बुधवार, 4 अप्रैल 2012

झलकारी बाई दलित-पिछड़े समाज से थीं और निस्वार्थ भाव से देश-सेवा में रहीं। ऐसे स्वतंत्रता सेनानियों को याद करना हमारे लिए जरुरी है

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में वीरांगना झलकारी बाई का महत्त्वपूर्ण प्रसंग हमें 1857 के उन स्वतंत्रता सेनानियों की याद दिलाता है, जो इतिहास में भूले-बिसरे हैं। बहुत कम लोग जानते हैं कि झलकारी बाई झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई की प्रिय सहेलियों में से एक थी और झलकारी बाई ने समर्पित रुप में न सिर्फ रानी लक्ष्मीबाई का साथ दिया बल्कि झाँसी की रक्षा में अंग्रेजों का सामना भी किया।

झलकारी बाई दलित-पिछड़े समाज से थीं और निस्वार्थ भाव से देश-सेवा में रहीं। ऐसे स्वतंत्रता सेनानियों को याद करना हमारे लिए जरुरी है। इस नाते भी जो जातियाँ उस समय हाशिये पर थीं, उन्होंने समय-समय पर देश पर आई विपत्ति में अपनी जान की परवाह न कर बढ़-चढ़कर साथ दिया। वीरांगना झलकारी बाई स्वतंत्रता सेनानियों की उसी श्रृंखला की महत्त्वपूर्ण कड़ी हैं।
इस उपन्यास को लिखने के लिए लेखक ने सम्बधित ऐतिहासिक और सामाजिक परिस्थितियों पर शोध कार्य के साथ स्वयं झाँसी जाकर झलकारी बाई के परिवार के लोगों, रिश्तेदारों आदि से भी मुलाकात की है।


न धर्म रक्षा और न जाति रक्षा, झलकारी ने चूड़ियाँ पहनना छोड़ देश-रक्षा के लिए बन्दूक हाथ में ले ली थी। उसे न महल चाहिए थे, न कीमती जेवर और न रेशमी कपड़े और न दुशाले। वह न तो रानी थी और न ही पटरानी। वह किसी सामन्त की बेटी भी नहीं थी तथा किसी जागीरदार की पत्नी भी नहीं। वह तो गाँव भोजला के एक साधारण कोरी परिवार में पैदा हुई थी और पूरन को ब्याही गयी थी। पिता भी आम परिवार से थे और पति भी, लेकिन देश और समाज के प्रति प्रेम और बलिदान ने उन्होंने इतिहास में खास जगह बनाई थी। दुःखद बात यह कि जाति विशेष के चश्माधारी इतिहासकारों, साहित्यकारों और पत्रकारों में से किसी ने भी दलित समाज की उस वीरांगना झकलारी बाई की खबर नहीं ली थी।

भला हो स्वयं उन दलित और पिछड़े समाज के लेखक, पत्रकार तथा नाट्यकारों का, जिन्होंने छोटी-छोटी पुस्तकें लिखकर इतिहास के उन महत्त्वपूर्ण तथ्यों को उजाले में लाने का प्रयास किया, जो बरसों से अंधेरे में पड़े थे। वही पुस्तिकाएं तथा लेख लिए ऐतिहासिक दास्तावेज साबित हुए। जिसने इस उपन्यास का कथानक रचने-बुनने में मुझे मदद मिली। इसी सम्बन्ध में मैंने गाँव भोजला तथा झाँसी में झलकारी बाई की ससुराल जाकर भी बात की। झांसी के किले के भीतर कई बार गया। महल देखे, उनमें रचीं-बसी शेष रही संस्कृति तथा परम्पराओं को नजदीक से जाना। झाँसी की गलियाँ, बाजारों ऐतिहासिक दरवाजों, बुर्जियों के भीतर बाहर के परिवेश में अतीत की गूँज सुनी। मुझे उम्मीद है कि पुस्तक के माध्यम से दलित और पिछड़े समाज के गौरवशाली इतिहास के भीतर छुपी हुई कई महत्त्वपूर्ण बातें सामने आएँगी। जिनके सवर्णों के अधिकांश लेखक, पत्रकारों, समीक्षकों के साथ इतिंहासकारों को जहाँ सबक मिलेगा वहीं दलितों की नई पीढ़ी को प्रेरणा भी मिलेगी, इसलिए कि वे अपने नायकों से रू-ब-रू हो सकेंगे। उपन्यास लेखन के दौरान झाँसी में रह रहे बहुत-साथियों ने मुझे सहयोग दिया, उनमें विशेष हैं डॉ.शुभेश, प्राधानाचार्य, फाइन आर्ट्स कॉलेज, झाँसी, सत्येन्द्र सिंह, हिंदी अधिकारी, झाँसी मंडल रेलवे।

मोहनदास नैमिशराय

वीरांगना झलकारी बाई


झाँसी से चार कोश दूरी पर भोजला गाँव। गाँव बड़ा न था, पर उसके भीतर एक बड़ा इतिहास पल रहा था। वह इतिहास था क्रान्ति और संघर्ष का। छल और प्रपंच से जीते गए प्रदेशों, रियासतों तथा रजवाड़ों में ब्रिटिश साम्राज्य का बुलडोजर गाँव-गाँव और नगर-नगर आगे ही बढता जा रहा था। झाँसी में भी उसकी दस्तक हो चुकी थी, पर दहल अभी होनी शेष थी। झाँसी के रणबाँकुरों के सीनों में अंग्रेजों के खिलाफ आग ही आग थी। उसी आग के भीतर एक और आग धधक रही थी। चिनगारियाँ इधर-उधर छिटक रहीं थी। बुन्देलखंड की जमीन के कतरे-कतरे में कसक थी। छोटी-छोटी रियासतों तथा जागीरों के घाव रिस रहे थे। उन घावों में असीम पीड़ा थी। उनमें उन्माद था और प्रमाद भी। रियासतदारों और जागीरदारों की तलवारें अभी जंग नहीं खाई थीं। खूब चमकती-दमकती थीं पर आपस में ही टकराती थीं। झाँसी के भीतर तथा बाहर एक जैसी स्थिति थी। वहाँ बहुत कुछ पल रहा था, बीत रहा था। सूरज के उगने और अस्त होने जैसी नियति इतिहास की नहीं थी। वह करवटें ले रहा था। उसके भीतर बवंडर था। आदमी सोया नहीं था। जमीन तप रही थी। टोरियाँ और नदियाँ मौन थीं। उनका लिबास बदल रहा था। नदियों में पानी कम खून अधिक बह रहा था। जंगल और वन कट रहे थे। राजनीतिक मौसम बदल रहा था और तूफान के आने का शोर चारों तरफ बढ रहा था।

भोजला गाँव के भीतर भी बहुत कुछ रच-बस रहा था। गाँव में स्कूल न था, मन्दिर था। पर लोगों के बीच जानने-समझने की धार तेज थी। उस समय पाठ्यक्रम ही शायद ही कोई किताब उत्तरी भारत में छपी होगी। स्कूलों का स्वरूप भी वैसा नहीं था। शिक्षक और शिक्षा का स्वभाव अलग था। धर्म में प्रयोग और विश्लेक्षण की नवीन प्रक्रिया आरम्भ हो चुकी थी। धर्म ही शिक्षा था और शिक्षा ही धर्म थी। दोनों एक दूसरे के पूरक थे। गाँव के आसपास सब कुछ वैसा ही था। जमीन से मिटटी उड़ती तो वैसी ही पर रंग लाल था उसका। गाँव का आकाश भी नीला ही था। सड़के पक्की न थीं। कच्चे रास्ते गर्द-गुबार से भरे रहते थे। खेत थे, नाले थे, पथरीले रास्ते थे और उनके आसपास थी बुन्देलखंडी अस्मिता और पहचान। जिसकी रौनक अभी भी लोगों के चेहरों पर बरकरार थी। उनकी भाषा में मिठास और सहजता थी, पर मिजाज में गर्मी थी, आक्रोश था और जमीन-आकाश को एक कर देने की बुलन्दगी थी। इसलिए उस लाल मिट्टी का अपना एक गौरवपूर्ण इतिहास था। तत्कालीन शासक और सत्ता ने जिसे और भी प्रभावकारी बना दिया था।

राजा की तुलना उन दिनों भगवान से की जाती थी। जमीन पर वह उसका प्रतिनिधि था। वैसे अंग्रेजों के बारे में कुछ लोगों की अलग राय थी। वे ब्रिटिश हुक्मरनों को स्वर्ग से आए भगवान के प्रतिनिधि समझते थे। आम आदमी की न दरबार में पहुँच थी और न ही अंग्रेजों की कोठियों और बंगलों में। पर उस राजा और अंग्रेजीं शासकों दोनों से न्याय की उम्मीद होती थी।। राजा न्याय करे या अन्याय, जनता-जनार्धन की उस पर आस्था थी। राजा और प्रजा के रिश्ते परम्पराओं और संस्कारों ने अटूट बना दिए थे। उन रिश्तों के बीच अजीब-सी गन्ध होती थी। दोनों को एक-दूसरे से लगाव भी होता था, पर अलग-अलग तरह का।

समय तेजी के साथ बदल रहा था, जैसे तेज गति से दौड़नेवाले रथ पर सवार हो वह। जमीन-आकाश एक करने को आतुर, चाबुक लगनेवाले घोड़े-से बिदकने जैसा। लम्बी-लम्बी छलाँग लगाते हुए समय बढ़ रहा था। समय के भीतर और बाहर सब कुछ बदल रहा था। शहर से गाँव जुड़ने को लालायित थे। गाड़ी भर-भरकर गाँव से शहर की ओर सामान ढोया जा रहे था। वह युग विस्तार का था। व्यवसाय और उद्योगों के स्वभाव बदल रहे थे। गाँव-शहर सब तरफ बाजार पसर रहे थे। लोगों के खान-पान के तौर-तरीकों में बदलाव आ रहे थे।

ग्वालियर रोड से भोजला गाँव नजदीक था। खेतों में हरी-भरी चने की फसल लहरा रही थी। चारों तरफ रंग-बिरंगे फूल खिले थे। प्रकृति अपने अनोखे श्रृंगार में थी। उन्हीं की अनुपम छटा निहारते हुए राहगीर सड़क से उतरकर छोटे रास्ते पर आ गया था। दिन  का समय था। चारों तरफ धूप फैली थी। गाँव की विराट संस्कृति का अनूठा सौन्दर्य अपनी अस्मिता और पहचान के साथ सर्वत्र दिखाई देता था। अलग-बगल से गुजरते हुए लोग। उनके अलग-अलग सम्बोधन। पर उन सम्बोधनों में खुशबू एक जैसी ही थी। उसके स्वर में रिश्तों की गर्माहट थी। राहगीर कुछ के लिए अपना था और अन्य के लिए पराया, पर अजनबी नहीं था। जमीन की गन्ध जितनी बाहर थी उतनी ही उसके भीतर भी। खेत पार कर अचानक राहगीर की निगाहें छः सात वर्षीय एक लड़की की ओर उठ गई। उसका रंग थोड़ा साँवला था। आँखों में ढेर सारी चमक, बिखरे बाल। राहगीर ने पलभर सोचा। उसे ध्यान आया। पहले इस लडकी को कहीं देखा है। वह व्यक्ति गाँव में दो-तीन बरस पहले भी आ चुका था। उसी व्यक्ति ने मन में सोचा। कहीं यह सदोवा की मोड़ी* तो नहीं है। राहगीर पास आया, तो पूछ बैठा वह, ‘‘बिन्नू का कर रई ?’’

मिट्टी के ढेर पर बैठी लड़की के कानो में अनजाने व्यक्ति की आवाज पड़ी तो चौंक-सी उठी वह। उसने देखा अधेड़ उम्र का आदमी उसके पास आकर ठहर गया था।
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*लड़की

उसके होंठों पर हल्की मूँछें थीं। सिर पर सफेदी बिखरी हुई थी। शरीर पर मटमैला कुर्ता और धोती, पाँव में साधारण जूतियाँ, जो धूल-मिट्टी से अटी हुई थीं। लगता था जैसे वह काफी दूर से पैदल चलकर आया हो। बिना किसी हिचकिचाहट के तपाक से उसने कहा था, ‘‘किलौ बनाई रई हूँ।’’
पूछने वाले के मुँह से आश्चर्य से निकला, ‘‘क्या ?’’
झलकारी फिर बोली, ‘‘किलौ, तोय सुनाई नई दैरयौ।’’
उसके स्वर में थोड़ी तुर्शी थी। सुनने वाले को बुरा लगा। थोड़ा नाराजगी के स्वर में बोला, ‘‘बिन्नू तैं तो भौतई खुन्नस खा रई। य्य तो बतला, कौन की मोड़ी है तू ?’’
झलकारी इस बार धीरे से बोली, ‘‘सदोवा मूलचन्द्र की।’’
सुनकर आगन्तुक जाने के लिए पीछे मुड़ा ही था कि वह पूछ बैठी, ‘‘हमाय बारे में पूछ लयो अपने बारे में नई बताओ कछु।’’

जाते-जाते मंद-मंद मुस्कराते हुए कहा था राहगीर ने, ‘‘तेय बाबा को बताँव।’’ उसे घर की ओर जाते देख मन ही मन बुदबुदायी थी झलकारी, ‘‘बाबा को बताँव।’’
आसपास कोई न था। ढलान के उस पार थी तो केवल एक गाय जो खेत में चर रही थी। मिट्टी के टीले पर वह अकेली थी। थोड़ी चुप्पी के फिर उसने अपने-आप से कहा, ‘‘ऐसो कौन आदमी है, जो मोए नई बताँव।’’
मन में उभरा सवाल भला कहाँ चैन लेने देता झलकारी को। जिज्ञासावश उसने गरदन घुमाकर फिर देखा। राहगीर उसके घर की तरफ ही जा रहा था। उसके भीतर हुड़क-सी उठी। कौन आदमी हो सकता है यह ? उसके भीतर बार-बार जिज्ञासा उभर रही थी।
‘‘सहर से आया होगा...। पर तभी स्वयं का जवाब आया था, ‘‘सहरी मानस तो नइ लगता।’’
‘फिर ?’’

उसके भीतर से पुनः सवाल उभरा, ‘‘हो सकत माँ के गाँव से हो।’’ सवाल के बाद स्वयं ने जवाब भी दे दिया था, ‘‘पर माँ के गाँव से काय आया होगा ? गाँव से तो मामा आते हैं।’’
अपने ही सवाल-जवाबों की कशमश में थी वह। आगन्तुक ने बीच में आकर एक भोली-भाली लड़की को अजीब-सी मुश्किल में डाल दिया था। उसके भीतर से कभी सवाल उभरते तो कभी जवाब आते। वह असमंजस में थी। बिन बुलाए आई इसी मुश्किल से पीछा छुड़ाते हुए अन्ततः वह बुदबुदा उठी थी।, ‘‘होंगे कोई, गाँव में कितने आदमी आते-जाते हैं। हमें क्या।’’
तभी उसके बाल-सखा चन्ना और रमची ने दूर से देखा। मिट्टी के ढेर पर बैठी झलकारी कुछ बना रही थी। पास आते ही वे पूछ बैठे, ‘‘किलौ जैसो का बना रही हो बहना ?’’
उनकी तरफ देखकर जवाब दिया था झलकारी ने, ‘‘किलौ जैसो कछु नई याँ, पर किलौ ऐन है।’’
इस बार चन्ना-रमची दोनों का संयुक्त स्वर उभरा था, ‘‘किलौ !’’ बिना किसी विलम्ब के बोली थी वह, ‘‘कै दयी किलौ.....किलौ....कलौ, कछु और जानबी ?’’
बाल सुलभ मन से पूछा था फिर उन्होंने, ‘‘पर की किलौ।’’
इस बार भी तुरन्त उत्तर दिया था झलकारी ने, ‘‘हमाओ किलौ ?’’
उसका जवाब सुनकर आश्चर्य से उभरे थे चन्ना-रमची के स्वर ‘‘तुमाओ किलौ ?’’

दूसरी ओर झलकारी के स्वर में विश्वास उभरा था, ‘‘हाँ हाँ, हमाओ किलौ ? हुई नई सकत, हम किलौ में नई रह सकत ?’’
इस पर दूसरा दो-टूक जवाब था, ‘‘नई।’’
तभी झलकारी ने प्रतिवाद में कहा था, ‘‘काय ?’’
उसके प्रतिवाद में पहले दोनों हँस रहे थे तो दूसरी तरफ झलकारी उन दोनों की ओर अजीब-सी नज़रों से देख रही थी। उसकी आँखों में गुस्सा था। वैसे ही गुस्से से भरा स्वर फूटा था उसके होंठों से, ‘काए हो-हो कर रहे हो बिलात देर से, काय कौ, हम किलौ में नई रह सकत हैं ?’’ इस बार चन्ना-रमची दोनों ने बुजर्गों की तरह जवाब दिया था, ‘‘तैं इतेक बाउत नइ समझ सकत, हम कौन राजा-महाराजा हम। और किलौ में तो राजा रत्त रानी रउतीं।’’
पर झलकारी के स्वर में अभी भी आत्मविश्वास था, ‘‘अरै, हम रानी से काउ कम है।’’

दोनों बच्चों ने सुना तो वे और भी चिढाने लगे, ‘‘ऊहूँ, रानी....।’’ झलकारी उठकर उन्हें मारने को दौड़ी। वह चन्ना के पीछे भागी तो रमची उसके बनाए हुए किले की ओर आया। झलकारी ने पीछे मुड़कर देखा और डांटने के स्वर में बोली, देख रमची हमाय किलौ को कछु न हो।’’
रमची ने जैसे ही मिट्टी के किले को छूने की कोशिश की, झलकारी ने उसी तरफ झपटते हुए कहा, ‘‘ठहर पहले तोयस बतलाऊँ।’’

उससे बचने के लिए रमची और तेजी से भागा। झलकारी उसकी तरफ भागी तो चन्ना मिट्टी के आधे बने हुए किलेकी ओर आया। दोनों उसके बनाए हुए किले की ओर बारी-बारी से झपट रहे थे। पर झलकारी ने चन्ना-रमची को किले से अँगुली तक नहीं लगाने दी थी। वह उनकी तरफ दौड़ती-भागती थी। हारकर वे दोनों थक से गए थे, पर झकलारी थकने वाली नहीं, अन्त में वे ही दोनों थककर हाँफते हुए मिट्टी के ढेर पर बैठ गए। किले के पास नहीं, उससे कुछ दूर पर दोनों बैठे हुए अभी भी हाँफ रहे थे। इसलिए कि वे झलकारी के क्रोध को अच्छी तरह से जानते थे। इधर झलकारी फिर से अधूरे किले को बनाने में लग गयी। उसके माथे पर पसीने की कुछ बूँदे चुहचुहाई थीं।

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User: navratna mandusiya surera dantaramgarhReview Date:April 4, 2012, 7:04 am
झलकारी बाई दलित-पिछड़े समाज से थीं और निस्वार्थ भाव से देश-सेवा में रहीं। ऐसे स्वतंत्रता सेनानियों को याद करना हमारे लिए जरुरी है।

आराध्य बाल तपस्वी अणसी बाई मेघवाल

भास्कर न्यूज. नाडोल
कस्बे में स्थित आराध्य बाल तपस्वी अणसी बाई की 86 वीं जयंती समारोह पूर्वक मनाई गई। मेघवालों के बड़े बास में स्थित बाल तपस्वी अणसी बाई के जन्म स्थल से शनिवार को पुजारी मांगीलाल मेघवाल के सानिध्य में बैंड बाजा, झांकी व गेर नृत्य के साथ शोभायात्रा निकाली गई।
शोभायात्रा कस्बे के मुख्य मार्गों से गुजरी तो ग्रामीणों ने पुष्प वर्षा से स्वागत किया। इसके बाद खारडा रोड स्थित बाल तपस्वी अणसी बाई समाधि स्थल पर पहुंचकर विसर्जित हुई, जहां पर सैकड़ों श्रद्धालु एवं संतों के सानिध्य में चादर चढ़ाने की रस्म अदा की गई। इसके साथ पूजा-अर्चना कर प्रसादी का वितरण किया गया। पूर्व संध्या पर 'एक शाम श्री बाल तपस्वी अणसी बाई के नामÓ भजन संध्या का आयोजन किया गया। भजन संध्या में गायक कलाकार संत कन्हैयालाल एंड पार्टी आदि कई कलाकारों ने प्रस्तुति दी। समारोह में सहयोग देने वाले दानदाताओं एवं अतिथियों का साफा एवं माल्यार्पण कर स्वागत किया गया। इस मौके पर कांग्रेस के संयुक्त सचिव मदन सिंह राजपुरोहित, बीडीओ घीसाराम बामणिया, जिला परिषद सदस्य प्रमोद सिंह मेघवाल, सरपंच मनीषा मेघवाल, पंचायत समिति सदस्य ओंकारलाल मेघवाल, मेघवाल युवा समिति के जिला संयुक्त सचिव गौतम चंद गजनीपुरा आदि उपस्थित थे।

रविवार, 1 अप्रैल 2012

मेघवाल समाज की संभाग स्तरीय महापंचायत


भास्कर न्यूजत्नपीपाड़ शहर
राजस्थान मेघवाल समाज के तत्वावधान में मेघवंश महापंचायत 29 अपै्रल को रावण का चबूतरा मैदान, जोधपुर में सुबह 10 बजे आयोजित होगी। समाज के जिला अध्यक्ष नथमल खींची ने बताया कि समाज द्वारा प्रदेश भर में चलाए जा रहे जनजागरण अभियान के तहत प्रदेश के सभी संभाग मुख्यालयों पर संभाग स्तरीय महापंचायत का आयोजन किया जा रहा है।
इस महापंचायत में पूर्व केन्द्रीय मंत्री योगेन्द्र मकवाना, पूर्व मंत्री चांदराम, पूर्व मंत्री कैलाश मेघवाल, पुलिस महानिरीक्षक आरपी सिंह मुख्य वक्ता समाज के राष्ट्रीय अध्यक्ष गोपाल डेनवाल होंगे। खीची के अनुसार महापंचायत की तैयारियों को लेकर 13 अप्रैल को जोधपुर के मसूरिया स्थित मेघवाल छात्रावास में आम सभा का आयोजन होगा। जिसमें संभाग क्षेत्र के समाज के बंधुगण शरीक होंगे। इस दौरान समाज के विभिन्न अग्रिम संगठनों से जुड़े प्रमुख जन भी उपस्थित रहेंगे।

Last Updated 01:29(31/03/12)
 


मंगलवार, 27 मार्च 2012

मेघ सेना का संभागीय पथ संचलन

त्नछीपाबड़ौद

राष्ट्रीय मेघवाल युवा परिषद की बैठक हनुमान चौराहा स्थित हनुमान मंदिर पर प्रदेशाध्यक्ष नंदलाल केसरी की अध्यक्षता में हुई।

केसरी ने बताया कि मेघ सेना का पथ संचलन २९ जनवरी को कोटा दशहरा मैदान स्थित श्रीराम रंगमंच पर संपन्न होगा। इसमें जिले से भी गणवेशधारी मेघ सैनिक भाग लेंगे। सुबह दस बजे मेघ सैनिक मल्टी परपज स्कूल गुमानपुरा में एकत्रित होंगे। यहां से सांसद इज्यराजसिंह हरी झंडी दिखाकर रवाना करेंगे। तहसील अध्यक्ष जमनालाल मेघवाल ने बताया कि बारां से चतुर्भुज मेघ, रामप्रसाद मेघवाल, अंता पूर्व प्रधान शांतिप्रकाश, अटरू से रामपाल मेघवाल, छीपाबड़ौद से मुकेश नारायण को सम्मानित किया जाएगा। बैठक में जिला उपाध्यक्ष गोकुल मेघवाल, तहसील कोषाध्यक्ष चंपालाल, महासचिव बाबूलाल मेघवाल, ने विचार व्यक्त किए।

Last Updated 1:12 AM (28/01/2012)
http://bollywood.bhaskar.com/article/RAJ-OTH-1781518-2795094.html?PRVNX=

राजनेताओं से सचेत रहकर हमें एकता दिखानी होगी : पूर्व गृहमंत्री कैलाश मेघवाल

Monday, March 19, 2012
Monday, March 19, 2012
सूरतगढ़। हमारा समाज अब जागृत होने लगा है। अब एक होने में ज्यादा देर नहीं लगेगी। पूर्व गृहमंत्री कैलाश मेघवाल ने भाईचारा बनाने व शिक्षा को बढ़ावा देने सहित राजनेताओं से सचेत रहने की यह नसीहत रविवार को मेघवाल समाज की सम्भागीय स्तर पर हुई महापंचायत में दी। रविवार को अनाज मण्डी में इस महापंचायत की अध्यक्षता मेघवाल समाज के राष्ट्रीय अध्यक्ष गोपाल डेनवाल ने की। विशिष्ट अतिथि के रूप में गुजरात से पूर्व केन्द्रीय मंत्री डॉ. योगेन्द्र मकवाना व मेघ सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष भोपाल कांटीवाल उपस्थित रहे। कैलाश मेघवाल ने कहा कि समाज का वोट समाज के उम्मीदवार को ही मिलना चाहिये। उन्होंने मेघवाल समाज को राष्ट्र की मुख्य धारा से जोडऩे के लिए राजनीतिक, आर्थिक व सामाजिक क्षेत्र में प्रगति करने पर जोर दिया। समाज की 11 सूत्री मांगों पर प्रकाश डालते हुए मेघवाल ने कहा कि इनको मनवाने के लिए हमें अपनी एकता को दर्शाना होगा। उन्होंने लोगों से हाथ खड़े करवाकर एकता के इस संकल्प का प्रदर्शन किया। विशिष्ट अतिथि डॉ. योगेन्द्र मकवान ने कहा कि हमारा समाज अब शिक्षित व विकसित हो चुका है। अब जरूरत समाज को और अधिक संगठित करने की है। उन्होंने देशहित में कार्य करने का मेघवाल समाज का आह़्वान किया। राष्ट्रीय अध्यक्ष गोपाल डेनवाल ने इस मौके पर कहा कि मेघवंश समाज 1671 जातियों में बंटा हुआ है। उन्होंने समाज की 11 सूत्री मांगे मनवाने के लिए समाज की एकता और संगठन को मजबूत करने की बात कही। वहीं गोपाल कांटीवाल ने युवाओं से आगे आकर भारतीय सेना में भर्ती होने की बात कही। कार्यक्रम में कई कार्यकत्र्ताओं को सम्मानित किया गया। इस महापंचायत कार्यक्रम का संचालन जिलाध्यक्ष कुलदीप चालिया ने किया।

http://www.seemasandesh.com/NewsDetail.aspx?NewsID=21628

मेघवाल युवा परिषद की कार्यकारिणी घोषित

झालावाड़त्न राष्ट्रीय मेघवाल युवा परिषद के जिलाध्यक्ष प्रहलाद मेघवाल ने परिषद के प्रदेशाध्यक्ष की सहमति से जिला कार्यकारिणी घोषित की। जिसमें जिला संरक्षक नन्दलाल वर्मा, सलाहकार रामनारायण मेघवाल, गोपाललाल, श्याम लाल वर्मा, वरिष्ठ उपाध्यक्ष डालूराम मेघवाल, कोषाध्यक्ष राजूलाल मेघवाल, प्रवक्ता विष्णु कुमार, जिला महामंत्री रामप्रताप वर्मा, उपाध्यक्ष फूलचंद वर्मा, अमरलाल वर्मा, मुकेश वर्मा, रमेशचंद, मोहनलाल वर्मा, संगठन मंत्री कैलाश मेघवाल, श्यामलाल , किशोर, सचिव राजाराम देवरिया, राजेंद्र सरखणिया, प्रचार मंत्री भगवानसिंह गडोदिया, भैरुलाल करावन को मनोनीत किया।
Last Updated 01:25(16/03/12)
 
http://www.bhaskar.com/article/RAJ-OTH-1902057-2978056.html

मेघवाल ने ठोकी कपासन से ताल

भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष व राज्य के पूर्व गृहमंत्री कैलाश मेघवाल ने अगले विस चुनाव के लिए जिले के कपासन विस क्षेत्र से ताल ठोक दी है। मेघवाल ने जिले के कुछ पार्टी नेताओं और संगठन पर कटाक्ष करते हुए कहा कि उनको इस इलाके में मेरी सक्रियता पच नहीं रही है, लेकिन मैं फिलहाल जनता की अदालत में घूम कर टिकट मांग रहा हूं। इसके बाद पार्टी से टिकट लाऊंगा। भदेसर पंस में कपासन विस के तहत आने वाले पारलिया गांव में शुक्रवार को नवसंवत्सर व होली मिलन समारोह को मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए मेघवाल ने शेष

अर्जुन पर तीर.........।
अगला विस चुनाव कपासन से लडऩे की मंशा रखने के बावजूद मेघवाल जिले व प्रदेश नेताओं पर कटाक्ष करने से भी नहीं चूक रहे। उन्होंने पारलिया में कहा कि गत चुनाव में गलत टिकट वितरण से जिले में पांचों सीटें हारनी पड़ी। कपासन से प्रबल दावेदार पूर्व विधायक अर्जुन जीनगर का नाम नहीं लेते हुए भी उन्होंने कहा कि एक कार्यकर्ता ने टिकट नहीं मिला तो निर्दलीय चुनाव लड़ लिया। किसी कारण से भले ही उन्हें पार्टी में वापस ले लिया गया हो, मगर पार्टी विधान के अनुसार ऐसे व्यक्ति को अगले छह साल तक कोई चुनाव लडऩे का हक नहीं है। मेघवाल ने यह कहते हुए अन्य नेताओं पर भी निशाना साधा कि पार्टी दो चुनाव हारने वाले को भी टिकट नहीं देती है। ऐसी नीति बनी हुई है। http://www.bhaskar.com/article/RAJ-OTH-1918140-3013626.html   
Last Updated 01:57(25/03/12)
 

नवरत्न मन्डुसिया

शादियों में फिजूलखर्ची रोककर शिक्षा पर धन खर्च करने का आह्वान, विवाह के नियम हुये आसान, सामूहिक विवाह के लिए उमड़े सैकड़ों लोग

 मेघवाल समाज का ऐतिहासिक फैसला, नानी का गोत्र छोड़ने की कुप्रथा बंद, अब शादियों के लिए मिलेंगे ज्यादा विकल्प कस्बे के टापरी रोड़ स्थित मेघवाल ...