शनिवार, 21 अप्रैल 2018

POCSO एक्‍ट में बड़ा बदलाव, 12 साल तक की बच्चियों से रेप पर होगी फांसी की सजा

मंडुसिया||नई दिल्ली : कैबिनेट ने शनिवार को एक बड़े फैसले के तहत पोक्‍सो एक्‍ट में बदलाव के लिए अध्‍यादेश को मंजूरी दे दी. इस बैैठक में 'प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंस' यानी पॉक्सो एक्ट में संशोधन को हरी झंडी दी गई. इस संशोधन केे तहत देश में 12 साल या उससे कम उम्र की बच्चियों के साथ रेप के दोषियों को मौत की सजा दी जा सकेगी.
नए बदलाव के तहत लिए गए फैसले...
1. 12 साल की बच्चियों से रेप पर फांसी की सजा
2. 16 साल से छोटी लड़की से गैंगरेप पर उम्रकैद की सजा
3.16 साल से छोटी लड़की से रेप पर कम से कम 20 साल तक की सजा
4.सभी रेप केस में 6 महीने के भीतर फैसला सुनाना होगा
5.नए संशोधन के तहत रेप केस की जांच 2 महीने में पूरी करनी होगी
6.अग्रिम जमानत नहीं मिलेगी
7.महिला से रेप पर सजा 7 से बढ़कर 10 साल होगी
उन्नाव और कठुआ केस के बाद देश में गुस्सा
उत्तर प्रदेश के उन्नाव के अलावा और जम्मू कश्मीर के कठुआ में नाबालिग बच्ची के बाद सामने आ रही ऐसी घटनाओं को लेकर देशभर में गुस्से के माहौल है. चारों तरफ से रेप के दोषियों को सजा दिलाने की मांग उठ रही है. इसी पृष्ठभूमि में सरकार बच्चों को यौन अपराधों से संरक्षण अधिनियम (पोक्सो) में संशोधन के लिए अध्यादेश लाने की योजना बना रही थी. http://zeenews.india.com/hindi/india/cabinet-amendment-pocso-act-now-death-penalty-for-child-rapists/393259पॉक्सो कानून के फ‍िलहाल प्रावधानों के अनुसार इस जघन्य अपराध के लिए अधिकतम सजा उम्रकैद है. वहीं, न्यूनतम सजा 7 साल की जेल है.

शोभा मेघवाल ने बनाया पानी से बिजली बनाने का मॉडल, जिले में रही प्रथम

नवरत्न मंडुसिया की कलम से||छोटी सी उम्र में बड़ा कार्य करना बहुत बड़ी सफलता की कहानी होती है हमे शोभा मेघवाल ओर इनके परिवार व विद्यालय परिवार पर गर्व करना चाहिए कि इन्होंने बहुत बड़ा कार्य किया वैसे आज के जमाने मे कई अभावों के कारण लोग पीछे हट
(रानीवाड़ा. प्रदर्शनी में मॉडल प्रदर्शित करती शोभा)
जाते है लेकिन शोभा मेघवाल ने हार को मात देकर जीवन के अनमोल भाग को आगे बढ़ाया है जिंदगी में हार ओर जीत के दो पहलू होते है जिसने जिसको समझ लिया तो उसी मुकाम पर पहुच जाते है उसी प्रकार शोभा मेघवाल ने मुकाम को हासिल किया है राष्ट्रीय आजीविका अभियान के तहत 28 फरवरी 2018 को जिला मुख्यालय पर मलकेश्वर मठ में जिला स्तरीय विज्ञान मेले क आयोजन किया गया था। मेले में रानीवाड़ा क्षेत्र के उत्कृष्ट राउप्रा विद्यालय मेडक कलां की सातवीं कक्षा की छात्रा शोभा कुमारी पुत्री मालाराम मेघवाल ने जिले में प्रथम स्थान प्राप्त किया। पानी से बिजली निर्माण करने का एक मॉडल बनाकर प्रदर्शित किया था। इसी प्रकार इसी विद्यालय के कक्षा 6 के छात्र भगाराम ने क्विज प्रतियोगिता में जिला स्तर पर द्वितीय स्थान प्राप्त कर विद्यालय को गौरवान्वित किया। जिला शिक्षा अधिकारी ने प्रथम व द्वितीय स्थान प्राप्त करने वाले प्रतिभागियों को नकद पुरस्कार प्रदान कर सम्मानित किया।

सोमवार, 12 मार्च 2018

धारा 164 व 161 में अदालत में झूठ बोलने पर होती है सजा

नवभारत टाइम्स | Updated Jun 26, 2011, 02:23 AM IST
राजेश चौधरी
जेसिका लाल मर्डर केस में श्यान मुंशी समेत कई गवाह मुकर गए थे। अदालत में झूठा बयान देने के मामले में इनके खिलाफ केस चलाने को लेकर हाई कोर्ट में फैसला रिजर्व है। इस तरह के कई मामले देखने को मिलते हैं, जिनमें गवाहों के मुकरने पर उनके खिलाफ कार्रवाई की अनुशंसा की जाती है। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि आखिर गवाह के मुकरने का मतलब क्या होता है और अदालत में झूठ बोलने पर क्या कार्रवाई हो सकती है!

मुकरने का मतलब
मुकरने वाले गवाह यानी होस्टाइल विटनेस का मतलब होता है अदालत के सामने पुलिस की कहानी को सपोर्ट न करने वाला गवाह। अदालत में शपथ लेकर झूठ बोलने के मामले में दोषी पाए जाने पर सजा का प्रावधान है। कानूनी जानकार बताते हैं कि पुलिस किसी को भी छानबीन के दौरान सरकारी गवाह बना सकती है। गवाह की सहमति से पुलिस सीआरपीसी की धारा-161 के तहत उसका बयान दर्ज करती है। धारा-161 के बयान में किसी गवाह के दस्तखत लिए जाने का प्रावधान नहीं है। हालांकि किसी गवाह के सामने पुलिस अगर कोई रिकवरी आदि करती है तो रिकवरी मेमो पर गवाह के दस्तखत लिए जाते हैं।

शक है तो मैजिस्ट्रेट के सामने बयान
कानूनी जानकार अजय दिग्पाल ने बताया कि किसी गवाह के बारे में अगर पुलिस को शक होता है कि वह बाद में अपने बयान से मुकर सकता है तो उस गवाह का धारा-164 में मैजिस्ट्रेट के सामने बयान दर्ज कराया जाता है। धारा-164 में बयान देने वाले का बाद में मुकरना आसान नहीं होता। वैसे इन तमाम बयानों के बाद भी ट्रायल कोर्ट के सामने दिया बयान ही मान्य बयान होता है और अदालत यह देखती है कि गवाह झूठ तो नहीं बोल रहा। अगर अदालत को यह लगता है कि गवाह अदालत में सच्चाई बयान कर रहा है और वह बयान पुलिस के सामने दिए बयान से चाहे पूरी तरह मेल नहीं भी खा रहा हो, तो भी उस बयान को स्वीकार किया जाता है। अदालत को जब यह लगता है कि गवाह शपथ लेकर झूठ बोल रहा है, तो वह उसके खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए अनुशंसा कर सकती है।

सात साल की सजा
कानूनी जानकार डी. बी. गोस्वामी बताते हैं कि असल में होता यह है कि अगर कोई गवाह पुलिस या मैजिस्ट्रेट के सामने दिए बयान से मुकरे, तो उसे मुकरा हुआ गवाह माना जाता है। अगर कोई सरकारी गवाह मुकर जाए, तो सरकारी वकील उसके साथ जिरह करता है और सच्चाई निकालने की कोशिश करता है। लेकिन इस प्रक्रिया में अदालत यह देखती है कि कौन से ऐसे गवाह हैं, जिन्होंने जानबूझकर अदालत से सच्चाई छुपाई या फिर झूठ बोला। ऐसे गवाहों के खिलाफ सीआरपीसी की धारा-340 के तहत अदालत शिकायत करती है। ऐसे गवाह के खिलाफ अदालत में झूठा बयान देने के मामले में आईपीसी की धारा-193 के तहत मुकदमा चलाया जाता है। इस मामले में दोषी पाए जाने पर अधिकतम 7 साल कैद की सजा का प्रावधान है। 

कोर्ट में झूठी गवाही देने वाले को मिलती है सजा


Updated Jul 19, 2015, 08:00 AM IST
राजेश चौधरी, लीगल फोरम
क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम में गवाहों का रोल अहम है। जैसे ही किसी मामले में आरोप तय हो जाते हैं, उसके बाद अभियोजन पक्ष के गवाहों के बयान दर्ज किए जाते हैं। कई बार ऐसे भी मामले देखने को मिलते हैं, जब गवाह अपने बयान से मुकर जाते हैं। उस वक्त कोर्ट यह देखता है कि गवाह झूठ तो नहीं बोल रहा है। अगर कोर्ट को लगता है कि गवाह ने शपथ लेकर झूठे बयान दर्ज कराए हैं तो अदालत ऐसे गवाह के खिलाफ एक्शन लेने का आदेश दे सकती है।
कानूनी जानकार मुरारी तिवारी बताते हैं कि मुकरने वाले गवाह का मतलब होता है अदालत के सामने पुलिस की कहानी को सपोर्ट न करने वाला गवाह। अदालत में शपथ लेकर झूठ बोलने के मामले में दोषी पाए जाने पर सजा का प्रावधान है। जब पुलिस किसी क्रिमिनल केस को दर्ज करती है तो उसके बाद वह छानबीन शुरू करती है और इस दौरान वह गवाहों के बयान दर्ज करती है। उन गवाहों के बयान और साक्ष्य के आधार पर पुलिस छानबीन पूरी करने के बाद चार्जशीट दाखिल करती है। फिर चार्ज पर बहस होती है। अगर पहली नजर में आरोप पुख्ता हैं तो अदालत आरोपी के खिलाफ चार्ज फ्रेम कर देती है और ट्रायल शुरू होता है। इस दौरान पहले अभियोजन पक्ष के गवाहों के बयान दर्ज किए जाते हैं। छानबीन के दौरान जांच एजेंसी या पुलिस जिसे चाहे अभियोजन पक्ष का गवाह बना सकती है।
शपथ लेकर बयान
पुलिस सीआरपीसी की धारा-161 के तहत उक्त गवाह के बयान दर्ज कर सकती है और उसका पता आदि लिखती है। साथ ही गवाह को यह बताती है कि उसे कोर्ट से समन मिलने पर गवाही के लिए आना होगा, हालांकि उक्त बयान पर गवाह के दस्तखत नहीं होते। पुलिस को जब गवाह पर यह शक हो कि वह अपने बयान से मुकर सकता है तो वह गवाह का बयान मैजिस्ट्रेट के सामने भी करवाती है। मैजिस्ट्रेट के सामने धारा-164 के तहत बयान दर्ज किए जाते हैं। बयान के वक्त मैजिस्ट्रेट गवाह से पूछता है कि उस पर कोई दबाव तो नहीं है। गवाह जब बताता है कि वह अपनी मर्जी से बयान दे रहा है, तब मैजिस्ट्रेट उसे दर्ज करता है।
कई बार ट्रायल के दौरान गवाह आरोप लगाता है कि पुलिस ने जबरन बयान दर्ज किया है और उसने उक्त बयान नहीं दिए थे, लेकिन मैजिस्ट्रेट के सामने दिए बयान से उसके लिए मुकरना आसान नहीं होता। हाई कोर्ट के सरकारी वकील नवीन शर्मा बताते हैं कि धारा-161 या 164 के बयान के बावजूद ट्रायल कोर्ट के सामने गवाह जो बयान देता है, वही बयान आखिरी होता है। ट्रायल कोर्ट में बयान के वक्त गवाह को शपथ लेना होता है और फिर वह बयान दर्ज कराता है। अगर अदालत को लगता है कि गवाह सच बोल रहा है और बयान पुलिस के सामने दिए बयान से पूरी तरह न भी मिलता हो, तो भी उसके बयान के उस पार्ट को स्वीकार किया जाता है जो अभियोजन पक्ष के फेवर में है।
झूठ बोलने पर सजा
एडवोकेट अजय दिग्पाल बताते हैं कि अगर कोई अभियोजन पक्ष यानी सरकारी गवाह पुलिस और मैजिस्ट्रेट के सामने दिए बयान से मुकरे तो अभियोजन पक्ष के वकील उसके साथ जिरह करते हैं और जिरह के दौरान सच्चाई सामने लाने की कोशिश करते हैं। इस दौरान उक्त गवाह को मुकरा हुआ गवाह करार दिया जाता है। इसका मतलब हमेशा यह नहीं है कि गवाह झूठ बोल रहा है। कई बार पुलिस गलत तरीके से बयान दर्ज कर लेती है और तब गवाह पुलिस द्वारा लिखे गए बयान से अलग बयान देता है। लेकिन बयान और साक्ष्य देखकर अदालत यह देखती है कि गवाह शपथ लेकर झूठ तो नहीं बोल रहा है। अगर अदालत इस बात से संतुष्ट हो जाती है कि गवाह ने शपथ लेकर झूठ बोला है तो ऐसे गवाहों के खिलाफ सीआरपीसी की धारा-340 के तहत अदालत शिकायत कर सकती है। ऐसे गवाह के खिलाफ अदालत में झूठा बयान देने के मामले में आईपीसी की धारा-193 के तहत मुकदमा चलाया जाता है। इसमें दोषी पाए जाने पर 7 साल तक कैद की सजा हो सकती है।

अधिक जानकारी के लिए यहां किल्क करे 
https://www.google.co.in/amp/s/m.navbharattimes.indiatimes.com/metro/delhi/crime/giving-false-evidence-in-court-draws-punishment/amp_articleshow/48127325.cms

बुधवार, 7 फ़रवरी 2018

250 साल से एक मंदिर बेटियों की शादी के लिए जाना जाता है


मेघवाल समाज में मंदिर में होती है शादी, 250 सालों से चली आ रही परम्परा

शहर से 10 किलोमीटर दूर आटी मालाणी गांव की पहाडिय़ों की तलहटी में स्थित मेघवाल समाज के जयपाल गौत्र की कुलदेवी चामुंडा माता का मंदिर। यह मंदिर बेटियों की शादी के लिए जाना जाता है। जयपाल समाज की सदियों से परम्परा रही है कि बेटी का विवाह मंदिर परिसर में ही होता है। इस कारण उनके घर के आंगन आज भी कुंवारे हैं। कहा जाता है कि घर के आंगन में जब तक बेटी का विवाह नहीं होता, तब तक उसे कुंवारा ही माना जाता है। मंदिर में शादी की परम्परा के बारे में गांव के बुजुर्ग चेतनराम जयपाल की मानें तो लगभग 250 वर्षों से यह परम्परा चली आ रही है। 
एेसे हुई शुरुआत
लगभग 250 वर्ष पूर्व जैसलमेर के खुहड़ी गांव से जयपाल गौत्र के लोग आटी आकर बसे। तब वह खुहड़ी गांव से अपने साथ में लकड़ी के पालणे में माताजी की प्रतिमा लेकर आए। आटी गांव में तत्कालीन जागीरदार हमीरसिंह राठौड़ ने उन्हें यहां पर बसने के लिए स्थान दिया। उस स्थान पर बिरादरी के लोगों ने मंदिर बनाकर माताजी की प्रतिमा की प्रतिष्ठा कर दी। मंदिर को ही अपना घर मान लिया। उस समय विवाह योग्य बेटी की शादी मंदिर में ही हुई। फिर यह परम्परा बन गई, जो आज भी कायम है।
पाट बिठाई से विदाई तक सब मंदिर में
बेटी के विवाह का आयोजन पाट बिठाई से शुरू होता है। जयपाल समाज के लोग पाट बिठाई मंदिर से करते हैं। फिर फेरे, भोजन व विदाई तक का कार्यक्रम मंदिर परिसर में ही होता है। इस दौरान आस-पास रहने वाले परिवार विवाह का सामान लेकर मंदिर में ही रुकते हैं। बारात को भी मंदिर में रुकवाते हैं। एक ही स्थान पर सम्पूर्ण कार्यक्रम होता है।
बेटे की बारात भी मंदिर से रवाना
मंदिर परिसर में बेटियों की शादी होती है। वहीं बेटे की शादी में पाट बिठाई की रस्म व बारात की रवानगी भी मंदिर से होती है। बारात के आगमन पर नववधु को भी मंदिर में रुकवाया जाता है। इस दौरान मंदिर में रात को जागरण व अगले दिन सुबह पूजा-पाठ करने के बाद ही नववधू गृह प्रवेश करती है।
सप्तमी पर भरता है मेला
मंदिर में भादवा व माघ सुदी सप्तमी को मेला भरता है। इस दौरान गौत्र सहित आस-पास के लोग मंदिर में पूजा-अर्चना करने आते हैं। नए दूल्हे व दुल्हन शादी की प्रथम चूनड़ी मंदिर में चढ़ाते हैं।
बलि प्रथा पर रोक
मंदिर कमेटी के मंत्री हीरालाल जयपाल बताते हैं कि लगभग 135 वर्ष पहले तक शादी के अवसर पर बलि प्रथा प्रचलित थी, लेकिन जयपाल गौत्र में जन्मे महंत प्रागनाथ महाराज ने इस प्रथा को बंद करवाया। तब से लेकर आज तक बलि प्रथा पर रोक कायम है।
मंदिर ही हमारा घर
सदियों से चली आ रही परम्परा को आज भी कायम रखा है। मंदिर को ही घर मानते हैं। बेटियों की शादी मंदिर में ही होती है।
मेताराम जयपाल, अध्यापक, राउप्रावि आटी
मंदिर में शादी शुभ
जयपाल गौत्र की कुलदेवी चामुंडा माता मंदिर में ही बेटियों की शादी होती है। मंदिर में शादी करना शुभ माना जाता है। परम्परा कायम है।
रणजीत जयपाल, सरपंच, ग्राम पंचायत आटी

https://m.patrika.com/story/barmer/also-refresh-a-fraternity-whose-courtyard-centuries-loner-2233372.html

यहाँ ईंट की होती है कुलदेवी रूप में पूजा : बूढ़ादीत की ईंट माता Eent Mata Temple Budhadeet

कहते हैं कि भगवान् कण-कण में विराजमान हैं। जल,थल व आकाश में ऐसा कोई स्थान नहीं जहाँ ईश्वर का वास न हो। देवभूमि भारत के वासियों की अटूट श्रद्धा का इस संसार में कोई थाह नहीं। हम प्रकृति ही नहीं बल्कि किसी भी वस्तुमें देवदर्शन कर सकते हैं। जैसा कि आप जानते हैं कि मनुष्य में अपार आस्था व श्रद्धा हो तो साधारण से पत्थर में भी भगवान दिखाई दे जाता है। इसका एक अनुपम उदाहरण है – राजस्थान में कोटा जिले की दीगोद तहसील के गाँव बूढ़ादीत में स्थित ईंट माता का मन्दिर। सुनने में आपको भले ही थोड़ा आश्चर्यजनक लगे परन्तु आज के लगभग एक हजार वर्षों से इस गाँव में एक ईंट को देवी स्वरूप में पूजा जाता है। ना सिर्फ पूजा जाता है बल्कि यह मीणा समाज में कंजोलिया व करेलवाल गोत्रों की कुलदेवी है। दरअसल उस समय मूर्ति का निर्माण आसान नहीं था अतः माँ के भक्तों ने ईंट को ही माँ भगवती का स्वरुप मानकर उसकी स्थापना कर दी, और आज एक सहस्त्राब्दी बीत जाने पर भी वह ईंट बिना किसी क्षति के यथावत विराजित और पूजित है।

ईंट माता की स्थापना के सम्बन्ध में एक घटना इस प्रकार बताई जाती है कि बूढ़ादीत कस्बे में ब्राह्मण रहते थे। मीणा समाज के कंजोलिया (अन्यत्र करेलवाल) गोत्र के मीना एवं मेघवाल जाति के लोग 5-6 मील दूर रहते थे। मीणा समाज की स्त्रियां जब बूढ़ादीत गाँव में से जाती तो वहां के निवासी उन पर व्यंग्य करते। एक दिन स्त्रियों ने यह बात अपने परिवारजनों को बता दी। स्वाभिमान का प्रश्न मानकर मीणाओं ने बूढ़ादीत गाँव पर हमला कर दिया और वहां रहने वालों को गाँव से भगा दिया और वहीं रहने लगे।
डॉ रघुनाथ प्रसाद तिवारी ने अपनी पुस्तक ‘मीणा समाज की कुलदेवियाँ’ में लिखा है कि “मीणा समाज और मेघवाल समाज जो बूढ़ादीत में आबाद हो गए वे मकानों की चिनाई का काम करते थे। चिनाई के काम में ईंटों का प्रयोग होता था, वह उनकी आमदनी का साधन था, अतः उन्होनें ईंट को अपनी कुलदेवी मानते हुए उसकी कुलदेवी के रूप में खुले आकाश के नीचे स्थापना कर दी। बाद में चबूतरा बनाकर उस पर ईंट माता को विराजित कर दिया। कंजोलिया गोत्र के `मीणा व मेघवाल दोनों ही समाज के लोग माता की पूजा करते थे। मीणा समाज माता को रोटी एवं खीर का भोग लगाते थे।जो आज भी वही भोग माता को अर्पित किया जाता है। मेघवाल समाज माता के लिए घी लाता था। मीणा एवं मेघवाल समाज में कुछ समय बाद मतभेद हो गया। कारण था मीणा समाज पहले पूजा करता था तथा मेघवाल समाज को पूजा हेतु घी चढ़ाने का अवसर बाद में मिलता था। जब मंदिर के चबूतरे पर जाकर मेघवाल समाज पूजा करने लगा तथा रोटी व खीर का भोग लगाने लगा तो मीणाओं ने इसका विरोध किया। फलतः मेघवाल समाज ने ईंट माता का अपना अलग मंदिर बना लिया। वह मंदिर भी खुले आकाश के नीचे ही है। दोनों ही मंदिरों में माता की कोई गुमटी नहीं है।”

लाल ईंट से नहीं बनाते मकान :

यहाँ के मीणा ईंट को अपनी कुलदेवी के रूप में मानते हैं,अतः ये लोग लाल ईंट का उपयोग अपने मकान आदि बनाने में नहीं करते हैं।
चैत्र एवं आश्विन के नवरात्रों में भक्तों की अपार भीड़ लगती है। माता को रोटी एवं खीर का ही भोग लगाया जाता है। ईंट माता की पूजा-अर्चना संबंधित समाज के व्यक्ति ही करते हैं।

मीणा समाज की सती माता :

डॉ रघुनाथ प्रसाद तिवारी ने यहाँ के मीणा समाज की सती माता का भी उल्लेख करते हुए लिखते हैं “कुछ बूढ़ादीत के मीणा समाज का एक कथानक यह भी है कि लगभग 700 वर्ष पूर्व कंजोलिया समाज में एक गृहस्थ संत श्री कन्हैयालाल जी हुए थे। उनके दो पत्नियां थी। एक रोज अनायास कन्हैयालाल जी का स्वर्गवास हो गया। एक पत्नी जो घर पर थी उसने सती होने का निर्णय लिया। उनकी दूसरी पत्नी गोबर बीनने हेतु गई हुई थी। जब उसको अपने पति के देहावसान की जानकारी हुई तो गोबर से भरी तगारी उसके हाथों से छूट गई। गोबर की तगारी लुढ़कती हुई नारियल में परिवर्तित हो गई। दूसरी पत्नी ने भी नारियल हाथ में लेकर सती होने का निर्णय लिया। जिस स्थान पर गोबर नारियल के रूप में परिवर्तित हुआ वही कन्हैयालाल जी का दाहसंस्कार हुआ और आज वह मंदिर की मान्यता के रूप में पूजित है। कंजोलिया गोत्र के मीणे यहां जात जडूले उतारते हैं तथा बसंत पंचमी को अपनी बहन-बेटियों को बुलाकर उन्हें भेंट स्वरूप यथा साध्य उपहार देते हैं। सती माता के मंदिर में एक हवन कुंड भी बना हुआ है। सती माता की मूर्तियों को लड्डू एवं बाटी का भोग लगाया जाता है।”

प्राचीन सूर्य मंदिर :

बूढ़ादीत का अर्थ है बूढ़ा-पुराना, दीत- सूर्य। ग्राम में नवीं शताब्दी का एक प्राचीन सूर्य मंदिर भी है जो ग्राम के तालाब की पाल पर पूर्वाभिमुखी है। मंदिर का शिखरबंध दर्शनीय है। मंदिर पंचायतन शैली का बताया जाता है।

नवरत्न मन्डुसिया

शादियों में फिजूलखर्ची रोककर शिक्षा पर धन खर्च करने का आह्वान, विवाह के नियम हुये आसान, सामूहिक विवाह के लिए उमड़े सैकड़ों लोग

 मेघवाल समाज का ऐतिहासिक फैसला, नानी का गोत्र छोड़ने की कुप्रथा बंद, अब शादियों के लिए मिलेंगे ज्यादा विकल्प कस्बे के टापरी रोड़ स्थित मेघवाल ...