हमारे उद्देश्य: - मेघवाल समुदाय समृद्ध सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, मानसिक और सांस्कृतिक. मृत्यु भोज, शराब दुरुपयोग, बाल विवाह, बहुविवाह, दहेज, विदेशी शोषण, अत्याचार और समाज और सामाजिक कार्यकर्ताओं पर अपराधों को रोकने के लिए और समाज के कमजोर लोगों का समर्थन की तरह प्रगति में बाधा कार्यों से छुटकारा पाने की कोशिश करेंगे :- नवरत्न मन्डुसिया
गुरुवार, 7 जुलाई 2011
मेघ सेना राजस्थान (भारत ) megh sena rajasthan (india)
भारत में कई सामाजिक और धार्मिक सेनाएँ बनी हैं. इन्हीं में एक नाम और जुड़ा है ‘मेघ सेना’ का. मेघवाल समाज का संगठन रजिस्टर्ड है और इसकी उपविधि भी है. मेघ सेना इसी की एक इकाई है. 07-02-2009 को राजस्थान में मेघ सेना का गठन हुआ. इसके लिए मेघवाल समाज की एक बैठक की गई जिसमें प्रदेश कार्यकारिणी और ज़िला केंद्र बनाए गए. इसी बैठक में मेघ सेना का ड्रेस कोड और वर्दी निर्धारित की गई. 04-07-2009 को प्रदेश कार्यकारिणी की प्रथम बैठक हुई जिसमें सभी ज़िलों के मेघ सैनिक आमंत्रित किए गए. तारीख़ 31-10-2009 को जयपुर में मेघ सेना का प्रथम फ्लैग मार्च किया गया. फ्लैग मार्च के बाद एक बैठक की गई जिसमें यह संकल्प पास किया गया कि विभिन्न नामों से जानी जाने वाली सभी मेघवंशी जातियों का आपसी संपर्क बढ़ाया जाए और उन्हें एक सूत्र में बाँधा जाए.
इसी सिलसिले में दिनाँक 01-11-2009 को राष्ट्रीय सर्वमेघवंश महासभा का गठन किया गया. इसमें भारत के विभिन्न राज्यों से आए प्रतिनिधियों ने भाग लिया. यह बैठक होटल इंडियाना क्लासिक, जयपुर में की गई. इसमें तय किया गया कि मेघवंशी जातियों के विभिन्न संगठनों को एक मंच पर लाने का कार्य शीघ्र निष्पादित किया जाए. कार्यकारिणी बनाई गई. प्रदेश अध्यक्षों के चयन का निर्णय लिया गया. संकल्प पास किया गया कि मेघवंश समाज की विभिन्न जातियों के संगठनों से संपर्क बढ़ा कर उन्हें राष्ट्रीय मेघवंश मंच से जोड़ा जाए और साथ ही मेघ सेना को राष्ट्रीय स्तर पर संगठित किया जाए.
इसी दिन महिला विंग का गठन किया गया जिसकी अध्यक्षा श्रीमती प्रमिला कुमार (हाईकोर्ट की रिटायर्ड जज और कंज़्यूमर स्टेट फोरम की चेयरपर्सन) हैं. यूथ विंग भी गठित किया गया और श्री नरेंद्र पाल मेघवाल को इसके अध्यक्ष बनाया गया.
21-03-2010 को राष्ट्रीय सर्वमेघवंश महासभा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक हुई जिसमें एक फिल्म के निर्माण का फैसला लिया गया ताकि मेघवंशीय संगठनों में एकता की प्रक्रिया तेज़ की जा सके. इसकी पटकथा और गीत लिखे जा चुके हैं. निर्माण की कार्रवाई चल रही है.
दिनाँक 04-07-2010 को कार्यकारिणी और प्रदेशाध्यक्षों की बैठक हुई. तय हुआ कि प्रत्येक प्रांत में सम्मेलन आयोजित किए जाएँ. उक्त योजना के तहत नवंबर और दिसंबर 2010 में पंजाब, राजस्थान (श्रीगंगानगर), हरियाणा (हिसार) और मध्य प्रदेश में उज्जैन या मंदसौर में सम्मेलन आयोजित किए जाएँगे.
विशेष टिप्पणी: भारत में कई सेनाओं का गठन हुआ है. कुछ ने सामाजिक कार्य किया और कुछ हिंसात्मक गतिविधियों का पर्याय बन गईं और कुछ राजनीतिक पार्टियों का महत्वपूर्ण अंग बनीं. मेघ सेना अभी स्वरूप ले रही है. इसकी भूमिका का मूल्यांकन अभी कुछ वर्ष बाद ही हो पाएगा. जहाँ तक मेघवाल समाज का प्रश्न है मेरी जानकारी में है कि इस समाज के लोगों को बारात के मौके पर घोड़ी या कार का प्रयोग नहीं करने दिया जाता. यह गाँवों में होता है. दूल्हे को घोड़ी से उतार कर पीटने या बारात पर पत्थर फेंकने की कई घटनाएँ रपोर्ट हो चुकी हैं. मीडिया ऐसा करने वालों को ‘दबंग’ जैसे शब्दों से महिमा मंडित करने का कार्य अनजाने में कर डालता है. शिक्षित वर्ग इस विषय में एक मत होगा कि किसी की बारात पर पत्थर फेंकना वास्तव में संवेदनहीन और अनपढ़ लोगों का कार्य होता है.
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In India there are many social and religious forces. And connected in such a name is "Cloud Army's. Meghwal social organization and its by-law is registered. That cloud is a unit of force. 07-02-2009 Iranian forces in the cloud was formed. It was a meeting of the State Executive Meghwal community and district centers. At the meeting, Cloud military dress code and uniform set. 04-07-2009 The first meeting of the State Executive of the cloud in which all military districts were invited. Cloud Army flag march in Jaipur on 31-10-2009 date was the first.
Date 01-11-2009 Srwmegvansh National Assembly in this respect was formed. It was attended by delegates from various states of India. The meeting hotel Indiana Classic in Jaipur, the. It was decided that the Megvanshi nations work to bring together different organizations to be executed soon. Executive made. State has decided the selection of presidents.
Women's Wing was formed the same day the chairperson Pramila Kumar (Retired High Court Judge and State Consumer Forum chairperson) are. Mr. Narendra Pal Meghwal youth wing has also been constituted and it was made president.
21-03-2010 Srwmegvansh national council meeting of the National Executive has decided to build a film so as to expedite the process of integration in Megvanshiy organizations. The script and songs have been written. Construction of the action is ongoing.
Meeting of the Executive and Pradeshadhykshon Date 04-07-2010. Was decided to be held in each province. Under the plan, November and December 2010 in Punjab, Rajasthan (Sriganganagar), Haryana (Hisar) or Mandsaur and Ujjain in Madhya Pradesh will be held in the conference.
Special Note: In India, several forces have been formed. Some social work and became synonymous with violence and became a vital part of some political parties. Cloud Army is now taking shape. Its role will be assessed only after a few years.It is in villages. Beat down from the mare or the groom to throw stones at the procession, there have been several incidents Rport. Those media that the "dominant" to glorify the work of such words and puts them into unknowingly.
शनिवार, 2 जुलाई 2011
Megvansh history (Gokuldasji Swami Maharaj, Gribdas Ji Maharaj
भारतवर्ष के सभ्यता इतिहास में पुरातन सभ्यताऐं सिन्धु घाटी, मोहनजोदडो जैसी सम्पन्न सभ्यताओं के पुरातन प्राप्त अवशेषों एवं भारत के कई प्राचीन ऋषि ग्रंथों में मेघवाल समाज की उत्पत्ति एवं उन्नति की जानकारीयां मिली हैं. साथ ही समाज के प्रात: स्मरणीय स्वामी गोकुलदास जी द्वारा सदग्रंथों से प्राप्त जानकारी के आधार पर भी समाज के सृजनहार ऋषि मेघ का विवरण ज्ञात हुआ है. मेघवाल इतिहास गौरवशाली ऋषि परम्पराओं वाला तथा शासकीय स्वरूप वाला रहा है. मेघऋषि का इतिहास भारत के उत्तर-पश्चिमी भूभाग की सरसब्ज सिन्धुघाटी सभ्यता के शासक एवं धर्म संस्थापक के रूप में रहा है जो प्राचीनकाल में वस्त्र उद्दोग, कांस्यकला तथा स्थापत्यकला का विकसित केन्द्र रहा था. संसार में सभ्यता के सूत्रधार स्वरूप वस्त्र निर्माण की शुरू आत भगवान मेघ की प्रेरणा से स्वयं भगवान शिव द्वारा ऋषि मेघ के जरिये कपास का बिजारोपण करवाकर कपास की खेती विकसित करवाई गयी थी. जो समस्त विश्व की सभ्यताओं के विकास का आधार बना. समस्त उत्तर-पश्चिमी भूभाग पर मेघऋषि के अनुयायियों एवं वंशजों का साम्राज्य था. जिसमें लोगों का प्रजातांत्रिक तरीके से विकास हुआ था जहां पर मानवमात्र एकसमान था. लेकिन भारत में कई विदेशी कबीले आये जिनमें आर्य भी एक थे, उन्होंने अपनी चतुराई एवं बाहुबल से इन बसे हुये लोगों को खंडित कर दिया तथा उन लोगों क|
सम्पूर्ण भारत में बिखर जाने लिये विवस कर दिया. चूंकि आर्य समुदाय शासक के रूप में एवं सभी संसाधनों के स्वामी के रूप में यहां स्थापित हो चुके थे उन्होंने अपने वर्णाश्रम एवं ब्राह्मणी संस्कृति को यहां थोप दिया था. ऐसी हालत में उनसे हारे हुये मेघऋषि के वंशजों को आर्यों द्वारा नीचा दर्जा दिया गया. जिसमें आज के वर्तमान के सभी आदिवासी, दलित एवं पिछडे लोग शामिल थेभारत में स्थापित आर्य सभ्यता वालों ने यहां पर अपने अनुकुल धर्म, परमपरायें एवं नियम, रिवाज आदि कायम कर दिये थे जिनमें श्रम सम्बन्धि कठिन काम पूर्व में बसे हुये लोगों पर थोपकर उनसे निम्नता का व्यवहार किया जाना शुरू कर दिया था तथा उन्हें पुराने काल के राक्षस, नाग, असुर, अनार्य, दैत्य आदि कहकर उनकी छवि को खराब किया गया. इन समूहों के राजाओं के धर्म को अधर्म कहा गया था. इस प्रकार इतिहास के अंशों को देखकर मेघऋषि के वंशजों को अपना गौरवशाली अतीत पर गौरवान्वित होना चाहिये तथा वर्तमान व्यवस्था में ब्राह्मणवादी संस्कृति के थोपी हुई मान्यताओं को नकारते हुये कलियुग में भगवान रामदेव एवं बाबा साहेब भीमराव आम्बेडकर के बताये आदर्शों पर अमल करते हुये अपने अधिकार प्राप्त करने चाहिये. समाज में मेघवंश को सबल बनाने के लिये स्वामी गोकुलदासजी महाराज, गरीबदास जी महाराज जैसे संत हुये हैं जिन्होंने मेघवाल समाज के गौरव को भारत के प्राचीन ग्रंथों से समाज की उत्पत्ति एवं विकास का स्वरूप उजागर कर हमें हमारा गौरवशाली अतीत बताया है. तथा हमें निम्नता एवं कुरीतियों का त्याग कर सत कर्मों की ओर बड़ने का मार्ग दिखाया है. मेघवंश इतिहास :- मेघजाति की उत्पत्ति एवं निकास की खोज स्वामी गोकुलदासजी महाराज डूमाडा (अजमेर) ने अपनी खोज एवं लेखन के जरिये मेघवाल समाज की सेवा में प्रस्तुत की है जो इस प्रकार है; सृष्टि के आदि में श्रीनारायण के नाभिकमल से ब्रह्मा, ब्रह्मा ने सृष्टि रचाने की इच्छा से सनक, सनन्दन, सनातन, सन्तकुमार इन चार ऋषियों को उत्पन्न किया लेकिन ये चारों नैष्टिक ब्रह्मचारी रहे फिर ब्रह्मा ने दस मानसी पुत्रों को उत्पन्न किया. मरीचि, अत्रि अंगिरा, पुलस्त्व, पुलह, क्रतु, भृगु, वशिष्ट, दक्ष, और नारद. ब्रह्मा ने अपने शरीर के दो खण्ड करके दाहिने भाग से स्वायम्भुव मनु (पुरूष) और बाम भाग से स्तरूपा (स्त्री) को उत्पन्न करके मैथुनी सृष्टि आरम्भ की. स्वायम्भु मनु स्तरुपा से 2 पुत्र - उत्तानपाद और प्रियव्रत तथा 3 कन्याऐं आकुति, प्रसूति, देवहूति उत्पन्न हुई. स्वायम्भु मनु की पुत्री आकुति का विवाह रूचिनाम ऋषि से, प्रसूति का दक्ष प्रजापति से और देवहुति का कर्दम ऋषि से कर दिया. कर्दम ऋषि के कपिल मुनि पैदा हुये जिन्होंने सांख्य शास्त्र बनाया. कर्दम ऋषि के 9 कन्याऐं हुई जिनका विवाह: कला का मरीचि से, अनुसूया का अत्रि से, श्रद्धा का अंगिरा ऋषि से, हवि का पुलस्त्य ऋषि से, गति का पुलह से, योग का क्रतु से, ख्याति का भृगु से, अरुन्धति का वशिष्ट से और शांति का अर्थवन से कर दिया. ब्रह्माजी के पुत्र वशिष्ट ऋषि की अरुन्धति नामक स्त्री से मेघ, शक्ति आदि 100 पुत्र उत्पन्न हुये. इस प्रकार ब्रह्माजी के पौत्र मेघ ऋषि से मेघवंश चला. वशिष्ट ऋषि का वंश सूर्यवंश माना जाता है. ब्रह्माजी के जिन दस मानसी पुत्रों का वर्णन पीछे किया गया है उन ऋषियों से उन्हीं के नामानुसार गौत्र चालू हुये जो अब तक चले आ रहे हैं. ब्रह्माजी के ये पुत्र, पौत्र और प्रपौत्र ही गुण कर्मानुसार चारों वर्णों में विभाजित हुये| श्रीमदभागवत में एक कथा आती है कि मान्धाता के वंश में त्रिशंकु नामक एक राजा हुये, वह सदेह स्वर्ग जाने के लिये यज्ञ की इच्छा करके महर्षि वशिष्ट के पास गये और इस प्रकार यज्ञ करने के लिये कहा. वशिष्टजी ने यह कहकर इन्कार कर दिया कि मुझे ऐसा यज्ञ कराना नहीं आता. यह सुनकर वह वशिष्टजी के 100 पुत्रों के पास जाकर उनसे यज्ञ करने को कहा. तब उन्होंने उस राजा त्रिशंकु को श्राप दिया कि तू हमारे गुरू का वचन झूंठा समझकर हमारे पास आया है इसलिये तू चांडाल हो जायेगा, वह चांडाल हो गया. फिर वह ऋषि विश्वामित्र के पास गया, विश्वामित्र ने उसकी चांडाल हालत देखकर कहा कि हे राजा तेरी यह दशा कैसे हुई. त्रिशंक ने अपना सारा वृतान्त कह सुनाया. विश्वामित्र उसका यह वृतान्त सुनकर अत्यन्त क्रोधित हुये और उसका वह यज्ञ कराने की स्वीकृति दे दी विश्वामित्र ने राजा त्रिशंकु के यज्ञ में समस्त ब्राह्मणों को आमंत्रण किया मगर वशिष्ट ऋषि और उनके 100 पुत्र यज्ञ में सम्मिलित नहीं हुये. इस पर विश्वामित्र ने उनको श्राप दिया कि तुम शूद्रत्व को प्राप्त हो जावो. उनके श्राप से वशिष्ट ऋषि की सन्तान मेघ आदि 100 पुत्र शूद्रत्व को प्राप्त हो गये|
शुक्रवार, 1 जुलाई 2011
लोक संचार को जीवंत रखे हैं संत कामड
उदयपुर, लोकजीवन में कई जातियां हजारों वर्षों से अपना अस्तित्व बनाए हुए हैं। उनमें कामड संत एक जाति के रूप में राजस्थान और मध्यप्रदेश जैसे प्रांतों में लोक में धर्म शिक्षण के साथ-साथ अध्यात्म की भावधारा का प्रसार कर रही है और यह क्रम ऐतिहासिक तौर पर पिछले एक हजार वर्षों से प्रमाणित हैं। इनकी एक धारा तेराताली लोकनृत्य के कारण पूरे विश्व में पहचान लिए हुए है।
उक्त विचार लोककलाविद् डॉ. महेंद्र भानावत ने मंगलवार को यहां संप्रति संस्थान की ओर से आयोजित डॉ. चंपालाल कामड के शोधग्रन्थ ‘कामड संत-समुदाय’ के लोकार्पण अवसर पर व्यक्ति किए। उन्होंने कहा कि आज भी लोकसाहित्य अध्ययन की दृष्टि से उपेक्षित ही अधिक है, इस पर शीघ्र और स्तरीय कार्य होना चाहिए अन्यथा यह शीघ्र ही लुप्त हो जाएगा और इसके प्रमाण तक नहीं मिलेंगे। कामड संत समुदाय का अध्ययन समग्र समुदाय का शोध अध्ययन है और इसकी हर विधा पर गंभीर शोध हुआ है, यह बधाई योग्य कार्य है।
बीएसएनएल में वेलफेयर एसोसिएशन के जिला सचिव ओमप्रकाश आर्य ने कहा कि हमें नई पीढी को लोक साहित्य और लोक परंपराओं के बचाने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। हीरालाल बलाई ने लोक साहित्य को जन-जन का साहित्य बताया और राजस्थान को इस दृष्टि से समृद्ध कहा।
इस अवसर पर रचनाकार डॉ. चंपादास कामड ने ग्रंथ के प्रणयन के उद्देश्यों पर प्रकाश डाला और कहा कि आज कितना ही दूरसंचार का दौर हो किंतु यह समुदाय लोक संचार माध्यमों से न केवल जुडा है बल्कि उनको आज तक जीवंत भी बनाए हुए है। यह अध्ययन मेवाड के उन सैकडों गांवों में बसे कामड लोगों पर आधारित है जो कला के धारक हैं और शैव, शाक्त, वैष्णवी परंपराओं सहित निर्गुणी परंपराओं के पोषक है। आज कामडों की परंपरा लुप्त होने को है और उसे बचाया जाना अति आवश्यक है। साहित्यसेवी राजेंद्र पानेरी ने पुस्तक के प्रकाशन उद्देश्यों की जानकारी दी। संचालन डॉ. श्रीकृष्ण ‘जुगनू’ ने किया। धन्यवाद संप्रति के महासचिव डॉ. तुक्तक भानावत ने ज्ञापित किया।
Udaipur, Lokjivn many species have survived for thousands of years.They Teratali a stream of folk around the world have been identified.
Dr. Mahendra Banawat Lokklavid the idea present here on Tuesday organized by the Institute of Dr. Chanpalal Kamd Sodgranth 'Kamd Saint - Community "on the occasion of the release that person.Saint Kamd research community and its study of the overall community is serious research on every genre, this work deserves congratulations.
BSNL district secretary of the Welfare Association Om Prakash Arya said that the new generation of folk literature and folk traditions should be encouraged to save. Hiralal Balai folklore of the public - the public literature and Rajasthan, said the rich.
Hundreds of them settled in villages of Mewar Kamd This study is based on people who are holders of Arts and Shaiva, Shakta, Vaishnavi Nirguni traditions, including traditions, is nutritious. Kamdon today the tradition is disappearing and there must be saved. The objectives of the publication of the book Sahitysevi Rajendra Paneri. Operations Dr. Krishna 'Firefly' did. Currently the Secretary General gave vote of thanks to Dr. limerick Banawat.
लोक कलाकारों ने समा बांधा
नई दिल्ली, पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र, उदयपुर एवं बाल भवन बोर्ड, दीव के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित पहला तटीय पर्व “बीच फेस्टीवल“ का दीव में समापन हुआ।
29 से 31 अक्टूबर तक चले इस उत्सव को दीव के मुक्ताकाशी रंगमंच की दीर्घा में बैठे दर्शकों ने एक ओर क्षितिज को छूते समुद्र के दर्शन किए वहीं भारत की सांस्कृतिक विरासत की गहराई, विविधता एवं व्यापकता के दर्शन किए। बीच फेस्टीवल की परिकल्पना बाल भवन बोर्ड, दीव के निदेशक प्रेमजीत बारिया ने की थी। मंच परिकल्पना एवं प्रस्तुति पश्चिम क्षेत्रा सांस्कृतिक केन्द्र, उदयपुर के कार्यक्रम अधिकारी विलास जानवे ने की थी।
“बीच फेस्टीवल“ में उदयपुर (राजस्थान) के “तेरा ताल“ दर्शनीय नृत्य ने खासा प्रभाव छोडा। “तेरा ताल“ कामड समुदाय की महिलाओं द्वारा बाबा रामदेव की आराधना में किए जाने वाले इस विशेष नृत्य को बैठकर किया जाता है। चौतारे की धुन और बाबा रामसा पीर के भजनों पर ढोलक की ताल पर महिलाएं अपने शरीर पर बांधे हुए १३ मंजिरों को बारी-बारी से दक्षतापूर्वक बजाते हुए अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करती हैं। गोगुंदा-उदयपुर से आई निर्मला कामड के दल ने तेरा ताल नृत्य पर वाहवाही लूटी।
कार्यक्रम में जामनगर-गुजरात से आए जे.सी. जाडेजा के दल ने लास्य से भरपूर “मिश्ररास“ प्रस्तुत किया, जिसमें हर बाला अपने आपको गोपी तथा हर युवा अपने आपको कृष्ण का सखा समझता है। इसी दल ने बाद मेंडांडिया-रास भी प्रस्तुत कर दर्शकों में ऊर्जा का संचार किया। गोवा से आए महेन्द्र गावकर के दल की महिला कलाकारों ने अपने सिर पर पीतल की समई (प्रज्जवलित दीप स्तंभ) को संतुलित करते हुए नयनाभिराम सामुहिक नृत्य का प्रदर्शन किया। इसी दल ने गोवा के प्रसिद्ध नृत्य “देखणी“ से दर्शकों को रोमांचित कर दिया। हिन्दी और पाश्चात्य संस्कृति के सुरीले संगम को बताने वाले इस नृत्य के मधुर गीत को दर्शक बाद में भी गुनगुनाते देखे गए। भारत के पूर्वी तट बंगाल की खाडी पर बसे पुरी से आए बाल नर्तकों ने “गोटीपुआ“ नृत्य में अपनी विलक्षण प्रतिभा का प्रदर्शन किया। चंद्रशेखर गोटीपुआ कलासंसद के गुरू सत्यप्रिय पलई के निर्देशन में इन बाल कलाकारों ने प्रथम प्रस्तुति“दशावतार“ में भगवान विष्णु के दस अवतारों को शारीरिक एवं चेहरे के उत्कृष्ट भावों द्वारा दर्शकों को खासा प्रभावित किया। इन्हीं बच्चों ने “बंधा नृत्य“ द्वारा सामुहिक योगाभ्यास से ओतप्रोत विभिन्न मुद्राओं और कठिनतम शारीरिक भंगिमाओं से दर्शक समुदाय को हतप्रभ कर दिया। असम के कामरूप जिले से आए युवा कलाकारों ने जयदेव डेका के निर्देशन में असम का सदाबहार नृत्य “बिहू“ प्रस्तुत कर दर्शकों को साथ में झूमने के लिए मजबूर कर दिया। नव वर्ष के अवसर पर किये जाने वाले इस पारंपरिक नृत्य में युवकों ने जहां ढोल, पेंपां, गगना और ताल के साथ झूमते हुए प्रेमगीत गाए वहीं युवतियों ने अपने लास्यपूर्ण नृत्य से प्रकृति और पुरूष के प्रेम को बखूबी से प्रदर्शित किया।
बाल भवन बोर्ड, दीव के अधीनस्थ बाल भवन केन्द्र, वणांकबारा के बच्चों ने “जहां डाल-डाल पर सोने की चिडया....“ गीत पर समूह नृत्य प्रस्तुत किया वहीं बाल भवन केन्द्र, घोघला के बच्चों ने “जय हो“ गीत पर समूह नृत्य प्रस्तुत कर दर्शकों की प्रशंसा बटोरी।
कार्यक्रम का महत्वपूर्ण पक्ष “संस्कृति संगम“ रहा, जिसमें असम और गुजरात के मिश्रित ढोल वादन पर न केवल सभी कलाकारों ने बल्कि दर्शकों ने भी झूमकर नृत्य किया। समूचे मंच पर रंग-बिरंगे परिधानों में नाचते हुए कलाकारों ने अनेकता में एकता की परिकल्पना को सार्थक रूप दिया और हर दर्शक को अपनी भारतीय संस्कृति पर गर्व करने का अवसर दिया। इस कार्यक्रम को देखने हेतु दीव के नागरिकों के अलावा भारी संख्या में देशी और विदेशी पर्यटक भी पधारे थे। प्रारंभिक उद्घोषणा दीव की श्रीमती प्रतिभा स्मार्ट ने की।
भारत के पश्चिम तट से जुडे संघीय क्षेत्रा दीव की ऐतिहासिक भूमि, आई.एन.एस. खुकरी स्मारक स्थल के इस भाग को चक्रतीर्थ भी कहते हैं। लोकमान्यता के अनुसार भगवान विष्णु ने जिस सुदर्शन चक्र से जलंधर राक्षस का संहार किया था, वह चक्र यहीं रखा गया था और इसी कारण इस क्षेत्रा का नाम पडा “चक्रतीर्थ“।
गुरुवार, 30 जून 2011
मेघवाल samaj ko aage bhadhao mere pyare megh samaj ke logo kyo ki aaj ke yug me meghwal samaj ka naam bhahut aage aa rha h is liye pure bharat or pakisthan me rah rhe megh bhagat samaj aadi ko meghwal samaj me yogdan dena chahiye jise hamara samaj pure bharat me aage bhade
आज हमारे समाज मे कई अनिश्चता और कई खामिया फ़ैली हुई है ?आज जब हम पूरे भारत मे हर जगह बसे हूऐ है पर हमारी गिनती न के बराबर है क्यूंकि हमारे समाज मैं एकता की कमी है जिसे हम चाह कर भी पुरी नही कर सकते ,आज कई जगहों पर हमे एकत्रित करने की पहल की जा रही है ? पर एन कोसिसो मैं हमारा फायदा हमारी समाज के नेता और उनके सहकार ही पुरा फायदा ले जा रहे है ?वे हमारे नासम्जभाइयो और न पढे लिखे बुजुर्गो को अपनी समक्ष खडे रख दुसरे गाओ ओर उनके वासियों को फायदा ले रहे है जब की हमे सही मायने मैएक हो हमारी जाती की प्रगति के बारे मैं सोचना चाहिए और हमे मिलने वाले सभी अधिकारों को पाने की पहल करनी चाहिए ?
मै गुजरात का रहने व्हाला हूँ मेरापुरा नाम हरेश शिवलाल मेघवाल है मेरे पिताश्री पछले ७० वर्ष से यहाँ बसे हुऐ है वेसे तो हमारा पुरा परिवार यही बसा हुआ है पर हम अपनी खुसिया मनाने अक्सर अपने गाव मारवाड़ जक्सन जाया करते है ,हमारी ही तरह यहाँ बसे कई हमारे जातिवासी अपने गाव आया करते है ?उनके इसी तरह जाने आने की वजह से हमारी नतो यहाँ कुछ पहचान है औरनही न ही वहा ? मेरी पिताश्री के सामान उनके हम उम्र के सभी लोगो को तो यहाँ सरकारी नोकरी का होदा प्राप्त है पर हमारी जाती यहाँ मान्य न हो ने के कारन हमारी आने वाली पीढी का कोई भविष्य नही है हम जहाँ रह रहे है यहाँ मेरी गिनती के अनुसार मेघवाल २५०० के आसपास और अन्य राजस्थानी भाई जिनमे ठाकुर,रेगर,राजपूत,चोहान ,चोधरीऔर भी कई जातिया सायद २५००० के आसपास रहती है ?
हमे एक करने के लिए हाल ही कुछ दिनों मैं हमारे यहाँ एक विशाल समेलन किया जा रहा है ?जिसमे सभी जातियों को एक कियाजा रहा है , दिनाक २५:१०:२००९ को सेहर गांधीधाम ( कच्छ )
आप से अनुरोध है आप हमें सहियोग दे?
मेघवंशी भाइयो, उठो और समय को पहचान कर आगे बढ़ो (Megvanshi brothers, wake up and recognize the Proceed)
आर.पी.सिंह आई.पी.एस.
73, अरविंद नगर, सी.बी.आई. कॉलोनी, जगतपुरा, जयपुर.
भारत का संविधान 26 जनवरी, 1950 को लागू हुआ. संविधान लागू होने के तुरन्त बाद सभी को समानता का अधिकार, स्वतंत्रता का अधिकार, शोषण के विरुद्ध अत्याचारों से मुक्ति पाने का अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार, शिक्षा व संस्कृति का अधिकार, संवैधानिक उपचारों का अधिकार मिला. लेकिन संविधान लागू होने के 57 वर्ष बाद भी दलित समाज अपमानित, उपेक्षित और घृणित जीवन जीने पर मजबूर है. इसका कारण दूसरों पर नहीं थोपकर हम अपने अन्दर ही झांक कर देखें कि हम अपमानित, उपेक्षित और घृणित क्यों हैं? हम दूसरों में सौ बुराई देखते हैं. दूसरों की ओर अंगुली उठाते हैं, लेकिन हमें याद रखना चाहिए कि हमारी ओर भी तीन अंगुलियां उठी रहती हैं. दूसरों में बुराई ढूँढने से पहले अपने अंदर की बुराई देखें. कबीर की पंक्तियाँ याद रखकर अपने अंदर झांकें:-
बुरा, जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय,
जब दिल ढूंढा आपणा, मुझ से बुरा न कोय।
मन को उन्नत करो, हीन विचारों का त्याग करो.
मेरे विचार से यह सब इसलिए कि हम दब्बू हैं, स्वाभिमानी नहीं हैं. हम यह मानने भी लगे हैं कि वास्तव में अक्षम हैं. हमारा मन मरा हुआ है. हमारे अन्दर आत्मसम्मान व आत्मविश्वास की कमी है. किसी को आप बार-बार बुद्धु कहो तो वह वास्तव में बुद्धु जैसा दिखने लगता है. हमें भी ऐसा ही निरीह, कमजोर बनाया गया है और हम अपने को निरीह, कमजोर समझने लगे हैं. जबकि वास्तव में हम नहीं हैं. जब हमारे उपर कोई हाथ उठाता है, थप्पड़ मार मारता है तो हम केवल यही कहते हैं - अब की मार. दबी हुई, मरी हुई आत्मा, हुंकार तो मारती है, लेकिन मारने वाले का हाथ नहीं पकड़ती. मैं हिंसा में विश्वास नहीं करता, फिर भी आपको कहना चाहता हूँ कि आप पर जो हाथ उठे उस हाथ को साहस कर, एकजुट होकर कम से कम पकड़ने की तो हिम्मत करिए ताकि वह आपको मार नहीं सके. उसको वापिस मारने की आवश्यकता नहीं. आपका आत्मसम्मान जाग्रत होगा और आप एकजुट होकर अपने अधिकारों के प्रति सचेत होंगे. अपने दिलों को बदलना होगा. दब्बू को हर कोई मारने की कोशिश करता है. एक कहावत है- एक मेमना (बकरी का बच्चा) भगवान के पास गया और बोला -भगवान आपने तो कहा था कि सभी प्राणी समान हैं. सभी को जीने का समान अधिकार है. फिर भी सभी भाईचारे को भूलकर मुझ पालनहार का भी तुम्हें निगलने का मन कर रहा है. सीना उठाकर चलोगे तो कोई भी तुम पर झपटने से पहले सोचेगा. बली तो भेड़-बकरियों की ही दी जाती है, सिंहों की नहीं. अत: मेमने जैसा दब्बूपन छोड़ो और समानता के अधिकार के लिए सिंहों की तरह दहाड़ो. एक बार हम साहस करेंगे तो हमें कोई भी जबरन दब्बू नहीं बना सकता.
असमानता, ऊँच-नीच की धारणा दूसरों देशों में भी है.
ऊँच-नीच की बात भारत में ही नहीं सम्पूर्ण विश्व में है. अमेरिका के राष्ट्रपति इब्राहिम लिंकन जब राष्ट्रपति बनकर वहाँ की संसद में पहुँचे तो किसी सदस्य ने पीछे से टोका, लेकिन तुम्हारे पिता जूते बनाते थे, एक चर्मकार थे. इब्राहिम लिंकन तनिक भी हीनभावना में नहीं आए बल्कि उस सदस्य को उत्तर दिया, हाँ, मेरे पिता जी जूते बनाते थे. वे एक अच्छे कारीगर थे. उनके द्वारा बनाए गए जूतों ने किसी के पैर नहीं काटे. किसी के पैरों में कील नहीं चुभी. किसी के पैरों में छाले नहीं हुए. डील नहीं बनी. मुझे गर्व है कि वे एक कुशल कारीगर थे. लोग उनकी कारीगरी की प्रशंसा करते थे. यह था लिंकन का स्वाभिमान, आत्मसम्मान के कारण वे दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश के राष्ट्रपति बने थे. हमें भी लिंकन की तरह अपने में आत्मविश्वास पैदा करना होगा. यदि हमको तरक्की की राह पकड़नी है तो हमें हीनभावना, कुंठित भावना को त्यागना होगा. हमें पुन: अपना आत्मसम्मान जगाना होगा. हम अपनी मर्जी से तो इस जाति में पैदा नहीं हुए और जब हम दलित वर्ग में पैदा हो ही गए हैं तो हीन भावना कैसी? आत्मसम्मान के साथ समाज की इस सच्चाई को स्वीकार कर आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ना होगा. सफलता की सबसे पहली शर्त आत्मसम्मान, आत्मविश्वास ही होती है.
राजस्थान प्रांत में मेघवाल जाति के क्षेत्रानुसार भिन्न-भिन्न नाम हैं लेकिन मूल रूप से यह 'चमार' नाम से जानी जाती थी. समाज में चमार शब्द से सभी नफ़रत करते हैं. गाली भी इसी नाम से दी जाती है. बचपन से ही मेघवाल जाति को हेय दृष्टि से देखा जाता है और समाज के इस उपेक्षित व्यवहार के कारण हमारे अंदर हीनभावना भर जाती है. हम अपनी जाति बताने में भी संकोच करते हैं. अब हम स्वतंत्र हैं, समान हैं तो अपने में हीन भावना क्यों पनपने दी जाए? हमें अपनी जाति पर गर्व होना चाहिए. संत शिरोमणी गुरु रविदास, भक्त कबीरदास, रूसी क्रांति का नायक स्टालिन, दासप्रथा समाप्त करने वाला अमेरिका का राष्ट्रपति अब्राहिम लिंकन, पागल कुत्ते के इलाज खोजने वाला लुई पास्चर, जलियाँवाला बाग में निर्दोष लोगों को मारने वाले जनरल डायर की हत्या कर बदला लेने वाला शहीद ऊधम सिंह, भारतीय संविधान के रचयिता बाबा साहब भीमराव अंबेडकर और न जाने कितने महान नायक समाज द्वारा घोषित तथा कथित दलित जाति में पैदा हुए हैं तो हम अपने को हीन क्यों समझें.
अपने समाज की पहचान मेघवाल से स्थापित करो
मैंने कई पुस्तकें पढ़ी हैं. यह जानने की कोशिश की है कि समाज में अनेक अन्य जातियाँ भी हैं मगर ‘चमार’ शब्द से इतनी नफ़रत क्यों है? किसी अन्य जाति से क्यों नहीं लोग समझते हैं कि ‘चमार’ शब्द चमड़े का काम करने वाली जातियों से जुड़ा है. यदि चमड़े का काम करने से जाति चमार कही गई है तो कोई बात नहीं लेकिन इसी जाति से इतनी नफ़रत पैदा कहाँ से हुई? यह एक अनुसंधान का विषय है कि और जहाँ तक मैं समझ पाया हूँ ‘चमार’ शब्द चमड़े से संबंधित न होकर संस्कृत के शब्द ‘च’ तथा ‘मार’ से बना है. संस्कृत में ‘च’ तथा ‘मार’ से बना है. संस्कृत में ‘मार’ का अर्थ मारना होता है. अत: चमार का अर्थ हुआ 'और मारो' उस समय उन लोगों को भय होगा कि ज़बरदस्ती अधीन किया गया एक विकसित समाज उनको कहीं पहले ही नहीं मार दे इसलिए अपने पूर्वजों को 'और मारो'….'और मारो' कहते हुए दब्बू बनाया गया, नीच बनाया गया, नीच व गंदे काम करवाए गए यह उस समय की व्यवस्था थी. हर विजेता हारने वाले को सभी प्रकार से दबाने-कुचलने की कोशिश करता है ताकि वह पुन: अपना राज्य न छीन सकें. लेकिन अब उस समय की व्यवस्था के बारे में आज चर्चा करना बेमानी है. हमें आज की व्यवस्था पर अपनी स्थिति पर विचार करना होगा. आप भी जाति का नाम चमार बताने में सभी संकोच करते हैं इसलिए हमें अपनी जाति का नाम 'चमार' की बजाए 'मेघवाल' लिखवाने का अभियान शुरू करना चाहिए. प्रत्येक को अपने घर में अन्य देवी देवताओं के साथ बाबा मेघऋषि की मूर्ति या तस्वीर लगानी चाहिए. हरिजन शब्द तो सरकार ने गैर कानूनी घोषित कर दिया है, इसलिए हरिजन शब्द का प्रयोग क़तई नहीं करना चाहिए.
हमारे पिछड़ने का एक कारण यह भी है कि हम बिखरे हुए हैं, संगठित नहीं है. हम अपनी एकता की ताकत भूल चुके हैं. अपना समाज भिन्न-भिन्न उपनामों में बंटा हुआ है, भ्रमित है. एक दूसरे से ऊँचा होने का भ्रम बनाया हुआ है. हममें फूट डाली गई है. हमारे पिछड़ेपन का कारण हमारी आपसी फूट हैं. आप तो जानते हैं कि फूट के कारण यह भी है कि भारत सैकड़ों वर्षों तक गुलाम रहा है. रावण व विभीषण की फूट ने लंका को जलवाया, राजाओं की फूट ने बाहर से आक्रमणकारियों को बुलाया, अंग्रेजों को राज्य करने का मौका दिया और सबसे बड़ी बात है कि हमारी आपसी फूट से हमें असमानता की, अस्पृश्यता की जिन्दगी जीने पर मजबूर किया गया. फूट डालो और राज्य करो की नीति अंग्रेजों की देन नहीं, बल्कि यह भारत में बहुत प्राचीन समय से चालू की गई थी. ज़ोर-मर्जी से बनाया गया, शूद्र वर्ण अनेकों छोटी-छोटी उप जातियों में बांट दिया गया. उनके क्षेत्रीय नाम रख दिए गए ताकि हम सभी एक हो कर समाज के ठेकेदारों से अपने हक नहीं मांग सकें. मेघवाल यानि चमार जाति को अन्य छोटे-छोटे नामों से बांट दिया गया. मसलन बलाई, बुनकर, सूत्रकार, भांभी, बैरवा, जाटव, साल्वी, रैगर- जातियां मोची, जीनगर मेंघवाल इत्यादि आदि हमें एक होते हुए भी अपने को अलग-अलग मान लिया है. उनको एक दूसरे से बड़ा होने की बात सिखाई गई. यहाँ तक कि मेघवालों को भी जाटा मेघवाल तथा रजपूता मेघवाल में बांटा गया. यानि एक नहीं होने देने का पूरा बंदोबस्त पक्का कर दिया गया. यह एक षडयंत्र था और इस षडयंत्र में समाज के ठेकेदारों को कामयाबी भी मिली. राज्य के कुछ जिलों में अलवर, झुन्झुनु तथा सीकर जिले के कुछ भागों में मेघवाल जाति के चमार शब्द का उपयोग किया जाता था. चमार नाम को छोड़ मेघवाल नाम लगाने के लिए मेंघवंशीय नाम लगाने के लिए मेंघवंशीय समाज चेतना संस्थान ने मुहिम चलाई और 12-9-2004 को झुन्झुंनु में एक एतिहासिक सम्मेलन हुआ जिसमें लगभग सत्तर हज़ार लोगों ने हाथ खड़े करके मेघवाल कहलाने को राज्य स्तरीय अभियान शुरू किया गया. समाज को एकजुट करने के लिए मेघवाल नाम से अच्छा शब्द कोई नाम नहीं हो सकता. कई लोगों का सोचना है कि अपनी काफी रिश्तेदारियां हरियाणा, पंजाब प्रांतों में हैं और वहाँ पर अभी भी चमार शब्द का उपयोग होता है तो वहाँ पर क्या नाम होगा? इस बात पर मेरा कहना है कि हम पहल तो करें, बाद में वहाँ पर भी लोग अपनी तरह सोचेंगे.
राजस्थान राज्य में मेघवाल बाहुल्य में हैं बात उठती है कि समाज के लिए मेघवाल शब्द ही क्यों प्रयोग हों? इसका छोटा सा उत्तर है कि राजस्थान के 20-22 जिलों में यह शब्द अपने समाज के लिए प्रयोग होता है. अलवर में चमार, धौलपुर, सवाई माधोपुर, भरतपुर, करौली में जाटव, कोटा, टौंक, दौसा में बैरवा, जयपुर, सीकर में बलाई, बुनकर इत्यादि का प्रयोग किया जाता है. अत: एकरूपता के कारण मेघवाल बाकी जिलों में भी प्रयोग हो तो अच्छा है. एकरूपता के साथ एकता बनती है. कई लोग उपनामों को मेघवाल शब्द के नीचे लाने के समर्थक नहीं है. यह उनकी भूल है. मेरा तो मानना है कि शर्मा शब्द से परहेज़ नहीं होना चाहिए. मेघवाल शब्द से बहुमत दिखता है. मेघवालों में आपस में विभेद पूछना चाहें तो वे कह सकते हैं, -मैं जाटव मेघवाल हूँ, मैं बलाई मेघवाल हूँ इत्यादि. इस शब्द से एक बार शुरूआत तो हो. इसके बाद साल-छ महीनों में यह विभेद भी समाप्त कर हम सभी मेघवाल कहने लगेंगे. जब अन्य जातियाँ मेघवालों के शिक्षित बेटों के साथ अपनी बेटियों की शादी बिना किसी हिचकिचाहट के कर रही हैं तो हम छोटी-छोटी उपजातियों में भेदभाव नहीं रखें तो ही अच्छा है. अपनी एकता बनी रहेगी, वरना भौतिकवाद में पनप रहे इस समाज में हमारे अंदर फूट डाल कर हमारा शोषण ही होता रहेगा. कई भाइयों का मानना है कि नाम बदलने से जाति थोड़े ही बदल जाएगी. इस संशय पर मेरा विचार है कि नाम बदलने से हमारा व सम्पूर्ण समाज का सोच अवश्य बदलेगा. यह सही है कि मेघवाल नाम से लोग हमें चमार ही समझेंगे लेकिन मेघवाल शब्द बोलने में, सुनने में अच्छा लगता है और चमार यानि 'और मार' की दुर्गंध से पैदा हुई हीनभावना से छुटकारा भी मिलता है.
हमें गर्व है कि हम मेघऋषि की संतान हैं. मेघ बादलों को भी कहते हैं. बादलों का काम तपती धरती को बारिश से तर-बतर कर हरा-भरा करना है. उसी तरह हमारी जाति भी अपनी परिश्रम रूपी वर्षा से समाज को लाभान्वित करती है. अपनी जाति ने देना सीखा है. किसी का दिल दुखाना नहीं. इसलिए अच्छे संस्कारों को आत्मसम्मान के साथ पुनर्जीवित करना है. अत: हम हीनभावना को ना पनपने देवें. अत: परस्पर वाद-विवाद में अपनी शक्ति को दुर्बल न करें. अपने को एकजुट होकर सम्पन्न, शिक्षित, योग्य कर्मठ, स्वाभिमानी बनना है. इसी से हम अपने खोए हुए अस्तित्व व अधिकारों की बहाली करने में सक्षम होंगे. अब भी समय है हम आपस के वर्ग भेदभाव -चमार, बलाई इत्यादि भुलाकर मेघवाल के नाम के नीचे एक हो जाएँ. यदि हम एक होकर अपने अधिकारों की बात करते हैं तो सभी को सोचना पड़ेगा. आप जानते हैं कि अकेली अंगुली को कोई भी आसानी से मरोड़ सकता है, लेकिन जब पाँचों अंगुलियाँ मिलकर मुट्ठी बन जाती है तो किसी की भी हिम्मत नहीं होती कि उसे खोल सके. जिस प्रकार हनुमान जी को समुद्र की छलांग लगाने के लिए उनकी शक्ति की याद दिलायी गयी तो वे एक ही छलाँग में लंका पहुँच गए थे. उसी प्रकार हम भी अपनी एकता की ताकत पहचान कर एक ही झटके में अपनी मंजिल प्राप्त कर सकते हैं. अब आपको अपनी एकता की शक्ति की ताकत दिखाने की आवश्यकता है. जानते हो, छोटी चिड़ियाएँ एकता कर जाल को उड़ाकर साथ ही ले गईं और अपने अस्तित्व की रक्षा की थी. उसी प्रकार आप भी उठो. स्वाभिमान जागृत करो अलगाव छोड़ो और एकजुट हो जाओ. समाजिक बुराइयाँ छोड़ने के लिए एकजुट, अपने को आत्मनिभर्र बनाने के जिए एकजुट और समाज में समान अधिकार पाने के लिए एकजुट. हम एकजुट होंगे तो तरक्की का रास्ता स्वयं बन जाएगा. देश में हम एक होकर हुंकार भरेंगे तो उस हुंकार की नाद गूंजेगी.
अंध श्रद्धा का त्याग करो, कुरीतियों का त्याग करो, जीवित मां-बाप की सेवा करो, और लोग हमें हमारे अधिकार देने पर मजबूर होंगे.
हम अनेक सामाजिक बुराईयों से , बुरी प्रथाओं से, सामाजिक रुढि़यो की बेडि़यों में जकड़े हुए हैं. म्रत्यु -भोज जैसे दिखावे पर लाखों रुपए हैसियत ये अधिक खर्च कर डालते हैं. कुछ लोग मां-बाप के जिंदा रहते कई बार उन्हें रोटी भी नहीं देते और मरने के बाद उनकी आत्मा की शांति के लिए ढोंग करते हुए उनके मुंह में घी डालते हैं. जागरण कराते हैं. देवी देवताओं को मानते हैं. गंगाजल चढ़ाते हैं. घर में बूढ़ी दादी चारपाई पर लेटी पानी मांगती रहती है और उसे कोई पानी की पूछने वाला नहीं. यह कैसी विडम्बना है यह ? एक राजस्थानी कवि ने सही कहा है:-
जोर-जोर स्यूं करै जागरण, देई, देव मनावै,
घरां बूढ़की माची माथै, पाणी न अरड़ावै.
और उपेक्षित वृद्धा के मरने के बाद हम उसके मृत्यु-भोज पर हजा़रों रुपए खर्च कर डालते हैं जो पाप है. माता-पिता के जिंदा रहते उनकी सेवा करने से समस्त प्रकार को सुख प्राप्त होता है. मां-बाप से बड़ा से बड़ा भगवान, इस दुनिया में कोई नहीं है. यदि मां-बाप नहीं होते तो हम इस संसार में आते ही नहीं. अत: अनेक देवी-देवताओं के मंदिरों में माथा टेकने से अच्छा है, घर में मां-बाप की सेवा करो. हमें धोखे में रखकर, भटकाकर, कर्मकांडो के चक्रों में फंसाया गया है. मैने देखा है कि हम देवी देवता, पीर बाबा इत्यादि में बहुत विश्वास करते हैं. एक बात सोचो कि क्यों ये सभी देवी-देवता हमें ही बहुत परेशान करते हैं. किसी अन्य जाति को क्यों नहीं? बड़े-बड़े धार्मिक मेलों में जाकर देखो. अस्सी प्रतिशत लोग निम्न तबके के मिलेंगे. हमें धर्मभीरू बनाया जाता है. ताकि हम उनके चक्रों में पड़े रहें. भगवान तो घट-घट में हैं. जरा सोचो और इस चक्रव्यूह से निकलकर प्रगति की बातें करो. जागरण, डैरु, सवामणी इत्यादि के नाम पर हजारों रुपए कर्ज़ लेकर देवता को मनाना समझदारी नहीं है? कबीर ने कहा है:-
पाथर पूजे हरि मिले, तो मैं पूजूं पहाड़
ताते तो चक्की भली पीस खाय संसार
यदि हम अब अपनी कुरीतियाँ पाले रहे, आडम्बरों से घिरे रहे तो अपना अस्तित्व दासों से भी घटिया, चाण्डलों से भी बदतर हो सकता है. निकलो इन कर्मकांडों से. त्यागो इस धर्मभरूता को. उठो और नये सवेरे की ओर बढ़ो. समाज की भलाई की ओर ध्यान दो तब आपका दिल नेक होगा, समाज की भलाई की ओर ध्यान होगा तो भगवान स्वयं मंदिर से चलकर आपके घर आयेंगे और पूछेंगे, बेटे बताओ तुम्हारी और क्या मदद की जाए? जो मनुष्य स्वयं अपनी मदद करता है, भगवान भी उसी की मदद करता है. स्वयं को सुधार कर अपनी मदद खुद करें. आप सुधर गए तो भगवान भी आपके कल्याण के लिए पीछे नहीं हट सकते. गूंगे बहरे मत बनों. एक दूसरे का दुख-दर्द बांटो, किसी की आत्मा को मत दुखाओ. अपने को सुधारो, समाज स्वयं सुधर जाएगा.
शादी-विवाह, दहेज, छुछक, भात, मृत्यु भोज इत्यादि सामाजिक दायित्व में हम हैसियत से अधिक खर्च कर डालते हैं. लेकिन कर्ज़ लेकर शान दिखाना कहाँ की शान है? बहन-बेटियों को भी सोचना चाहिए और अपने माता-पिता, भाई-बहन को सलाह देनी चाहिए कि उनका दहेज पढ़ाई है. वे पढ़-लिखकर आगे आएँ और समाज की अग्रणी बने. अत: मृत्यु भोज, दहेज प्रथा, बालविवाह, ढोंग-आडम्बर इत्यादि समाज के कोढ़ को छोड़ो और आत्मविश्वास के साथ प्रगति की राह पकड़ो.
लड़कियाँ लड़कों से प्रतिभा में कम नहीं
इंदिरा गाँधी अकेली लड़की थी जिसने अपने नाम के साथ अपने परिवार का नाम पूरे विश्व में रोशन किया. आज लड़कियाँ हर क्षेत्र में अग्रणी हैं. बड़े-बड़े पदों को सुशोभित कर रही हैं. राजस्थान में लड़कियों की नौकरियों में तीस प्रतशित आरक्षण हैं. अत पुत्र प्राप्ति का मोह त्यागकर एक या दो संतान ही पैदा करने का संकल्प करना चाहिए. उन्हीं को पढ़ा-लिखाकर उच्चाधिकारी बनाएँ. लड़का या लड़की कामयाब होंगे तो अपने नाम के साथ आपका नाम भी रोशन करेंगे. अत कम संतान पैदा करके अपने दो बच्चों को पढ़ाने की सौगंध खाएँ. समाज को भी होनहार, प्रतिभाशाली बच्चों को पढ़ाने के लिए प्रोत्साहन देना चाहिए.
आज कम्प्यूटर युग है. प्रतियोगिता का ज़माना है. जो प्रतियोगिता में सर्वश्रेष्ठ होगा वही सफलता प्राप्त करेगा. जो प्रतियोगिता में नहीं टिक पाएगा, चाहे उसने कितनी ही डिग्रियाँ ले रखीं हों, अनपढ़ के समान होगा. डिग्री के नशे में वह पेट पालने के लिए छोटा काम, मज़दूरी इत्यादि भी नहीं करेगा. वह न इधर का रहेगा और न उधर का. अतः आपने अपने बच्चों को कम्पीटीशन को ध्यान में रखकर पढ़ाना होगा. बच्चे भी इस बात का ध्यान रखें कि इस प्रतियोगिता के युग में एक नौकरी के लिए हज़ारों लड़के मैदान में खड़े हैं. हमें संघर्ष से नहीं डरना चाहिए. संघर्ष के बिना कुछ मिलता भी नहीं है. मंच पर बैठे सभी व्यक्ति भी आज संघर्ष के कारण इतनी उन्नति कर पाए हैं. सफलता के लिए कठिन संघर्ष की आवश्यकता है.
मन के हारे हार है, मन के जीते जीत,
कह कबीरा पिउ पाया, मन ही की परतीत.
नौकरियों के भरोसे पर निर्भर मत रहो. व्यापार करो. अपनो से क्रय-विक्रय करो. अतः आप दृढ़ निश्चय के साथ हिम्मत कर सर्वश्रेष्ठ बनने का प्रयास करेंगे तभी इस कम्पीटिशन व कम्प्यूटर के ज़माने में आपको सफलता मिलेगी अन्यथा फिर से आप अपने पूर्वजों की भांति शोषण का शिकार होंगे.
हमें यह भी भय रहता है कि हम आर्थिक रूप से कमजोर हैं. अपने अधिकारों के लिए एक होता देख, कहीं हमारा सामाजिक बायकॉट न कर दिया जाए. हमें काम-धंधा नहीं मिलेगा तो हम भूखे मरेंगे. आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति सामाजिक बायॅकाट के भय से जल्दी टूटता है. इसलिए हमें सुनिश्चित करना है कि हम आर्थिक रूप से सम्पन्न बने.
हमारे लोग केवल नौकरी की तलाश में रहते हैं, बिज़नेस की ओर ध्यान नहीं देते. जनसंख्या बढ़ोत्तरी के अनुपात में आजकल नौकरियाँ बहुत कम रह गई हैं. हम नौकरियों के भरोसे नहीं रहकर कोई धन्धा अपनाएँ तथा आत्मनिर्भर होंगे. इसलिए हमें दूसरे धंधों की ओर ध्यान देना चाहिए. यदि हम आर्थिक रूप से सम्पन्न होंगे, आत्मनिर्भर होंगे तो किसी की गुलामी नहीं करनी पड़ेगी. आर्थिक रूप से सम्पन्न व्यक्ति संघर्ष करने में अधिक सक्षम है. मकान बनाने की करणी पकड़ने से मकान बनाना शुरू करते-करते बिल्डिंग कंट्रेक्टर बनो, लकड़ी में कील ठोकने से धंधा शुरू कर बड़ी सी फर्नीचर की दूकान चलाओ, परचून की छोटी सी दूकान से शुरू कर मल्टीप्लैक्स क्रय-विक्रय बाजार बनाओ. वास्तुशास्त्र, हस्तरेखा विज्ञान, अंक ज्योतिष, एस्ट्रोलॉजी इत्यादि में भी भाग्य आज़माया जा सकता है. ये कुछ उदाहरण है. आप अपनी पसंद का कोई भी धंधा शुरू कर सकते हैं. मन में शंका होती है कि क्या हम विज़नेस में कामयाब होंगे? अनुसूचित जाति की जनसंख्या राजस्थान में सोलह प्रतशित है. हम सभी सोच लें कि हम अधिकतर सामान अपने लोगों की दुकानों से ही खरीदेंगे तो दुकान जरूर चलेगी. जैसे हम आप सभी खुशी के अवसरों पर मिठाई खरीदें. मेघवाल भाई के ढाबे पर खाना खाएँ, चाय पिएँ, मेघवाल किराना स्टोर से सामान खरीदें, मेघवाल टीएसएफ जैसी जूतों की फैक्टरी खोल सकते हैं, जूतों की दुकान खोल सकते हैं तो हम अन्य धंधे क्यों नहीं अपना सकते. हम भी अपना सकते हैं और सफल भी हो सकते हैं. केवल हिम्मत की बात है. उदाहण के तौर पर जैसे विवाह-शादियों, जन्म-मरण इत्यदि अवसरों पर पंडितों की जरूरत होती है, यदि यह काम भी अपना ही कोई करे तो अच्छा लगेगा. रोज़गार के साथ किसी का मोहताज भी नहीं होना पड़ेगा. हम केवल गाँव में ही धंधे की क्यों सोचें. शहरों में जाकर भी धंधा कर सकते हैं. यह शाश्वत सत्य है कि जिसने भी स्थान परिवर्तन किया, बाहर जाकर खाने-कमाने की कोशिश की, वे सम्पन्न हो गए. हम कूप-मंडूक (कुएँ के मेंढक) बने रहे. जिस प्रकार कुएँ में पड़ा मेंढक उस कुएँ को ही अपना संसार समझता है, उसी प्रकार हम गाँव को ही अपना संसार समझकर बाहर नहीं निकलने के कारण, गाँव की अर्थव्यवस्था के चलते दबे रहे, पिछड़े रहे. एक बार आज़माकर तो देखो. घर से दूर जाकर मिट्टी भी बेचोगे तो सोना बन जाएगी. इसलिए आत्मनिर्भर होंगे तो आर्थिक बायकॉट के भय से मुक्त होकर हम एकजुट होंगे.
सरकार ने दलितों के अधिकारों की रक्षा के लिए, उनके सामाजिक संरक्षण के लिए अनेक कानून बनाए हैं, लेकिन अन्य लोग दलितों के कंधों पर बन्दूक रखकर इनका दुरुपयोग कर रहे हैं. इस कार्रवाई से हम बदनाम होते हैं. सामान्य वर्ग में दलितों को नीचा देखना पड़ता है. वे पुनः उपेक्षा के पात्र हो जाते हैं. कसम खाओ कि कानून का सहारा केवल अपने अधिकारों की प्राप्ति के लिए लेंगे. किसी अन्य के लाभ के लिए कानून का दुरुपयोग नहीं करेंगे.
आज हम संगठित होना शुरू हुए हैं और शिक्षित बनने-बनाने, संघर्ष करने-कराने का संकल्प लिया है. पीछे मुड़कर नहीं देखें और दिखाते रहें अपनी ताकत और बुद्धिमता. मैं आपको गर्व के साथ मेघऋषि की संतान मेघवाल कहलाने, सामाजिक बुराइयाँ छोड़ने, संगठित होने, शिक्षित बनने व संघर्ष करने का आह्वान करता हूँ. साथ ही निवेदन करता हूँ कि मेघऋषि को भी अपने देवताओं की भांति पूजें. उनका चित्र अपने घरों में श्रद्धा के साथ लगाएँ व प्रतिदिन पूजा करें ताकि भगवान मेघऋषि की हम संताने आत्मसम्मान के साथ जी सकें व समाज में अपना खोया सम्मान पा सकें.
बाबा मेघऋषि की जय, बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर की जय,
मेघवंश समाज की जय, भारत माता की जय. जय हिन्द, जय भीम.
जनगणना में अपनी मातृभाषा पंजाबी लिखवाएं
पूंडरी, संवाद सहयोगी : हरियाणा मेघ सभा की बैठक रविवार को गांव फतेहपुर में प्रधान सुभाष आर्य की अध्यक्षता में सम्पन्न हुई। बैठक को संबोधित करते हुए आर्य ने सभी मेघ जाति के लोगों से अपील की कि वे एक मई से शुरू हुई जनगणना में अपनी मातृभाषा पंजाबी लिखवाएं, जो कि उनके लिए गर्व का विषय है।
उन्होंने बताया कि पंजाब एवं जम्मू कश्मीर के राज्य गजट में पहले से इस जाति की भाषा को पंजाबी दर्शाया गया है। हरियाणा, दिल्ली व राजस्थान में समाज के लोगों ने अपनी पहचान पंजाबी भाषाई एवं संस्कृति के तौर पर बना रखी है। इस अभियान की शुरूआत बंटवारे के समय पाकिस्तान से आए समाज के लोगों को राजनैतिक तथा सामाजिक मजबूती देने के लिए की गई थी। इसी उद्देश्य से कार्यकारिणी की पहली बैठक सीवन में आयोजित हुई । बैठक में कार्यकारिणी के सभी सदस्य मौजूद थे।
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