रविवार, 10 अप्रैल 2011

वर्षा काल मेघ नभ छाए


 

Kirti Oberoi's picture
भारत में वर्ष में छह ऋतुं होती है -ग्रीष्म, वर्षा, शरद हमेंत, शिशिर और बंसत । अंग्रेजी वर्ष चक्र के अनंसार वर्षा ऋतु उत्तर भारत मेंप्राय: जुलाई सये प्रारभं होकर सितंबर तक रहती है । ग्रीष्म ऋतु में जब जड़-चेतन प्रकृति ग्रीष्म से व्याकुल होकर हाहाकार करने लगती है तो प्रकृति देती उनकी सुनवाई करती है और उस समय समुद्र का पानी वाष्प बनकर आकाश में उड़ता है।
वह हवा से ठंडा होकर मेघ मन जाता है। वहीं मेघ जहां बरसता है तो वर्षा कहलती ह। बंसत को ऋतुओं का राजा कहा गया है तो वर्षा को ऋतुओं की रानी । इस ऋतु में मेघों से रिमझिम- रिमझिम बरतसता पानी मन को महोह लेता है । तुलसीदास ने भीं मानस में लिखा है-
'' वर्षा काल मेघ नभ छाए।
गरजत लागत परम सुहाए।
दामिनी दमक रही घन माही।
खल की प्रीति जथा थिर नाही॥ "
मध्य जून से तटवर्ती क्षेत्रों से मानसून आने लगता है और जून-समाप्ति अथवा जुलाई लगते ही पा्रय: सारे भारतवर्ष में फैल जाता है । जब वर्षा क पहले मेघ आकाश में घिरते है,पहली फुहार के साथ देखते ही देखते वर्षा की झड़ी लग जातीहै तो जन-जीवन को चैन की साँस मिहलती है । सड़कें और गलियाँछोटी सी नदी का रूप धारण कर लेती है। बच्चे खुशी से भरकर बाहर निकल आते है। और कागत की छोटी छोटी नाव बनाकर उसे पानी में तैराते हुए और परनी में छप-छप करके उसे पानी में तैराते हुए ओर पानी में छप-छप करके खेलते हुए वर्षा का आनंद लेते है। पक्षी चहचहाने लगते है। कुम्हालाएं पेड़-पौधे हरे हो उठते है। प्रकृति में सर्वत्र हरियाली छा जाती है। जन-मानस में नए उमंग वे जोश का संचार होता हे। भारत एक कृषि प्रधान देश है इसलिए वर्षा के आगमन से ही किसानों की खुशी भी बढ़ जाती है। पूरी प्रकृति जैसे अपने चरम पर होती है। पत्तियों की धुल घुलने से उनमें एक नई चमक व ताजगी आ जाती है। पेड़-पौधे पुरवैया हवा में हिलते ऐसे लगते है।,मानों वे भी नाच-नाचकर झूम-झूमकर तथा सरर-सरर की मधुर ध्वनि में गा-गाकर वर्षा की रानी का शुभ स्वागत कर रहे है। पशुओं में भी जैसे नई खुशी का संचार हो जाता है। तालाबों व नदियों के किनारे बैठे मेंढ़कों की टर्र-टर्र आवाजें और मोर का अपनी धुन में थिरक-थिरक कर अपनी खुशी का इजहार करना इस बात का सूचक है। खेतों , बाग -बगीचों में टिमटिमाते जुगनु बहुत ही आकर्षक लगते हैं । रात के अंधेरें में चमकती बिजली किसी को प्रसन्न करती है, किसी को भयभीत करती है, तो किसी के सूने मन में किसी की याद के घाव को हरा कर देती हें कई गावों में वर्षा के आने की खुशी में वहाँ के रह-वासियों द्वारा अलग-अलग प्रकार के लोक-गीत गाये जाते है। तुलसीदास ने लिख है:-
'' दादुर धुनि चहुँ ओर सुहाई।
वेद पढें ज़नु बहु समुदाई॥''
कई गॉवों में इस दौरान सावन के मेलों का भी आयोजन किया जाता है। पूरे देश्या में वर्षा आरंभ होते ही वन-महोत्सव मनाया जाता है। सभी लोग नये-नये पौधे रोपते हैं। इसके साथ ही साथ वर्षा ऋतु अपने साथ कई अन्य त्यौहार भी लेकर आती है जिन्हें हमारे देश्या में सभी लोगों के द्वारा बहुत हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। :जैसे - जगन्नाथ भगवान की रथ-यात्रा का आयोजन, हरेली त्यौहार जो गाँव के लोगों द्वारा मनाया जाता हे, सावन सोमवार का महीना जिसमें कुवारियों व महिलाओं द्वारा भगवान शंकर का व्रत रखा जाता हैं,उनरके मंदिरों,शिवालयों के दर्शन किए जाते है व पूजन तथ व्रत -ज्ञापन जैसे कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है, तीज का त्योहार मनाया जाता है जिसमें महिलाए। अने-अपने घरों में सावन का झूला लगाती हैं व उसमें झूलती है, साथ ही रक्षा-बंधन, जन्माष्टमी तथा गणेश जी के बैठने का समय भी निकट आ जाता है जो कि वर्षा ऋतु के सबसे प्रसिध्द पर्व व त्योहार के रूप में भी जाने जाते है। वर्षा जहाँ इतनी आनंददायिनी है वह कुछ-कुछ कष्टदायिनी भी है। वर्षा की फुहार के साथ वह अपने साथ मक्खी -मच्छरों, पतंगों की सेना भी ले आती है। मलेरियों रोग भी इनका साथ देता है। निर्धनों,अकिंचनों तथा गृहहीनों के लिए तो वर्षा विशेष दुखदायिनी है। निर्धनों की झुग्गियों ,छप्परों तथा मकानों की कच्ची तथा टूटी छतों से पानी की धारें बहने लगती है और उनके घर की सभी वस्तुएं गीली होने के कारण खराब हो जाती है। और सड़ जाती हैष्। कई लोगों के घर भी अत्यधिक वर्षा के कारण आई बाढ़ से डूब जाते है और वे घर से बेघर हो जाते है। बाढ़ के कारण कई किसानों की खेती व फसल बर्बाद हो जाती है। सड़कें टूट जाता है। इसी प्रकार वर्षा ऋतु किसी के लिए वरदान की वर्षा करती है तो किसी पर कोप दृष्टि की । परंतु याद रखिए वर्षा हमारे जीवन का आधार है। इस पर हमारा जीवन और हमारे देश की उन्नति निर्भर करती है। अत: इसका बहुत महत्व है।
कीर्ति ओबेरॉय

गुरुवार, 7 अप्रैल 2011

bharat ke sant mahatma (navratna mandusiya ko परिवार में ईश्वर भक्ति का माहौल मिला)


रविदास/Ravidas

संत कवि रविदास/ रैदास
का जन्म वाराणसी के पास एक गाँव में सन 1398 में माघ पूर्णिमा के दिन हुआ था। रविवार के दिन जन्म होने के कारण उनका नाम रविदास रखा गया।

बचपन से ही रविदास को परिवार में ईश्वर भक्ति का माहौल मिला जिससे उनकी रूचि प्रभु-भक्ति में और बढ़ गयी। किसी साधु-संत के आने की सूचना मिलते ही वे ख़ुशी से नाच उठते थे। संतों की सेवा को वह परम सौभाग्य समझते थे।  कुछ बड़ा होने पर उन्होंने अपना पैतृक कार्य अपना लिया। वह जूते बनाते, गांठते जाते और भजन करते रहते। जूते बनाकर वे जो कुछ भी कमाते उसका अधिकांश साधु-संतों की सेवा में लगा देते। यह देखकर उनके माता-पिता को चिंता होने लगी कि कहीं यह सन्यासी न बन जाये। अतः उन्होंने रविदास का विवाह कर दिया। भगवान की भक्ति में यह विवाह सहायक सिद्ध हुआ। अब रविदास को प्रभु-भक्ति के लिए एक और साथी मिल गया था। रविदास की प्रवृत्ति भक्ति की ओर निरंतर बढती रही। वह गृहस्थ होकर भी विरक्त संत बन गए।

रविदास साधु-संतों की सेवा में अधिक धन व्यय कर देते थे। कड़ी मेहनत से कमाए गए धन को इस तरह से उड़ा देना उनके माता-पिता को अच्छा नहीं लगता था। पिता द्वारा कई बार समझाने पर भी रविदास के इस स्वभाव में कोई परिवर्तन नहीं आया। अंततः उन्होंने रविदास और उनकी पत्नी को घर से अलग कर दिया। तब रविदास घर के पिछवाड़े एक वृक्ष के नीचे झोंपड़ी बनाकर परम वैष्णव भक्त का जीवन बिताने लगे। यह झोंपड़ी ही उनकी संपत्ति थी। उसमें उन्होंने भगवान राम की प्रतिमा प्रतिष्ठित कर रखी थी। वह प्रभु-भक्ति व साधु-सेवा भी करते रहे और अपना पैतृक काम करते हुए रोजी-रोटी भी कमाते रहे। वे जो कुछ कमाते उसी में संतोष कर लेते थे। कभी-कभी तो उन्हें पत्नी सहित भूखे पेट सोना पड़ जाता था।

रविदास परम संतोषी व्यक्ति थे और एक सच्चे संत की भांति प्रभु-भक्ति में लीन रहते थे। उनकी दृष्टि में सांसारिक सुख, धन आदि का कोई महत्त्व नहीं था। कहा जाता है कि एक बार एक साधु उनके घर आये। रविदास की साधु-सेवा और श्रद्धा-भक्ति देखकर वह बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने रविदास को पारसमणि देनी चाही, जो लोहे को छूते ही सोना बना देती है। रविदास ने पारसमणि लेने से इनकार कर दिया क्योंकि उनके लिए राम से बड़ा कोई धन नहीं था। हारकर साधु पारसमणि को उनकी झोंपड़ी के छप्पर में खोंसकर चले गए। लगभग एक वर्ष बाद जब वह साधु वापस आये तो उन्हें पारसमणि यथास्थान रखी मिली। रविदास ने उसे छुआ तक नहीं था। रविदास की अनासक्ति देखकर वह आश्चर्यचकित रह गए। भक्तों का मानना है कि साधु के वेश में भगवान ही रविदास की परीक्षा लेने आये थे।

रविदास ने उस समय के प्रसिद्ध भक्त, दार्शनिक और गुरु स्वामी रामानंद से दीक्षा ली थी। गुरु रामानंद के सत्संग में उनके ज्ञानचक्षु पूरी तरह से खुल गए थे। वह अपना ज्ञान समस्त प्राणियों में बांटना चाहते थे। उन्होंने स्वयं लोगों को प्रवचन देना प्रारंभ कर दिया। उनके प्रवचनों में शास्त्रों की व्याख्या होती थी। वह आध्यात्मिक विषयों पर तर्कपूर्ण ज्ञान देते। प्रभावित होकर लोग उनके शिष्य बन जाते। वह सीधे-सरल पदों में गहरे भावों को भी बड़ी सरलता से प्रकट करते थे। धीरे-धीरे रविदास की ख्याति दूर-दूर तक फैलने लगी। उनके अनुयायियों की संख्या भी बढ़ने लगी।

रविदास की वाणी अत्यंत सरल, सुबोध, उदार विचारों व भक्ति-भावना से पूर्ण थी। वह अत्यंत विनीत, राग-द्वेषहीन, खंडन-मंडन की प्रवृत्ति से परे रहने वाले संत बन चुके थे। लोग उनकी आचार-पद्धति और वेद-शास्त्र के अनुकूल वाणी का रसपान करने के लिए दूर-दूर से आते थे। आडम्बर से दूर वह वाणी जनमानस की शंकाओं को सहज ही दूर करती थी। रविदासजी के बारे में कुछ कथाएं भी प्रचलित हैं।

एक ब्राह्मण रोज गंगा-स्नान करने के लिए जाता था। एक दिन रविदासजी ने उसे बिना दाम लिए जूते पहना दिए और निवेदन किया की गंगा को मेरी ओर से एक सुपारी अर्पित कर देना। ऐसा कहकर उन्होंने एक सुपारी ब्राह्मण को दे दी। ब्राह्मण ने यथाविधि गंगा की पूजा की और चलते समय उपेक्षापूर्वक रविदास की सुपारी दूर से ही गंगाजल में फेंक दी। अगले ही पल वह ठगा सा खड़ा रह गया। उसने देखा कि गंगाजी ने स्वयं हाथ बढाकर फेंकी गयी वह सुपारी ले ली। वह रविदास की सराहना करने लगे, जिसकी कृपा से उसने गंगाजी के साक्षात् दर्शन किये। ब्राह्मण के माध्यम से पूरी काशी में रविदास की भक्ति की प्रसिद्धि फ़ैल गयी। रविदासजी पर गंगाजी की साक्षात् कृपा थी। रविदासजी की सिद्धावस्था के बारे में प्रचलित है कि उन्होंने अपनी कठौती में ही गंगाजी के दर्शन कर लिए थे। कहा जाता है की एक बार रविदासजी भक्तों से घिरे सत्संग कर रहे थे। सामने कठौती में जल रखा हुआ था। रविदास और अन्य भक्तों ने देखा की गंगाजी स्वयं कठौती के जल में प्रकट होकर कंकण दे रही हैं। रविदास ने गंगाजी को प्रणाम कर उनकी कृपा के प्रतीक उस कंकण को स्वीकार कर लिया।

सिद्धावस्था पाने के बाद भी रविदासजी ने अपना पुश्तैनी काम नहीं छोड़ा। एक बार एक ब्राह्मण गंगा-स्नान को जा रहा था। रास्ते में उसकी जूती टूट गयी तो वह उसे ठीक करवाने के लिए रविदास जी के पास पहुंचा। ब्राह्मण ने उन्हें दमड़ी देते हुए गंगा नहाकर पुण्य प्राप्त करने को कहा। रविदास बोले, "भई, मन चंगा तो कठौती में गंगा। मैं तो अपनी कठौती में ही गंगाजी के दर्शन कर लिया करता हूँ। किन्तु आप यह दमड़ी मेरी ओर से गंगाजी को भेंट कर देना।"  ब्राह्मण ने रविदासजी की दमड़ी गंगाजी को भेंट की, जिसे गंगाजी ने स्वयं आकर स्वीकार किया और बदले में बहुमूल्य रत्न-जडित सोने का अलौकिक कंगन रविदास को भेंट करने को कहा। कंगन देखकर ब्राह्मण के मन में लालच आ गया। उसने वह कंगन एक बनिए को बेच दिया। धीरे-धीरे बातों-बातों में कंगन की ख्याति फैलते हुए राजा तक जा पहुंची। राजा ने वह कंगन मंगवाया और उसकी चमक देखकर स्तब्ध रह गया। उसने अपनी रानी को वह कंगन भेंट कर दिया। कंगन का आकर्षण देखकर वह राजा से दूसरा कंगन मंगाने के लिए हठ करने लगी। तब बनिए के द्वारा ब्राह्मण को दरबार में बुलाया गया। अपनी जान बचाने के लिए उसने सारी घटना राजा को सुना दी। फलतः रविदास को दरबार में बुलाया गया। राजा से सारी घटना सुनकर वह रानी के हठ पर विचार करने लगे। सहसा उन्होंने ध्यान किया और अपना हाथ कठौती में डाला। अगले ही क्षण उनके हाथ में ठीक वैसा ही कंगन था। कंगन पर रेत भी लगी थी, मानो अभी नदी से लाया गया हो। राजा सहित सभी उपस्थित लोग रविदासजी की भक्ति की प्रशंसा करने लगे। इस प्रकार रविदासजी की भक्ति और चमत्कारों का प्रताप दूसरे राज्यों में भी फ़ैल गया। लोग उन्हें अपने घर बुलाने लगे। रविदास जी उनके बीच जाकर धर्म का प्रचार करते।                                 

एक बार एक धनी व्यक्ति उनके सत्संग में शामिल हुआ। सत्संग की समाप्ति पर संतों ने भगवान के चरणों का अमृतपान किया। धनी व्यक्ति ने यद्यपि चरणामृत ले लिया, किन्तु वह चमार के घर का था, इसलिए आँख बचाकर उसे फेंक दिया। घर आकर उसने स्नान किया और नए कपडे पहने। चूंकी चरणामृत की कुछ बूँदें उसके कपड़ों पर गिर गयी थीं इसलिए उसने वे कपडे एक कोढी व्यक्ति को दे दिए। कुछ ही दिनों में वह धनी व्यक्ति कोढ़ का शिकार हो गया, जबकि कोढी व्यक्ति का रोग धीरे-धीरे दूर हो गया। यह देखकर धनी व्यक्ति पुनः चरणामृत लेने आया; किन्तु उसके मन में आदर व श्रद्धा का भाव न था। यह जानकर रविदास ने कहा कि अब तो पानी ही बचा है, चरणामृत नहीं।

संत रविदास भक्त कवि और राजयोगी थे। उनकी दृष्टि में कर्म ही धर्म था। उनके कई भजन व पद आज भी बड़ी श्रद्धा के साथ गाये जाते हैं। "प्रभु जी तुम चंदन हम पानी..." रविदास जी का ही भजन है।
Please send corrections to {navratnasurera@yahoo.com&mandusiya@gmail.com]    {Last updated June 15, 2010}

बुधवार, 6 अप्रैल 2011

Kabir Saheb कबीर साहेब

कबीर पंथ 

The Kabir Panth ("Path of Kabir") is a religious community of India that recognizes the fifteenth-century devotional poet Kabir as its founder. कबीर पंथ ("कबीर के पथ") के एक धार्मिक समुदाय है भारत कि कवि पहचानता पंद्रहवीं सदी के भक्ति कबीर संस्थापक के रूप में अपनी. It includes people of both Hindu and Muslim ancestry (although the overwhelming majority are Hindu [ 1 ] ) and the ritual life of the community displays its dual origins. यह दोनों के लोगों के भी शामिल हिन्दू और मुस्लिम वंश (बहुमत हालांकि भारी कर रहे हैं हिंदू [1] ) और सामुदायिक जीवन अनुष्ठान मूल को प्रदर्शित करता है अपनी दोहरी. It is difficult to estimate the actual number of Kabir panthis in India , since religious affiliations tend to overlap, but estimates of 9,600,000 are given.but some of them are Sant Garib Das and Maharaj Bhuriwale Sampraday found in all the provinces of Upper and Central India are well preacher of kabir Baani., [ 2 ] notably Punjab , Himachal Pradesh , Jammu & Kashmir , Haryana & Uttar Pradesh The two peeth of Kabirpanth is- Benaras and Kawardha in Chhattisagarh>Kawarda peth was stablished by Kabir's main disipel Dharamdas, who was a Kasundhan Baniya>, [ 3 ] the Kabir panth also has followers throughout the Indian diaspora, particularly in the United States, Canada, the Caribbean and Mauritius. [ citation needed ] यह मुश्किल है में कबीर की panthis संख्या वास्तविक आकलन भारत , के बाद से धार्मिक जुड़ाव के लिए करते हैं ओवरलैप करते हैं, लेकिन 9,600,000 का अनुमान संत कुछ given.but हैं उन्हें गरीब दास महाराज और Bhuriwale सम्प्रदाय इंडिया सेंट्रल के ऊपरी और प्रांतों में पाया सभी Baani हैं कबीर की अच्छी तरह से उपदेशक., [2] विशेष रूप से पंजाब , हिमाचल प्रदेश , जम्मू कश्मीर , हरियाणा और उत्तर प्रदेश , कौन था Dharamdas disipel दो पीठ का Kabirpanth कवर्धा है, बनारस और में मुख्य है> Chhattisagarh Kawarda Peth था stablished द्वारा कबीर एक बनिया Kasundhan>, [3] कबीर पंथ भी मॉरीशस कैरेबियन, कनाडा, और संयुक्त राज्य अमेरिका है अनुयायियों भर में भारतीय मूल के, विशेष रूप में. [ प्रशस्ति पत्र की जरूरत ]

नवरत्न मन्डुसिया

शादियों में फिजूलखर्ची रोककर शिक्षा पर धन खर्च करने का आह्वान, विवाह के नियम हुये आसान, सामूहिक विवाह के लिए उमड़े सैकड़ों लोग

 मेघवाल समाज का ऐतिहासिक फैसला, नानी का गोत्र छोड़ने की कुप्रथा बंद, अब शादियों के लिए मिलेंगे ज्यादा विकल्प कस्बे के टापरी रोड़ स्थित मेघवाल ...