सोमवार, 12 मार्च 2018

कोर्ट में झूठी गवाही देने वाले को मिलती है सजा


Updated Jul 19, 2015, 08:00 AM IST
राजेश चौधरी, लीगल फोरम
क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम में गवाहों का रोल अहम है। जैसे ही किसी मामले में आरोप तय हो जाते हैं, उसके बाद अभियोजन पक्ष के गवाहों के बयान दर्ज किए जाते हैं। कई बार ऐसे भी मामले देखने को मिलते हैं, जब गवाह अपने बयान से मुकर जाते हैं। उस वक्त कोर्ट यह देखता है कि गवाह झूठ तो नहीं बोल रहा है। अगर कोर्ट को लगता है कि गवाह ने शपथ लेकर झूठे बयान दर्ज कराए हैं तो अदालत ऐसे गवाह के खिलाफ एक्शन लेने का आदेश दे सकती है।
कानूनी जानकार मुरारी तिवारी बताते हैं कि मुकरने वाले गवाह का मतलब होता है अदालत के सामने पुलिस की कहानी को सपोर्ट न करने वाला गवाह। अदालत में शपथ लेकर झूठ बोलने के मामले में दोषी पाए जाने पर सजा का प्रावधान है। जब पुलिस किसी क्रिमिनल केस को दर्ज करती है तो उसके बाद वह छानबीन शुरू करती है और इस दौरान वह गवाहों के बयान दर्ज करती है। उन गवाहों के बयान और साक्ष्य के आधार पर पुलिस छानबीन पूरी करने के बाद चार्जशीट दाखिल करती है। फिर चार्ज पर बहस होती है। अगर पहली नजर में आरोप पुख्ता हैं तो अदालत आरोपी के खिलाफ चार्ज फ्रेम कर देती है और ट्रायल शुरू होता है। इस दौरान पहले अभियोजन पक्ष के गवाहों के बयान दर्ज किए जाते हैं। छानबीन के दौरान जांच एजेंसी या पुलिस जिसे चाहे अभियोजन पक्ष का गवाह बना सकती है।
शपथ लेकर बयान
पुलिस सीआरपीसी की धारा-161 के तहत उक्त गवाह के बयान दर्ज कर सकती है और उसका पता आदि लिखती है। साथ ही गवाह को यह बताती है कि उसे कोर्ट से समन मिलने पर गवाही के लिए आना होगा, हालांकि उक्त बयान पर गवाह के दस्तखत नहीं होते। पुलिस को जब गवाह पर यह शक हो कि वह अपने बयान से मुकर सकता है तो वह गवाह का बयान मैजिस्ट्रेट के सामने भी करवाती है। मैजिस्ट्रेट के सामने धारा-164 के तहत बयान दर्ज किए जाते हैं। बयान के वक्त मैजिस्ट्रेट गवाह से पूछता है कि उस पर कोई दबाव तो नहीं है। गवाह जब बताता है कि वह अपनी मर्जी से बयान दे रहा है, तब मैजिस्ट्रेट उसे दर्ज करता है।
कई बार ट्रायल के दौरान गवाह आरोप लगाता है कि पुलिस ने जबरन बयान दर्ज किया है और उसने उक्त बयान नहीं दिए थे, लेकिन मैजिस्ट्रेट के सामने दिए बयान से उसके लिए मुकरना आसान नहीं होता। हाई कोर्ट के सरकारी वकील नवीन शर्मा बताते हैं कि धारा-161 या 164 के बयान के बावजूद ट्रायल कोर्ट के सामने गवाह जो बयान देता है, वही बयान आखिरी होता है। ट्रायल कोर्ट में बयान के वक्त गवाह को शपथ लेना होता है और फिर वह बयान दर्ज कराता है। अगर अदालत को लगता है कि गवाह सच बोल रहा है और बयान पुलिस के सामने दिए बयान से पूरी तरह न भी मिलता हो, तो भी उसके बयान के उस पार्ट को स्वीकार किया जाता है जो अभियोजन पक्ष के फेवर में है।
झूठ बोलने पर सजा
एडवोकेट अजय दिग्पाल बताते हैं कि अगर कोई अभियोजन पक्ष यानी सरकारी गवाह पुलिस और मैजिस्ट्रेट के सामने दिए बयान से मुकरे तो अभियोजन पक्ष के वकील उसके साथ जिरह करते हैं और जिरह के दौरान सच्चाई सामने लाने की कोशिश करते हैं। इस दौरान उक्त गवाह को मुकरा हुआ गवाह करार दिया जाता है। इसका मतलब हमेशा यह नहीं है कि गवाह झूठ बोल रहा है। कई बार पुलिस गलत तरीके से बयान दर्ज कर लेती है और तब गवाह पुलिस द्वारा लिखे गए बयान से अलग बयान देता है। लेकिन बयान और साक्ष्य देखकर अदालत यह देखती है कि गवाह शपथ लेकर झूठ तो नहीं बोल रहा है। अगर अदालत इस बात से संतुष्ट हो जाती है कि गवाह ने शपथ लेकर झूठ बोला है तो ऐसे गवाहों के खिलाफ सीआरपीसी की धारा-340 के तहत अदालत शिकायत कर सकती है। ऐसे गवाह के खिलाफ अदालत में झूठा बयान देने के मामले में आईपीसी की धारा-193 के तहत मुकदमा चलाया जाता है। इसमें दोषी पाए जाने पर 7 साल तक कैद की सजा हो सकती है।

अधिक जानकारी के लिए यहां किल्क करे 
https://www.google.co.in/amp/s/m.navbharattimes.indiatimes.com/metro/delhi/crime/giving-false-evidence-in-court-draws-punishment/amp_articleshow/48127325.cms

बुधवार, 7 फ़रवरी 2018

250 साल से एक मंदिर बेटियों की शादी के लिए जाना जाता है


मेघवाल समाज में मंदिर में होती है शादी, 250 सालों से चली आ रही परम्परा

शहर से 10 किलोमीटर दूर आटी मालाणी गांव की पहाडिय़ों की तलहटी में स्थित मेघवाल समाज के जयपाल गौत्र की कुलदेवी चामुंडा माता का मंदिर। यह मंदिर बेटियों की शादी के लिए जाना जाता है। जयपाल समाज की सदियों से परम्परा रही है कि बेटी का विवाह मंदिर परिसर में ही होता है। इस कारण उनके घर के आंगन आज भी कुंवारे हैं। कहा जाता है कि घर के आंगन में जब तक बेटी का विवाह नहीं होता, तब तक उसे कुंवारा ही माना जाता है। मंदिर में शादी की परम्परा के बारे में गांव के बुजुर्ग चेतनराम जयपाल की मानें तो लगभग 250 वर्षों से यह परम्परा चली आ रही है। 
एेसे हुई शुरुआत
लगभग 250 वर्ष पूर्व जैसलमेर के खुहड़ी गांव से जयपाल गौत्र के लोग आटी आकर बसे। तब वह खुहड़ी गांव से अपने साथ में लकड़ी के पालणे में माताजी की प्रतिमा लेकर आए। आटी गांव में तत्कालीन जागीरदार हमीरसिंह राठौड़ ने उन्हें यहां पर बसने के लिए स्थान दिया। उस स्थान पर बिरादरी के लोगों ने मंदिर बनाकर माताजी की प्रतिमा की प्रतिष्ठा कर दी। मंदिर को ही अपना घर मान लिया। उस समय विवाह योग्य बेटी की शादी मंदिर में ही हुई। फिर यह परम्परा बन गई, जो आज भी कायम है।
पाट बिठाई से विदाई तक सब मंदिर में
बेटी के विवाह का आयोजन पाट बिठाई से शुरू होता है। जयपाल समाज के लोग पाट बिठाई मंदिर से करते हैं। फिर फेरे, भोजन व विदाई तक का कार्यक्रम मंदिर परिसर में ही होता है। इस दौरान आस-पास रहने वाले परिवार विवाह का सामान लेकर मंदिर में ही रुकते हैं। बारात को भी मंदिर में रुकवाते हैं। एक ही स्थान पर सम्पूर्ण कार्यक्रम होता है।
बेटे की बारात भी मंदिर से रवाना
मंदिर परिसर में बेटियों की शादी होती है। वहीं बेटे की शादी में पाट बिठाई की रस्म व बारात की रवानगी भी मंदिर से होती है। बारात के आगमन पर नववधु को भी मंदिर में रुकवाया जाता है। इस दौरान मंदिर में रात को जागरण व अगले दिन सुबह पूजा-पाठ करने के बाद ही नववधू गृह प्रवेश करती है।
सप्तमी पर भरता है मेला
मंदिर में भादवा व माघ सुदी सप्तमी को मेला भरता है। इस दौरान गौत्र सहित आस-पास के लोग मंदिर में पूजा-अर्चना करने आते हैं। नए दूल्हे व दुल्हन शादी की प्रथम चूनड़ी मंदिर में चढ़ाते हैं।
बलि प्रथा पर रोक
मंदिर कमेटी के मंत्री हीरालाल जयपाल बताते हैं कि लगभग 135 वर्ष पहले तक शादी के अवसर पर बलि प्रथा प्रचलित थी, लेकिन जयपाल गौत्र में जन्मे महंत प्रागनाथ महाराज ने इस प्रथा को बंद करवाया। तब से लेकर आज तक बलि प्रथा पर रोक कायम है।
मंदिर ही हमारा घर
सदियों से चली आ रही परम्परा को आज भी कायम रखा है। मंदिर को ही घर मानते हैं। बेटियों की शादी मंदिर में ही होती है।
मेताराम जयपाल, अध्यापक, राउप्रावि आटी
मंदिर में शादी शुभ
जयपाल गौत्र की कुलदेवी चामुंडा माता मंदिर में ही बेटियों की शादी होती है। मंदिर में शादी करना शुभ माना जाता है। परम्परा कायम है।
रणजीत जयपाल, सरपंच, ग्राम पंचायत आटी

https://m.patrika.com/story/barmer/also-refresh-a-fraternity-whose-courtyard-centuries-loner-2233372.html

यहाँ ईंट की होती है कुलदेवी रूप में पूजा : बूढ़ादीत की ईंट माता Eent Mata Temple Budhadeet

कहते हैं कि भगवान् कण-कण में विराजमान हैं। जल,थल व आकाश में ऐसा कोई स्थान नहीं जहाँ ईश्वर का वास न हो। देवभूमि भारत के वासियों की अटूट श्रद्धा का इस संसार में कोई थाह नहीं। हम प्रकृति ही नहीं बल्कि किसी भी वस्तुमें देवदर्शन कर सकते हैं। जैसा कि आप जानते हैं कि मनुष्य में अपार आस्था व श्रद्धा हो तो साधारण से पत्थर में भी भगवान दिखाई दे जाता है। इसका एक अनुपम उदाहरण है – राजस्थान में कोटा जिले की दीगोद तहसील के गाँव बूढ़ादीत में स्थित ईंट माता का मन्दिर। सुनने में आपको भले ही थोड़ा आश्चर्यजनक लगे परन्तु आज के लगभग एक हजार वर्षों से इस गाँव में एक ईंट को देवी स्वरूप में पूजा जाता है। ना सिर्फ पूजा जाता है बल्कि यह मीणा समाज में कंजोलिया व करेलवाल गोत्रों की कुलदेवी है। दरअसल उस समय मूर्ति का निर्माण आसान नहीं था अतः माँ के भक्तों ने ईंट को ही माँ भगवती का स्वरुप मानकर उसकी स्थापना कर दी, और आज एक सहस्त्राब्दी बीत जाने पर भी वह ईंट बिना किसी क्षति के यथावत विराजित और पूजित है।

ईंट माता की स्थापना के सम्बन्ध में एक घटना इस प्रकार बताई जाती है कि बूढ़ादीत कस्बे में ब्राह्मण रहते थे। मीणा समाज के कंजोलिया (अन्यत्र करेलवाल) गोत्र के मीना एवं मेघवाल जाति के लोग 5-6 मील दूर रहते थे। मीणा समाज की स्त्रियां जब बूढ़ादीत गाँव में से जाती तो वहां के निवासी उन पर व्यंग्य करते। एक दिन स्त्रियों ने यह बात अपने परिवारजनों को बता दी। स्वाभिमान का प्रश्न मानकर मीणाओं ने बूढ़ादीत गाँव पर हमला कर दिया और वहां रहने वालों को गाँव से भगा दिया और वहीं रहने लगे।
डॉ रघुनाथ प्रसाद तिवारी ने अपनी पुस्तक ‘मीणा समाज की कुलदेवियाँ’ में लिखा है कि “मीणा समाज और मेघवाल समाज जो बूढ़ादीत में आबाद हो गए वे मकानों की चिनाई का काम करते थे। चिनाई के काम में ईंटों का प्रयोग होता था, वह उनकी आमदनी का साधन था, अतः उन्होनें ईंट को अपनी कुलदेवी मानते हुए उसकी कुलदेवी के रूप में खुले आकाश के नीचे स्थापना कर दी। बाद में चबूतरा बनाकर उस पर ईंट माता को विराजित कर दिया। कंजोलिया गोत्र के `मीणा व मेघवाल दोनों ही समाज के लोग माता की पूजा करते थे। मीणा समाज माता को रोटी एवं खीर का भोग लगाते थे।जो आज भी वही भोग माता को अर्पित किया जाता है। मेघवाल समाज माता के लिए घी लाता था। मीणा एवं मेघवाल समाज में कुछ समय बाद मतभेद हो गया। कारण था मीणा समाज पहले पूजा करता था तथा मेघवाल समाज को पूजा हेतु घी चढ़ाने का अवसर बाद में मिलता था। जब मंदिर के चबूतरे पर जाकर मेघवाल समाज पूजा करने लगा तथा रोटी व खीर का भोग लगाने लगा तो मीणाओं ने इसका विरोध किया। फलतः मेघवाल समाज ने ईंट माता का अपना अलग मंदिर बना लिया। वह मंदिर भी खुले आकाश के नीचे ही है। दोनों ही मंदिरों में माता की कोई गुमटी नहीं है।”

लाल ईंट से नहीं बनाते मकान :

यहाँ के मीणा ईंट को अपनी कुलदेवी के रूप में मानते हैं,अतः ये लोग लाल ईंट का उपयोग अपने मकान आदि बनाने में नहीं करते हैं।
चैत्र एवं आश्विन के नवरात्रों में भक्तों की अपार भीड़ लगती है। माता को रोटी एवं खीर का ही भोग लगाया जाता है। ईंट माता की पूजा-अर्चना संबंधित समाज के व्यक्ति ही करते हैं।

मीणा समाज की सती माता :

डॉ रघुनाथ प्रसाद तिवारी ने यहाँ के मीणा समाज की सती माता का भी उल्लेख करते हुए लिखते हैं “कुछ बूढ़ादीत के मीणा समाज का एक कथानक यह भी है कि लगभग 700 वर्ष पूर्व कंजोलिया समाज में एक गृहस्थ संत श्री कन्हैयालाल जी हुए थे। उनके दो पत्नियां थी। एक रोज अनायास कन्हैयालाल जी का स्वर्गवास हो गया। एक पत्नी जो घर पर थी उसने सती होने का निर्णय लिया। उनकी दूसरी पत्नी गोबर बीनने हेतु गई हुई थी। जब उसको अपने पति के देहावसान की जानकारी हुई तो गोबर से भरी तगारी उसके हाथों से छूट गई। गोबर की तगारी लुढ़कती हुई नारियल में परिवर्तित हो गई। दूसरी पत्नी ने भी नारियल हाथ में लेकर सती होने का निर्णय लिया। जिस स्थान पर गोबर नारियल के रूप में परिवर्तित हुआ वही कन्हैयालाल जी का दाहसंस्कार हुआ और आज वह मंदिर की मान्यता के रूप में पूजित है। कंजोलिया गोत्र के मीणे यहां जात जडूले उतारते हैं तथा बसंत पंचमी को अपनी बहन-बेटियों को बुलाकर उन्हें भेंट स्वरूप यथा साध्य उपहार देते हैं। सती माता के मंदिर में एक हवन कुंड भी बना हुआ है। सती माता की मूर्तियों को लड्डू एवं बाटी का भोग लगाया जाता है।”

प्राचीन सूर्य मंदिर :

बूढ़ादीत का अर्थ है बूढ़ा-पुराना, दीत- सूर्य। ग्राम में नवीं शताब्दी का एक प्राचीन सूर्य मंदिर भी है जो ग्राम के तालाब की पाल पर पूर्वाभिमुखी है। मंदिर का शिखरबंध दर्शनीय है। मंदिर पंचायतन शैली का बताया जाता है।

मंगलवार, 30 जनवरी 2018

परम श्रध्देय श्री बंशीदास जी महाराज की प्रथम बरसी पर शत-शत नमन.....


स्मृति शेष....
संघर्षशील वयक्तित्व के धनी परम श्रद्धेय श्री बंशीदास जी महाराज सांगलपति
 (मेघवाल समाज के नवरत्न मंडुसिया के  सामाजिक ब्लॉग की ओर से स्वामी बंशी दास जी महाराज को शत शत नमन
भीम प्रवाह न्यूज, सीकर। राजस्थान का शेखावाटी क्षैत्र वीर सपूतो की संत महापुरूषो की धरा के नाम से जाना जाता है। यहां कि धरा पर हजारो ऐसे शूरवीर हुए है जिन्होने देश सेवा में अपने प्राणो की आहुति देकर शेखावाटी व देश का नाम रोशन किया है। यहां का रहन शहन,खान-पान,भाषा व भोगोलिक वातावरण देश में अपनी अलग पहचान रखता हैं। यहां के धार्मिक स्थलों के कारण क्षैत्र की देशभर में विशेष पहचान हैं। यहां के साधु संतो व्दारा लोककल्याणार्य करवाए गए कार्य सदैव जन जन की जुबान पर रहते हैं।
 शेखावाटी के सीकर जिला मुख्यालय से 35 किलोमीटर दूर सांगलिया नामक गांव स्थित हैं। इस गांव की धार्मिक पीठ बाबा लक्कड़दास आश्रम,सांगलिया धूणी के कारण आज देशभर में इसकी विशेष पहचान हैं। धूणी पर प्रतिवर्ष देश के कौने कौने से हजारो लोग पहुंचते है व यहां के संतो व्दारा करवाए गए अनुकरणीय कार्यो का स्मरण करते हैं।

धूणी की स्थापना लगभग 400 वर्ष पूर्व बाबा लक्कड़दास ने की थी। बाबा के बारे में अनेक दंतकथाए प्रचलित हैं। गांव की चौपाल पर बैठे लोग आज भी उनके चमत्कार व पर्चो के बारे में बताते रहते हैं। धूणी पर बाबा मलूकदास,मंगलदास,दुलादास,रामदास,अघोरीदास,मानदास,कूमदास,लादूदास,खींवादास,भगतदास सहित अनेक संतो ने अपनी वाणी से अनवरत जन चेतना की अलख जगाई। ऐसे ही संतो की श्रृंखला में परम श्रध्देय श्री खींवादासजी महाराज के परम शिष्य श्री बंशीदास जी महाराज हुए।

बंशीदास जी महाराज का जीवन परिचय

 12 अक्टूबर 1974 को सीकर जिले के लांपुवा गांव में माता श्रीमती ग्यारसी देवी की कोख से पिता श्री घीसाराम जी बरवड़ के घर एक बहुमुखी प्रतिभाशाली बालक का जन्म हुआ। बचपन से ही शोम्य व श्यामवर्णी इस बालक का नाम माता पिता ने बंशी रखा। बालक बंशी अपने सभी भाई बहनो में सबसे ज्यादा चंचल थे। बालक बंशी की बाल्यकाल की गतिविधीयो से परिवारजनो को भी ये लगने लगा था कि ये जरूर आगे चलकर बड़ा नाम कमायेगा। ये ही बालक बंशी बाद में सांगलिया धूणी के पीठाधीश्वर खींवादासजी महाराज के उतराधिकारी बना व सांगलिया पीठ की गद्दी पर पदासीन किए गए।
बंशीदासजी की प्रारंभिक शिक्षा पैतृक ग्राम लांपुवा तथा आभावास व रींगस में हुई। मैट्रीक तक की शिक्षा के बाद सन-1993 में आप अपने बड़े भाई जगदीश प्रसाद बरवड़ प्र.अ. के साथ प्रतियोगी परिक्षाओ की तैयारी हेतु सीकर आ गए। लेकिन पढ़ाई में मन नही लगने के कारण आप बार - बार सांगलिया धूणी आते रहे। उच्च शिक्षा ग्रहणकर अच्छी नौकरी के प्रयास करने हेतु आपके पिताजी, बड़े भाई लक्ष्मणसिंह,जगदीश प्रसाद व सुरेश बरवड़ ने उनको काफी समझाईश की पर वे नही माने और उन्होने मन की बात बताते हुए कहा कि मैं तो साधु बनूंगा। माता -पिता के लिए ये किसी वज्रपात से कम नही नही था।

सन्यास व धूणी से पारिवारिक जुड़ाव

सांगलिया धूणी से पारिवारिक जुड़ाव का होना भी बंशीदास का सन्यास की ओर रूख होने का मुख्य कारण रहा। आपके ननिहाल दांतला,रेलवाली ढ़ाणी व दिल्ली प्रवासी आपके मामाजी रामदेव जी व गणपत जी गर्वा के यहां धूणी के भूतपूर्व पीठाधीश्वर लादूदास जी व खींवादास जी महाराज का लगातार आना जाना रहता था। आपके सबसे छोटे मामाजी मंगलाराम गर्वा बताते है कि बाबाजी एक-एक महिने तक अपने घर पर प्रवास पर रहते थे। इस दौरान भजन,सत्संग व ज्ञान चर्चाएं होती रहती थी। वे बताते है की बंशीदास का भी ननिहाल में आना जाना और संतो की संगत से बाबा खींवादास जी की ओर रूझान हुआ। इसी से उसने संत मार्ग का रूख किया। तथा उन्होने 7 जून 1995 को बाबा खींवादास जी महाराज से दीक्षा ली। दीक्षा से कुछ दिनो पहले की बातो को याद करते हुए आपके बड़े मामा मालाराम जी गरवा बताते हैं कि उनके विषय में बात करते हुए खींवादासजी महाराज ने पूछा था कि मालाराम ये बंशी तेरा भांजा है क्या? ये साधु बनना चाहता हैं और तेरा भांजा है तब तो आगे चलकर ठीक ही निकलेगा।

मास्टर, बंशीदास नही मैं खुद ही आया हूं.....

अतीत के पन्नो पर नजर डालते हुए सोटवारा के मोहनलाल जी बजाड़ बताते है कि बाबा जी को व्यक्ति की बहुत ज्यादा पहचान थी। वे बार बार बंशीदास जी के बारे में बोलते थे कि मास्टर मैने एक साधु चुना है मैरे जाने के बाद इस सांगलपंथी संप्रदाय के वारिस हेतु, ये बंशीदास ठीक नजर आता हैं क्या ? मैरा भी ये ही जवाब रहता था बाबाजी आपने जिसको चुना ही वह ठीक नही सर्वोतम हैं। 
वर्ष 2000 के अंतिम दिनो में बाबाजी का स्वास्थय खराब रहने लगा था। इस दौरान वे सत्संग कार्यक्रम तो ले लेते थे पर जा नही पाते थे। इन सत्संग आयोजनो मे वे बंशीदासजी को ही भेजते थे। मोहन जी बताते हैं कि मैने भी अपने दिवं. सुपुत्र गुरूदयाल की प्रतिमा स्थापना कार्यक्रम में बाबा जी को आमंत्रित किया था पर बाबा जी स्वास्थय कारणो से नही आए तथा उन्होने बंशीदासजी को भेजा। जब बाबा जी को टेलिफोन पर उनके नही आने की पीड़ा मैने उनके सामने वयक्त की तो बाबाजी बोले मास्टर मैं नही आ सकता। अब मैरी सत्संग करने की क्षमता नही है। आप ये मानो ये बंशीदास नहीं मैं खुद ही आया हूं। तब मुझे साफ स्पष्ठ समझ आ चुका था कि बाबाजी का वारिस बंशीदास ही हैं। वे बताते है कि सांगलिया धूणी में आज तक बंशीदासजी जैसा निडर व दबंग साधु नही हुआ।

बाबा खींवादास जी की विशेष अनुकंपा

जीवन के 75 बसंत देख चुके धूणी के भक्त सोटवारा (झुंझुनूं) निवासी मोहनलाल जी बजाड़ का कहना कि भगतदास जी और बंशीदास जी महाराज में शुरू से ही विशेष प्रेम था। ये प्रेम भ्रात्तवभाव वाला था। वे दोनो हमेशा सगे भाई की तरह रहे। खींवादास जी महाराज व्दारा 1993 में हरिदास जी महाराज के निधन के पश्चात भगतदास जी को भंडारी की चादर दी गई थी। 1995 में बंशीदास जी महाराज ने खींवादास जी महाराज से दीक्षा ली। खींवादास जी महाराज की उम्र के अंतिम पड़ाव व बाबा खींवादास महाविद्यालय के स्थापनाकाल में बंशीदास के आने के बाद खींवादास बाबा जी स्वयं को काफी हद तक सुरक्षित व तनावमुक्त समझने लगे थे। बाबा जी को भी ये लगने लगा था कि अब धूणी व कॉलेज के कामकाज को संभालने वाला योग्य शिष्य आ गया है। इसी के चलते उन्होने बंशीदास जी को बाबा खींवादास सांगलपीठ शिक्षण एवं अनुसंधान संस्थान के कोषाध्यक्ष का कार्यभार सौपा। बाबा खींवादास महाविद्यालय का संपूर्ण निर्माण कार्य बंशीदास जी की देखरेख में पूर्ण हुआ। बाबा जी का आप पर विशेष स्नेह,विश्वास और अनुकंपा थी।

संघर्षशील वयक्तित्व के धनी

बाबा बंशीदास शुरू से ही संघर्षशील वयक्तित्व के धनी रहें। बाबा खींवादासजी के ब्रह्मलीन होने के पश्चात उनके उतराधिकारी चयन को लेकर जो कुछ सांगलिया धूणी में हुआ। वो किसी से छुपा हुआ नही हैं। उनके स्मृति दिवस पर मैं वो सब यहां बयां नही करूंगा। बाबाजी के निधन के बाद धूणी की गद्दी पर भगतदासजी महाराज को पदासीन किया गया। 24 मई 2001 में उन्होने सांगलिया गांव में ही धूणी के समतुल्य बाबा बंशीदास आश्रम की स्थापना की व आश्रम में खींवादास जी महाराज की प्रतिमा स्थापित की। अभी बंशीदास आश्रम का नवनिर्माण पूरा भी नही हुआ था।  लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था और 4 फरवरी 2004 को भगतदास जी महाराज का आकस्मिक निधन हो गया। जिसके बाद ग्रामवासियो व धूणी के भक्तो की भावनाओ की कद्र करते हुए उन्होने धूणी का कार्यभारा संभाला व सांगलपति बने।

अविस्मरणीय योगदान

शिक्षा स्वास्थय व समाज सेवा के क्षैत्र में बंशीदासजी महाराज का योगदान युगो युगो तक याद किया जायेगा। आपके व्दारा खींवादासजी व्दारा स्थापित बाबा खींवादास महाविद्यालय,छात्रावास,गौशाला,सैकड़ो छोटे बड़े आश्रमो का सफल संचालन किया गया। तथा विविध लोक कल्याण के कार्यक्रम संचालित किए गये। सैकड़ो निराश्रित बच्चो को उच्च शिक्षा हेतु छात्रवृतियां दी गई। गरीब व अनाथ बालिकाओ की शादियो में भी बाबाजी का सदैव सहयोग रहा। आपके द्वारा लगभग तीन दर्जन विविध स्थानो पर बाबा खींवादासजी की प्रतिमाएं स्थापित की गई। बाबा लक्कड़दास आश्रम,खींवादास महाविद्यालय व अन्य संस्थाओ में भी आपके द्वारा करोड़ो रूपये का नवनिर्माण कार्य करवाए गए।

अंतिम यात्रा में उमड़े देशभर के हजारों अनुयायी

सांगलिया धूणी के पीठाधीश्वर बंशीदास जी महाराज का 4 फरवरी 2017 को प्रात: 7.40 बजे आकस्मिक निधन हो गया।  दो दिन पूर्व अचानक तबीयत खराब होने पर उनको महात्मा गांधी अस्पताल जयपुर में एडमीट करवाया गया था। जहां सुधार नही होने पर रात्रि 1बजे उन्हे धूणी लाया गया था। जहां प्रात:4 फरवरी को 7.40बजे सांगलिया आश्रम में उन्होंने अंतिम सांस ली। बाबा की पार्थिव देह अंतिम दर्शनार्थ सांगलिया धूणी पर रखी गई। जहा शाम तक हजारों भक्तो व साधु संतो ने बाबा को श्रद्धांजलि अर्पित कर अंतिम दर्शन किए। आश्रम पर 17 दिन तक हुई श्रध्दांलि सभा में भी देश के कोने कोने से हजारो अनुयायी सांगलिया पहुंचे।

जब तक सूरज चांद रहेगा बाबा तेरा नाम रहेगा....

बाबा की अंतिम यात्रा 1बजे सांगलिया गांव के मुख्य मार्गो से निकली। अंतिम यात्रा में भक्तो ने जब तक सुरज चांद रहेगा बाबा तेरा नाम रहेगा,बाबा बंशीदास अमर रहे,बाबा बंशीदास की जय के जयकारो से आसमान गुंजा दिया। इसके पश्चात सांय 4बजे बाबा लक्कड़दास आश्रम सांगलिया में उनको उनके गुरू खींवादासजी महाराज की  समाधी के सम्मुख समाधि दी गई। इसके पश्चात धूणी की महाआरती का आयोजन हुआ। शिक्षा, स्वास्थ्य व समाज सेवा के क्षेत्र मे बाबा के योगदान को युगो युगो तक याद किया जायेगा।

अजीब संयोग...
4 फरवरी का अजीब संयोग...
विदित रहे कि बाबा खींवादास जी महाराज के देहावशान के पश्चात धूणी के पीठाधीश्वर बने संत भगतदास महाराज का निधन भी 4 फरवरी (वर्ष -2004) को हुआ था। तथा बंशीदास जी महाराज का निधन भी 4 फरवरी को ही हुआ। ये अजीब संयोग उनके अनुयायियो में विशेष चर्चा का विषय रहा।

रोते बिलखते पहुंचे देश के कौने कौने से अनुयायी,नही जले चूल्हे....

सांगलिया पीठाधीश्वर बंशीदास जी महाराज निधन के सूचना मिलते ही देश के कौने कौने में मौजूद उनके भक्तो व अनुयायियों में शोक की लहर फैल गई। आज अंतिम यात्रा में राजस्थान प्रांत के साथ साथ पंजाब, हरियाणा, दिल्ली व यूपी सहित कई राज्यो के हजारों भक्तो रोते बिलखते आश्रम पहुंचे। बाबा के पैतृक गांव लांपुवा से भी बाबा के बड़े भाई लक्ष्मण सिंह,जगदीश प्रसाद अ. इंजीनियर सुरेश बरवड़ व मदनलाल सहित परिजन व सैकड़ो ग्रामवासी अंतिम दर्शनार्थ पहुंचे। आश्रम में उमड़ी भीड़ से शाम तक परिसर में तिल रखने को भी जगह नही थी। जिससे पुलिस प्रशासन के जवानों को भी व्यवस्था संभालने में खासी मशक्कत करनी पड़ी। बाबा के शोक में सांगलिया व आस पास के गांवो में चूल्हे तक नही जले तथा बाजार में प्रतिष्ठान भी बंद रहे।

नारियल प्रसाद से भरे आश्रम के बरामदे......
बाबा बंशीदास के निधन पर धूणी पहुंचे उनके अनुयायियों व भक्तो व्दारा चढ़ाये गए नारियल प्रसाद व अगरबती से आश्रम के बरामदे भर गए। बाबा के निधन की सूचना पर देर रात तक लोगो के आने जाने का तांता लगा रहा।

इन्होने भी किए अंतिम दर्शन.......
बाबा बंशीदासजी के आकस्मिक निधन पर श्रद्धा सुमन अर्पित करने के लिए सुबह से ही उनके अनुयायियों के साथ ही वीआईपीज की भी कतार लगी रही। अनेक अधिकारी व राजनेताओं ने बाबा की प्रार्थिव देह पर पुष्पांजलि अर्पित की। कई संप्रदायो के संत महंतो व हजारों भक्तो ने बाबा के अंतिम दर्शन कर उन्हे श्रदांजलि दी।

सीकर में सर्व समाज ने दी श्रध्दांजलि,बताया अपूर्णीय क्षति

 अखिल भारतीय सांगलिया धूणी के पीठाधीश्वर परम श्रध्देय श्री बंशीदास जी महाराज के आकस्मिक निधन पर सीकर जिला मुख्यालय पर स्थित अंबेडकर सर्किल पर मंगलवार 7फरवरी 2017 को सांय 3.30 बजे श्रद्धांजलि सभा का आयोजन डॉ.अंबेडकर विचार प्रचार प्रसार संस्थान के तत्वावधान में किया गया। श्रद्धांजलि सभा में जिले के सभी सामाजिक संगठनो व सर्वसमाज के लोगों ने बाबा बंशीदास को श्रद्धासुमन अर्पित कर भावभीनी श्रद्धांजलि दी। इस दौरान वक्ताओं ने बाबा के जीवन पर प्रकाश डाला व उनके निधन को समाज के लिए अपूर्णीय क्षति बताया।

मुझे भी 10 साल तक आपके सानिध्य में रहकर सांगलिया धूणी में सेवा करने का मौका मिला। वास्तव में ही महाराज श्री का मार्गदर्शन व आशीर्वाद अकल्पनीय हैं। जिसका शब्दो में वर्णन नहीं किया जा सकता। आपके जीवन संघर्ष,सात्विक मनोवृति,चितचरित्र व योगदान का वर्णन करना संभव नही हैं। आपके जीवन दर्शन पर कई ग्रंथ लिखे जा सकते हैं। हम सब के बीच से आपका यूं अचानक चले जाने की खामी और पीड़ा सदैव सताती रहेंगी। आज भी सदैव आप हमारी स्मृतियो में बने हुए हो। ऐसा लगता हैं जैसे आज भी आप हमारे बीच ही  हो। प्रथम पुण्यतिथी पर कोटी कोटी नमन.....। एक बार पुन: अश्रपुरित श्रदांजलि।

बीरबल सिंह बरवड़
संपादक - भीम प्रवाह पाक्षिक समाचार-पत्र
नि.- लांपुवा, तह. श्रीमाधोपुर, सीकर (राज.)
मो. 7891189451

मंगलवार, 23 जनवरी 2018

नवरत्न मंडुसिया के ब्लॉग के दो लाख से भी अधिक व्यू

बोल भारत




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http://bolbharat.com/2018/01/31/ssrdhpsvvfynl/.
मेघवाल समाज का एक ब्लॉग है जो की देश विदेश मे बहूत ज्यादा देखा जा रहा है इस ब्लॉग का नाम मन्डुसिया डॉट ब्लॉग्सपोट डॉट कॉम है इसका संचालन राजस्थान प्रांत के सीकर जिले के सुरेरा नामक गाँव के नवरत्न मन्डुसिया नामक 23 वर्षीय युवा कर रहे है इस ब्लॉग का मुख्य उद्देश्य मेघवाल समुदाय समृद्ध सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, मानसिक और सांस्कृतिक. मृत्यु भोज, शराब दुरुपयोग, बाल विवाह, बहुविवाह, दहेज, विदेशी शोषण, अत्याचार और समाज और सामाजिक कार्यकर्ताओं पर अपराधों को रोकने के लिए और समाज के कमजोर लोगों का समर्थन की तरह प्रगति में बाधा कार्यों से छुटकारा पाने की कोशिश करने का है तथा इस ब्लॉग मे बाबा साहेब डॉक्टर भीव राव अम्बेडकर ज्योतिबा फुले सावत्री बाई बाबा रामदेव जी महाराज डाली बाई मेघवाल झरकारी बाई राजा राम मेघवाल करनी माता के ग्वाले दशरथ मेघवाल अखिल भारतीय सांगलिया धूणी तथा मेघवाल समाज के भारत के लोकसभा विधानसभा उच्च पदों पर विराजमान अधिकारियों के नाम पद उनकी जीवनियां आदि के बारे मे जानकारियां दे रखी है इस ब्लॉग का संचालन मेघवाल समाज के लाडले नवरत्न मन्डुसिया ने सन 2011 मे किया गया था मंडूसिया की शिक्षा बी.ए.बी.एड़ और एम.ए इतिहास ओर आई.टी.आई है मंडुसिया ने मेघवाल समाज के बारे अनेक तथ्य व पुस्तकें लिखी तथा इस ब्लॉग मे ब्लॉग मे मेघवाल समाज के गोत्र मेघवाल समाज की उत्पति आदि के बारे मे जानकारी देख सकते है और इस ब्लॉग को भारत के अलावा अन्य देशों मे बहूत तेजी से देख रहे है तथा अब तक लाखो लोग नवरत्न मन्डुसिया के ब्लॉग्स को देख चुके है तथा इस ब्लॉग को  यूएसए ने 58वी रेंक से भी नवाजा गया है और इस मेघवाल समाज के ब्लोग की खास बात यह है की दुनिया की किसी भी भाषा हो आप उस भाषा मे देख सकते है इसके अलावा मंडुसिया का सर्व समाज के बढ़ते अग्रसर क़दम नाम का भी ब्लॉग चलता है

नवरत्न मन्डुसिया

शादियों में फिजूलखर्ची रोककर शिक्षा पर धन खर्च करने का आह्वान, विवाह के नियम हुये आसान, सामूहिक विवाह के लिए उमड़े सैकड़ों लोग

 मेघवाल समाज का ऐतिहासिक फैसला, नानी का गोत्र छोड़ने की कुप्रथा बंद, अब शादियों के लिए मिलेंगे ज्यादा विकल्प कस्बे के टापरी रोड़ स्थित मेघवाल ...