता चला जाता है । कई परिवारों से गॉंव, कस्बे शहर बनते हैं, तत्पश्चात् देश और सम्पूर्ण विश्व । पड़ोस से तात्पर्य सिर्फ घर से घर ही नहीं बल्कि गॉंव का पड़ोसी गॉंव, शहर का पड़ोसी शहर, देश का पड़ोसी देश इस प्रकार सम्पूर्ण विश्व बनता है । हमारी संस्कृति तो वसुधैव कुटुम्बकम् के भाव से परिपूर्ण है । सम्पूर्ण विश्व को एक परिवार माना गया है और सबके ही सुख और कल्याण की कामना की गयी है ।
सर्वे भवन्तु सुखिन:, सर्वे सन्तु निरामया: ।
सर्वे पश्यन्तु भद्राणि, मा कश्चिद् दु:ख भाग भवेत् ।।
नीली बलाई ने खोजी पत्रकारिता का इतिहास बदल दिया
एलिज़ाबेथ जेन कोकरेन उ़र्फ नीली बलाई को जब वर्ष 1887 में पिट्सबर्ग डिस्पैच अख़बार ने एक बार फिर उन्हें थिएटर और आर्ट्स की रिपोर्टिंग का काम सौंपा, तो उन्होंने यह फैसला कर लिया कि अब पिट्सबर्ग डिस्पैच में उनके दिन पूरे हो गए हैं. यहां से निकलने के बाद उन्होंने सीधे आधुनिक पत्रकारिता के पितामह कहे जाने वाले जोसफ पुलित्ज़र के अख़बार द न्यूयॉर्क वर्ल्ड का रुख किया. यह ऐसा क़दम था, जो उन्हें गुमनामी के अंधेरे से निकाल कर पत्रकारिता की शोहरत की बुलंदियों पर पहुंचाने वाला था. द न्यूयॉर्क वर्ल्ड में क़दम रखने के कुछ वर्ष बाद उन्हें अख़बार की तरफ से एक अंडरकवर रिपोर्टिंग की पेशकश की गई.
द न्यूयॉर्क वर्ल्ड अखबार के एडिटर अपने अख़बार के नौजवान और ख़ूबसूरत रिपोर्टर नीली बलाई को एक बहुत ही खतरनाक और दिलचस्प मिशन के लिए तैयार करने की कोशिश कर रहे थे- हम तुम्हें वहां इसलिए नहीं भेज रहे हैं कि वहां जाकर कोई सनसनीखेज़
खुलासा करो. हां, तुम से यह आशा ज़रूर है कि चीज़ों को जिस तरह से देखो, वैसे ही लिख डालो. अगर बुरी हैं, तो बुरी और अच्छी हैं, तो अच्छी. नीली एडिटर की बात सुनकर मुस्कुराई थी. लेकिन तुम्हारी यह मानीखेज मुस्कराहट मुझे डरा रही है. एडिटर की बात सुनकर नीली ने जवाब में सिर्फ इतना कहा था-अब मैं बिल्कुल नहीं मुस्कुराउंगी. वह एडिटर के कमरे से भारी क़दमों से बहार निकल कर उस दिलचस्प और खतरनाक मिशन के लिए खुद को तैयार करने लगीं. हालांकि नीली को खुद पर भरोसा था, लेकिन मिशन के खतरों के मद्देनज़र उन्हें खुद को तैयार करने में काफी समय लग गया. यह मिशन था न्यूयॉर्क स्थित ब्लैकवेल आइलैंड पागलखाने की क्रियाकलापों की वास्तविक हालात को जनता के सामने लाने का. चूंकि यह पागलखाना एक द्वीप पर स्थित था, इसलिए आम लोगों की बात कौन करे, वहां इलाज करवा रहे मरीजों के रिश्तेदारों के लिए भी इस पर नज़र रख पाना नामुमकिन था. इसी वजह से इस काम को द न्यूयॉर्क वर्ल्ड अख़बार ने अपने हाथों में लेकर यहां की कार्यप्रणाली पर एक विस्तृत और वास्तविक रिपोर्ट प्रकाशित करने का फैसला किया. अख़बार के एडिटर के पास इस काम के लिए नीली बलाई से उपयुक्त कोई दूसरा पत्रकार नहीं मिला.
एलिज़ाबेथ जेन कोकरेन उ़र्फ नीली बलाई को जब वर्ष 1887 में पिट्सबर्ग डिस्पैच अख़बार ने एक बार फिर उन्हें थिएटर और आर्ट्स की रिपोर्टिंग का काम सौंपा, तो उन्होंने यह फैसला कर लिया कि अब पिट्सबर्ग डिस्पैच में उनके दिन पूरे हो गए हैं. यहां से निकलने के बाद उन्होंने सीधे आधुनिक पत्रकारिता के पितामह कहे जाने वाले जोसफ पुलित्ज़र के अख़बार द न्यूयॉर्क वर्ल्ड का रुख किया. यह ऐसा क़दम था, जो उन्हें गुमनामी के अंधेरे से निकाल कर पत्रकारिता की शोहरत की बुलंदियों पर पहुंचाने वाला था. द न्यूयॉर्क वर्ल्ड में क़दम रखने के कुछ वर्ष बाद उन्हें अख़बार की तरफ से एक अंडरकवर रिपोर्टिंग की पेशकश की गई. अख़बार के एडिटर नें इस रिपोर्टिंग से जुड़े खतरे को देखते हुए उन्हें इस मिशन पर जाने के लिए मन बनाने का पूरा समय दिया, क्योंकि नीली को ब्लैकवेल आइलैंड पागलखाने में एक पागल के रूप में दाखिल होना था, जिसमें मेडिकल जांच की प्रक्रिया से भी गुजरना शामिल था. काम बहुत ही खतरनाक और नाज़ुक था, क्योंकि एक गलत कदम पूरे मिशन को तहस-नहस कर देता.
जब नीली ने इस काम के लिए खुद को तैयार कर लिए, तब भी उनके मन में कई आशंकाएं थीं, जिन्हें वह दूर करना चाहती थीं. सबसे पहली आशंका यह कि वह पागल खाने कैसे पहुंचेंगीं. अगर पागल बन कर वहां पहुंच गईं, तो उन्हें वहां से निकालने के लिए कौन आएगा, कब आएगा? अख़बार के एडिटर ने उन्हें भरोसा दिलाया कि वह समय रहते उन्हें वहां से निकाल लाएंगे.
नीली ने कई रातों तक पागल दिखने का अभ्यास किया. जब वह खुद से आस्वस्थ हो गईं, तो उन्होंने कामकाजी महिलाओं के बोर्डिंग हाउस के रास्ते ब्लैकवेल आइलैंड पागल खाने में दाखिल होने का फैसला किया. बोर्डिंग हाउस में अपनी पहली ही रात को उन्होंने अपने बिस्तर में जाने से इंकार कर दिया. कहने लगीं कि यहां सभी पागल हैं और उन्हें उन सब से डर लग रहा है. फिर क्या था, दूसरे दिन ही पुलिस आ गई. नीली को अदालत में पेश किया गया. जज इस नतीजे पर पहुंचे कि उन्हें कोई नशीली दवा दी गई है. उसके बाद अदालत के आदेश पर उनकी जांच हुई. जांच के बाद एक के बाद एक कई डॉक्टरों ने उन्हें पागल घोषित कर दिया. मैं इस केस से नाउम्मीद हूं. मेरे हिसाब से मरीज़ को वहां होना चाहिए, जहां उसका पूरा ख्याल रखा जा सके, डॉक्टरों में से एक ने अपनी रिपोर्ट में कहा था. डॉक्टरी जांच में क्या हुआ, नीली को पता नहीं चला, क्योंकि मेडिकल को धोखा देने के लिए उन्होंने कुछ नशीली दवाइयां ले रखी थीं. एक अंजान पागल और रहस्यमयी लड़की का मामला अख़बारों की सुर्ख़ियों में भी छाया रहा, जो हताशापूर्ण लहजे में चीख रही थी-मैं कौन हूं, मुझे मालूम नहीं है. नीली का मकसद पूरा हो चूका था. वह अपने काम में लग चुकी थीं. उन्होंने ब्लैकवेल आइलैंड अस्पताल में देखा कि वहां का खाना घटिया था. पीने का पानी जानवरों के पीने के लिहाज़ से भी गन्दा था. खतरनाक मरीजों को एक साथ रस्सियों में बांध कर रखा गया था. मरीजों को लगातार सख्त सर्दी में बाहर बैठने पर मजबूर किया जा रहा था. अस्पताल में चारों तरफ चूहों का राज था. नहाने का पानी बर्फ बना हुआ था. नर्सें डाइनों की तरह थीं और बिना गाली के बात नहीं करती थीं. नीली लिखतीं हैं-मेरे दांत बज रहे थे. ठंड से मेरी हड्डियां चटक रहीं थीं. पूरे दिन के लिए मुझे तीन बाल्टी बर्फ की तरह ठंडा पानी दिया गया. कुल मिला कर यह जगह इंसानों के लिए नहीं थी.
दस दिन ब्लैकवेल आइलैंड में गुजरने के बाद योजना के मुताबिक नीली को बाहर निकाल लिया गया. वहां से निकलने के बाद उन्होंने यहां गुज़ारे वक़्त की याद पहले उनके अख़बार में छपी. उसके बाद उसे किताबी शक्ल में टेन डेज इन ए मैड-हाउस के नाम से छपा गया. जहां यह रिपोर्ट अस्पताल के डॉक्टरों और स्टाफ को कठघरे में खड़ा किया, वहीं अधिकारियों ने इस उपेक्षित अस्पताल पर ध्यान देना शुरू किया. न्यूयॉर्क की ग्रैंड जूरी ने खुद अपना अलग जांच करवा कर यहां की हालत सुधारने के लिए अपने सुझाव रखे. सरकार ने देश के पागलखानों के लिए फंड में 8.5 लाख डॉलर का इजाफा किया और नीली ने खोजी पत्रकारिता के इतिहास में अपना नाम अमर कर लिया. इसके बाद नीली बलाई को दुनिया घूमने के लिए एक दूसरा असाइनमेंट मिला, जिसके बारे में उन्होंने अराउंड द वर्ल्ड इन एट डेज नामक किताब में लिखी है.
http://www.chauthiduniya.com/2015/04/itihas-badal-diya.html
द न्यूयॉर्क वर्ल्ड अखबार के एडिटर अपने अख़बार के नौजवान और ख़ूबसूरत रिपोर्टर नीली बलाई को एक बहुत ही खतरनाक और दिलचस्प मिशन के लिए तैयार करने की कोशिश कर रहे थे- हम तुम्हें वहां इसलिए नहीं भेज रहे हैं कि वहां जाकर कोई सनसनीखेज़
खुलासा करो. हां, तुम से यह आशा ज़रूर है कि चीज़ों को जिस तरह से देखो, वैसे ही लिख डालो. अगर बुरी हैं, तो बुरी और अच्छी हैं, तो अच्छी. नीली एडिटर की बात सुनकर मुस्कुराई थी. लेकिन तुम्हारी यह मानीखेज मुस्कराहट मुझे डरा रही है. एडिटर की बात सुनकर नीली ने जवाब में सिर्फ इतना कहा था-अब मैं बिल्कुल नहीं मुस्कुराउंगी. वह एडिटर के कमरे से भारी क़दमों से बहार निकल कर उस दिलचस्प और खतरनाक मिशन के लिए खुद को तैयार करने लगीं. हालांकि नीली को खुद पर भरोसा था, लेकिन मिशन के खतरों के मद्देनज़र उन्हें खुद को तैयार करने में काफी समय लग गया. यह मिशन था न्यूयॉर्क स्थित ब्लैकवेल आइलैंड पागलखाने की क्रियाकलापों की वास्तविक हालात को जनता के सामने लाने का. चूंकि यह पागलखाना एक द्वीप पर स्थित था, इसलिए आम लोगों की बात कौन करे, वहां इलाज करवा रहे मरीजों के रिश्तेदारों के लिए भी इस पर नज़र रख पाना नामुमकिन था. इसी वजह से इस काम को द न्यूयॉर्क वर्ल्ड अख़बार ने अपने हाथों में लेकर यहां की कार्यप्रणाली पर एक विस्तृत और वास्तविक रिपोर्ट प्रकाशित करने का फैसला किया. अख़बार के एडिटर के पास इस काम के लिए नीली बलाई से उपयुक्त कोई दूसरा पत्रकार नहीं मिला.
एलिज़ाबेथ जेन कोकरेन उ़र्फ नीली बलाई को जब वर्ष 1887 में पिट्सबर्ग डिस्पैच अख़बार ने एक बार फिर उन्हें थिएटर और आर्ट्स की रिपोर्टिंग का काम सौंपा, तो उन्होंने यह फैसला कर लिया कि अब पिट्सबर्ग डिस्पैच में उनके दिन पूरे हो गए हैं. यहां से निकलने के बाद उन्होंने सीधे आधुनिक पत्रकारिता के पितामह कहे जाने वाले जोसफ पुलित्ज़र के अख़बार द न्यूयॉर्क वर्ल्ड का रुख किया. यह ऐसा क़दम था, जो उन्हें गुमनामी के अंधेरे से निकाल कर पत्रकारिता की शोहरत की बुलंदियों पर पहुंचाने वाला था. द न्यूयॉर्क वर्ल्ड में क़दम रखने के कुछ वर्ष बाद उन्हें अख़बार की तरफ से एक अंडरकवर रिपोर्टिंग की पेशकश की गई. अख़बार के एडिटर नें इस रिपोर्टिंग से जुड़े खतरे को देखते हुए उन्हें इस मिशन पर जाने के लिए मन बनाने का पूरा समय दिया, क्योंकि नीली को ब्लैकवेल आइलैंड पागलखाने में एक पागल के रूप में दाखिल होना था, जिसमें मेडिकल जांच की प्रक्रिया से भी गुजरना शामिल था. काम बहुत ही खतरनाक और नाज़ुक था, क्योंकि एक गलत कदम पूरे मिशन को तहस-नहस कर देता.
जब नीली ने इस काम के लिए खुद को तैयार कर लिए, तब भी उनके मन में कई आशंकाएं थीं, जिन्हें वह दूर करना चाहती थीं. सबसे पहली आशंका यह कि वह पागल खाने कैसे पहुंचेंगीं. अगर पागल बन कर वहां पहुंच गईं, तो उन्हें वहां से निकालने के लिए कौन आएगा, कब आएगा? अख़बार के एडिटर ने उन्हें भरोसा दिलाया कि वह समय रहते उन्हें वहां से निकाल लाएंगे.
नीली ने कई रातों तक पागल दिखने का अभ्यास किया. जब वह खुद से आस्वस्थ हो गईं, तो उन्होंने कामकाजी महिलाओं के बोर्डिंग हाउस के रास्ते ब्लैकवेल आइलैंड पागल खाने में दाखिल होने का फैसला किया. बोर्डिंग हाउस में अपनी पहली ही रात को उन्होंने अपने बिस्तर में जाने से इंकार कर दिया. कहने लगीं कि यहां सभी पागल हैं और उन्हें उन सब से डर लग रहा है. फिर क्या था, दूसरे दिन ही पुलिस आ गई. नीली को अदालत में पेश किया गया. जज इस नतीजे पर पहुंचे कि उन्हें कोई नशीली दवा दी गई है. उसके बाद अदालत के आदेश पर उनकी जांच हुई. जांच के बाद एक के बाद एक कई डॉक्टरों ने उन्हें पागल घोषित कर दिया. मैं इस केस से नाउम्मीद हूं. मेरे हिसाब से मरीज़ को वहां होना चाहिए, जहां उसका पूरा ख्याल रखा जा सके, डॉक्टरों में से एक ने अपनी रिपोर्ट में कहा था. डॉक्टरी जांच में क्या हुआ, नीली को पता नहीं चला, क्योंकि मेडिकल को धोखा देने के लिए उन्होंने कुछ नशीली दवाइयां ले रखी थीं. एक अंजान पागल और रहस्यमयी लड़की का मामला अख़बारों की सुर्ख़ियों में भी छाया रहा, जो हताशापूर्ण लहजे में चीख रही थी-मैं कौन हूं, मुझे मालूम नहीं है. नीली का मकसद पूरा हो चूका था. वह अपने काम में लग चुकी थीं. उन्होंने ब्लैकवेल आइलैंड अस्पताल में देखा कि वहां का खाना घटिया था. पीने का पानी जानवरों के पीने के लिहाज़ से भी गन्दा था. खतरनाक मरीजों को एक साथ रस्सियों में बांध कर रखा गया था. मरीजों को लगातार सख्त सर्दी में बाहर बैठने पर मजबूर किया जा रहा था. अस्पताल में चारों तरफ चूहों का राज था. नहाने का पानी बर्फ बना हुआ था. नर्सें डाइनों की तरह थीं और बिना गाली के बात नहीं करती थीं. नीली लिखतीं हैं-मेरे दांत बज रहे थे. ठंड से मेरी हड्डियां चटक रहीं थीं. पूरे दिन के लिए मुझे तीन बाल्टी बर्फ की तरह ठंडा पानी दिया गया. कुल मिला कर यह जगह इंसानों के लिए नहीं थी.
दस दिन ब्लैकवेल आइलैंड में गुजरने के बाद योजना के मुताबिक नीली को बाहर निकाल लिया गया. वहां से निकलने के बाद उन्होंने यहां गुज़ारे वक़्त की याद पहले उनके अख़बार में छपी. उसके बाद उसे किताबी शक्ल में टेन डेज इन ए मैड-हाउस के नाम से छपा गया. जहां यह रिपोर्ट अस्पताल के डॉक्टरों और स्टाफ को कठघरे में खड़ा किया, वहीं अधिकारियों ने इस उपेक्षित अस्पताल पर ध्यान देना शुरू किया. न्यूयॉर्क की ग्रैंड जूरी ने खुद अपना अलग जांच करवा कर यहां की हालत सुधारने के लिए अपने सुझाव रखे. सरकार ने देश के पागलखानों के लिए फंड में 8.5 लाख डॉलर का इजाफा किया और नीली ने खोजी पत्रकारिता के इतिहास में अपना नाम अमर कर लिया. इसके बाद नीली बलाई को दुनिया घूमने के लिए एक दूसरा असाइनमेंट मिला, जिसके बारे में उन्होंने अराउंड द वर्ल्ड इन एट डेज नामक किताब में लिखी है.
http://www.chauthiduniya.com/2015/04/itihas-badal-diya.html
जोधपुर किले की नींव में दलितों की बलि की दास्तान
राजस्थान में राजा रजवाड़ों के जमाने से तालाबों, किलों, मंदिरों व यज्ञों में ज्योतिषियों की सलाहपर शूद्रों को जीवित गाड़कर या जलाकर बलि देने की परम्परा थी। अमर शहीद राजा राम मेघवाल भी उनमें से एक है। जोधपुर के राजा राव जोधा के शासन काल में जोधपुर की पहाड़ियों पर विशाल मेहरानगढ़ किले का निर्माण हुआ था। इसी गगनचुम्बी भव्य किले की नींव में ज्योतिषी गणपतदत्त की सलाह पर 15मई 1459 को दलित राजाराम मेघवाल उसकी माता केसर व पिता मोहणसी को नींव में चुना गया। राजपूत राजाओं में यह अंधविश्वास चला आ रहा था कि यदि किसी किले की नींव में कोई जीवित पुरूष की बलि दी जाय तो वह किला हमेशा राजा के अधिकार में रहेगा, हमेशा विजयी होगा और राजा का खजाना हमेशा भरा रहेगा। उस काल में सामाजिक व धार्मिक व्यवस्था के अनुसार अछूत की छाया तक से घृणा की जाती थी लेकिन जब नर बलि की बात आती थी तो हमेशा अछूतों को पकड़ कर जिंदा गाड़ा जाता था। शूरवीर कहलाने वाले न क्षत्रिय आगे आते थे, न विद्वान कहलाने वाले पंडित और न ही राजा का गुणगान करने वाले चाटुकार अपनी नरबलि के लिए तैयार होते थे।
राजाराम के इस महान बलिदान को जातिवादी मानसिकता के इतिहासकारों ने सिर्फ डेढ़ लाइन में समेट लिया। जहां राजाराम की बलि दी गई थी उस स्थान के ऊपर विशाल किले का खजाना व नक्कारखाने वाला भाग स्थित है। किले में रोजाना हजारों देशी-विदेशी पर्यटक आते हैं लेकिन उन्हें उस लोमहर्षक घटना के बारे में कुछ भी नहीं बताया जाता है। एक दीवार पर एक छोटा-सा पत्थर जरूर चिपकाया गया है जो किसी पर्यटक को नजर ही नहीं आता है उस पत्थर पर धुंधले अक्षरों में राजाराम की शहादत की तारीख खुदी हुई है। राजाराम मेघवंशी की शहादत जैसी घटनाओं की अनगिनत कहानियां राजस्थान के हर कोने में बिखरी पड़ी हैं। महाराणा प्रताप की सेना में लड़ने वाले दलित आदिवासियों का महान योगदान रहा है। विदेशी आक्रमणकारियों की गुलामी से देश को आजाद कराने में न जाने कितने दलितों आदिवासियों ने कुर्बानी दी लेकिन इतिहास में उनका कहीं भी नामोनिशान नहीं है। दलित चिंतकों, संतों, क्रांतिकारियों व बलिदानियों को इतिहास में पूरी तरह से हाशिए पर रखा। अब दलितों द्वारा अपना गौरवषाली इतिहास लिखा जा रहा है। इसी कड़ी में ''अमर शहीद राजाराम मेघवाल'' नामक पुस्तक उस लोमहर्षक घटना की सच्चाई को सामने लाने वाली है जिसमें राव भाटों की बहियों, शिलालेखों व कई ऐतिहासिक दस्तावेजों को शामिल किया गया है। डा. एल.एल. परिहार द्वारा लिखित पुस्तक जहां एक ओर दलितों में वैचारिक जागृति पैदा करती है वहीं दूसरी ओर राजा, शासक, अमीर या आम व्यक्ति को यह सीख देती है कि धार्मिक कुप्रथाओं, अंधविश्विसों व अमानवीय परम्पराओं के आगे नतमस्तक न हों व अपने विवेक, तर्क व बुद्धि का प्रयोग कर वैज्ञानिक सोच के साथ मानव कल्याण की राह चलें। महा मानव बुद्ध की राह चलें। करुणा,दया, प्रेम, मैत्री व शील का पालन करें। अंधविश्वासों, पाखण्डों, कर्मकांडों व कुप्रथाओं से समाज व देश का भारी नुकसान हुआ है। जिसका सबसे अधिक खामियाजा दलित वंचित वर्ग को भुगतना पड़ा है। इतिहास की यह लघु पुस्तक आवश्यक चित्रों के कारण काफी पठनीय व रोचक बन गई है। मूल्य मात्र 60 रूपये रखा ताकि मजदूर भी खरीदकर पढ़ सके।
समीक्षक-सुनील कुमार
प्रकाशक- बुद्धम पबिलशर्स, 21-।, धर्मपार्क श्यामनगर, जयपुर 302019 मो. 9414242059
राजाराम के इस महान बलिदान को जातिवादी मानसिकता के इतिहासकारों ने सिर्फ डेढ़ लाइन में समेट लिया। जहां राजाराम की बलि दी गई थी उस स्थान के ऊपर विशाल किले का खजाना व नक्कारखाने वाला भाग स्थित है। किले में रोजाना हजारों देशी-विदेशी पर्यटक आते हैं लेकिन उन्हें उस लोमहर्षक घटना के बारे में कुछ भी नहीं बताया जाता है। एक दीवार पर एक छोटा-सा पत्थर जरूर चिपकाया गया है जो किसी पर्यटक को नजर ही नहीं आता है उस पत्थर पर धुंधले अक्षरों में राजाराम की शहादत की तारीख खुदी हुई है। राजाराम मेघवंशी की शहादत जैसी घटनाओं की अनगिनत कहानियां राजस्थान के हर कोने में बिखरी पड़ी हैं। महाराणा प्रताप की सेना में लड़ने वाले दलित आदिवासियों का महान योगदान रहा है। विदेशी आक्रमणकारियों की गुलामी से देश को आजाद कराने में न जाने कितने दलितों आदिवासियों ने कुर्बानी दी लेकिन इतिहास में उनका कहीं भी नामोनिशान नहीं है। दलित चिंतकों, संतों, क्रांतिकारियों व बलिदानियों को इतिहास में पूरी तरह से हाशिए पर रखा। अब दलितों द्वारा अपना गौरवषाली इतिहास लिखा जा रहा है। इसी कड़ी में ''अमर शहीद राजाराम मेघवाल'' नामक पुस्तक उस लोमहर्षक घटना की सच्चाई को सामने लाने वाली है जिसमें राव भाटों की बहियों, शिलालेखों व कई ऐतिहासिक दस्तावेजों को शामिल किया गया है। डा. एल.एल. परिहार द्वारा लिखित पुस्तक जहां एक ओर दलितों में वैचारिक जागृति पैदा करती है वहीं दूसरी ओर राजा, शासक, अमीर या आम व्यक्ति को यह सीख देती है कि धार्मिक कुप्रथाओं, अंधविश्विसों व अमानवीय परम्पराओं के आगे नतमस्तक न हों व अपने विवेक, तर्क व बुद्धि का प्रयोग कर वैज्ञानिक सोच के साथ मानव कल्याण की राह चलें। महा मानव बुद्ध की राह चलें। करुणा,दया, प्रेम, मैत्री व शील का पालन करें। अंधविश्वासों, पाखण्डों, कर्मकांडों व कुप्रथाओं से समाज व देश का भारी नुकसान हुआ है। जिसका सबसे अधिक खामियाजा दलित वंचित वर्ग को भुगतना पड़ा है। इतिहास की यह लघु पुस्तक आवश्यक चित्रों के कारण काफी पठनीय व रोचक बन गई है। मूल्य मात्र 60 रूपये रखा ताकि मजदूर भी खरीदकर पढ़ सके।
समीक्षक-सुनील कुमार
प्रकाशक- बुद्धम पबिलशर्स, 21-।, धर्मपार्क श्यामनगर, जयपुर 302019 मो. 9414242059
वसुधंरा राजे ने सराहीं हेमलता मेघवाल की कृति
मेघवाल समाज भले ही सदीयों से दबा-कुचला रहा हो। लेकिन जैसे ही इस समाज को आगे आने का मौका मिला तो फिर यह पिछे नहीं हटा। प्रशासन,सरकारी सेवा,राजनीति,आईटी,उद्योग हो या फिर कला का क्षेत्र। चित्रकला के क्षेत्र में तो कई मूर्धन्य कलाकार अपने समाज नाम रोशन कर रहे हैं। इसी तरह से पिछले दिनों पाली जिले की एक बालिका की चित्रकृति ने समूचा मेघवाल समाज का नाम गौरवान्वित कर दिया। यह कृति तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुधंरा राजे को इतनी भायी कि उन्होंने खुद एक पत्र लिखकर उसकी तारीफ की। यह बालिका हैं कुमारी हेमलता। इस छात्रा ने पिछली 2 सितम्बर 2008 को राज्य स्तरीय चित्रकला प्रतियोगिता में हिस्सा लिया था। उसकी चित्रकृति लाजवाब थी। इससे प्रभावित होकर मुख्यमंत्री राजे ने इस होनहार बालिका को पत्र लिखकर मुक्तकंठ से सराहना की। इस कृति को आर्ट एट दी सचिवालय में प्रकाशित किया गया। इतना ही नही इस कृति को शासन सचिवालय भवन में सुशोभित किया गया। जिले को यह सम्मान दिलाने के उपलक्ष में जिला कलेक्टर करणसिंह राठौड़ ने भी इस बालिका को सम्मानित किया। वर्तमान में पाली रह रही यह बालिका मूलत: देसूरी तहसील के गजनीपुरा ग्राम की निवासी हैं। पिता लक्ष्मणलाल परिहार क्रेन सर्विस एवं इंजीनियरिंग वक्र्स का व्यवसाय करते हैं। पिता व माता श्रीमती पूनम बालिका को चित्रकला के लिए प्रोत्साहित करते रहे हैं। इसी का परिणाम हैं कि उसने अपनी कला का लोहा प्रदेश में मनवा लिया। इस बालिका पर समूचे समाज को गर्व हैं।
सिद्धपुरूष थे शिवदान जी महाराज Shivdan ji Meghwal
राजस्थान की धरती ने मेघवाल समाज के साधु-संतो के त्याग एवं बलिदान की इबारतें लिखी हैं। जनहित में जब भी आवश्यकता पड़ी। यह समाज के लोगों ने अपना सर्वस्व न्यौछावर करने में कभी नहीं हिचकिचाया। बदले में किसी साम्राज्य की कामना नहीं की। इस समाज के लोगों ने ‘सर्वे भवन्तु सुखिन सर्वे संतु निरामया‘ श्लोक के भावार्थ को अपने जीवन में उतारने का सफल प्रयास किया।
फिर चाहे वे बाबा रामदेव से पहले समाधि लेने की जिद करने वाली ड़ालीबाई हो,चाहे रानी रूपा दे ंके गुरू धारूजी मेघ हो, चाहे देशनोक में करणीमाता के साथ समाधि लेने वाला दशरथ मेघवाल,ढ़ालोप के रघुनाथपीर हो,चाहे,कोट सोलंकियान के हरचंदपीर,चाहे अणसीबाई हो और चाहे सेसली की पद्दीबाई हो। इन सभी ने लोककल्याणार्थ अपनी योगशक्ति एवं भक्ति के बल पर जीवित समाधि ली। यहीं नहीं मेहरानगढ़ की नीवं में जीवित समाने वाले राजाराम,पुष्कर झील में जल उत्पति के लिए नरबलि देने वाले महाचंद,उदयपुर की पिछोला झील में पानी के ठहराव के लिए सपत्निक नरबलि देने वाले मन्नाजी जैसे कितने ही अनगिनत नाम हैं,जिन्होंने अपने बलिदान के बदले अपने वंशजों के लिए किसी राज्य की कामना नहीं की। केवल सोचा तो यहीं कि सभी का कल्याण हो।
ऐसे ही एक संत गोड़वाड़ के मादा ग्राम में पैदा हुए। जिनका नाम आज भी अतीत के पन्नों में खोया हुआ हैं। दलित वग की मेघवाल जाति में जन्मे इस सिद्धपुरूष संत का नाम था शिवदान जी परिहार। ‘मेघवाल समाज का गौरवशाली इतिहास’ पुस्तक के लेखक ड़ॉ. एम.एल. परिहार पृष्ठ 196 पर लिखते हैं कि ‘इन्होंने संवत 2017 अथवा सन् 1960 में जीवित समाधि ली। इनकी समाधि पर लगे स्मारक,स्वास्तिक,चांद-सूरज के प्रतिक उकेरे हुए हैं। इन्होंने समाधि लेने के एक सप्ताह पूर्व ही समाधि स्थान खोदकर घोषणा की थी।’ इन्होंने अपनी शिष्या सेसली की पद््दीबाई के समाधि लेने के सात साल बाद समाधि ली थी।
समाधिस्थ शिवदानजी महाराज का आश्रम सादड़ी-सिदंरली सड़क मार्ग पर मादा ग्राम के निकट अवस्थित हैं। आधा बीघा आश्रम में विशाल वट वृक्ष की घनी छाया में काला-गौरा भैरू की प्रतिमा स्थापित हैं। इनके छोटे भाई हकारामजी भी सिद्धपुरूष थे।
उनके शिष्यों में सादड़ी की हरू मॉं,सिन्दरली के भगाजी,पदीबाई सेसली,सादड़ी के भेराजी खटीक,काला टूक घाणेराव के संतोषगिरीजी,खुड़ाला-फालना के नथा महाराज,मेवाड़ के ग्वार गोद के दलाराम मेघवाल एवं केलवाड़ा के नन्दराम मेघवाल प्रमुख थे।
आज भी शिवदानजी के समाधिस्थल पर नियमित पूजा-अर्चना का आयोजन होता हैं और समाधि दिवस पर भजन-सत्संग का आयोजन होता हैं। इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालुगण पहूॅंचते है और उनके परिजन एवं वंशजों के साथ विशेष पूजा अर्चना में भाग लेकर मनौतियॉं करते हैं। इस समय उनके प्रप्रौत्र गोपाराम मेघवाल मादा ग्राम पंचायत के सरपंच हैं। (लेखक -कपूरचंद बाफना स्वतंत्र पत्रकार हैं और मेघवाल समाज का गौरव बढ़ाने वाले विषयों पर लिखते हैं
फिर चाहे वे बाबा रामदेव से पहले समाधि लेने की जिद करने वाली ड़ालीबाई हो,चाहे रानी रूपा दे ंके गुरू धारूजी मेघ हो, चाहे देशनोक में करणीमाता के साथ समाधि लेने वाला दशरथ मेघवाल,ढ़ालोप के रघुनाथपीर हो,चाहे,कोट सोलंकियान के हरचंदपीर,चाहे अणसीबाई हो और चाहे सेसली की पद्दीबाई हो। इन सभी ने लोककल्याणार्थ अपनी योगशक्ति एवं भक्ति के बल पर जीवित समाधि ली। यहीं नहीं मेहरानगढ़ की नीवं में जीवित समाने वाले राजाराम,पुष्कर झील में जल उत्पति के लिए नरबलि देने वाले महाचंद,उदयपुर की पिछोला झील में पानी के ठहराव के लिए सपत्निक नरबलि देने वाले मन्नाजी जैसे कितने ही अनगिनत नाम हैं,जिन्होंने अपने बलिदान के बदले अपने वंशजों के लिए किसी राज्य की कामना नहीं की। केवल सोचा तो यहीं कि सभी का कल्याण हो।
ऐसे ही एक संत गोड़वाड़ के मादा ग्राम में पैदा हुए। जिनका नाम आज भी अतीत के पन्नों में खोया हुआ हैं। दलित वग की मेघवाल जाति में जन्मे इस सिद्धपुरूष संत का नाम था शिवदान जी परिहार। ‘मेघवाल समाज का गौरवशाली इतिहास’ पुस्तक के लेखक ड़ॉ. एम.एल. परिहार पृष्ठ 196 पर लिखते हैं कि ‘इन्होंने संवत 2017 अथवा सन् 1960 में जीवित समाधि ली। इनकी समाधि पर लगे स्मारक,स्वास्तिक,चांद-सूरज के प्रतिक उकेरे हुए हैं। इन्होंने समाधि लेने के एक सप्ताह पूर्व ही समाधि स्थान खोदकर घोषणा की थी।’ इन्होंने अपनी शिष्या सेसली की पद््दीबाई के समाधि लेने के सात साल बाद समाधि ली थी।
समाधिस्थ शिवदानजी महाराज का आश्रम सादड़ी-सिदंरली सड़क मार्ग पर मादा ग्राम के निकट अवस्थित हैं। आधा बीघा आश्रम में विशाल वट वृक्ष की घनी छाया में काला-गौरा भैरू की प्रतिमा स्थापित हैं। इनके छोटे भाई हकारामजी भी सिद्धपुरूष थे।
उनके शिष्यों में सादड़ी की हरू मॉं,सिन्दरली के भगाजी,पदीबाई सेसली,सादड़ी के भेराजी खटीक,काला टूक घाणेराव के संतोषगिरीजी,खुड़ाला-फालना के नथा महाराज,मेवाड़ के ग्वार गोद के दलाराम मेघवाल एवं केलवाड़ा के नन्दराम मेघवाल प्रमुख थे।
आज भी शिवदानजी के समाधिस्थल पर नियमित पूजा-अर्चना का आयोजन होता हैं और समाधि दिवस पर भजन-सत्संग का आयोजन होता हैं। इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालुगण पहूॅंचते है और उनके परिजन एवं वंशजों के साथ विशेष पूजा अर्चना में भाग लेकर मनौतियॉं करते हैं। इस समय उनके प्रप्रौत्र गोपाराम मेघवाल मादा ग्राम पंचायत के सरपंच हैं। (लेखक -कपूरचंद बाफना स्वतंत्र पत्रकार हैं और मेघवाल समाज का गौरव बढ़ाने वाले विषयों पर लिखते हैं
सायर मेघ Sayar meghwal sayar megh sayar jaipal
मेघ सायर सुत्त रामदे , ज्यारी महिमा भारी ।
अजमल जी ने भेट कियो सुत्त , सायर ने बलिहारी ।।
मेघरिखो सॅग अजमल जी रा , भाग जागिया भारी ।
दुनिया जाणे रामदेव जी , अजमल घर अवतारी ।।
अजमल जी ने भेट कियो सुत्त , सायर ने बलिहारी ।।
मेघरिखो सॅग अजमल जी रा , भाग जागिया भारी ।
दुनिया जाणे रामदेव जी , अजमल घर अवतारी ।।
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