शनिवार, 10 जून 2017

रिश्ते के साथ साथ समान जानिये एक दूसरे की विचार धारायें


नवरत्न मन्डुसिया की कलम से // क्या  है रिश्तों में सम्मान का अर्थ मे आपको मेरे व्यक्तिगत विचार से आपको रिश्ते के साथ साथ हमे एक दूसरे के सामने किस तरह पेश आना चाहिये ये बाते मे आपको बताने जा रहा हूँ 

किसी भी रिश्ते के गहरे होने की पहली शर्त होती है सम्मान। सिर्फ पति-पत्नी ही नहीं, तमाम रिश्तों से लेकर यारी-दोस्ती तक में एक-दूसरे के प्रति सम्मान बेहद अहम् है। हंसी-मजाक के दौरान भी यदि हम हद से आगे बढ जाते हैं, तो सामनेवाले को ठेस पहुंचती है। ऎसे में यह बात समझना जरूरी है कि हर चीज की हद होती है। अपने दायरों को लांघते ही जैसे ही हम हदों को पार

किसी की भी राय को महत्व ना देकर मनमानी करना। कर जाते हैं, तो वहां सम्मान खत्म हो जाता है और रिश्तों पर नकारात्मक प्रभाव पडता है। हम रिश्तों को सम्मान दे रहे हैं या नहीं, इसे इन कसौटी पर परखें- अगर हम किसी बात पर असहमत हैं, पर हम अपनी ही बात और राय को महत्व देकर सामनेवाले को सुनना ही ना चाहे और उससे भी यह उम्मीद रखें कि वो हमारी ही सुने, तो यह उसके सम्मान को आहत करेगा।हर समय सिर्फ अपनी जरूरतों के बारे में ही सोचना। दोस्तो यह भी हद होती है की हमे किस तरह की मजाक करनी चाहिये मे नवरत्न मन्डुसिया आपको यह कहना चाहता हूँ की हम लोगो को एक सच्चे प्यार की भावनाएँ समझनी चाहिये और हमे एक दूसरे का समान करना चाहिये दोस्तो आपका अपना दोस्त आपका भाई नवरत्न मन्डुसिया हमेशा आपके साथ एक सच्चे अम्बेडकर वादी विचार धारा रखने वाला है मेरा तो यह ही सोचना है कहना है की हमे रिश्ते की गहराई को देखकर हमे अच्छा रिश्ता निभाना चाहिये हमे महिलाओ की इज्जत करनी चाहिये बड़े लोगो का और छोटे लोगो का सभी लोगो का समान करना चाहिये ताकि हमे समाज मे एक सकरात्मक पहल देखने को मिले और हमे मजाक करना आदि परिस्थियों को देखकर करना चाहिये 

सबसे मजाक करना, लेकिन जब कोई आपसे मजाक करे, तो बुरा मान जाना। सामनेवाले की स्थिति को समझे बगैर या समझने की कोशिश किए बिना ही बात-बात पर नाराज हो जाना।
विचार अलग होने पर दूसरों के विचारों को गलत व महत्वहीन समझना। सामनेवाले की भावनाओं के प्रति असंवेदनशील होकर उन्हें महत्व ना देना। अपने रिश्तेदारों या पार्टनर को सामाजिक समारोहों में या अन्य लोगों के सामने डांटते हैं या उनका मजाक उडाते हैं।
सबसे यह उम्मीद रखना कि वो सिर्फ आपका ही ख्याल रखे और आपकी हर बात पर हां में हां मिलाए।
अपनी सुविधानुसार नियम बदलना और दूसरों से भी अपनी सुविधानुसार ही व्यहार करने की उम्मीद करना।
किसी की भी राय को महत्व ना देकर मनमानी करना।ये सभी चीजे हमे व्यवहार और हमारे महत्वपूर्ण  समान को दर्शाती है  इसलिए हमे किसी से जो भी रिश्ता निभाये वो सच्चे दिल और प्रेम से निभाना चाहिये 

नवरत्न मन्डुसिया की कलम से 

सामाजिक जनसेवक

शुक्रवार, 2 जून 2017

परिवार की उत्पति महत्व और परिचय


(मन्डुसिया लेखन )//परिवार (family) साधारणतया पति, पत्नी और बच्चों के समूह को कहते हैं, किंतु दुनिया के अधिकांश भागों में वह सम्मिलित वासवाले रक्त संबंधियों का समूह है जिसमें विवाहऔर दत्तक प्रथा द्वारा स्वीकृत व्यक्ति भी सम्मिलित हैं।

परिचय एवं महत्व

सभी समाजों में बच्चों का जन्म और पालन पोषण परिवार में होता है। बच्चों का संस्कार करने और समाज के आचार व्यवहार में उन्हें दीक्षित करने का काम मुख्य रूप से परिवार में होता है। इसके द्वारा समाज की सांस्कृतिक विरासत एक से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित होती है। व्यक्ति की सामाजिक मर्यादा बहुत कुछ परिवार से ही निर्धारित होती है। नर-नारी के यौन संबंध मुख्यत: परिवार के दायरे में निबद्ध होते हैं। औद्योगिक सभ्यता से उत्पन्न जनसंकुल समाजों और नगरों को यदि छोड़ दिया जाए तो व्यक्ति का परिचय मुख्यत: उसके परिवार और कुल के आधार पर होता है। संसार के विभिन्न प्रदेशों और विभिन्न कालों में यद्यपि रचना, आकार, संबंध और कार्य की दृष्टि से परिवार के अनेक भेद हैं किंतु उसके यह उपर्युक्त कार्य सार्वदेशिक और सार्वकालिक हैं। उसमें देश, काल, परिस्थिति और प्रथा आदि के भेद स एक या अनेक पीढ़ियों का और एक या अनेक दंपतियों अथवा पति-पत्नियों के समूहों का होना संभव है, उसके सदस्य एक पारिवारिक अनुशासन व्यवस्था के अतिरिक्त पति और पत्नी, भाई और बहन, पितामह और पौत्र, चाचा और भतीजे, सास और पुत्रवधू जैसे संबंधों तथा कर्तव्यों एवं अधिकारों से परस्पर आबद्ध, अन्य सामाजिक समूहों के संदर्भ में एक घनिष्टतम अंतरंग समूह के रूप में रहते हैं। परिवार के दायरे में स्त्री और पुरुष के बीच कार्यविभाजन भी सार्वत्रिक और सार्वकालिक है। स्त्रियों का अधिकांश समय घर में व्यतीत होता है। भोजन बनाना, बच्चों की देख रेख और घर की सफाई करना और कपड़ों की सिलाई आदि ऐसे काम हैं जो स्त्री के हिस्से में आते हैं। पुरुष बाहरी तथा अधिक श्रम के कार्य करता है, जैसे खेती, व्यापार, उद्योग, पशुचारण, शिकार और लड़ाई आदि। तब भी यह कार्यविभाजन सब समाजों में एक सा नहीं है, कोई बड़ी सामान्य सूची भी बनाना कठिन है क्योंकि कई समाजों में स्त्रियाँ भी खेती और शिकार जैसे कामों में हिस्सा लेती हैं।

उत्पत्ति

विवाह के रूपों से परिवार के रूपों का घनिष्ट संबंध है। लेविस मार्गन आदि विकासवादियों का मत है कि मानव समाज की प्रारंभिक अवस्था में विवाह प्रथा नहीं थी और पूर्ण कामाचार प्रचलित था। इसके बाद सामाजिक विकासक्रम में यूथ विवाह (कई पुरुषों और कई स्त्रियों का सामूहिक रूप से पति पत्नी होना), बहुपतित्व, बहुपत्नीत्व और एकपत्नीत्व या एकपतित्व की अवस्था आई। वस्तुत: बहुविवाह और एकपत्नीत्व की प्रथा असभ्य और सभ्य सभी समाजों में पाई जाती है। अत: यह मत साक्ष्यसंमत नहीं प्रतीत होता। मानव शिशु के पालन पोषण के लिए लंबी अवधि अपेक्षित है और पहले बच्चें की बाल्यावस्था में ही अन्य छोटे बच्चे उत्पन्न होते रहते हैं। गर्भावस्था और प्रसूतिकाल में माता की देख-रेख आवश्यक है। फिर, पशुओं की भाँति मनुष्य में रति की कोई विशेष ऋतु नहीं है। अत: संभवत: मानव समाज के प्रारंभ में या तो पूरा समुदाय या फिर पति पत्नी तथा बच्चों का समूह ही परिवार था।

मानव वैज्ञानिकों को कोई ऐसा समाज नहीं मिला जहाँ विवाह संबंध परिवार के अंदर ही होते हों, अत: पितृस्थानीय परिवार में पत्नी को और मातृस्थानीय परिवार में पति को अतिरिक्त सदस्यता प्रदान की जाती है। युगल परिवार में पति और पत्नी मिलकर अपनी पृथक् गृहस्थी स्थापित करते हैं। किंतु अधिकांश समाजों में यह परिवार बृहत्तर कौटुंबिक समूह का अंग माना जाता है और जीवन के अनेक प्रसंगों में परिवार पर बृहत्तर कौटुबिक समूह का, घनिष्ट संबध के अतिरिक्त, नियंत्रण होता है। अमरीका जैसे उद्योगप्रधान देशों में कुटुंबियों के सम्मिलित परिवार के स्थान पर युगल परिवार की बहुलता हो गई है। यद्यपि वहाँ का समाज पितृवंशीय है, फिर भी युगल परिवार वहाँ किसी एक बृहत्तर कुटुंब का अंग नहीं माना जाता। युगल परिवार में पति पत्नी और, पैदा होने पर, उनके अविवाहित बच्चे होते हैं। सम्मिलित परिवारों में इनके अतिरिक्त विवाहित बच्चे और उनकी संतान, विवाहित भाई अथवा बहन और उनके बच्चे साथ रह सकते हैं। सम्मिलित परिवार में रक्त संबंधियों की परिधि भिन्न भिन्न समाजों में भिन्न भिन्न है। भारत जैसे देश में एक सम्मिलित परिवार में साधारणत: 10-12 सदस्य होते हैं, किंतु कुछ परिवारों में सदस्यों की संख्या 50-60 या 100 तक होती है।

विवाह, वंशावली, स्वामित्व और शासनाधिकार के विभिन्न रूपों के आधार पर परिवारों के विभिन्न रूप और प्रकार हो जाते हैं। मातृस्थानीय परिवार में पति अपनी पत्नी के घर का स्थायी या अस्थायी सदस्य बनता है, जबकि पितृस्थानीय परिवार में पत्नी पति के घर जाकर रहती है। मातृस्थानीय परिवार साधारणत: मातृवंशीय और पितृस्थानीय परिवार पितृवंशीय होते हैं। बहुधा परिवार की संपत्ति का स्वामित्व पितृस्थानीय परिवार में पुरुष को और मातृस्थानीय परिवार में नारी को प्राप्त है। प्राय: संपत्ति का उत्तराधिकारी ज्येष्ठ संतान होती है। किंतु यह आवश्यक नहीं है। भारत की गारो जैसी जनजाति में सबसे छाटी लड़की ही पारिवारिक संपत्ति की स्वामिनी होती है। अनेक समाजों में परिवार के सभी स्त्री या पुरुष सदस्यों में स्वमित्व निहित होता है और कुछ में पुरुष तथा स्त्री दोनों को संपत्ति का उत्तराधिकार प्राप्त है। परिवार का शासन अधिकांश समाजों में पुरुषों के हाथ होता है। अंतर इतना है कि पितृवंशीय परिवारों में साधारणत: पिता अथवा घर का सबसे बड़ा पुरुष और मातृवंशीय परिवारों में मामा या माता का अन्य सबसे बड़ा रक्तसंबंधी (पुरुष) घर का मुखिया होता है। अत: संसार के अधिकांश भागों में और समाजों में पुरुष की प्रधानता पाई जाती है।

संसार में दांपत्य जीवन में प्राय: एकपत्नीत्व ही सबसे अधिक प्रचलित है, यद्यपि अनेक समाजों में पुरुषों को एक से अधिक पत्नियाँ रखने की भी छूट है। इसके विपरीत टोडा और खस जनजातियों में और तिब्बत के कुछ प्रदेशों में बहुपति प्रथा तथा एक प्रकार के यूथ विवाह की प्रथा है। इसी प्रकार भारत में खासी, गारो और अमरीका में होपी, हैडिया जैसी जनजातियाँ भी हैं जो मातृस्थानीय और मातृवंशीय हैं। विवाह के इन रूपों में परिवार की रचना और स्वरूप में अंतर पड़ जाता है।

आधुनिक औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप परिवार की रचना और कार्यों में गंभीर परिवर्तन परिलक्षित हुए हैं। पहले सभी समाजों में परिवार समाज की सबसे महत्वपूर्ण और मौलिक संस्था थी। जीवन का अधिकांश व्यापार परिवार के माध्यम से संपन्न होता था। इन औद्योगिक समाजों में परिवार अब उत्पादन की इकाई नहीं है। बच्चों के शिक्षण का कार्य शिक्षण संस्थाओं ने लिया है। रसोई का कार्य व्यावसायिक भोजनालयों तथा जलपानगृहों में चला गया है। मनोरंजन के लिए पृथक् संगठन स्थापित हो गए हैं। सामाजिक सुरक्षा का उत्तरदायित्व राज्य के पास चला गया और धर्म के घटते हुए प्रभाव के कारण धार्मिक कृत्यों का स्थान गौण को गया है। पति और पत्नी का अधिकांश समय घर के बाहर व्यतीत होता है। फिर भी परिवार बना हुआ है और उसके द्वारा कुछ महत्वपूर्ण कार्य संपन्न होते हैं, जिन्हें परिवार का स्थायी या अवशिष्ट कार्य कहा जाता है। नवरत्न मन्डुसिया की कलम से

https://hi.m.wikipedia.org/wiki/परिवार
1980 के दशक का एक मराठा परिवार 


ईंट भट्टों पर मज़दूरी करने वाली मेघवाल समाज की गरीब महिला ने अस्पताल को दान की पाँच बीघा ज़मीन


 मेघवाल समाज की महिला को सम्मानित करते हुवे 

(मन्डुसिया ब्लोग)//सीकर :-कांवट के निकटवर्ती गांव भादवाड़ी निवासी गरीब परिवार की एक मेघवाल समाज की महिला ने सरकारी अस्पताल को अपनी 5 बीघा जमीन दान कर अनूठी मिसाल कायम की है। भादवाड़ी गांव में फिलहाल पीएचसी का संचालन हो रहा है। अस्पताल का भवन काफी जर्जर है, जहां स्वास्थ्य की बेहतर सुविधाएं नहीं हैं। खासकर महिलाओं को प्रसव के लिए दूसरे अस्पतालों में जाना पड़ता है। अव्यवस्थाओं की वजह से रात में डॉक्टर भी अस्पताल में नहीं रुकते हैं।

ईंट भट्टों पर मजदूरी करता है परिवार

55 साल की बिमला देवी मेघवाल  के चार बेटे व दो बेटियां हैं। इनके तीन बेटे दूसरे राज्यों में मार्बल का काम करते हैं। ईंट-भट्टों पर मजदूरी करने वाली बिमला फिलहाल नरेगा में काम कर रही है।
ग्रामीणों ने सराहा
गरीबों की पीड़ा को देखते हुए दलित परिवार की बिमला देवी पत्नी जगदीश प्रसाद मेघवाल ने खुद की 5 बीघा जमीन को दान करने का निर्णय लिया। और  अस्पताल प्रभारी डॉ. कृष्णकांत शर्मा को बिमला देवी ने ग्रामीणों की मौजूदगी में जमीन का दस्तावेज सौंपा। इस मौके पर ग्राम पंचायत और अस्पताल प्रशासन ने बिमला देवी व पति जगदीश प्रसाद मेघवाल को सम्मानित किया। हमे गर्व करने चाहिये हमारे मेघवाल समाज पर जिसमे की एक विश्व लेवल की सोच ने एक सरानीय काम किया है
नवरत्न मन्डुसिया की कलम से

शनिवार, 13 मई 2017

मातृ दिवस का महत्व और माँ का प्यार दुनिया का सबसे बड़ा प्यार :- नवरत्न मन्डुसिया

मेघवाल समाज न्यूज़ ब्लॉग :-सभी जानते है की एक माँ ही ऐसी चंचल दिल वाली होती है जो की अपने बेटे की हर दुःख तक़लीफ़ समझती है एक माँ ही है जो खुद भूखी रहकर अपने बच्चो से कहती है की मुझे भूख नही है आप खाना खा लो एक माँ ही है जो की बेटा चाहे केसा भी हो वो उनका हमेशा साथ देती है दोस्तो आज मेने अपनी माँ से कहा की माँ आज मातृ दिवस है आज घर का पूरा काम मे करूँगा और आप आज के आराम करो तो मेरी माँ ने एक सुंदर सा जवाब दिया की नवरत्न मन्डुसिया मेने आपको कभी भी दुखद नही देखा है और ना ही देखना चाहती है मेरे बेटे का प्यार यदि मेरे साथ रहेगा तो मे बहूत ही भाग्य शाली माँ कहलाऊँगी बस आप हमेशा मेरे साथ रहे मेरी और आपके पिता जी आज्ञा की पालना करते रहे यही मेरी इच्छा है तभी जाकर मे खुश रहूंगी इसीलिए कहते है की माँ ही एक ऐसी चीज़ है जो अपने बच्चो की हर दुःख तक़लीफ़ समझती है दोस्तो मे नवरत्न मन्डुसिया आपको कहना चाहता हूँ की हमेशा माता पिता की सेवा करना ही सबसे बड़ा धर्म है इसलिये हमे माता पिता की हर बात माननी चाहिये और माता पिता की सेवा करनी चाहिये अब मे आपको मातृ दिवस के बारे मे बताना चाहता हूँ
दिवस, मातृ और दिवस शब्दों से मिलकर बना है जिसमें मातृ का अर्थ है मां और दिवस यानि दिन। इस तरह से मातृ दिवस का मतलब होता है मां का दिन। पूरी दुनिया में मई माह के दूसरे रविवार को मातृ दिवस मनाया जाता है। मातृ दिवस मनाने का प्रमुख उद्देश्य मां के प्रति सम्मान और प्रेम को प्रदर्शित करना है। हर जगह मातृ दिवस मनाने का तरीका अलग-अलग होता है, लेकिन इसका उद्देश्य एक ही होता है।

मां :  एक शिशु का जब जन्म होता है, तो उसका पहला रिश्ता मां से होता है। एक मां शिशु को पूरे 9 माह अपनी कोख में रखने के बाद असहनीय पीड़ा सहते हुए उसे जन्म देती है और इस दुनिया में लाती है। इन नौ महीनों में शिशु और मां के बीच एक अदृश्य प्यार भरा गहरा रिश्ता बन जाता है। यह रिश्ता शिशु के जन्म के बाद साकार होता है और जीवन पर्यन्त बना रहता है।

मां और बच्चे का रिश्ता इतना प्रगाढ़ और प्रेम से भरा होता है, कि बच्चे को जरा ही तकलीफ होने पर भी मां बेचैन हो उठती है। वहीं तकलीफ के समय बच्चा भी मां को ही याद करता है। मां का दुलार और प्यार भरी पुचकार ही बच्चे के लिए दवा का कार्य करती है। इसलिए ही ममता और स्नेह के इस रिश्ते को संसार का खूबसूरत रिश्ता कहा जाता है। दुनिया का कोई भी रिश्ता इतना मर्मस्पर्शी नहीं हो सकता।

मातृ दिवस :  मातृ दिवस मनाने का शुरुआत सर्वप्रथम ग्रीस देश में हुई थी, जहां देवताओं की मां को पूजने का चलन शुरु हुआ था। इसके बाद इसे त्योहार की तरह मनाया जाने लगा। हर मां अपने बच्चों के प्रति जीवन भर समर्पित होती है। मां के त्याग की गहराई को मापना भी संभव नहीं है और ना ही उनके एहसानों को चुका पाना। लेकिन उनके प्रति सम्मान और कृतज्ञता को प्रकट करना हमारा कर्तव्य है।

मां के प्रति इन्हीं भावों को व्यक्त करने के उद्देश्य से मातृ दिवस मनाया जाता है। यह दिन विशेष रूप से मां के लिए समर्पित है। इस दिन को दुनिया भर में लोग अपने तरीके से मनाते हैं। कहीं पर मां के लिए पार्टी का आयोजन होता है तो कहीं उन्हें उपहार और शुभकामनाएं दी जाती है। कहीं पर पूजा अर्चना तो कुछ लोग मां के प्रति अपनी भावनाएं लिखकर जताते हैं। इस दिन करे मनाने का तरीका कोई भी हो, लेकिन बच्चों में मां के प्रति प्रेम और इस दिन के प्रति उत्साह चरम पर होता है।
धरती पर मौजूद प्रत्येक इंसान का अस्तित्व, मां के कारण ही है। मां के जन्म देने पर ही मनुष्य धरती पर आता है और मां के स्नेह दुलार और संस्कारों में मानवता का गुण सीखता है। हमारे हर विचार और भाव के पीछे मां द्वारा रोपित किए गए संस्कार के बीज हैं, जिनकी बदौलत हम एक अच्छे इंसान की श्रेणी में आते हैं। इसलि मातृ दिवस को मनाना और भी आवश्यक हो जाता है। हम अपने व्यस्त जीवन में यदि हर दिन न सही तो कम से कम साल में एक बार मां के प्रति पूर्ण समर्पित होकर इस दिन को उत्सव की तरह मना सकते हैं।
नवरत्न मन्डुसिया की कलम से
सामाजिक जनसेवक
9929394143

शुक्रवार, 12 मई 2017

अखिल हाड़ौती मेघवाल युवा समिति बारां के द्वारा विवाह सम्मेलन सम्पन्न

मेघवाल समाज बारां /
अखिल हाड़ौती मेघवाल युवा समिति बारां के तत्वावधान समिति के अध्यक्ष हरिश मेघवाल की अध्यक्षता में बारां के मांगरोल रोड स्थित के.जी.एन. काॅलेज ग्राउण्ड पर संस्था का प्रथम सामूहिक विवाह सम्मेलन सम्पन्न हुआ।*

*मिडिया प्रभारी राकेश मेघवाल ने बताया कि सम्मेलन में 24 जोड़ों ने परिणय सूत्र में बंधकर अपने दाम्पत्य जीवन की शुरूआत की। इस अवसर पर अतिथि रामपाल मेघवाल विधायक बारां ने कहा कि समाज सुधार के लिए इस तरह के आयोजन बहुत जरूरी है, लेकिन परिवार एवं समाज विकास की ओर अग्रसर हो। इसके लिए उन्होंने उच्च शिक्षा पर भी जोर दिया। उन्होंने आयोजन के लिए मेघवाल समाज को साधूवाद का पात्र बताते हुए अन्य समाज से भी इस तरह के आयोजन में आगे आने की बात कही। पूर्व विधायक व कांग्रेस जिलाध्यक्ष पानाचन्द मेघवाल ने कहा कि इस तरह के आयोजन में भी फिजूलखर्ची नहीं की जानी चाहिए तथा कोई सामूहिक विवाह आयोजन में शामिल होने के बाद अपने घर पर किसी तरह का कार्यक्रम कर फिजूल खर्च नहीं करें। जिससे अमीर वर्ग के लोग भी इस तरह के आयोजनों से जुड़ेंगे। अतिथि विनोद मेघवाल कहना था कि आयोजन समिति को मात्र इस तरह के आयोजन कर ही अपने दायित्वों की इतिश्री नहीं कर लेनी चाहिए। उन्होंने समाज विकास के लिए लीडर पैदा करने पर जोर दिया, जिससे समाज को मजबूती मिल सके। वहीं बारां काॅलेज व्याख्यता राजेश वर्मा ने बाबा साहब की प्रतिमा की तस्वीर नवदम्पतियों को भेंट कर आशीर्वाद दिया। समारोह में बाहर से पधारे अतिथि समिति के संस्थापक नरेन्द्रपाल, सम्भागीय समिति के अध्यक्ष कालूलाल चन्द्रसेन, जगन्नाथ भौभरा, रामप्रताप अनिल, कन्हैयालाल मेघवाल, शंकरलाल दौबड़ा का स्वागत किया गया। विधिवत रूप से तोरण की रस्म अदा की गई। साथ ही वैवाहिक कार्यक्रम मेघवाल समाज के पण्डित द्वारा मंत्रोच्चार के साथ सम्पन्न करवाए गए। मंच का संचालन मेघराज बिलोटिया ने किया।*

*सामूहिक विवाह सम्मेलन में समिति के पदाधिकारी युवराज मेघवाल, ओमप्रकाश निमोदा, संजय दिलोदा, सूरजमल मेघवाल, मनोज मेघवाल, मनीष मेघवाल, राकेश राई, हेमराज बरखेड़ा, मुरारी कुण्डी, दिपक दिलोदा, केप्टन मुकेश ने समाज व संस्था के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझते हुये समाज सेवा में कोई कसर नहीं छोड़ी तथा रात-दिन एक करते हुये अपने कार्य को सकुशलपूर्वक अन्जाम तक पहुंचाया। वहीं समिति के अध्यक्ष हरिश मेघवाल से सम्मेलन में पधारे सभी समाज बन्धुओं आभार व्यक्त किया।*

राजा राम मेघवाल (मेहरान गढ़ जोधपुर दुर्ग ) की जीवनी

मेघवाल समाज :- चिड़ियाटूंक पहाड़ी पर स्थित जोधपुर-दुर्ग ‘मेहरानगढ़’ आज अपने वैभव और शिल्पकला के कारण पर्यटन का प्रमुख केंद्र है ।लेकिन इसकी नींव के प्रस्तर नीरव मेघ-निनाद करते हैं क्योंकि वे एक महान् मेघवंशी की शहादत के मूक-दर्शक बने थे ।राजस्थान में राजा रजवाड़ों के जमाने से तालाबों, किलों, मंदिरों व यज्ञों में ज्योतिषियों की सलाहपर शूद्रों को जीवित गाड़कर या जलाकर बलि देने की परम्परा थी । कहा जाता था कि यदि किसी किले की नींव में किसी जीवित पुरूष की बलि दे दी जाए तो वह किला हमेशा राजा के अधिकार में रहेगा, हमेशा विजयी होगा और राजा का खजाना हमेशा भरा रहेगा ! इस किले हेतु भी सिंध प्रान्त के ज्योतिषी गणपत ने किले की अजेयता और समृद्धता के लिए नरबलि देना अनिवार्य बताया । राव जोधा उसके प्रस्ताव को मानकर नरबलि हेतु अग्रसर हुआ और आम-जनता से में इसके लिए घोषणा करवा दी । उस दौर में राजा की ओर से उनके हरकारे गांव-गांव जाकर ढोल-नगाड़ों को बजा राजा का फरमान सुनाया करते थे। उन्होंने गांव-गांव जाकर घोषणा की कि राव जोधा मारवाड़ की नई राजधानी का निर्माण करने जा रहे है। इसके लिए किसी ऐसे स्वामी भक्त वीर पुरुष की आवश्यकता है जो दुर्ग की नींव में स्वयं को जीवित गाड़े जाने के लिए अपनी मर्जी से पेश कर सके। इतने क्षत्रिय-ब्राह्मण-वैश्य-सामंत-सेठ-साहूकारों में से कोई एक भी लोक-कल्याण हेतु अपनी बलि देने को तैयार नहीं हुआ । सभी बड़े-बड़े कार्य इनकी उपस्थिति में होते थे । राजा द्वारा इनको विशेष रूप से आमंत्रित किया जाता था । उनकी चाटुकारिता का भी कोई जवाब नहीं । शब्द-कौशल के धनी लंबी-चौड़ी प्रशंसाएं करते दिखाई देते थे । दरबार में हमेशा स्तुतियाँ हुआ करती थी पर अपनी जान कौन दे? इसके लिए कोई सपने में भी तैयार नहीं हो सका । आख़िरकार स्वामिभक्ति के लिए एकमात्र राजिया भाम्बी (राजाराम मेघवाल गौत्र कड़ेला) अपने आत्मबलिदान हेतु प्रस्तुत हुआ । एक ऐसे समुदाय का व्यक्ति जिससे बात करना तो दूर उसका स्पर्श भी अग्राह्य था । लोग उसकी छाया पड़ने को भी अशुभ मानते थे । हाँ, वह एक अछूत था ! फिर भी उसे किले की दीवार में चुनना और उसके पार्श्व में ख़जाने हेतु भवन बनाना पूरी तरह शुभ था । दोगलेपन का इससे बड़ा क्या सबूत हो सकता है !
इसी गगनचुम्बी भव्य किले की नींव में ज्योतिषी गणपतदत्त की सलाह पर 15 मई 1459 [12 मई 1459 ई. तदनुसार ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी (11) वार शनिवार को] दलित राजाराम मेघवाल उसकी माता केसर व पिता मोहणसी को नींव में चुना गया। 
कुछ स्रोत उद्घाटित करते हैं कि राजिया (राजाराम) और कालिया नामक दो मेघवंशी किले की दीवार में जीवित चुने गए थे । साथ थी कुछ स्रोतों से ज्ञात होता है कि गोरा भी सती हुई थी ।
राजिया के सहर्ष किये हुए आत्म त्याग एवम स्वामी भक्ति की एवज में राव जोधाजी राठोड ने उनके वंशजो को जोधपुर किले पास सूरसागर में कुछ भूमि भी दी ( पट्टा सहित ) व दस हजार रुपए नगद प्रदान किए गए । राव जोधा के आदेश पर जमीन का पट्टा उसकी पत्नी व पुत्र के नाम कर दिया गया। राज बाग के नाम से प्रसिद्ध हैं !और होली के त्यौहार पर मेघवालो की गेर को किले में गाजे बजे साथ जाने का अधिकार हैं जो अन्य किसी जाति को नही हैं !
जहां राजाराम की बलि दी गई थी उस स्थान के ऊपर विशाल किले का खजाना व नक्कारखाने वाला भाग स्थित है। किले में रोजाना हजारों देशी-विदेशी पर्यटक आते हैं लेकिन उन्हें उस लोमहर्षक घटना के बारे में कुछ भी नहीं बताया जाता है। एक दीवार पर एक छोटा-सा पत्थर जरूर चिपकाया गया है जो किसी पर्यटक को नजर ही नहीं आता है उस पत्थर पर धुंधले अक्षरों में राजाराम की शहादत की तारीख खुदी हुई है।

मंगलवार, 9 मई 2017

EPFO Housing Scheme | EPFO ग्राहकों के लिए अपनी आवास योजना की घोषणा

Empoyees’ Provident Fund Organisation (EPFO) ने EPFO ग्राहकों के लिए अपनी आवास योजना की घोषणा की है | अगले 2 सालों में 10 लाख घरों के निर्माण के लिए EPFO ने शहरी विकास मंत्रालय (urban development ministry) के साथ भागीदारी की है | EPFO आवास योजना, प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 2022 तक सभी को आवास प्रदान करने के लिए शुरू की गई महत्वाकांक्षी प्रधान मंत्री आवास योजना को बढ़ावा देगी |

EPFO आवास योजना :-
EPFO, शहरी विकास मंत्रालय (urban development ministry) की मदद से अगले 2 वर्षों में 10 लाख घरों का निर्माण करेगा | Group Insurance आवास योजना के तहत, EPFO ग्राहकों को चरणबद्ध तरीके से घर दिए जाएंगे |  EPFO, प्रधान मंत्री आवास योजना के CLSS घटकों के तहत EWS सदस्यों को सब्सिडी प्रदान करने के लिए शहरी विकास मंत्रालय के साथ बातचीत भी करेगा |

Pradhan Mantri Awas Yojana | प्रधान मंत्री आवास योजना (PMAY) के बारे में जाने
EPFO आवास योजना में MIG (Middle Income Group) और LIG (Low Income Group) ग्राहकों को भी केंद्र सरकार की Credit Linked Subsidy Scheme के अनुसार interest subsidy प्रदान की जाएगी | MIG (Middle Income Group) ग्राहक 18 लाख की ऋण राशि पर 3% की ब्याज सब्सिडी का लाभ उठाने में सक्षम होंगे जबकि 6 लाख से 12 लाख की ऋण राशि पर 4% की ब्याज सब्सिडी का लाभ उठाने में सक्षम होंगे |

केंद्र सरकार ने हाल ही में MIG (Middle Income Group) ग्राहकों के लिए PMAY की Credit Linked Subsidy Scheme का शुभारंभ किया है और होम लोन पर ब्याज सब्सिडी प्रदान करने के लिए MIG (Middle Income Group) के CLSS और EWS/ LIG के लिए CLSS की घोषणा की है |

प्रधान मंत्री ग्रामीण आवास योजना (PMAY-G) के बारे में जाने
प्रधान मंत्री आवास योजना (PMAY) का लक्ष्य वर्ष 2022 तक सभी के लिए आवास प्रदान करना है और इस योजना के लाभार्थियों को कई घटकों के माध्यम से वित्तीय लाभ प्रदान किया जा रहा है |  सरकार ने अब तक प्रधान मंत्री आवास योजना (PMAY) के तहत 18.75 लाख से ज्यादा घरों के निर्माण को मंजूरी दे दी है |

EPFO Housing Scheme की विशेषताएं :-
Home loan का भुगतान PF से किया जा सकेगा |
EPFO, शहरी विकास मंत्रालय (urban development ministry) की मदद से अगले 2 वर्षों में 10 लाख घरों का निर्माण करेगा |
EPFO आवास योजना में MIG (Middle Income Group) और LIG (Low Income Group) ग्राहकों को interest subsidy प्रदान की जाएगी |
MIG (Middle Income Group) ग्राहकों 18 लाख के loan पर 3% की ब्याज सब्सिडी और 6 लाख से 12 लाख के loan पर 4% की ब्याज सब्सिडी  प्रदान की जाएगी |
EPFO Housing Scheme में EMI Payment :-
अगर EPFO के ग्राहकों को कम लागत वाले आवास उपलब्ध कराये जाते हैं तो उनके लिए आवास ऋण की पुनर्भुगतान प्रक्रिया आसान होगी | वे अपने EPF खातों में जमा धन से बहुत आसानी से अपनी EMI का भुगतान कर सकते हैं | इससे पहले, EPFO के सदस्य अपनी EPF पूंजी केवल परिपक्वता पर या ऋण के रूप में वापस ले सकते थे | लेकिन इस नई आवास योजना के तहत, वे सरकार द्वारा उपलब्ध कराए गए नए कम लागत वाले घरों के ऋणों का भुगतान उनके PF खातों से  कर सकते हैं | वे आवास में निवेश करने के लिए अपने ईपीएफ खाते से उन्नत निधि आसानी से निकाल सकते हैं |

EPFO ग्राहक, बैंक या housing agency के बीच एक संयुक्त समझौता होता है | Housing EMI का भुगतान करने के लिए PF खाते से अग्रिम वापसी के बारे में EPFO Authority होगा।

नवरत्न मन्डुसिया

शादियों में फिजूलखर्ची रोककर शिक्षा पर धन खर्च करने का आह्वान, विवाह के नियम हुये आसान, सामूहिक विवाह के लिए उमड़े सैकड़ों लोग

 मेघवाल समाज का ऐतिहासिक फैसला, नानी का गोत्र छोड़ने की कुप्रथा बंद, अब शादियों के लिए मिलेंगे ज्यादा विकल्प कस्बे के टापरी रोड़ स्थित मेघवाल ...