सोमवार, 23 दिसंबर 2013

मेघवाल समाज के गोत्र


मेघवंश जाती के प्रवर शाखा और प्रशाखा
प्राचीन क्षत्रियो में चन्द्र वंश और सूर्य वंश ये दो वंश मुख्य मने जाते हैं !फिर ऋषि वंश और अग्नि वंश ये दो वंश और मने गए हैं ,इन्ही चार वंशो से समस्त हिन्दू जाती का प्रदुभाव हुआ हैं !
चन्द्र वंश -ब्रह्माजी के दस मानसी पुत्रो में अत्रीऋषि के समुन्द्र और समुन्द्र के सोम ,इनसे चन्द्र वंश चालू हुआ !इशी वंश में महाराज ययाति हुए ,इनके पुत्र यदु हुए ,जिनके वंशज यदु वंशी हुए और इशी वंश में भगवन कृष्ण का जन्म हुआ !चन्द्र वंश ने विशेष कयती प्राप्त की !इस्सी चन्द्र वंश में आगे चलकर दस शाखाओ का निर्माण हुआ जो जो निम्न हैं !
1 यादव २ गोड३ काबा ४ चन्देल ५ बहती ६ कंवरा ७ तंवर ८ सोरठा ९ कटारिया १० सुरसेन


सुर्यवंश -ब्रह्माजी के पुत्र मरीचि ,मरीचि के कश्यप और कश्यप के विवस्वान (सूर्य)हुए ,इनसे सूर्य वंश चालू हुआ !

इसी वंश में राजा इक्ष्वाकु अधिक प्रसिद्ध हुए हैं ,इन्ही इक्ष्वाकु की ५१ वि पीढ़ी बाद राजा दशरथ हुए थे ,जिनके पुत्र रामचंद्र ,लक्ष्मण ,भरत,शत्रुघ्न हुए !इसी सूर्य वंश में भी दस शाखाये हुए !

१ गहलोत २ सिकरवाल ३ बडगुजर ४ कछवाह ५ बनाकर ६ गहरवार ७ राठोर ८ बडेल ८ बुन्देला १० निकुम्भ !

ऋषि वंश - विवशवान सूर्य के पुत्र नाम श्राद्धदेव मनु था !इनके पुत्र नभग हुए जिनके कुल में रजा अम्बरीश थे ,जिन्होंने अपने व्रत के प्रभाव से दुर्वासा मुनि का मानमर्दन किया था !अम्बरीश के प्रपोत्र रथीतर की स्त्री मदयन्ति ने अंगीरा ऋषि से नियोग करके कई संताने उत्पन्न की ,जो ऋषि वंश नाम से प्रसिद्ध हुई !ये क्षत्रियो की अपेक्षा श्रेष्ठ मणि गई है !इसी ऋषि वंश क्षत्रिय समाज में १२ वंश प्रचलित हुए !
१ सेंगर २ गोतम ३ विसेन ४ चमार गौड़ ५ ब्राहमण ६ भटगोड ७ राजगोंड ८ दीक्षित ९ दिन दीक्षित १० बिलकेत ११ बलखेरिया १२ कनपुरिया !
अग्नि वंश --त्रेता और द्वापर की संधि के समय जब परशुरामजी ने २१ बार युद्ध करके पृथ्वी को नि :क्षत्रिय कर दीया तब परशुरामजी मह्रिषी वसिष्ठ आदि ऋषियों ने अर्बुगिरी (आबू पर्वत) पर एक वृहद् यज्ञ किया !उस यज्ञ कुंड से चार पुरुष प्रकट हुए !
१ चौहान २ पडिहार (प्रतिहार) ३ सोलंकी (चालुक्य) ४ पंवार (परमार) !
यज्ञ की अग्नि से प्रकट होने के कारण ये अग्नि वंशी (हुतासणी)कहलाये !बोद्ध धर्म के अंत के आरम्भ में ही इसी वंश का निर्माण हुआ था !
दोहा - दस रवि ,दस चन्द्र से ,द्वादस ऋषि प्रमाण !

चार वंश हुतासनी (अग्निवंश),ये छतीस बखान !!

इन छतीस वंशो से ही समस्त हिन्दू समाज का प्रदुभाव होता हैं !
इन छतीस वंशो से पूर्व १६ वंश ऋषियों के माने जाते हैं !

१ मरीचि २ अत्रि ३ अगस्त ४ आदरा ५ वसिष्ठ ६ अंगीरा ७ भारद्वाज ८ पाराशर ९ मातंग १० धानेश्वर ११ मह्चंद १२ जोगचंद १३ जोगपाल १४ मेघपाल १५ गरवा १६ जयपाल !

इन सोलह वंशो सहित कुल ५२ वंश होते हैं !

दोहा -आठ बीस ऋषि गोत्र हैं ,चार अग्नि प्रमाण !

दस रवि ,दस चन्द्र से ,पुरे बावन जाण!!

फिर इनकी शाखा प्रशाखाओ द्वारा समस्त हिन्दू समाज का विस्तार होता गया और बढ़ते -बढ़ते आज हजारो जातियों में विभक्त हो गया !
मेघवाल जाती के लिए लिखे गये लेख में उपरोक्त वंश - उपवंश किसी न किसी रूप में अधिकतर पाए जाते हैं !
क्षत्रियो की १८ जातीय मुख्य मणि जाती हैं !
१ गहलोत २ कचवाहा ३ राठौड़ ४ यादव ५ चौहान ६ पंवार (परमार) ७ सोलंकी ८ पडिहार (प्रतिहार) ९ चावड़ा १० तंवर ११ गौड़ १२ चन्देल १३ दहिया १४ मकवाना १५ जोहिया १६ बडगुजर १७ पड़वाडिया १८ टांक !


१ मरीचि ऋषि (सुर्यवंश)गहलोत की शाखा प्रशाखा से २२ गोत्र

१ गहलोत (गहलोत्या) २ ओस्तिवाल ३ गोदा ४ देवागान्वा ५ खिंवासरा ६ कंसड ७ करसंड ८ कलसड ९

करसिन्धु १० खारड़िया ११ ख्याली १२ खांड १३ खलेरी १४ गहलोत्रा १५ शिसोदिया १६ चूहड़ा १७ बिकुंधा १८

गोंरा १९ खांडपा २० धोधावत २१ राणवा २२ तालपा !


२ मरीचि ऋषि सूर्य वंश कछवाहां से ७ गॉत्र

१ कछवाहां २ सिंगला ३ छेडवाल ३ खोहवाल ४ कंसुबा ५ कन्हड़ ६ मीणा


३ मरीचि ऋषि सूर्य वंश राठोड से ८ गोत्र --


१ राठोड (राठोडया) २ सोनगरा ३ लोयमा ४ म्हायच ५ बांदर ६ जोधा ७ बागडा ८ अजेर्या !


४ अत्रि ऋषि चन्द्र वंश यादव में ४६ गोत्र ----

१ यादव (यादवा) २ भाटी (भाटिया) ३ कडेला ४ किलान्या५ कलिरावण ६ कलेचा ७ कालवा ८ कडवासरा ९

कालेरा १० काहनीवाल११ कोहली १२ खामिवास १३ खुडिवाल १४ जाम १५ खोबडा १६ गरडवा१७ जनागल १८

दावा १९ देवाला २० देहरावरिया २१ देपन २२ पटीर २३ पाटोधा २४ बरवड २५ बलायच २६ बरडोयिय २७

बारुपाल २८ बाजडा २९ भाल्याण ३० बेगड ३१ महरडा ३२ लालर ३३ साऊं ३४ निलड ३५ पुनड ३६ कांवल्या

३७ सिंहमार ३८ खामिवाल ३९ झाटीवाल ४० खोखर ४१ पलास्या ४२ बुडिया ४३ आयच ४४ अंणख्या

(इणखिया )४५ खुन्वारा ४६ खत्री


५ अत्री ऋषि चंदर वंश (तोमर)से १६ गोत्र --

१ तंवर २ बुडगाँवा ३ मोलोधा ४ लहकारा ५ जावाल्या ६ गोठण ७ गोठणवाल ८ सलोर्या ९ गोठिया १०

गोरावत ११ गोयल (गुहिल)१२ गोरख्या १३ ढल १४ केलवाल १५ ढाइवाल १६ गोरवा (गुरवा) !



६ ,विश्वामित्र ,ऋषि वशिषठ आदि अग्नि वंश चौहान से ३३ गोत्र --


१ चौहान (चुहान्या ,चुंडा)२ इडिवाल ३ गोठवाल ४ मोमत्या ५ कंकेडिया ६ नारनोल्या ७ भटान्या ८ जेवर्या ९

सोगण १० काला ११ पटीर १२ खती १३ जिलोया १४ जिणवाल १५ निमडया १६ बरोला १७ नरवाण १८

सोलेरा १९ निजरान्या २० निरवाल २१ निरवाणि २२ खिची २३ खारडधा २४ नाल्या २५ चाहिल २६ भालोत

२७ सांचोर्या २८ सामर्या २९ भदोर्या ३० नाडोल्या ३१ चाहिल्या ३२ शिंदर्या ३३ पटीर !

७ अग्नि वंश पंवार से २४ गोत्र ----

१ पंवार २ मोरोड्या ३ दायपन्नु ४ जाटावत ५ बडला ६ लोजडीवाल ७ सुवटवाल ८ लाडणा ९ महरान्या १०

टिकावत ११ बोच्या १२ सिला १३ भंवरेटा (भुरटिया) १४ कथ्नोरिया १५ सांखला १६ चणिया १७ सोडा १८

सरावता १९ गुणपाल २० सेजु २१ खान्भ २२ जाटीवाल २३ सियाल २४ सुवाल



8 अग्नि वंश पंवार से २४ गोत्र ----

१ पंवार २ मोरोड्या ३ दायपन्नु ४ जाटावत ५ बडला ६ लोजडीवाल ७ सुवटवाल ८ लाडणा ९ महरान्या १०

टिकावत ११ बोच्या १२ सिला १३ भंवरेटा (भुरटिया) १४ कथ्नोरिया १५ सांखला १६ चणिया १७ सोडा १८

सरावता १९ गुणपाल २० सेजु २१ खान्भ २२ जाटीवाल २३ सियाल २४ सुवाल


८ अग्नि वंश सोलंकी से ४ गोत्र ----

१ असोलंकी २ स्यालवा ३ सुंवालिया ४ बावल्या !


९ अग्नि वंश पडिहार से १५ गोत्र --


१ पड़ीहार २ कदणोच्या ३ कलशी ४ कडवासरा ५ कावडया ६ किराड़ ७ करडीवाल ८ किकरालिया ९ कडेचा

१० कडेलिया ११ कुलरिया १२ गुराहिया १३ गुजरान्या १४ जेठान्या १५ नाथड़ीवाल !


१० गौड़ राजपूतो से ५ गोत्र ---

१ गौड़ २ गंडेर ३ गंडे ४ गँवा ५ गंढीर !

११ पराशर ऋषि चंदेल राजपूतो से ४ गोत्र ---

१ चांदेल २ पावटवाल ३ चंदेला ४ चंडेला !

१२ मकवाना राजपूतो से २ गोत्र ---

१ मकवाना २ मकाना !

१३ दधिची ऋषि सुर्यवंश राठौड़ खांप दहिया से ३ गोत्र ----

१ दहिया (दीया) २ अडान्या ३ भुन्गरिया !

१४ अग्नि वंश चौहान खांप जोहिया से २ गोत्र --

१ जोहिया २ घरट !

१५ सुर्यवंश बडगुजर से १ गोत्र ---

१ बडगुजर

१६ पड़वाड़ीया १ गोत

१७ नाग वंशी टांक से २ गोत्र ----

१ नागवा २ टांक

साभार ----मेघवंश इतिहास (ऋषि पुराण)

लेखक -

स्वामी गोकुलदासजी महाराज

अलख स्थान ड़ूमाँडा
जिला अजमेर

प्रकाशक -सेवादास ऋषि

अलख स्थान ड़ूमाँडा

जिला अजमेर

मेघवाल के मंत्री बनने पर बंटी मिठाइयां


भीलवाड़ा। शाहपुरा से विधायक चुने गए कैलाश मेघवाल के मंत्री पद की शपथ लेने के बाद सुरेरा (सीकर)में भाजपा समर्थकों और मेघवाल समाज ने आतिशबाजी कर मिठाइयां बांट खुशी का इजहार किया।

शनिवार, 7 दिसंबर 2013

मेघवाल संत सांगलिया धूणी

संत गोस्वामी तुलसीदासजी ने संत शब्द की परिभाषा करते हुए लिखा है कि संतों का ह्नदय नवनीत के समान होता है। ऐसा कवि वर्ग का कहना है, लेकिन सही मायने में देखा जाए तो नवनीत तो तब द्रवित होता है, जब उस पर आँच आती है। परन्तु संत अपने पर आँच आने पर द्रवित नहीं होते हैं, बल्कि जब दूसरे प्राणियों पर आँच आती है, तब वे उनकी पीड़ा से द्रवित होते हैं। तुलसीदासजी की यह उक्ति आज भी हमारे समाज के कई संत महात्माओं और समाज सुधारक महापुरूषों पर खरी उतरती है। ऐसे ही संतों की श्रृंखला में एक महान समाजसेवी संत सांगलिया धूणी के भूतपूर्व पीठाधीश्वर श्री श्री 1008मानदासजी महाराज के परम शिष्य श्री श्री 1008श्री लादूदास जी महाराज हुए। जिनका सम्पूर्ण जीवन लोक कल्याण, परोपकार और जनसेवा को समर्पित रहा।
श्री लादूदासजी महाराज का जन्म सीकर जिले के हर्ष पर्वत की तलहटी में बसे एक छोटे से ग्राम कुण्डल की ढाणी में श्री पांचारामजी मेघवाल के घर हुआ। 20 वर्ष की उम्र में आपने सन्यास ग्रहण कर सांगलिया धूणी के महंत श्री मानदासजी महाराज से दीक्षा ले ली थी। श्री मानदासजी महाराज के ब्रह्यलीन होने पर आप सांगलिया धूणी के श्री महंत नियुक्त किए गए। आपने सन् 1956-57 में अपनी जन्म भूमि ग्राम कुण्डल की ढाणी में उच्च प्राथमिक विद्यालय का निर्माण करवाया। जिसको सन् 1962 में राजस्थान सरकार के अधिग्रहण में दे दिया तथा आपने सांगलिया ग्राम में बाबा लादूदास सीनियर सैकण्डरी स्कूल व आयुर्वेदिक औषधालय निर्माण करवाकर बाद में राजस्थान सरकार के अधिग्रहण में दे दिए।
इसके साथ-साथ आपने अनेक स्थानों पर पानी की प्याऊ, कुओं, बावडिय़ों आदि का भी निर्माण मानव सेवार्थ करवाया। श्रीलादूदासजी महाराज ने माघ सुदी पूर्णिमा सन् 1965 को श्री श्री 1008श्री लक्कड़दासजी महाराज का आश्रम सांगलिया धूणी में अपनी भौतिक देह त्याग दी। आपके पश्चात आपके उत्तराधिकारी शिष्य खींवादासजी महाराज सांगलिया पीठाधीश्वर बनें।
सांगलिया धूणी के दिव्य संत पुरूष बाबा खींवादासजी महाराज मेघवाल संत    बनें।
श्री श्री 1008 श्री भगतदासजी महाराज का जन्म सीकर जिले के नीमकाथाना तहसील के समीपवर्ती ग्राम पचलंगी में श्रीमति एवं श्री मुखराम मेघवाल के घर हुआ  सांगलिया धूणी    के     संत    बनें।
श्री श्री 1008 श्री बाबा बन्शी दास जी महाराज (वर्तमान पीठाधीश्वर)     सांगलिया धूणी    के     संत    बनें।

अपने युग के महान संत थे ( स्वामी लादूदासजी महाराज, खींवादासजी महाराज, श्री श्री 108श्री बंशीदासजी महाराज Sangliya Dhuni)

अखिल भारतीय सांगलिया धूणी सीकर जिले से 35 किलोमीटर दूर सीकर-डीडवाना रोड़ पर सांगलिया गांव की पावन धरा पर इस धूणी की स्थापना करीब सैंकड़ों वर्षों पूर्व बाबा लक्कड़दास जी द्वारा की जाने के कारण इसे लक्कड़दास बाबा का आश्रम भी कहा जाता है। बाबा के समय से अब तक इस धूणी पर बाबाजी के शिष्य एवं अन्य महान संतों द्वारा इस सांगलिया धूणी की मर्यादा को आगे बढाते हुए समाज सुधार व शिक्षा जैसे जनहित कार्यों के रूप में प्रसिद्ध दिलाई। लम्बे समय से यहाँ से पीठाधीश्वर विकास की ओर अग्रसर रहे। महान संत श्री श्री 1008श्री बाबा खींवादास महाराज के परम शिष्य श्री श्री 108श्री बाबा बंशीदासजी महराज गुरू की महिमा का बखान भक्तों को वाणी, प्रवचन तथा जागरण के रूप में प्रसाद स्वरूप भेंट कर रहे हैं।
वर्तमान पीठाधीश्वर श्री श्री 108श्री बंशीदासजी महाराज गुरू महिमा में कुछ शब्द बताने से पहले कहते हैं कि 'गुरू की मैं कहा तक करूं बड़ाई, महिमा मुख से वर्णन न जायी।Ó अखिल भारतीय सांगलिया धूणी के द्वारा जनहित में किए गए कार्यो से प्रभावित होकर भारत सरकार भूतपूर्व पीठाधीश्वर श्री श्री 1008श्री बाबा खींवादास महाराज को डॉ. भीमराव अम्बेडकर पुरस्कार भेंट कर अपने आपको गौरवान्वित महसूस कर चुकी है। बाबा खींवादासजी महाराज द्वारा शिक्षा को बढावा देने के लिए राज्य के विभिन्न हिस्सों में स्कूल-कॉलेजों का निर्माण करवाकर गरीब, अनाथ व छात्राओं को नि:शुल्क शिक्षा की व्यवस्था की। स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी बाबा का योगदान कम नहीं रहा। पश्चिमी राजस्थान के कई जिलों में सांगलिया धूणी द्वारा धर्मशालाएं बनवाई गई एवं पानी के लिए प्याऊ का निर्माण करवाया। पानी की प्याऊओं, कुओं का निर्माण करवाया। पानी सभी को एक रंग, एक रूप, एक ही स्वाद का संदेश देता है, इस प्रकार बाबा खींवादास जी ने इन्सान को अपने अन्दर देखने का पाठ पढ़ाते हुए सभी समाजों को एक छत के नीचे उठाते हुए ऊंच-नीच, जाति-पांति आदि के भेद-भाव से दूर होकर जन-कल्याण के कार्यो को सर्वोपरी बताया। उन्होंने ग्रामीण क्षेत्र में उच्च शिक्षा के लिए महाविद्यालय की स्थापना क्षेत्र में उच्च शिक्षा के लिए महाविद्यालय की स्थापना कर क्षेत्र के युवाओं का ध्यान धर्म कल्याण हेतु आकर्षित किया। वर्तमान समय में इस कॉलेज का नाम बाबा खींवादास स्नातकोत्तर महाविद्यालय है। जिसे क्रमोनत
करवाने एवं विभिन्न विषयों को खुलवाने का श्रेय वर्तमान पीठाधीश्वर श्री श्री 108 बाबा श्री बंशीदासजी महाराज को जाता है।
वर्ष 2001 रविवार जन्माष्ठमी को लाखों को भक्तों रोते-बिलखते छोड़कर श्री श्री 1008श्री बाबा खींवादास महाराज अपनी पार्थिव देह को माँ भारती की गोद में छोड़कर पंचतत्व में विलीन हो गए। इसके बाद उन्हीं के शिष्य बाबा भक्तदास जी महाराज को पीठाधीश्वर नियुक्त किया गया। जो अपनी भौतिक देह 4 फरवरी 2004 को त्याग कर भक्तों से विदा ले गए। तब इन्हीं के गुरू भाई एवं बाबा खींवादास के परम शिष्य गुणों की खान बाबा बंशीदासजी महान इस पीठ के पीठाधीश्वर बने।

बुधवार, 13 नवंबर 2013

धारुजी गोत्र पंवार (अग्नि वंश )मेघवंशी थे !

धारुजी गोत्र पंवार (अग्नि वंश )मेघवंशी थे !ये राव जोधाजी राठोड (जोधपुर संस्थापक )के पड्पोत्र तथा गांगाजी के पुत्र रावल मालदेव के समय मोजूद थे !मालदेवजी की स्त्री रूपादे और धारुजी ग्राम दुधवा (मारवाड़ )के रहने वाले थे ,दोनों बचपन से ही एक साथ रहते थे ,बाद में उगमसिंह भाटी से दीक्षा लेकर दोनों सत्संग में प्रवृत हो गये !रूपादे का विवाह जब मालदेव जी के साथ हुआ तब धारुजी को उनके दहेज़ में देकर रूपादे के साथ गढ़ मेंहवा (मालाणी)में भेज दिया था तब से वे वही रहने लगे !धारु जी साधू संतो की सत्संग में अधिक रहा करते थे और समय समय पर इनके यंहा भी संतो का समागम (सत्संग )होता रहता था ,बाई रूपादे भी कभी कभी चोरी चुपके धारुजी के घर सत्संग में आ जाया करती थी !सत्संगी होने की वजह से इनमे परस्पर किसी प्रकार का भेद-भाव जातीयता के आधार पर नही था !धारुजी अपना जातीय व्यवसाय (वस्त्र बुनने का कार्य करके अपनी जीविका निर्वाह करते )और साधू संतो की सेवा करते थे !

मुग़ल काल में बहती उगमसिंह ,धारुजी ,रूपादे ओर तत्कालीन अन्य साधू संत भी सत्संग ओर संत मत (कुंडा पंथ ) के द्वारा सेकड़ो दलित जातियों को शुद्ध तथा संगठन का हिन्दू धर्म की बड़ी भारी से सेवा की थी !
एक समय भाटी उगमसिंह धारुजी के घर आये ओर सत्संग करने का निश्चय करके समस्त सत्संगी तथा संतजनों को धारुजी द्वारा निमंत्रण दिया गया ,बाई रूपादे को भी निमंत्रण दिया गया !शाम को सत्संग शुरू हुआ ,सर्व संतजन उपस्थित हो गये ,मगर रूपादे की अनु उपस्थिती सबको खटक रही थी !बाई रूपा बड़ी कठिनता से मालदेवजी से छिपकर कई मुसीबतों का सामना करती हुई धारुजी के घर पहुंची !इधर किशी प्रकार से मालदेवजी की दूसरी पत्नी चंद्रावल की दासी ने उसे देख लिया ओर तत्काल रावल मालदेव को जगाया ओर रूपा दे के वंहा जाने की खबर दी तथा उनका क्रोध बढ़ने के लिए दो -चार चुभने वाली बाते बताई !रावल मालदेव उसी समय धारुजी के घर आये तो आगे सत्संग में रूपादे कोटवाली (सेवा टहल )करते देखकर आग बबूला हो गए लेकिन साधू संतो के पराक्रम से डरकर वंहा तो कुछ नही कह सके किन्तु वापिस आकर दरवाजे को रोक कर बैठ गये !रूपादे को मालदेवजी के आने खबर लग गई थी ,उसने विदा होते समय सब संतो से प्राथना की कि मेरा यह अंतिम प्रणाम है,क्योकि मालदेवजी स्वय यंहा आकर देख कर गये हैं ,अत:वे अब मुझे कदापि जीवित नही छोडेगे !यह सुनकर सबको बड़ा दुःख हुआ ओर उनकी रक्षा के लिए भगवान श्री रामदेवजी से प्रार्थना करने लगे !जब ज्यो ही किले के दरवाजे पर पंहुची ,तयो ही मालदेवजी ने उसे रोक कर तलवार निकाल शीश काटने उधत हो गये ,किन्तु तत्काल भगवान श्री रामदेवजी ने गुप्त रूप से तलवार को ऊपर ही रोक दिया !यह देखकर मालदेवजी बड़े शंकित हुए ,फिर भी उन्होंने रूपादे से पुछा कि रात्रि में तू कंहा गई थी ?रूपा दे ने जवाब दिया कि बाग में फुल लेन गई थी !मालदेवजी ने कहा कि यंहा नजदीक में कोई बाग ही नही हैं ,झूठ क्यों बोलती हो मैने तुझे धारु मेघवाल के घर देखा हैं ,फिर भी तू अगर बाग के लिए कहती हैं तो मुझे फुल बता !रूपादे ने बह्ग्वान से प्रार्थना कि हे प्रभु जिस प्रकार आपने द्रोपदी कि लाज रखी थी उसी प्रकार आज मेरी भी रक्षा करे !यह कहकर ज्यो ही उसने थाल को निकालकर दिखाया तो तो क्या देखते हैं की रूपादे सत्संग से जो प्रसाद ली थी उसके फुल बन गये हैं !रूपादे की इस चमत्कृत शक्ति को देख कर स्वयं मालदेव जी उसके पैरो में गिर कर क्षमा प्रार्थना करने लगे !रूपादे ने कंहा की यह सब भाई धारू मेघवाल की कृपा हैं !वही तुम्हे माफ़ कर सकता हैं !रावल मॉलदेवजी बड़े आतुर होकर रूपा दे से प्राथना करने लगे की मझे धारुजी के घर इसी समय ले चलो और मुझे क्षमा करके तुम्हारी सत्संग में ले लो !रूपादे मॉलदेवजी को साथ लेकर उसी समय धारुजी के घर आई और सब संतो ने उन्हें क्षमा करके दुसरे दिन किले में सत्संग नियत कर सर्व संत महात्माओ को धारुजी सहित वह बुलाकर सवयम मॉलदेवजी ने दीक्षा ली और जीवन पर्यन्त सत्संग में लीं रहकर अंत में धारुजी के बताये मार्ग पर चलकर अपने योगबल के द्वारा विक्रम संवत 1619 इ., सन 1562 अंतर्ध्यान हो गये !कहते हैं की ये सात जीव एक ही साथ योगबल द्वारा अंतर्ध्यान हुए थे !इनके नाम ये हैं १ रावल मॉलदेवजी २ बाई रूपादे ३ धारूजी ४ माता देवू (धारू जी के बड़े भाई की स्त्री )५ एलू ६ दलु कुम्हार ७ नाम देव छिपा!इनमे धारुजी सबमे मुख्य मने जाते थे और अन्यसब इन्हें गुरु के सामान मानकर इनके बताये मार्ग पर चलते थे !

इनका स्थान तलवाडा (मालाणी) बालोतरा जिला बाड़मेर राजस्थान में लूनी नदी के किनारे ,रावल मल्लिनाथजी के मंदिर के पास हैं !धारुजी भी इस मेघवंश जाती के प्रशिद्ध भक्त थे !इस मेघवंश जाती में " मालाणी"धुणी(जो चार धुणीयो ,में समसवाणी ,रामनिवाणी,हरचंदवाणी और चार मालाणी इन्ही से मानी जाती हैं !

शेर नर राजाराम मेघवाल भी जोधपुर नरेशो के हित के लिए बलिदान हो गए थ

शेर नर राजाराम मेघवाल भी जोधपुर नरेशो के हित के लिए बलिदान हो गए थे !मोर की पुंछ के आकर !वाले जोधपुर किले की नीव जब सिंध के ब्राह्मण ज्योतिषी गनपत ने राव जोधाजी के हाथ से वि ० स० 1516 में रखवाई गई तब उस नीव में मेघवंशी राजाराम जेठ सुदी 11 शनिवार (इ ० सन 1459 दिनाक 12 मई ) को जीवित चुने गए क्यों की राजपूतो में यह एक विश्वास चला आ रहा था की यदि किले की नीव में कोई जीवित पुरुष गाडा जाये तो वह किला उनके बनाने वालो के अधिकार में सदा अभय रहेगा !इसी विचार से किले की नीव में राजाराम (राजिया )गोत्र कडेला मेघवंशी को जीवित गाडा गया था ! उसके उअपर खजाना और नक्कार खाने की इमारते बनी हुई हैं ,इनके साथ गोरा बाई सती हुई थी !राजिया के सहर्ष किये हुए आत्म त्याग एवम स्वामी भक्ति की एवज में राव जोधाजी राठोड ने उनके वंशजो को जोधपुर किले पास सूरसागर में कुछ भूमि भी दी जो राज बाग के नाम से प्रसिद्ध हैं !और होली के त्यौहार पर मेघवालो की गेर को किले में गाजे बजे साथ जाने का अधिकार हैं जो अन्य किसी जाती को नही हैं !परन्तु उस वीर के आदर्श बलिदान के सामने यह रियायते कुछ भी नही हैं !

कंही -कंही राजिया और कालिया दो पुरुषो को नीव में जीवित गाड़े जाने का वर्तान्त भी लिखा मिलता हैं जो दोनों ही मेघवाल जाती के थे !

इस अपूर्व त्याग के कारण राज्य की और से प्रकाशित हुई कई हिंदी और अंग्रेजी पुस्तको में राजिया भाम्बी के नाम का उल्लेख श्रदा के साथ किया हैं !


आज से लगभग 135 वर्ष पहले इ ० सन 1874 (विक्रम संवत 1931 )में जोधपुर राज्य ने "THI JODHPUR FORT "नाम की अंग्रेजी पुस्तिका प्रकाशित की थी ,उनके पेज 1 पंक्ति 12 में अमर शहीद राजाराम मेघवंशी (भाम्बी )के आदर्श त्याग के विषय में यह लिखा हैं :-
-------------"its (Jodhpur )foundation was laid in 1459 A.D. when a man "bhambi rajiya "was interred alive in tha foundeto invoke good fortuneon its defenders and to ensurs its imprognabilityt "............"(vide "tha jodhpur for"page 1 line 12 frist edition ,1874 A.D.published by jodhpur state )
अर्थात ........इस किले (जोधपुर गढ़ ) की नीव इ ० सन 1459 (विक्रम संवत 1516 )में रखी थी तब एक राजिया भाम्बी (मेघवंशी)इस किले के स्थायित्व के लिए जीवित इसकी नीव में चुना गया )
वि ०स ० 1946 फाल्गुन सुदी 3 शनिवार( इ ०सन 1890 तारीख 22 फरवरी )को इंग्लेंड के ,राजकुमार प्रिंस एल्बर्ट विकटर ऑफ़ वेल्स ,भारत यात्रा करते जोधपुर तब स्टेट की और से "गाइड टु जोधपुर "(जोधपुर पथ प्रदर्शक )नाम की अंग्रेजी पुस्तक प्रकाशित हुई !उसके पृष्ठ 7 में राजाराम के लिए छपा :-.......................................
"......."tha fort (jodhpur)...............when tha foundation was laid ,aman rajiya bhambi by name ,was interred alive ,as an ausppicious omen,in a corner over which were built two apartments now occupied by tha treasury and tha nakar khana (country band) .in consideration of this sacrfice ,rao jodha bestowed a piece of land "raj bai bag"near sursagar,on tha desendants of tha deceased and exempted them from "begar"or forced lebour .........("vide guide to jodhpur 1890 A<D<page 7 published by tha order of H.H. tha maharaja jaswant singh G.C.S.I.,and maharaj dhiraj col .sir pratap singh K.C.S.I.&c. jodhpur on tha auspicious of tha visit his royal highness tha prince albert victor of wales. 1890 A.D. page 7)


अर्थात .................जब जोधपुर दुर्ग की नीव (इ ० सन 1459 में )रखी गई तब शुभ सगुन तथा उसके स्थायित्व के लिए राजिया भाम्बी नाम का पुरुष उसमे जिन्दा चुना गया !जन्हा पर खजाना और नक्कारखाना की इमारते बनी हुई हैं !इस क़ुरबानी के लिए राव जोधा ने उसके वंशधरो को कुछ भूमि सूरसागर (जोधपुर )के पास "राजबाग"नाम से इनायत की और उन्हें नि:शुल्क सेवा से बरी कर दिया !"

इ ० सन 1900 (वि ० स ० 1957 ) में राजपुताना के सर्जन लेफ्टिनेन्ट कर्नल डाक्टर एडम्स आई ० ऍम ० एस०; ऍम ० डी ० (इत्यादी)जोधपुर ने "दी वेस्टर्न राजपुताना स्टेट "नाम का अंग्रेजी में सचित्र इतिहास लन्दन में छाप कर पुन :प्रकाशित ! उसके पृष्ठ 81 में भी राजाराम के त्याग का उल्लेख हैं !

इस तरह से तत्कालीन जोधपुरस्टेट द्वारा प्रकाशित कई पुस्तको में राजाराम मेघवाल (राजिया)के बलिदान का उल्लेख मिलता हैं !

राजाराम मेघवाल

जोधाजी का महल बनाने का विचार था मसूरिया नामक पर्वत श्रृँग पर पर जल के अभाव के कारण स्थगित किया| उसी पर्वत पर रहने वाले एक फकीर ने पंचेटिया पर्वत पर बनाने की सलाह दी जो जोधाजी को पसंद आ गई| इसके एवज मेँ फकीर ने दो शर्ते रखी जो जोधा ने स्वीकार कर ली| पहली रामदेवजी के दर्शनार्थी पहले आश्रम मेँ आए|दुसरी वर्ष मेँ दो बार राज्य की तरफ से भेँट दी जाए| मेहरानगढ जिस पर्वत पर बना है उस पर एक झरने के पास एक योगी चिडियानाथ रहता था| उसका आश्रम किले के भीतर ले लिया तो वह नाराज हो जल अभाव का श्राप देकर 9 कोस दूर पालासनी गाँव मेँ चला गया जहाँ उसकी बनी हुई हैँ| जब जोधा को यह बात पता चली तो उसे सरदार मार्केट के पास एक मठ बनाया और योगी को निमंत्रण भेजा पर उसने कुछ दिन बाद आने का वादा किया| अंत मेँ कुछ दिन वहाँ ठहरा और उसी के पास शिवलिँग स्थापित किया| योगी के कहने पर जोधा ने रोज एक रोठ बनाकर साधु सन्यासी को देता था| झरने पास जोधा ने एक कुण्ड व शिवालय बना दिया जो झरनेश्वर महादेव के नाम से प्रसिद्ध हुए| विक्रम संवत 1515 जयेष्ठ सुदी 8 को दो मेघवालोँ( एक राजाराम मेघवाल) को नीँव के नीचे दफनकर किले का सुदी 11 कार्यारंभ किया| किले के द्वार की स्थापना मुहुर्त के समय उपयुक्त शिला नही लाए जाने पर वहाँ के पडोसी ऊँट चराने वाले के घर से बाडे की शिला लाकर स्थापित की| उस शिला मेँ द्वार बंद करने के लिए डंडोँ के छेद थ

नवरत्न मन्डुसिया

शादियों में फिजूलखर्ची रोककर शिक्षा पर धन खर्च करने का आह्वान, विवाह के नियम हुये आसान, सामूहिक विवाह के लिए उमड़े सैकड़ों लोग

 मेघवाल समाज का ऐतिहासिक फैसला, नानी का गोत्र छोड़ने की कुप्रथा बंद, अब शादियों के लिए मिलेंगे ज्यादा विकल्प कस्बे के टापरी रोड़ स्थित मेघवाल ...